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3 Mantras for Students to Make Real Effort Instead of Pretending

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1.छात्र-छात्राओं के लिए दिखावा करने के बजाय पुरुषार्थ करने के 3 मंत्र (3 Mantras for Students to Make Real Effort Instead of Pretending):

  • छात्र-छात्राओं के लिए दिखावा करने के बजाय पुरुषार्थ करने के 3 मंत्र (3 Mantras for Students to Make Real Effort Instead of Pretending) के आधार पर जानिए कि दिखावा क्यों न करें? सिर्फ किताब को पढ़ने से मस्तिष्क को लगता है कि सब समझ आ गया।वास्तविक पुरुषार्थ तब होता है जब किताब बन्द करके लिखें या बिना देखें सवालों को हल कर देते हैं।

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2.आजकल हर किसी को दिखावे की ललक (Nowadays everyone craves to show off):

  • इस संसार में अधिकांश विद्यार्थियों के अंदर स्वयं को अधिक श्रेष्ठ,अधिक सुंदर,कुछ विशेष,सबसे हटकर प्रदर्शित करने का एक गुण छिपा हुआ है।इसे महत्त्वपूर्ण दीखने का शौक भी कह सकते हैं।इस कारण अधिकांश विद्यार्थी और हर व्यक्ति इसी कोशिश में लगा रहता है कि कैसे वह सबकी नजरों में ऊपर चढ़ जाए।दूसरों की नजरों में अच्छा दीखने के लिए,अपनी छवि बनाने के लिए यदि विद्यार्थी को अनैतिक कार्य भी करना पड़ता है,तो वह उसे करने से नहीं कतराता।
    इस तरह के किए गए,अनैतिक कार्यों से वह अपने भविष्य के धरातल पर काँटे बोता रहता है,लेकिन उसे यह पता ही नहीं होता कि वह क्या कर रहा है और इसका परिणाम उसके लिए कितना दुःखदायी होगा!
  • यह सच है कि यह दुनिया दिखावे की है।यहाँ हर चीज दिखावट की वस्तु है।जो अपने को जितना सुंदर दिखाता है,वह उतना ही श्रेष्ठ कहा जाता है,लेकिन वास्तविकता कुछ भिन्न है।भिन्नता यह है कि जो भी वस्तु या चीज बाहर से जितनी सुंदर दिखाई जाती है या दीखती है,क्या वह अंदर से भी उतनी ही सुंदर है? (Equally beautiful) यदि है तो इससे सर्वोत्तम (best) कुछ भी नहीं और यदि नहीं है तो यह केवल एक प्रकार का आडंबर (Pomp) मात्र है।जो हमारी अंतश्चेतना पर एक ऐसा आवरण चढ़ा देता है,जिसके नीचे हमारी मौलिकता छिप जाती है और इसे हटाने के लिए हमें कठिन मेहनत करनी पड़ती है;क्योंकि यह एक ऐसा परदा होता है जिसे हमने स्वयं ओढ़ा है,खुद को स्वयं से दूर किया है।यह एक ऐसा अँधेरा होता है,जिसे हमने स्वयं आमंत्रित किया है,भले ही हम उसे उस समय नहीं समझ पाते और उसके दुष्परिणाम को नहीं जान पाते।
  • दिखावे की ललक में किए गए अच्छे कार्य अपनी दिव्यता और उससे अर्जित पुण्य संपदा (Acquired merit) को खो बैठते हैं। आज की दुनिया में विद्यार्थी अच्छा दीखना चाहते हैं,लेकिन अच्छा करना नहीं चाहते।ऐसे कम विद्यार्थी ही हैं,जो अच्छा दीखने के साथ अच्छा करना चाहते हैं।अधिकतर विद्यार्थी ऐसे हैं,जो अच्छा दीखने के फेर में बहुत कुछ बुरा कर्म करते रहते हैं।अच्छा दीखने की चाहत विद्यार्थी को अंदर से खोखला करती है और रिक्तता से भर देती है।
    इस दुनिया में अनेक ऐसे विद्यार्थी हैं,जो दिखावे की दुनिया में जीते हैं।ये वास्तविकता जानते हुए भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहते और किसी भी क्षेत्र में आगे
  • बढ़ने के लिए शॉर्टकट (Shortcuts) तलाशते हैं।कड़ी मेहनत और उसमें लगने वाले समय पर विश्वास नहीं करते और ऐसे तरीके ढूँढ़ते रहते हैं,जिससे जल्दी ही उन्हें फायदा मिले और कुछ करना भी न पड़े।ऐसे विद्यार्थी अपने व्यक्तित्व की मौलिकता को विकसित नहीं कर पाते,अपनी क्षमताओं को भी निखार नहीं पाते;क्योंकि वे अपने आप से ही बहुत दूर हो जाते हैं।

3.धनसम्पदा से अधिक मूल्य पुण्यसम्पदा का (Virtue and wealth are worth more than wealth):

  • दिखावे की इस दुनिया (This world of pretense) में रहने वाले यदि अपने जीवन में अच्छे कार्य करते हैं तो वह भी सिर्फ दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं,ताकि लोग यह समझें कि वे कितने अच्छे हैं और इस दिखावे के कारण वे यदि कुछ अच्छा कार्य करते भी हैं तो उसका कुछ भी पुण्य उनके जीवन में संचित नहीं हो पाता;अर्थात उनका जीवन पुण्यसंपदा से रिक्त ही रहता है।
  • उदाहरण के लिए यदि कोई विद्यार्थी एक बोतल रक्तदान दूसरों के लिए करता है,किंतु वह अपनी फोटो खिंचवाकर पेपर में छपवाता है तो एक बोतल रक्तदान करने से जो पुण्य उसके जीवन में संचित होना चाहिए था,वह पेपर में फोटो छपाने,दूसरों की नजरों में ऊपर चढ़ने और उनकी वाहवाही पाने में चला जाता है।
    इस संसार में धन-संपदा का मूल्य है (The value of wealth),लेकिन उससे भी अधिक मूल्य उसकी पुण्यसंपदा (The value of Virtues) का होता है।यह प्रत्यक्ष दिखाई तो नहीं देती,लेकिन निष्काम भाव (desirelessness) से किए गए अच्छे कर्मों के माध्यम से संचित होती रहती है।जिस विद्यार्थी में यह पुण्यसंपदा जितनी ज्यादा होती है,वह विद्यार्थी भौतिक जीवन में उतना ही सफल,समृद्ध और प्रसिद्ध होता जाता है।ऐसे विद्यार्थियों को सफल होने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती;क्योंकि उनके अंदर की पुण्यसंपदा उनकी इच्छाओं को शीघ्र पूरा करती जाती है।
  • इसके विपरीत विद्यार्थी के अंदर पापकर्मों की संपदा एकत्र हो जाने पर उसके जीवन में बीमारियाँ,असफलताएँ,निराशा,अत्यधिक कष्ट-कठिनाइयाँ,कठिन चुनौतियाँ,कर्ज,अशांति,कलह बने रहते हैं और उसका जीवन उसे घोर नारकीय प्रतीत होता है।ऐसे जीवन से हर कोई दूर जाना चाहता है,लेकिन विद्यार्थी के साथ जो है,वह उसके साथ रहेगा,चाहे वह कहीं भी जाए।यही कारण है कि ऐसे विद्यार्थी को कितना भी अच्छा वातावरण मिल जाए,वह थोड़ी देर तो खुश रहेगा (Will be happy),लेकिन कुछ समय बीतने पर अपनी पहले वाली मनःस्थिति में वापस आ जाएगा।पाप अपने साथ रोग,शोक,पतन,पराभव,निंदा,तिरस्कार लेकर आता है।
  • यह सच है कि जीवन में मिलने वाली कष्ट कठिनाइयाँ हमें अंदर से शुद्ध करती हैं,बुरे कर्मों के भोग को पूरा करती हैं और जीवन की सुंदरता को निखारती हैं,लेकिन जीवन के कठिन समय को समझना,स्वीकार करना और उसे जीना बहुत कठिन होता है।
  • उस समय अधिकतर विद्यार्थी स्वयं को कोसने के साथ नकारात्मक विचारों व भावनाओं से भी घिर जाते हैं,जो उनके लिए अच्छा नहीं होता,लेकिन यह कठिन समय हमारी चेतना को प्रकाशित करने के लिए आता है।इस समय हममें अपने जीवन को समझने (Understanding Life) का होश जाग्रत होता है और यह हमारी अंतश्चेतना को सामान्य क्षणों की तुलना में कुछ अधिक देकर जाता है,भले ही हम इसकी कीमत न समझ पाते हों।
  • जीवन में कभी ऐसा नहीं होता कि किसी विद्यार्थी के अंदर केवल पापसंपदा हो या केवल पुण्यसंपदा हो।यह अच्छी या बुरी संपदा उसके बीते हुए समय में किए गए कर्मबीजों पर निर्भर करती है कि उसने किस तरह के कर्म किए हैं,तदनुरूप ही उसके परिणाम भविष्य में मिलते हैं।यह परिणाम कब और किस तरह मिलेंगे,यह जानना सबके लिए संभव नहीं है;क्योंकि हमारे जीवन के ग्रह-नक्षत्र हमारे अतीत में किए गए कर्मों के अनुरूप व्यवस्थित हो जाते हैं और फिर समयानुसार घटनाएँ घटित होती रहती हैं,लेकिन एक अंतर्दृष्टि-संपन्न (Insightful) विद्यार्थी तथा व्यक्ति इसे आसानी से समझ सकता है।
  • विद्यार्थी का जीवन कैसा होगा,यह इसीलिए रहस्यपूर्ण है; क्योंकि आज हम जिस वर्तमान के धरातल पर खड़े हैं,वह अतीत की पृष्ठभूमि से पनपा है और आने वाले भविष्य का धरातल इसी वर्तमान की आधारशिला से उत्पन्न होने वाला है।यदि हम अपने जीवन को समझना चाहते हैं तो हमें अपने जीवन में ओढ़ी हुई उन परतों को पार करना होगा,जिनके भीतर हमारा अस्तित्व,हमारी मौलिकता छिपी हुई है।जीवन में अच्छे कर्म करने का सतत अभ्यास डालना होगा,ताकि हम उस पुण्यसंपदा को अर्जित कर सकें,जिससे हमारा जीवन सुरक्षित,शांतिपूर्ण,प्रकाशवान व सफल बन सके।इस संसार में वही सच्चे महापुरुष बने हैं,जिन्होंने दिखावे के जीवन का त्यागकर निष्काम भाव से लोकहित का मार्ग अपनाया है।अतः दिखावे की दुनिया से बाहर आकर हमें वास्तविक दुनिया में निष्काम भाव से जीना चाहिए।

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4.विद्यार्थी दिखावा न करें (Students should not show off):

  • अक्सर बिद्यार्थी (कुछ) अध्ययन करने का दिखावा करते हैं।वे घन्टों किताब लेकर बैठे रहेंगे और माता-पिता,अपने मित्रों,सम्बन्धियों को यह दिखावे की चेष्टा करते हैं जैसे वे पढ़ने के सिवाय और किसी काम को कोई तवज्जो नहीं देते हैं।ऐसा करके वे दूसरो को धोखा देने के साथ-साथ खुद को भी धोखा देते हैं,दूसरे की आँखों में धूल झोंकने के साथ-साथ खुद की आँखों में भी धूल झोंकते है।क्योंकि अन्ततः हमारी असलियत की पोल खुल जाती है।आप कब तक दूसरों को और स्वयं को धोखा देते रहेंगे।
  • असफल होने पर आपका यह कारण कि उसने तो खूब पढ़ाई की थी लेकिन क्या पता एग्जामीनर ने कम अंक कैसे दे दिए ? इस तरह का झूठ,पाखण्ड का चोला ओढ़कर दूसरों को एक-दो बार धोखा दे सकते हैं लेकिन बार-बार नहीं।इसलिए सच्चे सम्मान और यश की कामना है तो ईमानदारीपूर्वक अध्ययन करें,भले कम अंकों से उत्तीर्ण हो जायें परन्तु उससे आत्मसंतुष्टि मिलती है साथ ही माता-पिता व अन्य लोगों का आपके प्रति विश्वास बढ़ता है,आपका यश बढ़ता है।अतः हृदय और दिल से अध्ययन करें,आप लगातार कठिन मेहनत को,निष्काम कर्म को जीवन में अपनाएंगे तो धीरे-धीरे आपकी प्रगति होती जाएगी और आप देखेंगे कि आप शीर्ष पर जा विराजेंगे।
  • ईमानदारी से किया गया आपका पुरुषार्थ ही असरदार होता है,यही आपकी असली सम्पदा है,वही आपको यश और सम्मान दिला सकता है।ईमानदारी से की गई तैयारी का परिणाम आने में समय लग सकता है।लेकिन उसका स्वाद अनोखा और मीठा होता है।
    उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र-छात्राओं के लिए दिखावा करने के बजाय पुरुषार्थ करने के 3 मंत्र (3 Mantras for Students to Make Real Effort Instead of Pretending) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
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5.पढ़ने का ढोंग (हास्य-व्यंग्य) (Pretend to read) (Humour-Satire):

  • टीचर (छात्र से):क्या कर रहे हो?
  • छात्र:मैं पढ़ रहा हूँ।
  • टीचर:पर तुम्हारा ध्यान तो कहीं ओर है और हाथों में पुस्तक को पकड़े हुए हो।
  • छात्र:आपको मुझ पर विश्वास ही नहीं हो रहा है,जबकि मैं पढ़ रहा हूँ (छात्र बात को साधते हुए)।

6.छात्र-छात्राओं के लिए दिखावा करने के बजाय पुरुषार्थ करने के 3 मंत्र (3 Mantras for Students to Make Real Effort Instead of Pretending) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्नः1.छात्र-छात्रा पढ़ने का ढोंग क्यों करते है? (Why do students pretend to read?):

उत्तरःबिना मेहनत किए लोगों से,माता-पिता से वाहवाही और सम्मान पाने की कामना।माता-पिता,टीचर से डाँट-फटकार व प्रताड़ना से बचने के लिए।

प्रश्न:2.छात्र-छात्रा की असलियत कैसे पता लगती है? (How do you find out the true nature of the student?):

उत्तर:उसके परीक्षा परिणाम,व्यवहार,चाल चलन और तौर-तरीकों तथा दिनचर्या पर नजर रखने से पता लगाया जा सकता है कि वह वाकई में पढ़ रहा है या स्वाँग कर रहा है।कुछ समय के लिए ही धोखा दिया जा सकता है।परन्तु स्कूल,घर,कोचिंग सेन्टर या कहीं न कहीं उसकी असलियत सामने आ जाती है।

प्रश्न:3.विद्यार्थी को दिखावा क्यों नहीं करना चाहिए? (Why shouldn’t the student show off?):

उत्तरः क्योंकि एक न एक दिन उसकी असलियत पता चल जाती है और उसका मान-सम्मान घट जाता है।वह लोगों की नजरों से गिर जाता है।साथ ही उसे आमसंतुष्टि भी तभी मिलती है जब वह कठिन परिश्रम करके तथा सही उत्तर लिखकर उत्तीर्ण होता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र-छात्राओं के लिए दिखावा करने के बजाय पुरुषार्थ करने के 3 मंत्र (3 Mantras for Students to Make Real Effort Instead of Pretending) की प्राइमरी टर्म्स के बारे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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