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Understanding Freedom of Expression:Right and Reasonable Restrictions

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1.अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को समझना:अधिकार और उचित प्रतिबन्ध (Understanding Freedom of Expression:Rights and Reasonable Restrictions):

  • अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को समझना:अधिकार और उचित प्रतिबन्ध (Understanding Freedom of Expression:Rights and Reasonable Restrictions) को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि अक्सर लोग इसकी सीमा रेखा का उल्लंघन कर जाते हैं,पता ही नहीं चलता? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा होनी चाहिए या नहीं जानिए सम्पूर्ण जानकारी।हमारे अधिकार और उचित प्रतिबन्ध क्या हों?

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2.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मिसालें (Examples of Freedom of Expression):

  • बांग्लादेश की मूल निवासी (वर्तमान में भारत में निवास) तसलीमा नसरीन (Taslima Nasrin) ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत सबसे विषादास्पद और चर्चित पुस्तक ‘लज्जा’ लिखी है।इस उपन्यास में बांग्लादेश में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद वहाँ के अल्पसंख्यक समुदाय पर हुए अत्याचारों और साम्प्रदायिकता का यथार्थ चित्रण है।
  • दूसरी पुस्तक उन्होंने ‘शर्म’ लिखी है जो बहुत ही सनसनीखेज और साहसी किताब है,जिसमें उन्होंने अपने देश के छोटे हिन्दू समुदाय के एक परिवार की भयावह नियति का वर्णन किया है।उनकी और अनेक पुस्तकें हैं जो बेहद चर्चित रही है।
  • अभिव्यक्ति की आजादी के दूसरे उहाहरण हैं सलमान रुश्दी (Salman Rusdie) जिन्होंने 1988 में चर्चित पुस्तक द सैटेनिक वर्सेज लिखी है।चर्चित और प्रशंसित उपन्यासों में से एक है।अराजकता और चमत्कारों से भरी आधु‌निक दुनिया में लिखी गई यह पुस्तक एक धमाके के साथ शुरू होती है और यह धमाका होता है लंदन जा रहे एक विमान में उड़ान के दौरान हुए आंतकवादी बम विस्फोट से।उक्त दोनों लेखक ही इस्लाम के फतवों के जारी होने के कारण निर्वासित जीवन जी रहे हैं।
  • अभिव्यक्ति की आजादी की तीसरी मिशाल है दीपा मेहता।उन्होंने महिलाओं पर ज्यादती को दर्शाने के लिए दो फिल्में बनायी।पहली फायर समलैंगिकता विषय पर बनायी गयी फिल्म है और उसने बहुत ही बोल्ड विषय ही नहीं चुना था बल्कि उसको बोल्ड भी दिखाया था। फायर फिल्म 1999 में प्रदर्शित हुई थी और उस समय इसका काफी विरोध हुआ था।
  • इसके बाद 2000 में वाटर फिल्म बनायी।उसमें काशी में आयी बंगाली विधवाओं को आश्रम की संचालिका सेठों और जमीदारों को सेक्स के लिए विधवाएँ सप्लाई करती है।इस प्रकार यह फिल्म बेहद चर्चित होती है।
  • अभिव्यक्ति की आजादी की अगली पुस्तक है।’मी नानूराम बोलतोय’ पर इतना बवाल मचा कि उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।मकबूल फिदा हुसैन भी अपनी कला के लिए एक प्रसिद्ध कलाकार रहे है।उन्होंने सरस्वती माँ की नग्न चित्रकारी करके विवाद खड़ा कर दिया था।
    इसी प्रकार क्या अभिव्यक्ति की आजादी के तहत पत्रकार द्वारा अपराधी,अभियुक्त का साक्षात्कार लेना और अखबार या पत्रिका में छापना जायज है। आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेंस और उसके दो पुत्रों की हत्या करके रविन्द्रपाल सिंह उर्फ दारासिंह का साक्षात्कार लेने वाले पत्रकार विश्नोई भूषण पटनायक को 5 अप्रैल 1999 से क्योंझर पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया था। पत्रकार की गिरफ्तारी से यह सवाल उठ खडा हुआ कि क्या पत्रकारों द्वारा स्वतंत्र और निर्भीक होकर अपना काम अंजाम देने का अधिकार गलत है।
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पब्लिक स्कूलों की छठी कक्षा में पढ़ाई जानेवाली इतिहास और नागरिक शास्त्र की एक किताब ने सितम्बर 1999 में मुस्लिमों को आक्रोशित कर दिया।
  • इस “छठी क्लास के लिए ‘कंप्रीहेंसिव हिस्ट्री एंड सिविक्स’ नामक किताब में पैगम्बर हजरत मोहमद साहब का आपत्तिजनक रेखाचित्र तथा मुसलमानों के मजहब से जुड़ी झूठी बातें छापी गयी।मुस्लिम समाज (muslim society) को किताब में छपे जिन उल्लेखों पर आपत्ति है वे हैं:पहला इस्लाम तलवार के जोर पर चलता है।दूसरा:मोहम्मद साहब मक्के से मदीना भाग कर गये थे।
  • तीसरा-कुरान मोहम्मद साहब का पैगाम है।चौथा-इस्लाम को हजरत मोहम्मद साहब ने बनाया है। इसके अलावा इस ‘कंप्रीहेंसिव हिस्ट्री एंड सिविक्स’ के पृष्ठ 104 पर हजरत मोहम्मद का काबे में काला पत्थर लगाते हुए एक रेखाचित्र भी छापा गया है।विवाद का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी था कि इस किताब के ऊपर मोटे अक्षरों में अंग्रेजी में लिखा गया था,’कन्फर्म्स टू द लेटेस्ट सिलेबस प्रेस्क्राइब्ड बाई द नेशनल कौसिल ऑफ एजूकेशनल रिसर्च एण्ड ट्रेनिंग (NCERT)।’ पुस्तक के ऊपर एनसीईआरटी छपा होने से प्रकरण में कुछ ज्यादा गर्माहट इसलिए आ गयी क्योंकि एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) भारत सरकार की एक बड़ी शैक्षिक संस्था है।छठी क्लास की इस विवादास्पद किताब को गुडगांव (हरियाणा) के द्रोणाचार्य शासकीय विद्यालय के पीसी पोपली और जेएम गाँधी ने संपादित किया था।
  • ऊपर विवादों की फेहरिस्त के बाद अब जो विवाद हुआ था वह भी NCERT की एक पुस्तक से सम्बन्धित है।
    हाल ही में फरवरी 2026 में NCERT प्रकाशित कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” (corruption in Judiciary) विषय पर छपे एक अध्याय को लेकर विवाद हुआ।NCERT की इस किताब के अध्याय 4 (हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका) में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ी सामग्री शामिल की गई थी।सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने इस पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की एक “सोची-समझी” चाल बताया था।
  • इसके बाद NCERT ने बिना शर्त माफी मांगी और शिक्षा मंत्रालय ने उस विवादित हिस्से पर रोक लगा दी। सरकार ने इस मामले की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति भी गठित की थी।सुप्रीम कोर्ट ने NCERT पुस्तक विवाद में अपना पुराना आदेश बदल दिया है और न्यायपालिका से सम्बन्धित लेखकों से दूरी बनाने के निर्देश को वापस ले लिया है,ताकि संस्थाएँ अपने स्तर पर निर्णय ले सकें।न्यायपालिका और केन्द्र सरकार से जुड़े विवादों के हल के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction होता है।

3.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वरूप (The nature of freedom of expression):

  • हम सब अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर हैं परन्तु हम में से कितने व्यक्ति हैं जो वाल्टेयर की तरह यह कह सकें कि यद्यपि मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ तथापि तुमको अपनी बात कहने की आजादी के लिए मैं जन्म भर संघर्ष करने को तैयार हूँ।
  • हम स्वयं तो मनमानी कभी-कभी अवांछनीय कथन की भी स्वतन्त्रता चाहते हैं परन्तु सामने खड़े व्यक्ति को ऐसा करते हुए नहीं देख सकते हैं
    पिछले कुछ वर्षों से अभिव्यक्ति की एक पक्षीय स्वतंत्रता की मानसिकता को लेकर हमारे देश में पुस्तकों पर प्रतिबन्ध और जलाने (Fire of Book) की परम्परा चल पड़ी है।सर्वप्रथम रामचरित मानस की प्रतियाँ जलाई गई क्योंकि उसमें “ढोल गँवार शूद्र पशु नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी॥चौपाई थी।
    इसके बाद कुरान को लक्ष्य करके सलमान रश्दी द्वारा लिखी गई पुस्तक जलाई गई।इतना ही नहीं उनकी हत्या करने का फरमान जारी कर दिया गया जो अभी तक लागू है।फलतः रश्दी साहब अभी तक अपने प्राणों की रक्षा के लिए इंगलैण्ड में छिपे बैठे हैं।
  • इस प्रकार की अन्तिम घटना है डॉ भीमराव अम्बेडकर को लक्ष्य करके अरुण शौरी द्वारा लिखी गई पुस्तक जिसकी प्रतियाँ देश की सर्वोच्च संस्था संसद में जलाई गई,जो जगह राष्ट्रीय हित सम्बन्धी बहस के लिए बनाई गई है।
  • प्रश्न यह है कि पुस्तकों को जलाने से पुस्तक के रचयिता की बात क्या अनकही हो जाएगी अथवा क्या आकाश में उसकी व्याप्ति को निर्मूल किया जा सकेगा।
    अभिव्यक्ति का कोई निश्चित रूप नहीं होता है और न उसके रूप निश्चित किए जा सकते हैं।पुस्तकों का जलाना भी अभिव्यक्ति का एक रूप है।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दीवानों का वश चले तो वे पुस्तक लिखने वालों की हत्या ही कर दें।क्रोध होता है वस्तुतः लेखक के प्रति उसको उतारा जाता है पुस्तक पर।
    बुरी पुस्तक का जवाब अच्छी किताब है।विरोधी यदि ऐसी पुस्तकें लिख सकें जिसको पढ़ कर लोग तुलसीदास,सलमान रश्दी,अरुण शौरी की रचनाओं को भूल जाए तो विरोध भी सार्थक एवं प्रभावी हो तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का पालन भी सही दिशा में हो जाए,परन्तु बहुत कम लोगों में किताब लिखने की क्षमता होती है।अतः वे उस किताब पर टूट पड़ते हैं जिसे वे बुरी समझते हैं।
  • यदि अवसर मिल जाए तो लेखक को जलाकर अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक नया आयाम प्रदान कर दें।उक्त विरोध में बुराई का विरोध कम है,बुराई करने वाले के प्रति विरोध अधिक है।बुराई करने वाले का विरोध उसकी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाएगा,जबकि उसकी कृति युगों तक बनी रहेगी।
    गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस इसका ज्वलन्त प्रमाण है।इसी कारण प्रत्येक धर्म के आचार्यों ने कहा है कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं।पापी से घृणा करके हम अपने को असद विचारों के परिवेश के सुपुर्द कर देते हैं,जबकि पाप से घृणा करके हम प्रकारान्तर से सद‌विचारों के परिवेश का निर्माण करते है और पाप से दूर रहने के प्रति सचेष्ट होते हैं।
  • पुस्तकों को जलाने की घटनाओं के सन्दर्भ में हमारा कहना है कि देश के विद्वानों तथा राजनेताओं को अपनी ऊर्जा सामाजिक कलह को न्याययुक्त ढंग से शान्त करने में लगानी चाहिए,न कि उसे और उद्‌दीप्त करने में।वे यदि कुछ शोधकर्ताओं को उक्त पुस्तकों के विरोध में अधिक प्रामाणिक एवं सशक्त रचनाएँ प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित कर सके तो बात ही क्या है:नकरात्मक विरोध सकारात्मक बन जाए और नवनिर्माण की एक स्वस्थ परम्परा का प्रवर्तन भी हो जाए?
    पापी से घृणा करके हम वस्तुतः पाप करते हैं।पाप सदैव सन्ताप को जन्म देता है और कर्ता को उसके दुष्परिणाम भोगने ही पडते हैं।पाप की कल्पना आरम्भ में अफीम के फूल की तरह सुन्दर और मनोहारिणी होती है,किन्तु अन्त में नागिन के आलिंगन की तरह विनाशमयी सिद्ध होती है।
    पापी से घृणा न करके पाप से घृणा करने के उदाहरण हमारे इतिहास में भरे है।पाप से घृणा करना और पापी के प्रति सदभाव की प्रवृत्ति अनेक इतिहास पुरुषों की जीवन पद्धति बताई गई है।
  • रोमवासियों ने जब महात्मा ईसा को सूली पर लटकाया था,तब उन्होंने यही कहा था:वे नहीं जानते हैं कि वे क्या पाप कर रहे हैं? हे परमपिता इनको क्षमा कर देना।विक्टर ह्यूगो के उपन्यास ‘मिजरेबिल’ में भी बिशप अपने घर में चोरी करने वाले व्यक्ति को प्रेमपूर्वक क्षमा कर देता है और समाज को सन्देश देता है कि वह चोर से नहीं,चोरी की मनोवृत्ति से घृणा करें।आधुनिक काल में महात्मा गांधी तथा मार्टिन लूथर किंग ने उन शासकों के प्रति कभी भी दुर्भावना की अभिध्यक्ति नहीं की,जिन्होंने उनको वर्षों तक कारावास में रखा और शारीरिक यातनाएं दीं।महात्मा गांधी तो बार-बार यही कहते थे कि अंग्रेजों का विरोधी नहीं हूँ,अंग्रेजी शासन का विरोधी हूँ।यद्यपि अनेक व्यक्ति महात्मा गांधी के उक्त कथन में धूर्तता एवं चकमा देने के प्रयत्न का दर्शन करते थे,तथापि कालान्तर में समस्त विश्व ने यह स्वीकार कर लिया कि महात्मा गांधी सच्चे अहिंसक थे,क्योंकि उनके मन में अपने प्रबलतम विरोधी के प्रति भी हिंसामूलक घृणा का भाव नहीं था।
  • पापी नारी को पत्थरों द्वारा मार डालने के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए महात्मा ईसा ने कहा था कि “इसके पहला पत्थर वह मारे जिसने कभी कोई पाप न किया किया हो।सब निश्चेष्ट होकर खड़े रह गए थे।”

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4.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का निष्कर्ष (Conclusion to freedom of expression):

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा रेखा या लक्ष्मण रेखा तय करना बहुत मुश्किल काम है और यदि इसकी लक्ष्मण रेखा खींच भी दी जाये तो उस नियम या कानून को लागू करने वाले अपने तरीके से उसका अर्थ निकालते हैं।
  • उदाहरणार्थ हिन्दू मन्दिरों में नग्न स्त्रियों और प्रेमालाप करते हुए स्त्रियों की मूर्ति और चित्र मिल जाएंगे।इसी प्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने सरस्वती माता का नग्न चित्र बनाया था।परन्तु दोनों की मंशा में अन्तर है।कई बार लेखक या व्यक्ति जल्दी से जल्दी पापुलर होने के लिए भी विवादित पुस्तकें लिख देते हैं या ऐसे स्पीच दे देते हैं जो विवादित हो या ऐसी फिल्में अथवा चित्र बना देते हैं जो चर्चा में आए और उनकी पुस्तक,चित्र या फिल्म ज्यादा से पापुलर हो।
    सारांश यह है कि व्यक्ति या संगठन की मंशा से ही पता चलता है कि उसने अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का दुरुपयोग किया है या नहीं।मंशा को जानना भी तो मुश्किल है परन्तु व्यक्ति के चाल,चरित्र और व्यवहार से उसकी मंशा को जाना जा सकता है।
  • वास्तविक रूप में अन्ततः किसी भी व्यक्ति का चाल-चरित्र और मंशा का पता चल ही जाता है चाहे वह अपने आपको कितना ही छुपाने की कोशिश करे।कहीं न कहीं,कभी न कभी उसकी असलियत पता चल ही जाती है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को समझना:अधिकार और उचित प्रतिबन्ध (Understanding Freedom of Expression:Rights and Reasonable Restrictions) के बारे में विस्तार से उदाहरणों के द्वारा वर्णन किया गया है।
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5.छात्र के लिए लेख लिखने की शर्तें (हास्य-व्यंग्य) (Conditions for Writing Articles for Student):

  • टीचर (छात्र से) :आपको अमुक विषय पर लेख लिखना है।लेकिन इसकी कुछ शर्तें हैं।
    छात्र:कौनसी?
  • टीचर:आपको ये नहीं करना है,वो नहीं लिखना है,आपको विवादित बातें नहीं लिखना है।आपको इन बातों का भी ध्यान रखना है।
  • छात्र:आपने इक्कीस तरह की शर्ते लगा दी हैं,मेरे हाथों में हथकड़ी डाल दी है फिर लेख क्या खाक लिखूँगा।बेवजह विवाद करने वाले भी हैं और विवादित लेख लिखने वाले भी हैं।

6.अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को समझना:अधिकार और उचित प्रतिबन्ध (Frequently Asked Questions Related to Understanding Freedom of Expression:Rights and Reasonable Restrictions) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्नः1.विरोध से कोई बदलता है क्या? (Does the opposition change anyone?):

उत्तर:विरोध उत्साहियों को सदैव उत्तेजित करता है,उन्हें बदलता नहीं।

प्रश्न:2.क्या विरोध से न्यक्ति का विकास होता है? (Does opposition lead to the development of a person?):

उत्तर:कठिनाई और विरोध वह देशी मिट्टी है जिसमें पराक्रम और आत्मविश्वास का विकास होता है।

प्रश्न:3.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग कैसे करें? (How to exercise freedom of expression?):

उत्तर:कुछ लिखने और बोलने से पहले उसके परिणाम पर भी विचार कर लेना चाहिए।अच्छा संदेश देने की नीयत और मंशा होनी चाहिए।हमारे कुछ अधिकार हैं तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हमारे कुछ कर्त्तव्य भी हैं।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को समझना:अधिकार और उचित प्रतिबन्ध (Understanding Freedom of Expression:Right and Reasonable Restrictions) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में बताया गया है।
  • *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*

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