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9Spells to Increase Intellectual Power

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1.बौद्धिक बल बढ़ाने के 9 मंत्र (9Spells to Increase Intellectual Power),बौद्धिक बल कैसे बढ़ाएं? (How to Increase Intellectual Strength?):

  • बौद्धिक बल बढ़ाने के 9 मंत्र (9Spells to Increase Intellectual Power) के आधार पर आप जानेंगे कि बुद्धि बढ़ाने के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं और उसको बढ़ाने के लिए हमें क्या कुछ करना चाहिए? सांसारिक,व्यावहारिक कार्यों के लिए विशेष कर छात्र-छात्राओं के लिए बुद्धि बल की विशेष आवश्यकता होती है।
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  • बोर्ड,काॅलेज और प्रवेश परीक्षाओं के दृष्टिकोण को देखते हुए विशेष रूप से उपयोगी विशेष लेख।

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2.बुद्धि दैवीय वरदान है (Wisdom is a divine gift):

  • बुद्धि भगवदीय विभूति है।यह हर एक मनुष्य को मिली हुई है।यहाँ सर्वथा बुद्धिहीन आदमी शायद कोई भी नहीं।जिसे हम मूर्ख या बुद्धिहीन कहते हैं,उसमें बुद्धि का बिल्कुल अभाव नहीं होता।एक अध्यापक की दृष्टि में किसान मूर्ख है,क्योंकि वह साहित्य के क्षेत्र में कुछ नहीं जानता,किन्तु परीक्षा करने पर मालूम होगा कि किसान को खेती के सम्बन्ध में पर्याप्त होशियारी,सूझ और योग्यता है।इसी प्रकार एक वकील की दृष्टि में अध्यापक मूर्ख है,कारण कि कानून की बारीकियों के बारे में वह एकदम अनभिज्ञ है।डॉक्टर कदाचित वकील को मूर्ख समझे,क्योंकि वह यह भी नहीं जानता कि जुकाम हो जाने पर उसकी क्या चिकित्सा करनी चाहिए।इन सब बातों पर विचार करते हुए ऐसा मनुष्य मिलना कठिन है,जो पूर्णतः निर्बुद्धि कहा जा सके।
  • यहां जानने योग्य बात यह है कि प्रत्येक के अपने-अपने निजी विषय अलग होते हैं।एक वकील है,तो दूसरा किसान।एक पढ़ा-लिखा है जबकि दूसरा अशिक्षित।दोनों को ही अपने-अपने विषयों की योग्यता होगी।न्यूनाधिकता तो इस सृष्टि का नियम है।किसी की किसी से समानता तो हो नहीं सकती।जिस प्रकार सब मनुष्यों की आकृति भिन्न-भिन्न है,उसी प्रकार योग्यता भी पृथक-पृथक है।जो जितना प्राप्त कर सकता है,उतना पदार्थ उसके पास है।प्रयत्न करने पर उसे बढ़ा लेगा या प्रमाद में गँवा देगा।’बुद्धिहीन’ शब्द का जब प्रयोग किया जाता है,तो कहने वाले का तात्पर्य उसकी बुद्धि शक्ति से नहीं होता,क्योंकि पागलों को छोड़कर असल में कोई भी बुद्धिहीन नहीं है।जब किसी व्यक्ति को सामाजिक नियमों का ज्ञान नहीं होता,दूसरों से किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए,यह नहीं जानता,तो आम प्रचलन में उसे ‘जंगली’ अथवा ‘मूर्ख’ कह दिया जाता है,किंतु वास्तविक मूर्ख यथार्थ में वह है,जो अपनी योग्यता को नहीं समझता और बिना सोचे-समझे कार्य करके असफलता प्राप्त करता है।कार्य कोई भी असंभव नहीं है,लेकिन अपनी योग्यता,वर्तमान साधन और परिस्थिति आदि का ध्यान रखे बिना जो आरंभ होता है,वह असफलता की ओर ले जाता है।इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि,जो सामाजिक नियमों का पालन करना जानता है,वह बुद्धिमान कहा जाएगा।चतुर वह है,जो अपने व्यवसाय में बाहरी परिस्थितियों का ठीक प्रकार समन्वय करना जानता है।किसी विषय विशेष का ज्ञान प्राप्त करना तीव्र इच्छा और उचित शिक्षा क्रम पर निर्भर है,जो मनुष्य अपूर्ण या रोगी नहीं है,वह उस स्थिति को थोड़े-से ही प्रयत्न से प्राप्त कर सकता है,जिसमें उसको बुद्धिमान कहा जा सके।

3.अभ्यास से बुद्धि तीव्र होती है (Practice sharpens the intellect):

  • यों तो बुद्धि भगवान ने हर एक को दी है।इतने पर भी प्रयास,अभ्यास और लगन द्वारा उसे प्रखर बनाए रखने की निरंतर आवश्यकता पड़ती है।जो इस दिशा में कृपणता बरतते,उनकी बुद्धि कुंद पड़ जाती और जंग लगे लोहे की तरह निकम्मी साबित होती है।जितना अभ्यास करेंगे,जितना प्रयास करेंगे उतना ही हमें भूला हुआ याद आता जाएगा और हमारा बुद्धिबल बढ़ता जाएगा।सतत और निरंतर विकास करते रहना होगा।फालतू बातों और कामों में समय नष्ट न करके अपनी पाठ्यपुस्तकों को पढ़ने व समझने के बाद जो समय बचे उसका उपयोग भी ज्ञानवर्द्धक पुस्तकें,पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने में करना होगा।अतः बुद्धिबल बढ़ाने के लिए सबसे पहला और सर्वश्रेष्ठ उपाय विद्या का अभ्यास करना,सतत अभ्यास करना।

4.कल्पनाशक्ति से बुद्धि प्रखर होती है (Imagination sharpens the intellect):

  • मनःशास्त्रियों ने बुद्धिबल बढ़ाने के कुछ ऐसे उपाय-उपचार सुझाए हैं,जिनके संपादन से बुद्धि तत्त्व की तीक्षणता को प्रभावित-उत्तेजित किया जा सकना सम्भव है।इनमें से द्वितीय है कल्पनाशीलता।जिस मस्तिष्क में इसका अभाव है एवं जो अपनी दीन-दयनीय स्थिति से समझौता करके उसे संतुष्ट हो जाता तथा आगे की बात सोचने की जरूरत नहीं समझता,उसे एक प्रकार से पशु ही समझना चाहिए।पशुओं में इस क्षमता का अभाव होता है,अतएव वे बुद्धि-कौशल में आदमी के समकक्ष नहीं होते।काल्पनिक चित्र बनाना और योजनाओं की मानसिक रूपरेखा तैयार करना ऐसे कार्य हैं,जो मस्तिष्क पर दबाव डालते और बुद्धि को उद्बुद्ध और विकसित होने के लिए विवश करते हैं।यहाँ ‘कल्पनाशीलता’ का तात्पर्य शेखचिल्लियों जैसी कल्पना-जल्पना से नहीं है।इससे तो आदमी बहकता और अनावश्यक शक्ति-क्षरण होता है। यहाँ इसका संबंध अपने कार्यक्षेत्र के क्रियाकलापों एवं भविष्य की योजनाओं के उन मानसचित्रों से है,जिन्हें क्रियान्वित करने से पूर्व मानसपटल पर उन्हें साकार करना पड़ता और तर्क एवं तथ्यपूर्ण ढंग से बार-बार यह विचारना पड़ता है कि इसमें सफलता-असफलता की कितनी संभावना सन्निहित है।
  • किसी को यदि कोई व्यापार करना हो,तो उसकी कल्पनाशक्ति ऐसे मानसचित्र बनाएगी कि यह व्यापार करने से अमुक को इतना लाभ हुआ,इस वस्तु के ग्राहक अमुक स्थान में अधिक हैं,अमुक स्थान पर यह वस्तुएं सस्ती मिलती हैं,इसलिए इन्हें वहां से खरीदना चाहिए,अमुक महीनों में अमुक प्रकार की वस्तुओं की बिक्री बढ़ जाती है और अमुक प्रकार की घट जाती है,अतएव समयानुसार आवश्यक वस्तुएं खरीदनी चाहिए।इस प्रकार की सारी व्यवस्था के कल्पनाचित्र आरंभ में वह बनाएगा और यदि निर्णयशक्ति ठीक हुई,अनुभव के आधार पर इस कल्पना में ठीक संशोधन कर सका,तो एक उत्तम योजना बन जाएगी और उसे कार्यरूप में लाकर लाभ उठाया जा सकेगा,किंतु जिसके मन में इस प्रकार की उड़ानें नहीं उड़तीं,वह मजदूरी करने या ढर्रे के काम पर चलते रहने के अतिरिक्त और कुछ न कर सकेगा।इसीलिए बुद्धि को कल्पना का एक संस्कारित स्वरूप कहा गया है।

5.एकाग्रता से बुद्धि का विकास (Development of Intelligence through Concentration):

  • चित्त की एकाग्रता का संबंध रुचि से है।रूखे और अरुचिकर विषयों में मन नहीं लगता और वहां से बार-बार उचटता है,इसलिए जिस विषय पर मन लगता है,उसे रुचिकर बनाना चाहिए।जिन विद्यार्थियों को ज्यामेट्री और गणित के विषय में रूखे जान पड़ते हैं,इसलिए वे इससे बचते हैं,गणित के सवाल हल करने से बिदकते हैं।किंतु जिन विद्यार्थियों की गणित विषय में रुचि होती है उन्हें गणित सरस लगता है,वे गणित को खूब दिलचस्पी के साथ पढ़ते हैं,बार-बार पढ़ते हैं,खूब अभ्यास करते हैं।यहां यह न सोचना चाहिए कि अमुक विषय सरस है और अमुक नीरस।संसार में कुछ भी नीरस नहीं है।केवल मन को उनके अनुकूल बनाने की योग्यता में अंतर है।एक मजदूर को पढ़ने के काम में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है,किंतु एक विद्यार्थी की पढ़ने में रुचि होती है तो वे बड़े चाव से अध्ययन करते हैं,वे साइंस व गणित में डायग्राम भी बड़ी खूबसूरती से बनाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।संभव है कि धोबी को अध्यापक का काम नीरस मालूम पड़े,पर उसके लिए वही अपना कार्य बहुत मनोरंजक है।तपस्वी लोग भूखे-प्यासे निर्जन स्थानों पर रहते हैं,शीत,धूप के कष्ट सहते हैं,यह सब उनकी रुचि के अनुकूल होता है,इसलिए उस दशा में भी उन्हें प्रसन्नता ही रहती है।दूसरे मनुष्य को यदि उसमें रुचि नहीं है,तो वही उसके मन उचटने का कारण है।
  • एकाग्रता से कार्यशक्ति को बड़ी उत्तेजना मिलती है। कमजोर मस्तिष्क को भी एकाग्रता की प्रेरणा अद्भुत प्रतिभा-संपन्न बना देती है।इसे यों समझें।एक नदी दौ सौ गज चौड़ी और पाँच गज गहरी है।यदि उसकी चौड़ाई दस गज कर दी जाए,तो निश्चय ही गहराई पहले की अपेक्षा बहुत अधिक हो जाएगी और पानी के बहाव का वेग भी काफी बढ़ जाएगा।एकाग्रता की शक्ति ऐसी ही होती है।चिंतन के विस्तार को समेटकर उसे किसी एक विषय पर केंद्रीभूत कर लेने पर उस विषय के एक-से-एक रहस्य उजागर होने लगते हैं और चिंतक को उसमें वरिष्ठता और विशिष्टता प्राप्त हो जाती है।ऐसा एकाग्रता के अभाव में शक्य नहीं है।
  • अपने मस्तिष्क की बिखरी ऊर्जा को केंद्रित करके बड़े-से-बड़ा लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।जब मानसिक ऊर्जा बिखरी हुई होती है तो सरल से सरल कार्य को करना कठिन जान पड़ता है।आतिशी शीशे से सूर्य की किरणों को केंद्रित करने से कागज जल उठता है।ठीक ऐसे ही हमारी मानसिक ऊर्जा को एकजुट करके किसी एक लक्ष्य पर लगा देने से अप्रत्याशित परिणाम देखने को मिलते हैं।मन को एकाग्र करने के लिए हमने कई लेख लिखे हैं,उन्हें पढ़कर मन को एकाग्र किया जा सकता है।अस्तु बुद्धिमान बनने के लिए एकाग्रता संपादन अनिवार्य है।

6.जिज्ञासु बुद्धिमान बन जाता है (The inquisitive becomes intelligent):

  • जिज्ञासा-जानने,समझने और सीखने की इच्छा यदि मनुष्य में न होती,तो शायद वह आज की उन्नत स्थिति में ना होकर मूढ़ ही बना रहता।किसी चीज के प्रति इच्छा का होना या ना होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।वह किसी की प्रगति को विकसित या बाधित कर सकती है।इसकी उपादेयता को स्वयं प्रजापति ब्रह्मा ने भी ‘एककोअहम बहुस्याम्’ कह कर प्रकारांतर से स्वीकार ही किया है।आज उस महान इच्छा का ही परिणाम है कि यह बहुरंगी सृष्टि बन पड़ी और अनेकानेक प्रकार की सत्ताएं अस्तित्व में आई।ऐसा नहीं हुआ होता,तो अब की यह सुंदर पृथ्वी वीरान और बंजर पड़ी रहती।न यहाँ वृक्ष-वनस्पतियाँ होतीं,ना पहाड़-पर्वत,सर्वत्र शून्य ही पसरा रहता।
  • अतएव इच्छा की महत्ता का बखान करने के लिए उपर्युक्त आदि वाक्य ही पर्याप्त है।ज्यादा कुछ कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं।फिर भी इसकी विशेषताओं पर चिंतन-मनन करने पर ज्ञात होता है कि जिस अंतराल में यह विकसित होती है,उसका मस्तिष्क एक प्रकार का चुंबकीय गुण प्राप्त कर लेता है,जिससे उसका इच्छित विषय अपने आप खिंचता रहता है।कहते हैं कि वैद्य को रोगी हर जगह मिल जाते हैं।एक दूसरी कहावत है कि बेगारी को स्वर्ग में भी बेगार मिलेगी।इन उक्तियों में सत्य का अंश यह है कि उसका मानसिक चुंबकत्व अपने अनुकूल स्थितियाँ आकर्षित कर लेता है। निखिल विश्व-ब्रह्मांड में अनंत ज्ञान भरा हुआ है।उसमें से हर व्यक्ति उतना ही प्राप्त कर सकेगा,जितनी उसकी जिज्ञासा होगी।जितना बड़ा पात्र होगा,जल संग्रह उतना ही हो सकेगा।जिसे कुछ सीखने की इच्छा नहीं होती,वह कभी सीख भी ना सकेगा।नहीं सीखना,नहीं जानना और ज्ञानार्जन करने का कोई उपाय न करना,इसे बुद्धिहीनता के अतिरिक्त और क्या कहेंगे।जिसे ज्ञान प्राप्त करना है,बुद्धि बल बढ़ाना है उसे जिज्ञासु,मुमुक्षु,साधक,संन्यासी से होते हुए सिद्ध होकर साक्षी की स्थिति तक पहुंचता है तभी सच्चे मायने में बुद्धिमान होता है और इन स्थितियों को प्राप्त होना अनिवार्य है।आप चाहे सांसारिक उन्नति करें या आध्यात्मिक यात्रा करें,इन स्थितियों पर पहुंचे बिना लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

7.संगति से भी बुद्धि बढ़ती है (Consistency also increases intelligence):

  • संगति-इसमें इतनी क्षमता है कि वह व्यक्ति में अपने समान विशिष्टता पैदा कर देती है।यह विशिष्टता संगति के अनुसार अच्छी या बुरी दोनों प्रकार की हो सकती है,जो वास्तव में उसकी बुद्धि कुशलता को ही दर्शाती है,कारण कि बुद्धि की सहायता के बिना किसी क्षेत्र में वरिष्ठ या विशिष्ट बनने की कल्पना नहीं की जा सकती।जेबकतरों के साथ रहकर व्यक्ति इतना निष्णात जेबकट बन जाता है कि उसे सामने वाले के हाव-भाव देखकर यह अनुमान लगाते देर नहीं लगती कि उसके पास मोटी रकम है।इसके बाद वह अपने अभ्यास और कौशल का इस्तेमाल कर इतनी सफाई से उसकी जेब खाली कर जाता है कि व्यक्ति को इसका आभास तक नहीं मिलता।झाड़ू लगाने का काम करने वाला बालक एडीसन एक वैज्ञानिक के सानिध्य में रहकर महान वैज्ञानिक एडीसन बन गया।दूसरी ओर भेड़ियों के झुंड में पलने वाला रामू,रामू भेड़िया बन गया।उसमें मानवीय व्यवहार वाला एक भी गुण विकसित नहीं हो सका।इसके विपरीत वह भेड़िया जैसा गुर्राना,खाना और रहना सीख गया।यहां तक कि दो पैरों से चलने की मनुष्य की नैसर्गिक चाल भी भूल गया और चौपाइयों की तरह भागने लगा।इससे ऐसा प्रतीत होता है कि बुद्धि तो हर एक के पास है,पर बिना उसे प्रशिक्षित और पैना किए वह निकम्मी पड़ी रहती है।संगति उसके इस निकम्मेपन को दूर करती और उसमें प्रखरता पैदा करती है।
  • तुलसीकृत रामायण के अनुसार बिनु सत्संग विवेक न होई।रामकृपा बिना सुलभ न सोई।यानी बिना सत्संग के विवेक जाग्रत नहीं होता और भगवान की कृपा के बिना सत्संग उपलब्ध नहीं होता है।जब मनुष्य का अनेक जन्मों का भाग्य उदय होता है,तब उसको सत्संगति प्राप्त होती है और सत्संगति के प्राप्त होने से जब उसका अज्ञानजन्य मोह और मद का अंधकार नाश हो जाता है,तब विवेक का उदय होता है।

8.बुद्धिबल बढ़ाने का निष्कर्ष (Conclusion to increase strength of wisdom):

  • जड़ मूर्ख यहाँ कोई भी नहीं।यदि ऐसा कोई दीखता है,तो उसका एक ही कारण है कि बुद्धि को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिल सका।जब जिस डाल पर बैठे,उसी को काटने वाला कालिदास जैसा वज्र मूर्ख भी विद्वान कवि बन सकता है,तो कोई कारण नहीं कि दूसरे वैसी स्थिति प्राप्त न कर सकें।मनोयोग,रुचि,वातावरण,एकाग्रता,कल्पनाशीलता,सानिध्य,निरंतर व सतत अभ्यास आदि कुछ ऐसे तत्त्व हैं,जिनकी सहायता से आदमी बौद्धिक कुशाग्रता अर्जित कर वह उपाधि प्राप्त कर सकता है,जिसे आमतौर पर विद्वान या बुद्धिमान कहते हैं।
  • विद्यार्थियों को बुद्धिबल बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए,इसमें लापरवाही,आलस्य और प्रमाद बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।ये अवगुण बुद्धिबल बढ़ने नहीं देते हैं।विद्या अभ्यास के लिए हमें कसकर मेहनत करना होगी,बार-बार अभ्यास करके अपनी बुद्धि और जानकारी का विकास करके इनका बल बढ़ाना होगा।अपनी अक्ल को पैनी करने के लिए उस पर बार-बार धार धरना होगी।
  • तो,विद्या प्राप्ति के लिए आप एकाग्रचित होकर,शांत स्थिर मन से,नित्य प्रति नियमित रूप से विद्याभ्यास करें,साथ ही अपना सामान्य ज्ञान,व्यावहारिक ज्ञान बढ़ाने के लिए अच्छी-अच्छी पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं भी पढ़ें ताकि सिर्फ ‘किताबी कीड़े’ ही बनकर न रह जाएं।स्कूल-कॉलेज के कोर्स की पढ़ाई लिखाई करके थोड़ा समय सामान्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए देना चाहिए।इससे बौद्धिक बल बढ़ता है,विचार शक्ति बढ़ती है और सूझबूझ बढ़ती है।
  • इतना सतत अभ्यास और परिश्रम करने के लिए यह भी जरूरी है कि आपका दिमाग और शरीर स्वस्थ और ताकतवर भी रहे वरना जल्दी थक जाएंगे तो पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगेगा।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में बौद्धिक बल बढ़ाने के 9 मंत्र (9Spells to Increase Intellectual Power),बौद्धिक बल कैसे बढ़ाएं? (How to Increase Intellectual Strength?) के बारे में बताया गया है।

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9.बौद्धिक बल बढ़ाने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (How to Increase Intellectual Strength) (Humour-Satire):

  • मां:तुम दिन भर खेलते रहते हो,पढ़ते बिल्कुल नहीं।
  • राजू:टीचर ने कहा है कि अभ्यास करने से और एक्सरसाइज करने से बौद्धिक बल बढ़ता है।
  • माँ:बुद्धू दिमाग को काम में ही नहीं लोगे,अध्ययन का बार-बार अभ्यास नहीं करोगे तो बौद्धिक बल कैसे बढ़ेगा?

10.बौद्धिक बल बढ़ाने के 9 मंत्र (Frequently Asked Questions Related to 9Spells to Increase Intellectual Power),बौद्धिक बल कैसे बढ़ाएं? (How to Increase Intellectual Strength?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.बुद्धि किसके नियंत्रण में होने से बढ़ती है? (Intelligence grows by being under whose control):

उत्तर:बुद्धि पर आत्मिक नियंत्रण होना चाहिए तभी बुद्धि-कौशल दिनों-दिन तथा सही दिशा में बढ़ता है।आत्मिक नियंत्रण के अभाव में व्यक्ति कभी भी भटक सकता है।

प्रश्न :2.सद्बुद्धि के बारे में टिप्पणी लिखो। (Write a comment about good sense):

उत्तरःसूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थों को समझने की ज्ञान शक्ति का नाम ‘बुद्धि’ है।बुद्धि अंतःकरण की शक्ति है।विचार-शक्ति को भी बुद्धि कहते हैं।कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य,भले-बुरे,लाभ-हानि आदि का निर्णय और निश्चय करने वाली वृत्ति को भी बुद्धि कहते हैं।

प्रश्न:3.मूर्ख व बुद्धिमान बराबरी नहीं कर सकते कैसे? (How can the foolish and the wise not equal?):

उत्तर:सैकड़ो घोड़ों पर चलने वाले मूर्ख लोग पैदल चलने वाले धनरहित बुद्धिमानों की बराबरी नहीं कर सकते;क्योंकि पर्वत के शिखर पर निवास करने वाले कौए नदी के तट पर विहार करने वाले हंसों की बराबरी नहीं कर सकते।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा बौद्धिक बल बढ़ाने के 9 मंत्र (9Spells to Increase Intellectual Power),बौद्धिक बल कैसे बढ़ाएं? (How to Increase Intellectual Strength?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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