Mathematician Told Science of Rituals
1.गणितज्ञ ने संस्कारों का विज्ञान बताया (Mathematician Told Science of Rituals),गणितज्ञ ने संस्कारों को काटने का ज्ञान और विज्ञान बताया (Mathematician Explained Knowledge and Science of Cutting Sacraments):
- गणितज्ञ ने संस्कारों का विज्ञान बताया (Mathematician Told Science of Rituals) और छात्र के संदेहों का निवारण किया।जीवन में अनेक विकट परिस्थितियाँ आती है परंतु हम समझ ही नहीं पाते हैं कि ऐसा क्यों होता है और उसके निवारण का क्या उपाय किया जाए?
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2.आनंद की मस्ती (Drunkenness of Anand):
- शरद एवं बर्फीली हवा चल रही थी।उत्तर भारत क्षेत्र में जनवरी माह में वैसे भी न्यूनतम तापमान दो-तीन डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता है।हड्डियों को जमा देने वाली ठंडी हवा चलने से हवा शीतलहर में परिवर्तित हो गई थी।चारों ओर सफेद कोहरे की मोटी चादर ओढ़कर दोपहर भी ढलती साँझ के समान लग रही थी।पिछले कई दिनों से मौसम का भीषणतम शरद रूप अपने चरम पर था।केवल कड़कड़ाती ठंडी हवा इस सन्नाटे को चीरकर सांय-सांय की दहशतभरी आवाज निकाल रही थी।
ऐसे प्रचंड शरद मौसम में आनंद अपनी धुन में मगन होकर खेतों की मेढ़ से साइकिल चलाता हुआ आ रहा था।आनंद जंगलों की पगडंडियों एवं खेतों की मेढ़ों में साइकिल चलाने के लिए अभ्यस्त हो गया था;क्योंकि उसके गुरु गणितज्ञ सुधांशु के आश्रम के आसपास खेत,खलिहान एवं जंगल ही थे।आश्रम गांव से दूर नदी के किनारे अवस्थित था,जिसके पास से कोई पक्की,कच्ची सड़क नहीं निकलती थी।इसलिए आनंद को वहां पगडंडियों से गुजरने का अभ्यास हो गया था।नदी की पश्चिम दिशा में आश्रम था और पूर्व दिशा में जंगल था। - आनंद अपनी साइकिल में हरी सब्जियां,गेहूं एवं कुश की चटाई आदि बांधकर आ रहा था।उसकी दाईं ओर नदी थी।नदी के पार प्रकृति का सुरम्य,मनोहारी एवं विहंगम दृश्य था।प्रातःकालीन अरुणोदय का दृश्य आनंद के लिए ध्यान की धारणा थी।वह सरस्वती का पाठ करते हुए,मन ही मन स्मरण करते समय इसी उदयकालीन अरुणिम सरस्वती मां का ध्यान करता था।बीच-बीच में विहंगों के कलरव के मध्य मोर की आवाज से उसका अंतर्मन झूम उठता था।गुरु के अलावा प्रकृति ही तो उसकी मित्र-बंधु-बांधव एवं सर्वस्व थी।आनंद अपने गुरु के समस्त कार्यों को पूर्ण समर्पण के साथ संपन्न करता था,जैसे वह जप,ज्ञान एवं साधना ही कर रहा हो।
- आनंद प्रकृति के इस सुरम्य,सुरभित परंतु शरद मौसम में साइकिल चलाते-चलाते अपने दिनभर के कार्यों को सोचता आ रहा था।उसके पास ढेर सारे अलग-अलग काम रहते थे।प्रातः 4:00 बजे से लेकर रात्रि 11:00 तक विभिन्न विषयों गणित आदि का अध्ययन करने के अलावा वह गुरु-सेवा के संग विभिन्न कार्यों में व्यस्त एवं मस्त रहता था।इसी बीच उसे चिर-परिचित एक आवाज सुनाई दी।वह सुरीली आवाज किसी और की नहीं,बल्कि अपने परमश्रद्धेय गुरु सुधांशु जी की थी।गणितज्ञ सुधांशु जी भी आश्रम की ओर आ रहे थे।उन्होंने पीछे से आवाज दी-“वत्स आनंद! तुम समय पर आ गए।हमें लग रहा था कि तुम्हें आते-आते कहीं शाम ना हो जाए।तुम थक गए होंगे।लाओ हमें साइकिल दे दो।तुम तनिक विश्राम कर लो,फिर साथ-साथ चलते हैं।”
3.गुरु और शिष्य में संवाद (Dialogue between Guru and Disciple):
- आनंद को ऐसा लगा,मानो उसकी स्वयं की माता ने अपनी मातृत्व की छाया में उसे भर लिया हो।गुरु के रूप में उसे माता-पिता का अगाध प्रेम मिला था।वह बचपन से इसी प्रेम की छाँह तले पला-बढ़ा और विकसित हुआ था।जब वह बहुत अबोध बच्चा था,तभी उसके सिर से पिता का साया उठ गया था और 5 वर्ष का हुआ तो सदा-सदा के लिए माता का साथ छूट गया था।अनाथ-बेसहारा आनंद को नानी अपने पास ले आई थी।नानी सुधांशु जी के प्रति अटूट श्रद्धा-भाव रखती थी,सो वे आनंद को अध्ययन एवं परवरिश दोनों के लिए उन्हीं के पास छोड़ आई थीं।सुधांशु जी ने आनंद को सहर्ष अपना लिया।तब से लेकर अब तक अर्थात् बचपन की 5 वर्ष की उम्र से लेकर 21 वर्ष की उम्र तक,वह गुरु के ममत्व,मार्गदर्शन एवं आध्यात्मिक प्रकाश में तुष्ट-पुष्ट एवं सबल हुआ।
- गुरु के इस कथन के प्रत्युत्तर में आनंद ने कहा-“हे गुरुवर! हमारे रहते आपको यह सब करना पड़े तो फिर यह जीवन ही व्यर्थ एवं अर्थहीन है।आप अलभ्य,अनमोल एवं पूज्य हैं।आपके लिए शत-शत जीवन अहर्निश सेवा में लगाकर भी आपके ममत्व एवं प्रेम के प्रतिदान रूपी एक कण से उऋण नहीं हुआ जा सकता है।अतः इस जीवन को तो आप सेवा में अर्पित होने देने की कृपा करें।यह तो आपकी ही की कृपा है कि हमें आपका दिव्य एवं देवदुर्लभ सानिध्य मिल सका,अन्यथा हम तो आपकी चरण-रज के लायक भी नहीं हैं।अतः हमें इस सेवा से वंचित न करें।”सुधांशु जी ने कहा-“अच्छा-अच्छा! चलो तुम ही चलाओ।”यह कहकर वे आनंद को कुछ काम की बातें बताने लगे। आनंद बचपन से ही उनके प्रति इसी सेवा एवं प्रेम-भाव से सरोबार था,इसलिए उन्होंने इसका नाम आनंद रख दिया था।
- आनंद अपने गुरु के साथ आश्रम पहुंचा।घने कोहरे के कारण शाम का एहसास हो चला था।आश्रम में ज्यादा लोग नहीं थे।जो लोग थे,वे एक झोपड़ी के नीचे अलाव जलाकर सेंक रहे थे।संध्या का समय हो गया था।आनंद ने नित्यप्रति की तरह गुरु के संध्यावंदन की व्यवस्था की और स्वयं भी संध्यावंदन किया।पश्चात उसने विशिष्ट सरस्वती स्तोत्र एवं महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया।संध्यावंदन के समय ही गुरु जी ने आनंद को बता दिया दिया था कि वह अपना जप समाप्त करके सीधे प्रवचन कक्ष में उपस्थित हो जाए।आनंद को लगा कि आज कोई विशेष बात है,अन्यथा यह कहते समय गुरु जी के अधरों पर मनोहारी पावक रहस्यमयी मुस्कान तैर न जाती।आनंद ने जप समाप्त करके जब प्रवचन कक्ष की ओर प्रस्थान किया तो उसे वहां गुरु जी की किसी के साथ किसी विषय पर चर्चा करने की बात सुनाई पड़ने लगी।पास आने पर उसने लाइट की रोशनी में जिन्हें देखा,उससे उसका रोम-रोम पुलक उठा।उसकी आंखों से अश्रु झरने लगे।हर्षित वाणी के बोल फूट ना सके।बस,वह गुरु जी के अत्यंत प्रिय मित्र श्रद्धानंद जी के श्रीचरणों में साष्टांग प्रणिपात हो गया।
- श्रद्धानंद जी भी स्वयं को रोक न सके,उनके दृगों से भी प्रेमाश्रु छलक उठे।सुधांशु को उठाकर उन्होंने उसे अपने विशाल वक्षस्थल में भर लिया।आनंद सुबकते हुए बोलने लगा-“हे गुरुदेव! आप इतने दीर्घावधि के पश्चात आए। क्या आपको हमारी याद ना आई।आपकी राह तकते हमारी आंखें पथरा गई,पर आपके दर्शन दुर्लभ ही रहे।जब भी हम अपने गुरु गणितज्ञ सुधांशु जी से आपकी कुशल-क्षेम के बारे में पूछते तो वे हमारी बातों को प्यार से मुस्कराकर टाल देते थे।”उसके उलाहने तमाम शब्दों के द्वारा प्रवाह के रूप में मुख से निस्सृत होते रहे और श्रद्धानंद जी अपने दाहिने हाथ से उसके सिर को सहलाते एवं पुचकारते रहे।
4.गुरु जी के मित्र और शिष्य में संवाद (Dialogue between Guruji’s friend and disciple):
- श्रद्धानंद जी ने कहा-” वत्स आनंद! मैं दयावश एक ऐसी संस्कारजन्य उलझन में उलझ गया कि बस,उलझता चला गया।संस्कार एवं भोग का क्षेत्र होता ही है ऐसा उलझन भरा,पर इसका भी भरा-पूरा विज्ञान है।अच्छा छोड़ इन सब बातों को और देख! मैं तुम्हारे लिए स्वादिष्ट मिठाई लाया हूं।” आनंद बचपन में अपने गुरु जी के साथ-साथ श्रद्धानंद जी की गोद में खूब धमा-चौकड़ी मचा चुका था।उनके सामने तो वह अब भी बचपन की मीठी यादों में खो जाता और नटखटपन करने लगता।आज भी वह मिठाई छीन कर उछल-उछलकर खाने लगा।दोनों महान गणितज्ञ इस दृश्य को देख आनंदित हो उठे।हों भी क्यों न,तब से 5 वर्ष बाद श्रद्धानंद जी का यहाँ आगमन जो हुआ था।
- आनंद प्यार से श्रद्धानंद जी को ‘गुरुदेव’ कहता था।उसने कहा-“हे गुरुदेव! आप संस्कार एवं भोग के साथ विज्ञान को जोड़कर कुछ कह रहे थे।हम इसे न तो ढंग से सुन सके और न ही इसे समझ पा रहे हैं।आप कृपया विस्तार से यह बताएं कि संस्कार क्या है और ये कैसे हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं?” श्रद्धानंद जी और सुधांशु जी उस लोक से इस धरती पर अवतरित हुए थे,जहां असंभव संभव होते हैं,कल्पनाएं मूर्त रूप लेती हैं तथा गूढ़ रहस्य स्वतः अनावृत हो जाते हैं।इनकी नजरों से कुछ भी ओझल नहीं होता।श्रद्धानंद जी ने सुधांशु की ओर देखा और मुस्करा दिए।फिर आनंद की ओर मुड़कर कहने लगे।”वत्स! संस्कार ऊर्जा का सघन एवं संचित बीज होता है।यह चित्त के जिस स्थान पर अवस्थित होता है,उसे कर्माश्रय के नाम से संबोधित किया जाता है।जीवन में समयानुसार इस ऊर्जा बीज का स्फोट होता है तथा इसी के अनुरूप परिस्थितियाँ,संबंध आदि विनिर्मित हो जाते हैं।”
- आनंद ने कहा-” हे गुरुदेव! इसे स्पष्ट करें।”श्रद्धानंद जी ने कहा-” अच्छा वत्स! हम बताते हैं सुनो।संस्कार को हम धागा समझ सकते हैं और इस धागे की मजबूती को उसका भोग मान सकते हैं।लोहे के सिलेंडर को संस्कार कहें,तो उसके अंदर विद्यमान गैस को भोग कह सकते हैं।यदि धागे से उसकी मजबूती के बल को हटा दिया जाए तो धागा आसानी से टूट सकता है।यदि सिलेंडर से गैस को निकाल दिया जाए तो सिलेंडर विस्फोट नहीं करेगा।”
- श्रद्धानंद जी आगे अपनी बात को कहें,उसके पूर्व आनन्द ने एक गिलास जल उनको दिया।श्रद्धानंद जी ने गिलास से एक घूँट जल पिया और अपनी बात को आगे बढ़ाने लगे तथा कहा” संस्कार से भोग को कमजोर करना एक विशिष्ट प्रक्रिया है,एक विज्ञान है।इस विज्ञान के अंदर कर्मकांड एवं तपस्या आते हैं।संस्कार के अनुरूप भोग होता है।यदि भोग के अनुरूप कर्मकांड या तपस्या की जाए तो यह सुनिश्चित तथ्य है कि भोग कट जाता है या अति कमजोर हो जाता है।जब भोग कमजोर हो जाता है तो संस्कार निर्बल हो जाता है;क्योंकि भोग ही तो संस्कार को बलवान बनाता है।”
- आनंद ध्यानमग्न हो सभी बातों को सुन रहा था।उसने कहा-” हे गुरुदेव! भोग काटने के लिए कौन-कौन से कर्मकांड अपनाये जाते हैं और उनमें कितना समय लगता है? “श्रद्धानन्द जी ने इसके जवाब में कहा-“भोग की प्रकृति के अनुरूप कर्मकांड की आवश्यकता पड़ती है।इसे वही सही-सही बता सकता है,जिसकी दृष्टि बेहद पारदर्शी एवं भेदक हो,जिसकी नजर गहराई से एवं साफ-साफ देख सके।वैसे कर्मकांड के रूप में सरस्वती साधना,गायत्री मंत्र,महामृत्युंजय मंत्र एवं ग्रहों का जप,दुर्गा सप्तशती,हनुमान चालीसा आदि का पाठ एवं उनके विशिष्ट यज्ञ के माध्यम से असाध्य एवं अति दुष्कर भोगों को काटने का विधान है।हां,जिसका भोग काटा जाता है,वह भी स्वयं में अपना पुरुषार्थ करे तो चीजें और भी आसान हो जाती हैं।”
- श्रद्धानन्द जी ने कहा-“वत्स आनंद! जहां तक समय की बात है,तो इसमें 5 से 25 वर्ष तक लग सकते हैं।मैं भी इसी प्रकार के एक भोग को काटने में उलझ गया था।तुम्हारे गुरु ने तो तुम्हारे भोग उसी प्रकार काट दिए हैं।उन्होंने अपनी तपस्या से संचित अपार ऊर्जा को तुम्हारे भोग काटने में होम दिया है और इसलिए तुम्हें विशिष्ट जप,पाठ एवं यज्ञ की प्रक्रिया से गुजारते हैं।हम दोनों के इस धरती से जो भी शेष संस्कार हैं,वे समाप्त हो चुके हैं।अब तो प्रस्थान की बारी है।हम सबको अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ना है।हम दोनों को प्रकृति के पार चले जाना है और तुम्हें तो एक नवीन जिंदगी की शुरुआत करनी है।अपने गुरु के सूत्रों का जीवन में अनुशीलन करना,सन्मार्ग पर चलना,पीड़ितों की सेवा करना एवं माया के इस संसार से स्वयं को बचाने के लिए विवेक-वैराग्य को प्रखर करना।श्रीमन्! आपने यह तो बता दिया कि संस्कार भोग काटने से निर्बल होते हैं परंतु संस्कारों का निर्माण कैसे होता है?
5.संस्कार कैसे निर्मित होते हैं? (How are the sacraments formed?):
- हम जो भी अच्छा या बुरा कर्म करते हैं वे सब संकल्पों के कारण ही करते हैं।यदि हमारे संकल्प शुभ और कल्याणकारी होते हैं तो अच्छे कर्म करते हैं।संकल्पों के बिना कुछ भी नहीं होता है।हमारा पूरा जीवन हमारे संकल्पों के कारण ही गतिशील होता है।जैसा हमारा संकल्प होगा वैसा हमारा आचरण होगा।जैसा हमारा आचरण होगा वैसे हमारे संस्कार बनते जाएंगे।पूर्व कर्म के संस्कार और वर्तमान समय के संस्कार हमारे संकल्पों को प्रभावित,संचालित और नियंत्रित करते रहते हैं।जब तक हम इन सबको बदल डालने का दृढ़ संकल्प नहीं कर लेते और आचरण नहीं कर सकते जैसा करना जरूरी होता है तब तक हम अपना स्वभाव बदल नहीं सकते।
- जो भी कर्म हम करते हैं उसकी छाप मन पर पड़ी रह जाती हैं,यह छाप बार-बार के अभ्यास से मजबूत हो जाती है जिन्हें वृत्तियाँ,स्वभाव या आदतें (Tendencies) कह सकते हैं।अब ये संस्कार जिस प्रकार के होते हैं वैसे ही कर्म करने में हमारी रुचि बढ़ती जाती है,उस विषय के प्रति हमारी वासना बढ़ती जाती है।
- इसीलिए विद्यार्थियों को यह सलाह दी जाती है कि शुभ कर्म करें,शुभ विचार करें,अच्छा आचरण बनाएं।क्योंकि परिपक्व अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते हमारा स्वभाव और आचरण मजबूत हो जाता है और यह वैसा ही बनता जाता है जैसा हम बनाते हैं इसलिए यह जरूरी है कि अभी से हम अपना स्वभाव और आचरण अच्छा ही बनाएँ।ऐसा तभी होगा जब हम अभी से अच्छा मन बनाएंगे और मन को वश में रखने का अभ्यास करेंगे।याद रखें! सारी माया मन की है,सारे प्रपंच मन से पैदा होते हैं,सारी दुनियादारी इस मन से ही बनती है यानी हमारे जीवन को बनाने और बिगाड़ने का काम यह मन ही करता है।मन में ही खोट हो तो यह बुद्धि और विवेक की सुनता ही नहीं और अपने दोष छिपाने के लिए अनेक बहाने बना लेता है।इसलिए आप अभी से विवेक और धैर्य का प्रयोग करने की आदत डाल लें।अध्ययन की आदत डालने के लिए विवेक और धैर्य का उपयोग करना आवश्यक होता है यह गुर की बात सदैव ध्यान रखें।
- छात्र-छात्राओं को अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए बुरे संस्कारों,गलत आदतों को उखाड़ फेंकने के लिए संकल्प शक्ति,धैर्य,विवेक और मनोबल की नितांत आवश्यकता है।इसके अभाव में कोई भी विद्यार्थी न तो संस्कारों का परिमार्जन कर सकता है और न वासनाओं,तृष्णाओं के बंधनों से छूट सकता है।बार-बार वह बुरे संस्कारों,बुरी आदतों को त्यागने की इच्छा करता है,उनके परित्याग का संकल्प भी करता है,पर आंतरिक दुर्बलता के कारण वह बात निभती नहीं।
- मन पर जिन संस्कारों की छाप पड़ चुकी होती है,जो आदतें,स्वभाव बन चुका होता है उनका जब उफान आता है तो उस परित्याग के दुर्बल निश्चय को बात की बात में उखाड़ फेंकता है।पढ़ने,लिखने और अच्छी तैयारी आदि करने का कार्यक्रम बनाता है।थोड़े ही दिनों में जोश ठंडा होते ही आलस घेरता है और बनाया हुआ टाइम टेबल छूट जाता है।कई बार इस प्रकार की प्रगति करने के प्रयत्न असफल होने पर फिर हिम्मत ही नहीं रहती।विद्यार्थी सोच लेता है कि यह सब हमारे वश का नहीं,हमसे यह सब नहीं निभेगा।भगवान की इच्छा हमारा कल्याण करने की नहीं दीखती।
- किसी भी सफलता का प्रमुख आधार मनोबल है।साहस और धैर्य के बिना किसी को इस संसार में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिली।इसलिए विद्यार्थी काल का पूरा लाभ उठाने के इच्छुक सदा से अपने मनोबल को बढ़ाने का प्रयत्न करते रहे हैं।जिसे यह तत्त्व जितनी अधिक मात्रा में उपलब्ध हो गया,वह उतना ही मनोरथ में सफल होता देखा गया है।हम दोनों का तुमको सदा आशीर्वाद इतना कहकर दोनों गुरुओं ने आनंद को आशीर्वाद…… ।इतना कहकर दोनों गुरुओं ने आनन्द को आशीर्वाद दिया और अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए।>
- उपर्युक्त आर्टिकल में गणितज्ञ ने संस्कारों का विज्ञान बताया (Mathematician Told Science of Rituals),गणितज्ञ ने संस्कारों को काटने का ज्ञान और विज्ञान बताया (Mathematician Explained Knowledge and Science of Cutting Sacraments) के बारे में बताया गया है।
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6.संस्कारों का पूर्वानुमान (हास्य-व्यंग्य) (Prognosis of Rites) (Humour-Satire):
- श्रीया ने हेकड़ी दिखाते हुए कहा (गणितज्ञ से) आप मेरे संस्कारों के बारे में क्या जानते हो?
- गणितज्ञ:यही कि तुम्हारे पूर्व जन्मों के संस्कार तो खोटे हैं ही,सही नहीं है और वर्तमान जन्म में भी बिल्कुल खोटे ही कर्म करती जा रही हो,जैसे पूर्व जन्मों के हैं।
- श्रीया:यह जिन्दगी तो मजे लेने के लिए है।आपको तो पढ़ाई ही पढ़ाई ही दिखाई देती है।
7.गणितज्ञ ने संस्कारों का विज्ञान बताया (Frequently Asked Questions Related to Mathematician Told Science of Rituals),गणितज्ञ ने संस्कारों को काटने का ज्ञान और विज्ञान बताया (Mathematician Explained Knowledge and Science of Cutting Sacraments) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.संस्कारों का दास क्यों नहीं होना चाहिए? (Why should one not be a slave to the sacraments?):
उत्तर:क्योंकि संस्कारों की दासता एक न एक दिन व्यक्ति को ले डूबती है।अतः हमें अपने ऊपर मालकियत होनी चाहिए,अपने आप का गुलाम नहीं होना चाहिए।
प्रश्न:2.संस्कारों को कैसे बदलें? (How to change the sacraments?):
उत्तर:दृढ़ संकल्प,विवेक,धैर्य और साहस के द्वारा संस्कारों को बदला जा सकता है और नए संस्कारों,शुभ संस्कारों को अपनाया जा सकता है।बस एक बार आपमें यह समझ विकसित हो जाए कि संस्कारों को बदला जा सकता है तो तत्काल बदलाव शुरू हो जाता है।
प्रश्न:3.संस्कार का क्या अर्थ है? (What does sacrament mean?):
उत्तर:विशेष ढंग से काम करने की वृत्ति।इस वृत्ति को चाहे तो हम तत्काल बदल सकते हैं क्योंकि यह सिर्फ एक आदत है।विद्यार्थी काल में शुभ संस्कारों और अच्छे आचरण की नींव डालने के लिए इसीलिए कहा जाता है और इस उम्र में यह आसान भी है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणितज्ञ ने संस्कारों का विज्ञान बताया (Mathematician Told Science of Rituals),गणितज्ञ ने संस्कारों को काटने का ज्ञान और विज्ञान बताया (Mathematician Explained Knowledge and Science of Cutting Sacraments) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
About my self I am owner of Mathematics Satyam website.I am satya narain kumawat from manoharpur district-jaipur (Rajasthan) India pin code-303104.My qualification -B.SC. B.ed. I have read about m.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 15 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science.











