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Mathematician Showed Right Path

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1.गणितज्ञ ने सन्मार्ग दिखाया  (Mathematician Showed Right Path),महान् गणितज्ञ ने छात्र-छात्राओं को सन्मार्ग दिखाया (Great Mathematician Showed Students Right Path):

  • गणितज्ञ ने सन्मार्ग दिखाया  (Mathematician Showed Right Path) तथा सन्मार्ग पर लाकर यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि कितना ही भटके हुए छात्र हों उन्हें सन्मार्ग पर लाया जा सकता है।परंतु इससे पहले स्वयं को तपाना और गलाना पड़ता है,संघर्ष की भट्टी से गुजरना पड़ता है।
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2.गणितज्ञ का विश्वविद्यालय में आगमन (Mathematician’s arrival at the university):

  • गणितज्ञ गजाधर की आंखों की चमक में अनंत आशाओं के दीप जगमगा उठते थे।वह जब बोलते थे तो सुनने वाले मदहोश से हो जाते थे।ऐसा लगता था कि गणितज्ञ गजाधर कोई व्यक्ति नहीं,बल्कि देवदूत है,जिसे स्वयं भगवान ने उनके उद्धार के लिए वहां भेजा है।उदयनगरी के गणितज्ञ अपने गणित के ज्ञान के लिए तो जाने थे परंतु वे छात्र-छात्राओं का रूपान्तरण करने की कला में भी सिद्धहस्त थे।उनका व्यक्तित्व अत्यंत सम्मोहक एवं आकर्षक था और जो कोई भी उनसे मिलता तो वह उनका होकर रह जाता था।
  • उदयनगरी के गणितज्ञ में न जाने ऐसा कौनसा जादू था कि उनकी बातें सीधे हृदय में उतरकर छात्र-छात्राओं को उसे करने के लिए विवश कर देती थी।गणितज्ञ के व्यक्तित्व में सहजता,उदारता,आत्मीयता,संवेदनशीलता एवं भगवद्विश्वास सघन रूप से घुले हुए थे।इसी कारण वे जब भी कुछ करते या बोलते तो वहां का वातावरण अत्यंत सुरम्य हो जाता था।गणितज्ञ का मानना था कि दूसरों को वही खुश रख सकता है,जो स्वयं अंदर से प्रसन्नता से सरोबार हो।
  • यद्यपि गणितज्ञ के विश्वविद्यालय में आने से छात्र-छात्राओं के मन में एक अद्भुत ऊर्जा का संचार हो जाता था,तथापि कभी-कभी ऐसे दिन भी आते थे,जब उन्हें छात्र-छात्राओं की हताशा का सामना करना पड़ता था।एक दिन एक छात्र निखिल ने उनसे पूछा-“मेरे जीवन का अधिकांश भाग तो इन तथाकथित शिक्षालयों की चहारदीवारी एवं घुटन भरे अंधकार में तिल-तिलकर समाप्त हो गया है।अब तो शरीर थकाहारा हो गया है,कदम लड़खड़ा जाते हैं,शरीर और हाथों में वह ऊर्जा महसूस नहीं होती कि कुछ कर सकें,आंखों की रोशनी फीकी पड़ गई है।कारण स्पष्ट है कि आज की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में छात्र-छात्राएं स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देते हैं और केवल पढ़ने पर ध्यान देते हैं।चलने से ही सांसे फूलने लगती है।ऊपर से उसको अपने परिवार की हालत का कुछ पता नहीं,कैसे मां-बाप पेट काटकर उसकी फीस की व्यवस्था करते हैं।मोटी-तगड़ी फीस चुकाने के लिए उन्हें क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं। कहते-कहते निखिल की आंखों में उसके सारे कष्ट एवं दर्द ज्वार-भाटे के समान उमड़ने-घुमड़ने लगे।एक अन्य छात्र ने उसे संभालने का प्रयास किया,जो कि स्वयं को संभाल नहीं पा रहा था।
  • अन्य छात्र उज्ज्वल एवं दीपक ने भी निखिल के बुझे एवं डूबते निराशा के एक छोर को थामे रखा।वे भी गंभीर हताशा एवं निराशा के प्रतीक-पर्याय बन चुके थे।सभी ने जीवन को अपने भाग्य और भविष्य के ऊपर छोड़ दिया था और जो कुछ वर्तमान शिक्षा प्राप्त करते वह जेल के समान है,जो कुछ यातनापूर्ण जीवन था,उसे जीते जा रहे थे।शिक्षा के नाम पर मस्तिष्क में जबरदस्ती ठूँसा जाता है और भविष्य का कोई पता नहीं है क्या होगा।शिक्षा सामग्री को मस्तिष्क में जबरदस्ती ठूँसना यातना ही तो है।अब तो इस तरह की गंभीर एवं मानवीय यातना भी उनके लिए सामान्य सी चीज बन गई है।शरीर तो सहते-सहते पाषाणवत हो गया था एवं मन भी घोर अंधकार में डूब गया था।इस बीच दीपक ने कहाःश्रीमान (गणितज्ञ)! आप अच्छे हैं,परंतु हमारा कुछ नहीं हो सकता,आप यहां अपना समय बर्बाद कर रहे हैं।आप हमारे बीच होते हैं,आते हैं,हमें अच्छा लगता है,लेकिन इस अच्छा लगने के अलावा हमारा कुछ नहीं हो सकता।

3.गणितज्ञ का प्रण (Mathematician’s vow):

  • गणितज्ञ गजाधर भी पता नहीं किस मिट्टी के बने थे कि उनके लिए हार मानना स्वीकार नहीं था।उनकी आंखों की चमक में जरूर ऐसा कोई दिव्य एवं दैवीय तत्त्व था,जो घोर निराशा के गर्त में डूबे छात्र-छात्राओं के मन में भी आशा,उत्साह एवं उमंग जगाने के लिए कृतसंकल्पित था।छात्र-छात्राओं की चरम हताशा एवं गणितज्ञ के दमकते विश्वास के बीच अनवरत एवं सतत संघर्ष जारी था।छात्र-छात्राओं के मन में जन्मे वर्षों के कुहासे एवं गणितज्ञ के अनुभव के सच में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था।जीवट एवं आत्मविश्वास के प्रबल प्रेरक गणितज्ञ को विश्वास था कि वह एक दिन अवश्य सफल होंगे।उनकी सफलता छात्र-छात्राओं को जीवंत जीवन के प्रारंभ की प्रेरणा देगी।
  • गणितज्ञ निखिल एवं अन्य छात्र-छात्राओं की इन निराशाजनक एवं नकारात्मक बातों से सर्वथा अछूते रहकर बोले:निखिल! हमें यह बताओ कि हमारा आप लोगों के बीच आना तुम्हें अच्छा क्यों लगता है और क्या अच्छा लगता है? कहां तो ये छात्र-छात्राएं सोचते थे कि इतना कहने से गणितज्ञ यहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर रफूचक्कर हो जाएंगे,विश्वविद्यालय को छोड़कर चले जाएंगे,यहां आएंगे ही नहीं,पर उनकी सोच से परे उन्हें ही सोचने के लिए विवश कर दिया गणितज्ञ ने।निखिल के साथ सभी इस प्रश्न का उत्तर सोचने लगे।गणितज्ञ का आगमन उन्हें प्रसन्नता तो देता है पर क्यों देता है? उन्हें नहीं पता था।प्रसन्नता एक भावना है और उसे भाव भरे अनुभव को उनके लिए शब्द देना किसी गंभीर यातना से भी कठिन जान पड़ रहा था।
  • निखिल के साथ सभी छात्र-छात्राओं ने कहा-आपका आना अच्छा लगता है,बस,अच्छा लगता है,हम कैसे बताएं कि क्यों और कैसे अच्छा लगता है।गणितज्ञ ने मुस्कुराते हुए कहा:मित्रों! यह अच्छा लगना ही तो हमारी मुक्ति का आधार है,हमारे बन्धनों एवं बेड़ियों से छुटकारे के लिए प्रथम प्रयास है।छात्र-छात्राओं के चेहरे से अभी उत्सुकता की लकीरें मिटी नहीं थी।उनकी जिज्ञासा को भाँपते हुए गणितज्ञ आगे बोले:मित्रों! प्रसन्नता और आह्लाद दीपक की लौ की भांति हैं।दीपक पुरुषार्थ और आशा का प्रतीक है,अंधेरा चाहे कितना भी सघन क्यों ना हो एक छोटा सा दीपक उस अँधेरे को हमेशा के लिए निकाल फेंकता है।वैसे ही कारण चाहे कुछ भी हो यदि मेरे आने से तुम्हें प्रसन्नता मिलती है तो उसे अपने अंतर्मन में जले दीपक की तरह मानो,जो एक दिन तुम्हारे जीवन से इस हताशा और निराशा के अंधकार को निकाल फेंकेगा।
  • गणितज्ञ के इस कथन का छात्र-छात्राओं पर चमत्कारिक प्रभाव पड़ा और इसका परिणाम यह निकला कि उस विश्वविद्यालय के सभी छात्र-छात्राओं ने शिक्षा के साथ-साथ आत्मनिर्भर होने के लिए रुचिपूर्वक कार्य करना आरंभ कर दिया।अब से पूर्व कुछेक छात्र ही ऐसा करते थे,वे भी अनमने ढंग से किया करते थे,गणितज्ञ के जादुई प्रभाव से वहां स्थापित आत्मनिर्भर,स्वावलंबन कार्यशाला एक आकर्षण का केंद्र बन गई।मनोयोग एवं रुचिपूर्वक किया गया कर्म अपना प्रभाव छोड़ पाता है।ऐसा ही हुआ और उदयनगरी के इस विश्वविद्यालय के उत्पाद बाजार में हाथों हाथ बिकने लगे।देखते-देखते छात्र-छात्राओं के सहयोग से इसने कुटीर उद्योग का रूप धर लिया।

4.गणितज्ञ का उद्बोधन (Mathematician’s Address):

  • एक बार छात्र-छात्राओं ने मिलकर कहा कि आप हमें युवाशक्ति कहकर पुकारते हैं परंतु हम तो इस शिक्षा को प्राप्त करते-करते निस्तेज,प्राणहीन,निराश,हताश अनुभव करते जाते हैं।हमें इस युवाशक्ति का मर्म समझाएं।
  • गणितज्ञ ने कहा कि युवाशक्ति यानी युवाओं में शक्ति का होना है।इस शक्ति का एक अर्थ प्रतिभा भी है।प्रतिभा एक दैवीय वरदान एवं भगवद् उपहार है।यह वरदान एवं उपहार किसी को भी एवं कभी भी प्राप्त हो सकता है।हां,यह भी सच है कि प्रतिभा रूपी बेशकीमती वरदान को कुछ पुण्यवान जन्म से ही लेकर आते हैं।उनके लिए प्रतिभा जन्मजात होती है,परंतु यह विगत जन्मों के संचित पुण्य के कारण जीवन में कभी भी क्रियाशील हो सकती है और व्यक्ति प्रतिभा का धनी हो सकता है,पर जब प्रतिभा युवाओं में हो तो इसका तात्पर्य एवं मायने कुछ और हो जाता है।युवाओं की भरपूर ऊर्जा प्रतिभा को क्रियाशील करने में लग जाती है।
  • परंतु यह क्रियाशील तभी हो पाती है जब युवा अपनी समस्त ऊर्जा को केंद्रित करके किसी एक कार्य में झोंक देता है।केंद्रित ऊर्जा परमाणु बम और हाइड्रोजन बम की तरह शक्तिशाली होती है।प्रतिभाशाली मस्तिष्क में अनेक योजनाएं चल रही होती है।यह शत-प्रतिशत सच है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है।जब जैसी आवश्यकता होती है,ठीक उसी के अनुरूप खोज एवं अनुसंधान होने लगते हैं।
  • यहां यह उल्लेखनीय है कि आज के युवा केवल अपने करियर के लिए सोचते हैं एवं अपनी सीमित एवं संकीर्ण परिधि में रहना पसंद करते हैं।ऐसे युवाओं को श्रेष्ठ विचार प्रेरणा देने वाले होते हैं।
  • भावनाओं को जब विचार रूपी दिशा मिल जाती है तो चमत्कार घटित होता है।यह चमत्कार अनेक प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कारों में देखा जा सकता है।ऐसे कई युवाओं के उदाहरण है जिनके अंदर की भावना को जब विचारों का संबल मिला तो उन्होंने दिन-रात मेहनत करके अनेक आविष्कार कर डाले।ये युवा सामान्य,निम्न या मध्यम वर्ग के ही थे किसी हाई-फाई फैमिली में नहीं जन्मे थे।परंतु अपनी मेहनत एवं लगन से उन्होंने वह कर दिखाया,जिसका सपना हर युवा देखा करता है।
  • युवाओं में प्राण-ऊर्जा हिलोरे लेती हैं।जो उसे जितना उपयोग में ले लेता है,वह उतना ही प्रतिभाशाली होता है।प्रतिभा सदैव चुनौतियों,बाधाओं एवं कठिनाइयों को चीरते हुए सीधे अपने लक्ष्य तक पहुंचती है।उसके लिए आवश्यक है कि विचार,भाव एवं श्रम का समुचित समन्वय एवं तालमेल हो,अन्यथा व्यर्थ विचारों एवं कपोल कल्पनाओं एवं भावुकता में यह बहुमूल्य ऊर्जा विनष्ट हो जाती है।इसे संरक्षित एवं संयमित करके ही प्रतिभा रूपी दैवीय वरदान के रूप के साथ न्याय किया जा सकता है।
  • आपके अंदर इस सोई हुई युवाशक्ति को जगाने का प्रयास ही कर रहा हूं।आप अपने आपको हीन,दुर्बल,शक्तिहीन,निस्तेज इसलिए समझ रहे हो कि आपको केवल रटाऊ,ऊबाऊ और बोझिल शिक्षा दी जाती है।व्यावहारिक,स्वावलंबन और चारित्रिक शिक्षा नहीं दी जा रही है।यह शिक्षा पाकर आप अपने को बलहीन समझते हैं।जबकि आपके अंदर उर्जा का जखीरा दबा पड़ा है,उसे जगाने की आवश्यकता है।आपको उसे जगाना चाहिए,जगाना ही है,जगाना ही पड़ेगा।

5.गणितज्ञ के निष्काम कर्म का परिणाम (The result of the mathematician’s selfless deeds):

  • इस निष्काम कर्म में गणितज्ञ के वर्षों खप गए और गणितज्ञ का शरीर उम्र के प्रभाव से थकने लगा था,परंतु उनके मन में आशा एवं उत्साह की कमी नहीं थी।गणितज्ञ को केवल गणित का ज्ञान ही नहीं था बल्कि वे आध्यात्मिक,व्यावहारिक ज्ञान से संपन्न थे।अतः बिना विचलित हुए उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंचने पर भी निष्काम कर्म कर रहे थे।जो पुरुष संघर्ष की भट्टी में तपकर कुंदन बन जाते हैं वे घोर विपत्तियों,प्रतिकूलताओं में भी अपने मिशन में जुटे रहते हैं।यही गणितज्ञ गजाधर कर रहे थे।निष्काम पुरुष अपनी संपूर्ण शक्ति से पुरुषार्थ करते हैं और फिर भी सफलता न मिले तो इसमें उनका दोष नहीं होता है और सफलता न मिलने पर ऐसे पुरुषों को कोई मलाल भी नहीं होता है।उनके जीवन भर के पुरुषार्थ के लक्षण छात्र-छात्राओं में दिखाई देने लगे थे।
  • एक दिन एक परिवार उनसे मिलने आया।शाम का समय था।गणितज्ञ गजाधर ने अपने मानस पटल पर जोर दिया,परंतु याद नहीं आया कि इस परिवार के मुखिया को उसने कहां देखा है।मुखिया ने कहा:गणितज्ञ महोदय:मैं उज्ज्वल! विश्वविद्यालय का छात्र,याद आया? गणितज्ञ के मानस पटल पर यकायक अतीत का वह सारा परिदृश्य कौंध आया।गणितज्ञ प्यार से बोले:उज्ज्वल! कैसे हो? सब ठीक-ठाक तो है ना!
  • गणितज्ञ सर की इस आत्मीयता से उज्ज्वल की आंखें सजल हो उठी,फिर उसने वह सारा वृत्तांत सुना दिया कि कैसे उनके विचार एवं निष्काम कर्म ने उसके जीवन की दिशा धारा बदल दी,जिसकी वजह से बहुत सारे छात्र-छात्राओं के जीवन में कायापलट हो गई।सभी छात्र-छात्राओं ने न केवल गणित का गहन और रुचिपूर्वक अध्ययन किया बल्कि व्यावहारिक,आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया साथ ही स्वावलंबन का पाठ भी पढ़ा।विश्वविद्यालय परिसर से निकलते ही उन्हें सरकारी नौकरी का मोहताज नहीं होना पड़ा।उन्हें यह समझ आ गई थी कि सरकार नौकरी किन-किन को और कितनों को देगी।विश्वविद्यालय शिक्षा पूरी होते ही उन्हें अपने मनमाफिक जॉब मिल गया था क्योंकि शिक्षा प्राप्त करने के दौरान ही उन्होंने जाॅब संबंधी स्किल विकसित कर ली थी।
  • गणितज्ञ महोदय के अथक प्रयासों से विश्वविद्यालय परिसर में काउंसलिंग के एक प्रोफेसर की व्यवस्था कर दी थी जो छात्र-छात्राओं को करियर संबंधित तथा जीवन की अन्य समस्याओं से निपटने के तौर तरीके बताते और उनका व्यावहारिक समाधान करते थे।वे छात्र-छात्राओं की व्यावहारिक और आध्यात्मिक चिकित्सा करते थे।धीरे-धीरे विश्वविद्यालय परिसर का वातावरण बदलने लगा।जो विश्वविद्यालय छात्र-छात्राओं को जेल खाने की तरह लगता था वहाँ स्वर्ग जैसा वातावरण बन गया था।अब उस विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के लिए हरेक छात्र-छात्रा लालायित रहता था।वहां से शिक्षा प्राप्त करके छात्र-छात्राएं आनंद का अनुभव करते थे और गौरव का एहसास करते थे।
  • नालंदा,तक्षशिला,वल्लभी,काशी आदि विश्वविद्यालयों की तरह का वातावरण हो गया था।किसी व्यक्ति को जब उदयनगरी के उस विश्वविद्यालय की चर्चा की जाती तो कोई विश्वास ही नहीं करता था कि आधुनिक युग में भी ऐसा संभव है।
    उपयुक्त विवरण सुनकर गणितज्ञ की आंखों की चमक और भी गहरा गई।उन्हें यकायक भारत भ्रमण के दौरान मिले एक संत की वह बात याद आई,जो उनके (गणितज्ञ) जीवन का मूल मंत्र बन गई।संत ने कहा था: जीवन के कठिनतम भोग सतत सत्कर्म और निष्काम कर्म से कट जाते हैं।इसी बात को अपने जीवन का ध्येय बनाकर वे (गणितज्ञ) जीवन भर छात्र-छात्राओं को निस्स्वार्थ निष्काम कर्म करते रहे और आज उसका परिणाम उनके समक्ष उज्ज्वल के रूप में (एक परिवार) खड़ा था।सत्य ही है कि भगवान के राज्य में शुभ अथवा अशुभ कर्मों का फल मिलने में चाहे विलंब हो,पर वह मिलता जरूर है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में गणितज्ञ ने सन्मार्ग दिखाया  (Mathematician Showed Right Path),महान् गणितज्ञ ने छात्र-छात्राओं को सन्मार्ग दिखाया (Great Mathematician Showed Students Right Path) के बारे में बताया गया है।

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6.पानी की बचत पर भाषण (हास्य-व्यंग्य) (Speech on Water Saving) (Humour-Satire):

  • ठंड चालू हो गई है और किसी ने इस बार ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए……….जैसे गाने का छात्र-छात्राओं को किसी शिक्षक ने भाषण झाड़ा तो ठीक नहीं होगा।इस पानी को बचाकर रखेंगे और गर्मियों में इस पानी का इस्तेमाल करेंगे क्योंकि गर्मियों में वैसे ही पानी की शॉर्टेज रहती है।

7.गणितज्ञ ने सन्मार्ग दिखाया  (Mathematician Showed Right Path),महान् गणितज्ञ ने छात्र-छात्राओं को सन्मार्ग दिखाया (Great Mathematician Showed Students Right Path) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.आज युवा वर्ग सोया हुआ क्यों है? (Why are young people asleep today?):

उत्तर:आज के अधिकांश युवा इसलिए सोए हुए हैं क्योंकि उन्हें जगाने वाला कोई जामवंत नहीं है।जैसे जामवंत ने हनुमान जी की सोई हुई शक्ति को जगाया था,वैसे ही जामवंतों की आज आवश्यकता है।

प्रश्न:2.जागरण क्रांति कैसे संभव है? (How is the awakening revolution possible?):

उत्तर:जागरण क्रांति तभी संभव है जब कोई कर्मयोगी घर-घर अलख जगाए।जब हम किसी भी तरह की उपलब्धि के लोभ-लालच को गिरा देते हैं।जब कुछ होने का अथवा कुछ पाने का विचार ही छूट जाता है।हम स्वयं हैं ही,हम वही हैं ही।इसलिए किसी भी उपलब्धि का लालच बेकार है।

प्रश्न:3.उपलब्धि का क्या अर्थ है? (What does achievement mean?):

उत्तर:यह हमारे मन के लालच का हिस्सा है।उपलब्धि से आशय है सम्मान पाना,धन-पद,मुक्ति या भगवान की प्राप्ति की कामना करना आदि।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणितज्ञ ने सन्मार्ग दिखाया  (Mathematician Showed Right Path),महान् गणितज्ञ ने छात्र-छात्राओं को सन्मार्ग दिखाया (Great Mathematician Showed Students Right Path) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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