Graph Theory in Discrete Mathematics
1.विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics):
विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के जरिए जानिए कि ग्राफ सिद्धांत की आवश्यकता क्यों हुई? किसने इसकी खोज की? ग्राफ सिद्धांत कहां प्रयोग किया जाता है।कंपलीट ग्राफ थिअरी।
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2.ग्राफ सिद्धांत (Graph Theory):
(1.)ग्राफ की परिभाषा (Definition of Graph):
माना v एक अरिक्त समुच्चय है तथा समुच्चय V के अवयवों के अक्रमित युग्मों (Unordered pairs) का एक अन्य समुच्चय है।तब संरचना G=(V,E) एक ग्राफ (graph) कहलाता है।समुच्चय V के अवयवों को शीर्ष या बिंदु (Vertices or points or nodes) तथा समुच्चय E के अवयवों को (अक्रमित युग्म) कोर या शाखा (edges or branches) कहते हैं।
समुच्चय V जिसे शीर्षों का समुच्चय (Vertex set) कहते हैं,का अरिक्त (non empty) होना आवश्यक है।यदि V एक रिक्त समुच्चय है तो ग्राफ की कल्पना संभव नहीं है।हां,समुच्चय E,जिसे हम कोरों का समुच्चय (edge-set) कहते हैं रिक्त समुच्चय हो सकता है।
कोर e,शीर्षों u तथा v को संबंद्ध (connect) करती है। इस स्थिति में शीर्ष u तथा v “आसन्न शीर्ष” (adjacent vertices) कहलाते हैं।इन्हें हम कोर e के अन्त्य शीर्ष (end vertices) भी कहते हैं।शीर्ष u और v,कोर e पर आपतित (incident) हैं तथा कोर e,शीर्षों u और v पर आपतित है।
यदि किसी कोर के दोनों अन्त्य शीर्ष (end vertices) एक ही शीर्ष है,तो इसे एक” पाश” (loop) कहते हैं।
यह भी संभव है कि ग्राफ के किन्हीं भी दो शीर्षों पर एक से अधिक कोरें (edges) आपतित हों।ऐसी दशा में ये कोरें “समांतर कोरें” (parallel edges) या “बहुल कोरे” (mutiple edges) कहलाती है।
चित्र में e_1 तथा e_8 पाश हैं तथा e_4 और e_5 समांतर कोरें हैं।
उपर्युक्त बिंदुओ में विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के बारे में बताया गया है।
(2.)सरल ग्राफ (Simple Graph):
समांतर कोरों तथा पाशों (loops) से मुक्त ग्राफ एक सरल ग्राफ कहलाता है।
(3.)मल्टीग्राफ (Multigraph):
यदि किसी ग्राफ में समानांतर कोरें (parallel edges) विद्यमान है,तो ऐसा ग्राफ “मल्टीग्राफ” (multigraph) कहलाता है।
कुछ गणितज्ञों के अनुसार मल्टीग्राफ में पाशों की उपस्थिति अमान्य है।ऐसे ग्राफ जिसमें पाश तथा समांतर कोरें दोनों उपस्थित हैं,छद्म ग्राफ (pseudo graph) कहलाते हैं।
(4.)परिमित तथा अपरिमित ग्राफ (Finite and Infinite Graph):
यदि किसी ग्राफ G=(V,E) में समुच्चय V तथा E दोनों परिमित हैं तो G एक “परिमित” ग्राफ कहलाता है,अन्यथा इसे “अपरिमित ग्राफ” कहते हैं।
(5.)रिक्त ग्राफ (Null Graph):
यदि किसी ग्राफ G=(V,E) में कोरों का समुच्चय E एक रिक्त समुच्चय है तो G एक “रिक्त ग्राफ” कहलाता है।
(6.)ग्राफ में किसी शीर्ष की घात या कोटि (Degree of a vertex in a graph):
ग्राफ G में किसी शीर्ष v पर आपतित कोरों की संख्या (ऐसी कोर जो कि एक पाश है,दो बार गिनी जाती है),शीर्ष v की कोटि कहलाती है।इसे हम deg(v) द्वारा निरूपित करते हैं।
(7.)वियुक्त शीर्ष (Isolated Vetex):
ग्राफ G में यदि किसी शीर्ष की कोटि शून्य है,तो इसे वियुक्त शीर्ष कहते हैं।दूसरे शब्दों में वह शीर्ष जिस पर कोई भी कोर आपतित नहीं होती,वियुक्त शीर्ष कहलाता है।
(8.)निलंबी शीर्ष (Pendant Vertex):
ग्राफ G में कोई शीर्ष v एक निलंबी शीर्ष कहलाता है यदि और यदि केवल यदि v की कोटि 1 है।
(9.)सम और विषम शीर्ष (Even and odd vertices):
दिए हुए ग्राफ में,कोई शीर्ष v एक समशीर्ष (even vertex) कहलाता है यदि इसकी कोटि (degree) एक सम पूर्णांक (even integer) है।इसी प्रकार,शीर्ष v,एक विषम शीर्ष (odd vertex) कहलाता है यदि इसकी कोटि (degree) एक विषम पूर्णांक (odd integer) है।
प्रमेय (Theorem):1.किसी ग्राफ में उसके सभी शीर्षों की कोटियों (degrees) का योगफल,ग्राफ में उपस्थित कोरों की संख्या का दो गुणा होता है।
(The sum of the degrees of all the vertices in a graph is equal to twice the number of degree in the graph.)
उपपत्ति (Proof): \underset{v\in V}{\sum} \deg(v)=2e
यदि ग्राफ G=(V,E) में कोरों की संख्या e है तो
प्रमेय (Theorem):2.ग्राफ G में विषम कोटि के शीर्षों की संख्या सदैव एक सम पूर्णांक होती है।
(The number of vertices of odd degrees in a graph G is always even.)
(Raj. 2006,08)
उत्पत्ति (Proof):माना G=(V,E) एक ग्राफ है जिसमें कोरों की संख्या e है।तब हम जानते हैं कि
\underset{v\in V}{\sum} \deg(v)=2e \cdots(1)
माना V_1 तथा V_2 में,क्रमशः सम कोटियों तथा विषम कोटियों के शीर्षों के समुच्चय निरूपित करते हैं।तब
V=V_1\cup V_2
समीकरण (1) को निम्न प्रकार से व्यक्त करते पर
\underset{v\in V_1}{\sum} \deg(v)+ \underset{v\in V_2}{\sum}\deg(v)=2e \cdots(2)
चूँकि समुच्चय V_1 में प्रत्येक शीर्ष की कोटि सम है,इसलिए समीकरण (2) के वाम पक्ष का प्रथम पद एक सम संख्या है।पुनः समीकरण (2) का दक्षिण पक्ष एक सम संख्या है,अतः (2) के वाम पक्ष का द्वितीय पद भी एक सम संख्या होना चाहिए।
\underset{v\in V_2}{\sum}\deg(v)=एक सम संख्या
परंतु समुच्चय V_2 में प्रत्येक शीर्ष की कोटि विषम है, इसलिए उपर्युक्त योगफल में कुल पदों की संख्या एक सम संख्या होनी चाहिए ताकि समीकरण (3) का दक्षिण पक्ष एक सम संख्या बना रहे।
अतएव ग्राफ में,विषम कोटि के शीर्षों की संख्या सदैव सम होती है।
उपर्युक्त आर्टिकल में विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के बारे में बताया गया है।
(10.)दिष्ट ग्राफ (Direct Graph or Digraph):
(Raj. 2008)
माना v एक अरिक्त परिमित समुच्चय है तथा E,समुच्चय V के अवयवों के क्रमित युग्मों (Ordered pairs) का परिमित समुच्चय है।तब संरचना G=(V,E) एक दिष्ट ग्राफ (directed graph or digraph) कहलाता है। समुच्चय v को शीर्षों का समुच्चय (Vertex set) तथा E को दिष्ट कोरों का समुच्चय कहते हैं।
यदि कोई दिष्ट कोर (directed edge) e \in E, समुच्चय V के शीर्षों u और v से क्रमित युग्म (u,v) को निरूपित करती है तो इसे हम “शीर्ष u से शीर्ष v पर दिष्ट कोर” (directed edge from the vertex u to the vertex v) कहते हैं।
दिष्ट ग्राफ में शीर्षों (vertices) को बिंदुओं द्वारा तथा किसी दिष्ट कोर (directed edge) (u,v) को शीर्षों u और v के मध्य शीर्ष u से v की दिशा में तीर के रूप में चिन्हित कोर द्वारा निरूपित किया जाता है।
शीर्ष u,जहां से दिष्ट कोर प्रारंभ होती है,दिष्ट कोर (u,v) का आदि शीर्ष (initial vertex) तथा शीर्ष v इसका अंतस्थ शीर्ष (terminal vertex) कहलाता है।
यदि किसी दिष्ट कोर का आदि शीर्ष तथा अंतस्थ शीर्ष एक ही है तो इसे एक पाश (loop or arc) कहते हैं। एक ही आदि शीर्ष तथा एक ही अंतस्थ शीर्ष वाली दिष्ट कोरें समानांतर कोरें कहलाती है।
(11.)दिष्ट ग्राफ में किसी शीर्ष की कोटि (Degree of a vertex in a directed graph):
दिष्ट ग्राफ G=(V,E) में उन सभी कोरों की संख्या,जिनका आदि शीर्ष (initial vertex) v है,शीर्ष v की बाह्य-कोटि (out-edge) कहलाती है।इसे \text{deg}^{+}(v) द्वारा निरूपित करते हैं।
दिष्ट ग्राफ G=(V,E) में उन सभी कोरों की संख्या,जिनका अंतस्थ शीर्ष (terminal vertex) v है,शीर्ष v का अन्तः कोटि (indegree) कहलाती है।इसे \text{deg}^{-}(v) द्वारा निरूपित करते हैं।
यदि दिष्ट ग्राफ G=(V,E) में किसी शीर्ष v पर कोई पाश (loop) है तो यह पाश,शीर्ष v की बाह्यकोटि (out degree) तथा अंतः कोटि (indegree) कहलाती है। इसे \text{deg}^{-}(v) द्वारा निरूपित करते हैं।
यदि दिष्ट ग्राफ G=(V,E) में किसी शीर्ष v पर कोई पाश (loop) है तो यह पाश,शीर्ष v की बाह्यकोटि (out degree) तथा अंतःकोटि (indegree) प्रत्येक में 1 का योगफल करता है।
(12.)सरल दिष्ट ग्राफ (Simple Digraph):
एक दिष्ट ग्राफ जिसमें कोई पाश (loop) तथा समान्तर दिष्ट कोरें नहीं है,एक सरल दिष्ट ग्राफ कहलाता है।
(13.)प्रतिसममित दिष्ट ग्राफ (Asymmeyric Digraph):
यदि किसी दिष्ट ग्राफ में किन्हीं भी दो शीर्षों के मध्य अधिक से अधिक एक दिष्ट कोर है परंतु कोई पाश विद्यमान नहीं है,प्रतिसममित दिष्ट ग्राफ कहलाता है।
(Raj 2008)
(14.)सममित दिष्ट ग्राफ (Symmetric Diagraph):
दिष्ट ग्राफ एक सममित ग्राफ कहलाता है यदि इसमें किन्हीं भी दो शीर्षों v_i और v_j के मध्य यदि (v_i,v_j) कोर है तो (v_j,v_i) भी एक कोर है। (Raj. 2008)
(15.)पूर्ण दिष्ट ग्राफ (Complete Daigraph):
एक सरल दिष्ट ग्राफ जिसमें प्रत्येक शीर्ष से प्रत्येक दूसरे शीर्ष को संबंद्ध करने वाली यथार्थतः एक दिष्ट कोर है,एक पूर्ण सममित ग्राफ कहलाता है।(Raj. 2008)
कुछ विशेष सरल ग्राफ (Some Special Simple Graph):
(16.)नियमित ग्राफ (Regular Graph):
यदि किसी सरल ग्राफ G=(V,E) में प्रत्येक शीर्ष की कोटि (degree) समान है तो G एक नियमित ग्राफ कहलाता है।
(17.)पूर्ण ग्राफ (Complete Graph):
सरल ग्राफ G=(V,E) जिसमें प्रत्येक शीर्ष युग्म अर्थात् शीर्षों के प्रत्येक युग्म के मध्य यथार्थतः एक कोर होती है,एक पूर्ण ग्राफ (Complete Graph) कहलाता है।
(18.)चक्र (Cycle):
सरल ग्राफ G=(V,E),जिसमें n शीर्ष v_1,v_2,\ldots,v_n, \quad n\geq 3 तथा n कोरें \{v_1,v_2\},\{v_2,v_3\},\ldots,\{v_{n-1},v_n\},\{v_n,v_1\} और \{v_n,v_1\} हैं,एक चक्र कहलाता है इसे हम C_n द्वारा निरूपित करते हैं।
(19.)धुरीय चक्र (Wheel):
यदि किसी चक्र (Cycle) C_n (n\geq 3) में एक अतिरिक्त शीर्ष का योगदान करके इस शीर्ष को C_n के प्रत्येक शीर्ष कोरों के द्वारा सम्बद्ध किया जाए,तब इस प्रकार प्राप्त ग्राफ को “धुरीय चक्र” (wheel) कहते हैं।इसे हम W_n द्वारा निरूपित करते हैं।
(20.)द्विखण्डी ग्राफ (Bipartie Graph):
यदि किसी सरल ग्राफ G=(V,E) में शीर्षों के समुच्चय V को दो असंयुक्त (Disjoint) समुच्चयों V_1 तथा V_2 में इस प्रकार विभाजित किया जाए कि
(i) ग्राफ G में प्रत्येक कोर समुच्चय V_1 के किसी शीर्ष को समुच्चय V_2 के किसी शीर्ष से संबंद्ध करती है,
(ii)कोई भी कोर समुच्चय V_1 के किन्हीं भी दो शीर्षों को सम्बद्ध नहीं करती तथा कोई भी कोर समुच्चय V_2 के किन्हीं भी दो शीर्षों को संबंद्ध नहीं करती।
तब ऐसे सरल ग्राफ को द्विखण्डी ग्राफ (Bipartie Graph) कहते हैं।
V_1=\{v_1,v_3\}, V_2=\{v_2,v_4,v_5\}
उपर्युक्त आर्टिकल में विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के बारे में बताया गया है।
(21.)पूर्ण द्विखण्डी ग्राफ (Complete Bipartie Graph):
(Raj. 2005,08,09)
माना G=(V,E) एक सरल ग्राफ है,जिसमें शीर्षों के समुच्चय V को दो असंयुक्त समुच्चयों V_1 तथा V_2 में इस प्रकार विभाजित किया गया है कि समुच्चय V_1 का प्रत्येक शीर्ष,समुच्चय V_2 के प्रत्येक शीर्ष से किसी कोर के द्वारा संबद्ध है तथा समुच्चय V_1 के किन्हीं भी दो शीर्षों के मध्य कोई कोर नहीं है;तब ऐसे सरल ग्राफ को एक पूर्ण द्विखण्डी ग्राफ (Complete Bipartie Graph) कहते हैं।
पूर्ण द्विखण्डी ग्राफ को K_{m,n} द्वारा निरूपित किया जाता है जहां तथा क्रमशः असंयुक्त समुच्चयों V_1 और V_2 में शीर्षों की संख्या है।पूर्ण द्विखण्डी ग्राफों K_{2,3} का चित्र
ग्राफों पर संक्रियाएँ (Operations on Graphs):
(22.)दो ग्राफों का संघ (Union of Two Graphs):
दो ग्राफों G_1=(V_1,E_1) तथा G_2=(V_2,E_2) का संघ,वह G=(V,E) ग्राफ है,जहां V=V_1\cup V_2 तथा E=E_1\cup E_2 इसे हम G_1 \cup G_2 द्वारा निरूपित करते हैं।
(23.)दो ग्राफों का सर्वनिष्ठ (Intersection of Two Graphs):
यदि दो ग्राफ तथा इस प्रकार हैं कि इनमें कम से कम एक शीर्ष उभयनिष्ठ है,तब G_1 तथा G_2 का सर्वनिष्ठ (intersection) वह ग्राफ G=(V,E) है,जहां V=V_1\cap V_2 तथा E=E_1\cap E_2 इसे हम G_1 \cap G_2 द्वारा निरूपित करते हैं।
(24.)असंयुक्त ग्राफ (Disjoint Graphs):
दो ग्राफ G_1=(V_1,E_1) तथा G_2=(V_2,E_2) परस्पर असंयुक्त ग्राफ कहलाते हैं यदि इनमें कोई भी शीर्ष उभयनिष्ठ नहीं है (i.e. यदि V_1\cap V_2=\phi )
(25.)दो ग्राफ का वलय-योग (Ring-Sum of Two Graphs):
दो ग्राफों G_1=(V_1,E_1) तथा G_2=(V_2,E_2) का वलय-योग वह ग्राफ G=(V,E) है जहां V=V_1\cup V_2 तथा E,उन कोरों का समुच्चय है जो या तो G_1 में है या G_2 में परंतु दोनों में नहीं।इसे हम G=G_1\oplus G_2 द्वारा निरूपित करते हैं।
(26.)पूरक ग्राफ (Complementary Graph):
माना G=(V,E) एक सरल ग्राफ है।तब G का पूरक ग्राफ,जिसे G द्वारा निरूपित करते हैं,वह ग्राफ है जिसमें शीर्षों का समुच्चय यथार्थतः समुच्चय V है तथा जिसमें कोई भी दो शीर्ष,शीर्ष v_i और v_j परस्पर आसन्न (Adjacent) है यदि और केवल यदि v_i और v_j ग्राफ में आसन्न शीर्ष नहीं है।
(27.)दो ग्राफों का गुणनफल (Product of Two Graphs):
(Raj. 2009)
माना G_1=(V_1,E_1) तथा G_2=(V_2,E_2) दो ग्राफ हैं।तब G_1 तथा G_2 का गुणनफल G_1\times G_2 द्वारा निरूपित होता है तथा वह ग्राफ है जिसमें शीर्षों का समुच्चय V_1\times V_2 है एवं जिसमें कोई भी दो शीर्ष (u_1,u_2) और (v_1,v_2) परस्पर आसन्न हैं यदि और केवल यदि u_1=v_1 तथा u_2 और v_2 के मध्य कोर \in E_2 या u_2=v_2 तथा u_1 और v_1 के मध्य कोर \in E
उपर्युक्त आर्टिकल में विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के बारे में बताया गया है।
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3.ग्राफ सिद्धांत के महत्त्वपूर्ण बिंदु (Important Points of Graph Theory):
(1.)एक प्रतिसममित दिष्ट ग्राफ जिसमें प्रत्येक दो शीर्षों के मध्य यथार्थतः एक कोर विद्यमान है,पूर्ण प्रतिसममित दिष्ट ग्राफ कहलाता है।
(2.)यह सरलतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है कि किसी भी दिष्ट ग्राफ में शीर्षों की बाह्यकोटियों का योग तथा अंतःकोटियों का योग सर्वदा समान होता है तथा यह दिष्ट ग्राफ में कोरों की संख्या के बराबर होता है,i.e.
\underset{v\in V}{\sum} \deg^{+}(v)=\underset{v\in V}{\sum}\deg^{-}(v) = |E|
जहां |E| दिष्ट ग्राफ में कोरों की संख्या है।
(3.)दिष्ट ग्राफ G में किसी भी शीर्ष v की बाह्यकोटि तथा अंतःकोटि का योग शीर्ष v की कोटि के बराबर होता है
i.e. \deg^{+}(v)+\deg^{-}(v) = \deg(v)
(4.)दिष्ट ग्राफ G में वियुक्त शीर्ष (isolated vertex) वह शीर्ष है जिसकी बाह्य कोटि तथा अंतःकोटि प्रत्येक शून्य होती है।
(5.)दिष्ट ग्राफ G में कोई शीर्ष v एक विलंबी शीर्ष (Pendant) है यदि v की बाह्य कोटि तथा अंतःकोटि का योगफल 1 है; i.e. शीर्ष v एक निलंबी शीर्ष है
यदि \deg^{+}(v)+\deg^{-}(v)=1
(6.)नियमित ग्राफ G “k-नियमित” (k-regular) कहलाता है यदि G में प्रत्येक शीर्ष की कोटि (degree) k है।
(7.)यदि किसी पूर्ण ग्राफ में n शीर्ष है तो इसे K_n द्वारा निरूपित करते हैं।n=1,2,3,4,5 तथा 6 के लिए पूर्ण ग्राफ K_n से दर्शाया गया है। K_3 का चित्र
(8.)पूर्ण ग्राफ को “सार्वत्रिक ग्राफ” (universal graph) अथवा “क्लिक” (click) भी कहते हैं।
(9.)n शीर्षों वाले पूर्ण ग्राफ K_n में चूँकि प्रत्येक शीर्ष को शेष (n-1) शीर्षों से कोर द्वारा संबद्ध किया जाता है,अतः प्रत्येक शीर्ष की कोटि (n-1) होती है।इसी कारण K_n को (n-1) नियमित ग्राफ भी कहा जाता है।यह देखा जा सकता है कि n शीर्षों वाले पूर्ण ग्राफ में कौरों की संख्या \frac{n(n+1)}{2} होती है।
(10.)प्रत्येक पूर्ण ग्राफ का एक नियमित ग्राफ होता है परंतु प्रत्येक नियमित ग्राफ का पूर्ण ग्राफ होना आवश्यक नहीं है।
(11.)चक्र (Cycle) C_n,\quad \left(n \geq 3 \right) में चूँकि प्रत्येक शीर्ष की कोटि 2 होती है अतः प्रत्येक चक्र एक 2-नियमित (2-regular) ग्राफ होता है।
(12.)धुरीय चक्र W_n,एक सरल ग्राफ होता है,जिसमें (n-1) शीर्ष तथा 2n कोरें होती हैं।
(13.)धुरीय चक्र W_n में अतिरिक्त शीर्ष की कोटि n तथा शेष n शीर्षों में प्रत्येक शीर्ष की कोटि 3 होती है।
उपर्युक्त विवरण द्वारा विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के सम्बन्ध में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
\begin{array}{|l|} \hline \text{दिनांक 07.06.2026 के प्रश्न का उत्तर:4 इकाई } \\ \text{ माना वर्ग की भुजा=x } \\ \text{परिमाप=क्षेत्रफल } \\ \Rightarrow 4 x^2=x^2 \\ \Rightarrow x=4 \\ \text{**छात्र-छात्राओं से आज का सवाल} \\ \text{(Today's Question to Student)**} \\ \text{"एक पौधा रोजाना दुगना बढ़ता है।26 दिन में वह पूर्ण}\\ \text{ बड़ा हो जाता है तो बताओ वह आधा कितने दिनों में} \\ \text{ बड़ा हुआ होगा।} \\ \hline \end{array}
उपर्युक्त आर्टिकल में विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के बारे में बताया गया है।
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4.विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Frequently Asked Questions Related to Graph Theory in Discrete Mathematics) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.ग्राफ सिद्धांत की शुरुआत किसने की? (Graph Theory ki suruaat kisane ki?):
उत्तर:ग्राफ सिद्धान्त गणित की उन उत्कृष्ट सैद्धांतिक अवधारणाओं में से है,जिसकी उत्पत्ति समयावधि विशेष में मानी जाती है।ग्राफ सिद्धांत का प्रादुर्भाव वर्ष 1736 में लैनार्ड आयलर (Leonhard Euler) द्वारा प्रकाशित शोध पत्र “काॅनिसबर्ग सेतु समस्या का हल” (Solution of Konigsberg bridge problem) से माना जाता है।
उपर्युक्त आर्टिकल में विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के बारे में बताया गया है।
प्रश्न:2.ग्राफ सिद्धांत पर प्रथम पुस्तक किसने लिखी? (Graph Theory par pahali pustak kisne likhi?):
उत्तर:लगभग दो शताब्दी बाद वर्ष 1936 में डैनिस काॅनिस (Denes Konig) ने ग्राफ सिद्धान्त की अवधारणा पर प्रथम पुस्तक लिखी।
उपर्युक्त आर्टिकल में विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के बारे में बताया गया है।
प्रश्न:3.ग्राफ सिद्धांत का उपयोग किसमें होता है? (Graph Theory ka upyog kisme hota hai?):
उत्तर:ग्राफ सिद्धान्त का विकास मुख्यतः कम्प्यूटर विज्ञान में इसके बढ़ते अनुप्रयोगों एवं प्रचलन के कारण हुआ है।
उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा विविक्त गणित में ग्राफ सिद्धान्त (Graph Theory in Discrete Mathematics) के बारे में प्रारम्भिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।


