6 Tips to Get Rid of Negative Thinking
1.निषेधात्मक चिंतन से मुक्त होने की 6 टिप्स (6 Tips to Get Rid of Negative Thinking),निषेधात्मक चिन्तन से कैसे मुक्त हों? (How to Get Free From Negative Thinking?):
- निषेधात्मक चिंतन से मुक्त होने की 6 टिप्स (6 Tips to Get Rid of Negative Thinking) से हम समझेंगे कि निषेधात्मक चिंतन हमारी प्रगति,विकास में कैसे बाधक है।और इससे मुक्त होने के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं।कैसे निषेधात्मक चिंतन को सकारात्मक चिंतन में बदलें।
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2.निषेधात्मक चिन्तन धीरे-धीरे परिपक्व होता है (Negative thinking matures slowly):
- कोई दृष्टिदोष ऐसा भी होता है,जिसमें बड़ी वस्तु छोटी अथवा छोटी बड़ी दिखाई पड़ती है।कहते हैं कि हाथी की आँखें आकार की तुलना में छोटी होती है,इसलिए सामने से गुजरने वाले छोटे जीव-जंतु भी बड़े लगते हैं।आदमी को भी वह अपने बराबर मानता है,इसलिए डर कर उसके वशवर्ती हो जाता है।
- मनुष्यों की आंखों में तो उतनी गड़बड़ नहीं होती,पर उसके सोचने-समझने के तरीके में,दृष्टिकोण में ऐसा मतिभ्रम पाया जाता है कि सामने प्रस्तुत समस्याओं और कठिनाइयों को उनकी वास्तविकता से कहीं अधिक समझ बैठता है।साथ ही दूसरी गलती यह करता है कि प्रतिकूलताओं से निपटने की अपनी सामर्थ्य को भूल जाता है या नगण्य मान बैठता है।ऐसी दशा में जो भी कठिनाइयां,प्रतिकूलताएं सामने आती हैं,उन्हें वह बड़ा-चढ़ाकर देखता है और समाधान के बारे में अविश्वस्त,अनिश्चित एवं आतंकित रहने के कारण भीतर-ही-भीतर घुटने लगता है।वास्तविक कठिनाइयाँ जितनी होती हैं,उससे भी अधिक काल्पनिक चित्र गढ़ने में भी दिमाग दौड़ता है और अच्छा-खासा कल्पना लोक सामने ला खड़ा करता है।
- शेखचिल्ली ने तेल को यथास्थान पहुँचाने के एक घंटे की अवधि में शाही संभावनाएं गढ़कर खड़ी कर ली थी और दिवास्वप्न देखने वालों में प्रख्यात हो गया था।डरावनी कल्पनाएं करवाना और भी सरल है।रस्सी का साँप,झाड़ी का भूत बनने की निरर्थक आशंकाएं,उनकी मनगढ़ंत करने वालों को कितना त्रास देती हैं,यह सभी जानते हैं।ज्योतिषी लोग हाथ देखकर या कुंडली देखकर अशुभ-अनिष्टों को सिर पर मंडराता हुआ बताते हैं और भोले विश्वासी की नींद हराम कर देते हैं।इसी धंधे में वे लोग गुलछर्रे उड़ाते हैं और संपर्क में आने वाले किसी भी व्यक्ति को भयभीत कर देते हैं।यह कल्पनाओं का ही चमत्कार है,जिनके पीछे वास्तविकताएं नहीं के बराबर होती हैं।फिर जहां थोड़े बहुत तथ्य भी हों,वहां तिल का ताड़ बनाना क्या मुश्किल है।
- शनि या राहु-केतु की दशा होने पर विश्वास करने वाले सामने प्रस्तुत काम में असफलता मिलने और कहीं से संकट टूट पड़ने की ही आशंका करते रहते हैं।फलतः दिल में दिन में बेचैनी छाई रहती है और रात को नींद नहीं आती।इन परिस्थितियों में मानसिक तंत्र उत्तेजित-उद्विग्न रहने लगता है।धीरे-धीरे निषेधात्मक चिंतन की आदत परिपक्व हो जाती है और अपने लिए,परिवार के लिए,व्यवसाय के लिए संकट की संभावना चारों ओर दिखाई पड़ती है और लगता है कि मित्र-संबंधी दगा देने जा रहे हैं या अफसर द्वेष मानते हैं और नीचा दिखाते वाले हैं।कल्पना को अशुभ चिंतन के साथ जोड़ भर दिया जाए तो इसे राई का पर्वत बनाने में कितनी देर लगती है।
3.तनाव का कारण निषेधात्मक चिंतन (Causes of stress are negative thinking):
- ऐसे लोग सदा शंका से शंकित रहते हैं।मन उद्विग्न रहता है और उस उद्विग्नता का परिणाम फिर शरीर को भुगतना पड़ता है।शरीर का नियामक मन है।उसकी स्थिति डाँवाडोल हो तो ऐसे लक्षण उभरने लगते हैं,जिनसे प्रतीत होता है कि भयानक रोगों ने आ घेरा और मौत का शिकंजा अब नजदीक आया,अब नजदीक आया।रक्तचाप,दिल की धड़कन,बहुमूत्र,सिर का भारीपन,अनिद्रा,पीठ का दर्द,अपच,दमा आदि रोगों को तनावजन्य माना जाता है।डॉक्टर के पास इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है।सामयिक समाधान के लिए वे तत्काल तो कोई नशीली गोलियां दे देते हैं,जिससे रोगी की चिंतन धारा में व्यतिरेक उत्पन्न हो जाए।इससे तात्कालिक राहत भी मिलती है।पर जैसे ही नशा उतरता है,विस्मृति दूर हो जाती है और आदत के अनुसार विपत्ति भरी कल्पनाएं सिर के इर्द-गिर्द नाचने लगती हैं और उनका प्रभाव शरीर को अस्त-व्यस्त करने वाली रोग-श्रृंखला के रूप में अपना त्रास दिखाने लगता है।
- उद्विग्नता देखने में छोटा,किंतु परिणाम में भयानकता की दृष्टि से बड़ा रोग है।यह कुछ दिन लगातार बनी रहे तो उत्तेजना के दबाव से भीतरी अवयवों को अशक्त बना जाते हैं और वे अपना काम ठीक तरह कर नहीं पाते।इस व्यतिक्रम के कारण रोगों की घुड़-दौड़ चल पड़ती है।जब तक एक को समेटते हैं,तब तक दूसरे का प्रकोप सामने आ धमकता है।शरीरगत आहार-विहार की गड़बड़ी से उत्पन्न होने वाले रोग,पथ्य,परिचर्या और चिकित्सा के द्वारा आसानी से काबू में आ जाते हैं,पर जिनकी जड़ें मस्तिष्क में है,जो अशुभ चिंतन और भय-आशंका के कारण उत्पन्न हुए हैं,उनकी जड़ मन:क्षेत्र में होती हैं और उनके अंकुर शरीर में फूटते ही रहते हैं।एक से निपटने नहीं पाते कि दूसरे की उत्पत्ति एवं अभिवृद्धि अपना कमाल दिखाने लगती है।जड़ हरी रहने पर पत्तों को तोड़ते रहने से कोई काम नहीं चलता।मस्तिष्कीय विकृति शारीरिक रुग्णता से मिलकर एक-एक मिलकर ग्यारह होने का उदाहरण बनता है।संक्षेप में यही है तनाव की महाव्याधि,जिससे एक तिहाई लोग ग्रसित पाए जाते हैं।चिकित्सा काम देती नहीं।कभी किसी अंग में,कभी किसी में उपजने-उभरने वाली रुग्णता डाकिन की तरह पीछे लग जाती है,तो रक्त-मांस को चूस कर मनुष्य को हड्डियों का ढांचा बना देती है और अंततः उसे अकाल मृत्यु के मुंह में घसीट ले जाती है।
- तनाव यों चिकित्सकों के रजिस्टरों में दर्ज होने वाले रोगियों में से अधिकांश में पाया जाता है और वे इसी मर्ज की चित्र-विचित्र औषधियाँ देकर धंधा चलाते रहते हैं।ज्योतिषियों के लिए ग्रहदशा की प्रतिकूलता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है।शांति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों के नाम पर वे मोटी दक्षिणाएँ इसी आधार पर बटोरते हैं। घर भर चिंतित रहता है और मित्र-हितेषियों में से हर कोई इस दुर्भाग्य पर आंसू बहाता है।
- किंतु यह रोग कुकल्पनाओं का उत्पादन है।उसका उद्गम छिद्र बंध न किया जाय तो पानी रिसता,फैलता और बहता ही रहेगा।सही सोचने का तरीका यह है कि मनुष्य के पुरुषार्थ,साधन एवं सहयोगी समुदाय की सम्मिलित क्षमता ऐसी है,जो किसी भी आपत्ति का सामना कर सकती है।आपत्तियों में आधी से अधिक कुकल्पनाएँ डरपोक स्वभाव की उत्पत्ति हैं।उन्हें अपनी विधेयात्मक क्षमताओं को स्मरण करते हुए बात की बात में बुहार भगाया जा सकता है।जो शेष रह जाती हैं उनके साथ लड़ने की रणनीति बनाकर निरस्त किया और मार भगाया जा सकता है।इसके बाद जो बचती हैं,वे बहुत स्वल्प मात्रा में रहती हैं।वे बनी भी रहें तो भी मनुष्य इतनी मजबूत धातुओं का बना हुआ है कि उनका वजन मनुष्य जिस प्रकार सुविधाओं,लाभों और सफलताओं को पाकर यथावत बना रहता है,उसी प्रकार थोड़ी-बहुत छोटी-मोटी कठिनाइयों के जूझने में ही मिलता है।लड़ाकू जुझारू सैनिक ही अपनी प्रतिभा का परिचय देकर पदोन्नति प्राप्त करते और सेनापति बनते हैं। मुसीबतें एक प्रकार की अग्नि परीक्षा हैं,जो हर किसी के व्यक्तित्व को निखारती और परिपक्व बनाती हैं।चतुरता बढ़ाने और कौशल निखारने के लिए संकटों से लोहा लेने के अतिरिक्त और कोई सुनिश्चित उपाय है नहीं।
4.अपने आप को पहचानें (Recognize yourself):
- तनाव की स्थिति सामने आने पर अपनी चिकित्सा आप करनी चाहिए।देखना चाहिए कि किन चिंताओं का भार सिर पर लदा है।जो दिखाई पड़े उनके बारे में नया परीक्षण यह करना चाहिए कि ये काल्पनिक भी तो हो सकती हैं।ऐसा क्या सुनिश्चित प्रमाण है कि जो अनुमान लगाया गया है,वह सही ही हो।बरसात में कई बार काली घटाएँ उठती हैं और तेज हवा के आ धमकने पर ऐसे ही बिना बरसे उड़ जाती हैं।ऐसा क्यों न माना जाए कि जिन कुकल्पनाओं से अपना मन भयभीत हैं,वे अवास्तविक ही सिद्ध होंगी।फिर यह भी सोचना चाहिए कि कुछ अपनी भी तो क्षमताएँ हैं।भगवान ने हमें भी तो सामर्थ्य दी है।सामर्थ्यवानों का इतिहास है कि उनने विपन्न परिस्थितियों में भी टक्कर मारी और उल्टे को उलटकर सीधा कर दिया।हम क्यों वैसा नहीं कर सकते हैं।अपनी क्षमताओं को भूले रहने के कारण ही लोग आपत्तियों में पिस जाने और उनका सामना न कर पाने की बात सोचते हैं।किंतु जब सीना तानकर,कमर कस कर जूझने का निश्चय किया जाए तो प्रतीत होगा कि मनुष्य की सामर्थ्य संसार की हर कठिनाई से बड़ी है।
- उद्भभ विद्वान बोपदेव सोचते थे कि पढ़ना-लिखना मेरे वश की बात नहीं।विद्या ग्रहण करना कठिन ही नहीं अत्यंत दुष्कर कार्य है।परंतु पनिहारिनों ने उनकी आन्तरिक क्षमता का बोध कराया तो महान विद्वान बन गए।
- मनुष्य की सामर्थ्य असीम है।कालिदास महामूर्ख थे परंतु विदुषी महिला विद्योतमा से विवाह हुआ और विद्योतमा ने उन्हें बोध कराया तो उनके अंतर्चक्षु खुल गए और वह महाकवि कालिदास बन गए।साधनों में सबसे बड़ा साधन मनुष्य का मनोबल है,उसे प्रसुप्ति से जाग्रति की स्थिति में यदि लाया जा सके तो वह आर्यभट सिद्ध हो सकता है।संसार के शूरवीरों की सफलताएँ उनके साधनों पर नहीं साहस पर निर्भर रही हैं।इसकी साक्षी में गणितज्ञा हाईपेटिया और गणितज्ञ आर्किमिडीज की जीवन गाथाएं प्रस्तुत की जा सकती हैं।बुद्ध और महावीर जैसे दुर्बलकाय महामानवों ने अपने समय की विपन्न परिस्थितियों का एक प्रकार से कायाकल्प ही कर दियाखा।
- यह भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए कि रोग शरीरगत दिखाई पड़ता हो एवं यदि तनाव के लक्षण शरीर में दिखाई पड़ रहे हों तो उसके लिए चिंतन पद्धति एवं आहार-विहार में सुधार-परिवर्तन कर लेने से बहुत बड़ा प्रयोजन सिद्ध हो जाता है।भोजन भी सौम्य-सात्विक वस्तुएँ भूख के साथ तालमेल बिठाते हुए खाया जाए।स्वच्छता और नियमितता को सतर्कता पूर्वक अपनाया जाए और हंसते-हंसाते,हल्का-फुल्का जीवन जीने का अभ्यास किया जाय,तो तनावजन्य व्यथाओं से निश्चयपूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है।
5.छात्र-छात्राओं के लिए निषेधात्मक चिंतन से मुक्त होने के उपाय (Ways for students to get rid of negative thinking):
- निषेधात्मक चिंतन से मुक्त होना छात्र-छात्राओं के लिए अत्यंत आवश्यक है।निषेधात्मक चिंतन से हम तनाव को गले लगाते हैं और अनेक मानसिक रोग आ घेरते हैं।निषेधात्मक चिंतन से सही प्रकार से अध्ययन नहीं किया जा सकता है।अनेक छात्र-छात्राएँ निषेधात्मक चिंतन के जाल में फँस जाते हैं और जितना ही निकलने की कोशिश करते हैं उतना ही अधिक से अधिक तनाव व अनेक मानसिक रोगों के जाल में फँसते जाते हैं।
- इस निषेधात्मक चिंतन में हमारे परिवार के सदस्य,मित्र तथा सहपाठी,रिश्तेदार आदि यदि आप जॉब करते हैं तो आपके सहकर्मी,सीनियर्स आदि भी वृद्धि करते हैं।अतः आपको ऐसे निषेधात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करने वाले व्यक्तियों से सावधान हो जाना चाहिए और उनसे किनारा कर लें अर्थात् उनके साथ कंपनी ना करें।
- दरअसल छात्र-छात्रा निषेधात्मक चिंतन को इसलिए स्वीकार कर लेते हैं कि ये मेरे परिजन हैं,मित्र हैं,सहपाठी हैं,रिश्तेदार हैं इसलिए सही ही कहते होंगे।याद रखें निषेधात्मक चिंतन,तनाव या अवनति की ओर धकेलने वाला हमारा अपना नहीं है बल्कि वह पराया है,हमारा हितैषी नहीं बल्कि हमारी हानि करने वाला है।
- आप सोचें कि शिक्षित हुए बिना जीवन जीना भी कोई जीना है बल्कि अशिक्षित व्यक्ति पशुवत जीवन जीता है। जबकि स्वाध्याय,अध्ययन,मनन,चिंतन और सकारात्मक चिंतन हमें सफलता,उन्नति और आत्मिक विकास की ओर अग्रसर करते हैं।
- अतः अपने आप को कोर्स की पुस्तकें पढ़ने,सत्साहित्य का अध्ययन करने में संलग्न रखना चाहिए।असफलता मिलने,किसी समस्या का हल न हो पाने पर निषेधात्मक चिंतन के बजाय सोचें कि जो शीर्ष पर होते हैं उन्हें भी अनेक बार असफलताओं का सामना करना पड़ता है,तब कहीं जाकर वे ऊंचाइयों को छू पाते हैं और कई विद्यार्थी तो इतनी ऊँचाई पर जा विराजते हैं कि अन्य छात्र-छात्राएँ वहाँ तक पहुंचने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।ऊँचाइयों पर चढ़ने वाले और कीर्तिमान स्थापित करने वाले नए मापदंड स्थापित करते हैं।
- अब्राहम लिंकन को अनेक बार असफलता मिली,अनेक चुनाव लड़े और हार गए परंतु अंतिम बार के चुनाव में वे अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए।यदि वे निषेधात्मक चिंतन को गले लगाते तो कभी राष्ट्रपति के पद तक नहीं पहुंच पाते।
- निषेधात्मक चिंतन से विद्यार्थी याद किया हुआ भी भूल जाता है और सकारात्मक चिंतन करने वाला विद्यार्थी यदि भूला-बिसरा भी है तो उसे याद आ जाता है।ऐसे न सोचें कि असफलता आपको ही मिलती है या बुरा आपके साथ ही होता है अथवा याद किया हुआ आप ही भूलते हैं या अध्ययन करने पर आपके ही पाठ समझ में नहीं आता है अर्थात् अनेक श्रेष्ठ और मेधावी विद्यार्थियों के साथ भी ऐसा होता है या होता आया है।
- निषेधात्मक चिंतन से बचने का तरीका है कि अपने आप को व्यस्त रखें,व्यवस्थित रखें।अधिकांशतया जब हम बेकार में बैठे होते हैं तो अनावश्यक बातों,बेकार की बातों में अपने आप को लगा देते हैं फलस्वरूप निषेधात्मक चिंतन करने लगते हैं।कई बार जूझने,बहुत प्रयास करने पर भी सवाल,समस्याएँ हल नहीं हो पाती है,प्रश्न का उत्तर नहीं सूझता है और ऐसी स्थिति में ही हमारी असली परीक्षा होती है कि हम निषेधात्मक चिंतन न करें बल्कि उसमें भी कुछ अच्छा ही सोचें।आप सोच सकते हैं कि इस सवाल या समस्या अथवा प्रश्न को हल करने के लिए मैंने इतने विकल्प सोचें जो कारगर नहीं है इसका तो मुझे पता लगा।मैं और प्रयास करूंगा तो इसका सही विकल्प,सही हल,सही उत्तर भी ढूंढ लूँगा।
- बार-बार अभ्यास करेंगे तो निषेधात्मक चिंतन से मुक्त हो सकेंगे।अभ्यास नहीं सही अभ्यास जरूरी है।जैसे परीक्षा में नकल करके या अनैतिक तरीके अपनाना गलत अभ्यास है,उसके बारे में चिंतन करना निषेधात्मक चिंतन है।परंतु परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए कठिन परिश्रम करके और सही उत्तर लिखकर उत्तीर्ण होने का प्रयास करना सही अभ्यास है।तात्पर्य यह है कि बुरे कर्मों का अभ्यास न करें,बुरे कामों को करने में आसक्ति न रखें और अच्छे कार्यों का अभ्यास करें।अच्छी आदतों का निर्माण करने का प्रयास करें।इससे आप निषेधात्मक चिंतन करने से बचें रह सकेंगे।
- कठिन से कठिन परिस्थितियों से उबरकर जिन छात्र-छात्राओं,गणितज्ञों और वैज्ञानिकों ने कीर्तिमान कायम किया है,सफल हुए हैं उनके जीवन चरित्र को पढ़कर प्रेरणा लें और आगे बढ़ने का प्रयास करें।किसी भी समस्या के जड़ तक पहुंचे और उस कारण को दूर करें जो आपके मार्ग में अवरोधक बनी हुई है।
- उपर्युक्त विवरण का अर्थ यह नहीं है कि निषेधात्मक चिंतन हर बार गलत ही होता है और सकारात्मक चिंतन हमेशा ही सही होता है।चरम स्थिति दोनों ही खतरनाक और परेशान करने वाली होती है,अतः चरम स्थिति से बचने का प्रयास करें।
- उपर्युक्त आर्टिकल में निषेधात्मक चिंतन से मुक्त होने की 6 टिप्स (6 Tips to Get Rid of Negative Thinking),निषेधात्मक चिन्तन से कैसे मुक्त हों? (How to Get Free From Negative Thinking?) के बारे में बताया गया है।
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6.विद्यार्थी की नकारात्मक सोच (हास्य-व्यंग्य) (Negative Thinking of Student) (Humour-Satire):
- टीचर (छात्र से):तुमने तो अबकी बार रिकॉर्ड तोड़ दिया,परीक्षा में अच्छे मार्क्स प्राप्त किए हैं।90% मार्क्स प्राप्त कर लिए।अब तो खुश हो न।
- छात्रःसर,खुश कहाँ हूँ,मेरा आठवां स्थान आया है,खुश कैसे हो सकता हूँ।
7.निषेधात्मक चिंतन से मुक्त होने की 6 टिप्स (Frequently Asked Questions Related to 6 Tips to Get Rid of Negative Thinking),निषेधात्मक चिन्तन से कैसे मुक्त हों? (How to Get Free From Negative Thinking?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.क्या निषेधात्मकता में आकर्षण होता है? (Does negligence have attraction?):
उत्तर:हाँ,निषेधात्मकता में आकर्षण होता है।आप किसी बच्चे,विद्यार्थी या व्यक्ति को काम करने की मनाही करेंगे तो उसकी उत्सुकता हो जाती है कि उस काम को उसे करना चाहिए।जैसे किसी को कहें कि नकल मत करना तो उसकी जिज्ञासा नकल करने में हो जाती है।
प्रश्न:2.क्या निषेधात्मक बातें भी सही हों सकती हैं? (Can prohibitive things also be true?):
उत्तर:हाँ,जैसे बेईमानी नहीं करनी चाहिए,नकल नहीं करनी चाहिए (परीक्षा में),झूठ नहीं बोलना चाहिए,आलस्य नहीं करना चाहिए,देरी से नहीं उठना चाहिए,स्कूल में देरी से नहीं जाना चाहिए आदि।
प्रश्न:3.क्या निषेधात्मक चिंतन को बदला जा सकता है? (Can prohibitive thinking be changed?):
उत्तर:हाँ,निषेधात्मक चिंतन को बदला जा सकता है परंतु समय लगता है।साथ ही विद्यार्थी तथा व्यक्ति को दृढ़ संकल्प शक्ति,धैर्य और सही अभ्यास करना चाहिए तभी सोच में बदलाव आ सकता है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा निषेधात्मक चिंतन से मुक्त होने की 6 टिप्स (6 Tips to Get Rid of Negative Thinking),निषेधात्मक चिन्तन से कैसे मुक्त हों? (How to Get Free From Negative Thinking?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Lekhak Ke Baare Mein (About the Author)
**Satyam Narain Kumawat**
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*Owner:satyamcoachingcentre.in*
*Sthan:Manoharpur,Jaipur (Rajasthan)*
**Teaching Mathematics aur Anya Anubhav**
***Shiksha:**B.sc.,B.Ed.,(M.sc. star Ke Mathematics Ko Padhane ka Anubhav),B.com.,M.com. Ke vishayon Ko Padhane ka Anubhav,Philosophy,Psychology,Religious,sanskriti Mein Gahri Ruchi aur Adhyayan
***Anubhav:**phichale 23 varshon se M.sc.,M.com.,Angreji aur Vigyan Vishayon Mein Shikshaka Ka Lamba Anubhav
***Visheshagyata:*Maths,Adhyatma (spiritual),Yog vishayon ka vistrit Gyan*
****In Brief:I have read about M.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 23 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science.
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