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5 Ways to Help Students Themselves

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1.विद्यार्थी के लिए अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (5 Ways to Help Students Themselves),अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (5 Ways to Help Yourself):

  • विद्यार्थी के लिए अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (5 Ways to Help Students Themselves) के आधार पर आप जान सकेंगे कि हम स्वयं अपनी सहायता कैसे कर सकते हैं? अपनी सहायता स्वयं करें से क्या आशय है? क्या हमें दूसरों से सहायता नहीं लेनी चाहिए? यदि लेनी चाहिए तो उसकी शर्त क्या है?
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2.आपकी सहायता करने को तैयार (Ready to help you):

  • बोर्ड तथा कॉलेज की परीक्षाएं प्रारंभ होने वाली है।अतः  परीक्षा के निकट छात्र-छात्राओं के लिए पत्र-पत्रिकाओं,अखबार तथा इंटरनेट पर ढेरों लेख अटे पड़े हैं।हर कोई किसी न किसी रूप में उन्हें प्रेरित करने के लिए,सहायता प्रदान करने के लिए,अपने ढंग से,अपनी क्षमता के अनुसार प्रयासरत है।माता-पिता,मित्र,सहपाठी भी कुछ न कुछ सहायता-सहयोग करते हैं।
  • इसलिए कोई भी छात्र-छात्रा सफल होता है तो उसमें अनेक लोग शामिल होते हैं।केवल एक अकेला छात्र-छात्रा अपने बलबूते पर सफल नहीं होता है बल्कि उसके पीछे अनेक लोगों की त्याग व तपस्या शामिल होती है।अतः जहां आवश्यक और नितांत जरूरी है वहाँ अपने लोगों से,अपने शुभचिंतकों से सहयोग लेने में संकोच नहीं करना चाहिए अन्यथा थोड़ी सी भी कोर-कसर रह जाती है तो बाद में पश्चाताप करने के सिवाय हमारे हाथ में कुछ भी नहीं होता है।समय पर लिया गया सहायता-सहयोग ही शुभ फलदायी होता है।
  • का वर्षा जब कृषि सुखाने अर्थात् फसल सूखने के बाद वर्षा होने का कोई महत्त्व नहीं होता।इसी प्रकार परीक्षा में असफल होने के बाद कुछ भी कोशिश करना बेकार सिद्ध होता है।अनेक बार थोड़ी सी सहायता-सहयोग करना हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है और हम कहां से कहां पहुंच जाते हैं।परंतु समय के बाद बहुत भारी सहयोग भी किसी काम का नहीं होता है।
    इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वयं तो कठिन परिश्रम ना करें और दूसरों की सहायता-सहयोग लेने से हमारी नैया पार हो जाएगी।स्वयं के प्रयत्न करने से ही दूसरों का सहयोग,प्रेरणा फलदायी होता है।
  • इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हर किसी से हम सहयोग-सहायता मांगते फिरे।आप किसी से सहयोग ले रहे हैं तो आपको भी उसका सहयोग देने के लिए तत्पर रहना होगा।वैसे जब आप खुद अपनी सहायता नहीं करेंगे यानी अपनी योग्यता,क्षमताओं का उपयोग नहीं करेंगे और सिर्फ दूसरों से सहायता-सहयोग मांगते रहेंगे तो ऐसा व्यक्ति जीवन में असफल हो जाता है।
  • शेख फरीद एक बड़े संत हुए हैं।उन्होंने सुन रखा था कि बादशाह अकबर बहुत दानी हैं।कितने ही फकीर उनके यहां जाते हैं और झोली भर कर ले आते हैं।शेख फरीद ने सोचा चलो मैं भी कुछ मांग लाऊं,बादशाह अकबर से।शेख फरीद जिस वक्त बादशाह के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि बादशाह अकबर खुदा की इबादत कर रहे हैं।शेख फरीद दूर बैठे,अकबर को इबादत करते देखते रहे।अकबर ने इबादत के बाद दोनों हथेलियां फैलाकर हाथ ऊपर कर दिए और बोले-‘ऐ मेरे खुदा! ऐ मेरे परवरदिगार,मेरी सल्तनत को गांधार से लेकर दक्षिण तक सलामत रख।मेरी झोली सदा भरी रहे।मेरे पास कभी दौलत कम ना हों।’
  • शेख फरीद ने अकबर को इस तरह परवरदिगार से मांगते देखा और सुना।बस वह उठे और चल दिए।लेकिन तभी अकबर ने उन्हें वापस देख लिया और आगे बढ़कर रोका।अकबर बोला-‘हुजूर मुझे माफ कीजिए।मैं इबादत कर रहा था,इसलिए आपकी खिदमत करने में देर हो गई।’ लेकिन शेख फरीद ने कुछ न कहा और फिर चल दिए।अकबर ने कहा-‘लेकिन बाबा! आपने कुछ फरमाया नहीं।आप क्यों आए और क्यों इस तरह जा रहे हैं।’ आखिर अकबर के बार-बार पूछने पर शेख फरीद ने कहा-‘बादशाह अकबर! मैं यहाँ बेशक मांगने की नीयत से आया था।लेकिन जब मैंने देखा कि यहां देने वाला खुद,उस परवरदिगार से हाथ फैलाकर मांग रहा है-तो मेरी आंखें खुल गई।मुझे लगा कि मैं भी कैसा हूं।जो खुद उस खुदा से मांग रहा है,जो सारे जहां का मालिक है।मैंने उससे क्यों नहीं मांगा?’ और बाबा फरीद अकबर से बिना कुछ मांगे चलने लगे।वह कह रहे थे-‘ मैं भी कैसे भूल गया कि देने वाला तो खुदा है,मैंने उससे क्यों नहीं मांगा।

3.विद्यार्थी कर्म करें (Students should do the work):

  • उपर्युक्त घटना के कुछ निहितार्थ हैं।एक केवल समर्थ-सक्षम,अपने शुभचिंतकों से ही सहायता-सहयोग लेना चाहिए।दूसरी अपने पुरुषार्थ,अपनी प्रतिभा का भरपूर इस्तेमाल करें।परंतु जीवन में सफलता,सुख और शांति मांगने के लिए लोग अक्सर कभी इस गुरु के पास,कभी उस ज्योतिषी के पास,तो कभी किसी साधु के पास जाते हैं।लेकिन क्या उनसे सचमुच कुछ मिल पाता है? हमारे यहां आज तक अंधविश्वास इस हद तक फैला हुआ है कि साधु के वेश में ठगने वालों के कितने ही किस्से अखबार में पढ़ने को मिल जाते हैं।सफलता चाहे-व्यापार में हो या नौकरी पाने में,संतान और धन ये तीन मांगे प्रमुख हैं।लोग इन्हें पाने के लिए क्या-क्या नहीं करते।लेकिन जो वास्तव में देने वाला है,उससे नहीं मांगते।यह तभी संभव है जब मन में अपने प्रति आत्म-विश्वास हो।जब हमें अपने पर भरोसा नहीं होता-तो हम दूसरों का सहारा-मार्गदर्शन मांगते हैं।
  • ‘गुरुजी!मैं अमुक नौकरी का इंटरव्यू देने जा रहा हूं।मुझे सफलता मिलेगी ना?’ गुरु जी! कल से मेरी परीक्षा शुरू है।मैं पास हो जाऊंगा न? ‘गुरुजी! ये शादी कैसी रहेगी?’
  • ऐसे तमाम सवाल लेकर लोग गुरुओं और बाबाओं के पास बड़े विश्वास से जाते हैं।परिणाम तो वही होता है-जो आपने किया है।तैयारी अच्छी है-तो इंटरव्यू में सफल होंगे।पढ़ाई की है तो जरूर पास होंगे।लड़के-लड़की ने एक-दूसरे को यदि ठीक से समझा है तो शादी सफल होगी।लेकिन फिर यह पूछताछ क्यों? मन में परिणाम के प्रति शंका क्यों? क्योंकि हमारे अंदर आत्मविश्वास की कमी होती है।अपने ऊपर भरोसा नहीं होता।किसी ने ठीक कहा है-‘परमात्मा उसी की मदद करता है,जो अपनी मदद आप करता है।’ अपनी मदद आत्मविश्वास से परिश्रम करने पर होती है।तब यदि हम इधर-उधर भटकने की बजाय-सीधे परमात्मा या खुदा से मांगे तो-वह यही कहेगा-‘अपनी मदद खुद करो।सफल हो जाओगे।’
  • और हम इसी बात को सुनने से डरते हैं तो भगवान या खुदा के सामने नहीं जाते,क्योंकि मन में अपने प्रति,अपने परिश्रम के प्रति अविश्वास होता है-इसलिए किसी चमत्कार की मदद लेने या मांगने जाते हैं।फिर जब असफल हो जाते हैं तो वह ‘गुरु’ कहते हैं चिंता मत करो।सब ठीक हो जाएगा।सफलता-असफलता तो होती ही रहती है।प्रयत्न करते रहो।’ उसने भी घुमा-फिरा कर सफलता पाने की जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर ही डाल दी।यह तो सब जानते हैं कि परिश्रम करोगे तो फल अच्छा ही मिलेगा।एक पुराना किस्सा है।किसी छात्र ने परीक्षा पुस्तिका में लिखा-‘पास करने की कुंजी आपके पास है,पास कर दो तो फिर क्या बात है।’ परीक्षक ने उसके नीचे लिख दिया-‘पढ़ने की कुंजी तेरे पास थी,पढ़ लेता तो क्या बात थी।’

4.विद्यार्थी अपनी सहायता स्वयं करें (Students should help themselves):

  • हम हरदम अपनी कमजोरियों से डरते हैं और उन्हें छिपाने तथा उनके प्रति अपने को भुलावे में डालने के लिए इधर-उधर भटकते हैं-कभी चमत्कारी साधु के पास,कभी ज्योतिषी के पास अंगूठी लेने के लिए,तो कभी किसी और के पास।लेकिन अपने अंतःकरण में झांककर नहीं देखते।जो आत्मविश्वासी है,अपने अंतःकरण में झांकता है-उसे परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं।परमात्मा आपके अंदर का आत्मविश्वास है।वही तो आपकी मदद करता है।सफलता पानी है तो आत्मविश्वास रूपी मन के अंदर बैठे परमात्मा से मांगिये।सफलता मिलेगी।
  • गुरु या साधु तो असफलता मिलने पर यह भी कह देता है-‘हरि इच्छा बलवान।’ यानी करने वाला तो प्रभु है।तब उस साधु या गुरु ने उस समय क्यों नहीं यह चेतावनी दी थी कि पहले उसकी इच्छा पूरी करो।वह तो कहता है-‘पहले अपनी मदद आप करो-तब फल दूंगा।’ गीता का भी यही संदेश है-‘कर्म करो फल की चिंता छोड़ो,वह मैं दूंगा।’ अब यह तो तुम्हारे कर्म के स्तर पर निर्भर करता है।यदि वह उच्च कोटि का है-तो फल भी वैसा ही मिलेगा-‘जैसा करोगे,वैसा भरोगे।’ और यहीं पर हम संशय में पड़ जाते हैं-क्योंकि अपने कर्म के प्रति मन में अविश्वास जगा लेते हैं।अधकचरे कर्म के बदले पूरा फल पाना चाहते हैं-किसी चमत्कार या अंधविश्वास के माध्यम से।इसलिए सफलता का मंत्र है-आत्मविश्वास,कर्म करने में पूर्ण निष्ठा।उसे जगाओ।तब भगवान के सामने जाने से भी डर नहीं लगेगा।इधर-उधर भटकना बंद करो।मांगना है तो भगवान से मांगो-आत्मविश्वास,कर्म करने की शक्ति।फल तो अच्छा मिलेगा ही।
  • तात्पर्य यह है कि भगवान अकर्मण्य,निठल्ले और आलसी की नहीं,पुरुषार्थी की सहायता करता है क्योंकि भगवान की शक्ति का उपयोग ही तब होता है जब हम पुरुषार्थ करते हैं,कर्म करते हैं अन्यथा नहीं होता।इसे यूं समझें कि आपके दो हाथ,दो पैर,आंख,कान,नाक आदि ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ हैं ऐसे ही और भी अंग मौजूद हैं,इन सब में हमारी आत्मिक शक्ति और मन का कनेक्शन लगा हुआ है लेकिन जब तक आप अपने मन से इंद्रियों को कर्म करने का निर्देश नहीं देंगे तब तक कोई भी इंद्रियां,कर्मेंद्रियाँ काम नहीं करेगा।
  • सर्वव्यापक परमात्मा हमारे अंदर आत्मबल,आत्मिक शक्ति,आत्मविश्वास के रूप में मौजूद है परंतु उसके कोई गरज नहीं है कि आपके (मन) निर्देश दिए बिना वह आत्मिक शक्ति आपकी इंद्रियों को काम करने का निर्देश दे।आपको आत्मिक शक्ति से जो भी काम लेना हो,अध्ययन करना हो,परीक्षा की तैयारी करनी हो इंद्रियों को,मस्तिष्क को वह कार्य करने का निर्देश देना होगा।आत्मिक शक्ति के रूप में भगवान मौजूद न हो तो हम एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते हैं।परंतु भगवान ने मनुष्य को अपनी कठपुतली नहीं बनाया है,कर्म करने की स्वतंत्रता दी है।कर्म अच्छा करो करें या बुरा करें यह हम पर निर्भर है।
  • अतः किसी भी परीक्षा में सफलता या असफलता के लिए हम स्वयं जिम्मेदार होते हैं।उसके लिए हमें स्वयं ही परिश्रम करना होगा,अपने आप पर आत्मविश्वास रखना होगा,अनासक्तिपूर्वक कर्म करना होगा ताकि जो भी परिणाम प्राप्त हो उसे सहज भाव से स्वीकार कर सकें।

5.हम स्वयं के हितैषी बने या नहीं बनें (Whether we become self-friendly or not):

  • अब यह हम पर निर्भर है कि हम अपने आपके हितैषी बनें या नहीं बनें।आप शायद यह सुनकर हैरान हो सकते हैं कि हम अपनी हितैषी कैसे नहीं हो सकते क्योंकि हम अपने आप को सबसे ज्यादा चाहते हैं और जिसे सबसे ज्यादा चाहते हैं उसके हितैषी कैसे नहीं हो सकते हैं? लेकिन जरा गहरे में विचार करेंगे तो यह तथ्य समझ सकेंगे की हितैषी होना मुश्किल होता है और हितैषी न होना बहुत आसान है।हितैषी होना एक कठोर साधना है जबकि हितैषी ना होना मामूली काम है।दूसरों के साथ ही नहीं,स्वयं अपने आपका हितैषी होना बहुत कठिन साबित होता है।
  • आप सोचेंगे या कहेंगे कि इससे बड़ी गलत बात और क्या हो सकती है कि हम अपने हितैषी नहीं है।हम तो सबसे ज्यादा अपने बारे में,अपने आपकी चिंता करते हैं।अगर अपने आपके हितैषी ना होते तो भला ऐसा करते? पर सच्चाई कुछ और ही है जिस पर आपने विचार नहीं किया।यदि आप अपने आप को चाहते,अपने आप से प्रेम करते,अपना हित चाहते तो अध्ययन करने में कोई लापरवाही,गफलत नहीं करते।यदि आप अपने आप को चाहते तो आप कठिन परिश्रम (अध्ययन के लिए) करते,सही उत्तर लिखकर,सही तरीके से उत्तीर्ण होने का प्रयास करते।
  • दूसरों से ईर्ष्या न करते,द्वेष न करते,गलत तरीके से उत्तीर्ण होने का प्रयास न करते,तिकड़म न लगाते यानी ऐसा कोई काम कदापि नहीं करते जिससे आपको असफलता मिले।आपका हर कदम परीक्षा की तैयारी करने के लिए उचित होता।दरअसल परीक्षा के निकट आकर अगर हम यह सोचते हैं कि हमने अध्ययन नहीं किया,परीक्षा की ठीक तरह से तैयारी नहीं की,परीक्षा की तैयारी में कसर बाकी रह गई तो स्पष्ट है कि हम अपने आपके हितैषी नहीं है।केवल चाहने से कुछ नहीं होता है।चाहने के अनुसार कोशिश,परिश्रम करना होता है।
  • अब लेख आपके पास पहुंचने तक या तो परीक्षा प्रारंभ हो चुकी होगी या प्रारंभ होने वाली है।इस मुद्दे पर जरा गहरे में सोचें और अपने आप के हितैषी होने वाले कार्य करें,अपने आपके हितैषी ना होने के कार्य न करें।परीक्षा की तैयारी पूरे मन,उत्साह,उमंग,जोश व होश के साथ जो विद्यार्थी कर रहे हैं वे ही सच्चे मायने में अपने आपके हितैषी होते हैं।जिनकी आंख अब खुली है उन्हें इस मंत्र का पालन करना चाहिए कि जागे तभी सवेरा।मेहनत करने में जुट जाना चाहिए,अपने आप पर विश्वास रखकर।परिणाम भगवान पर छोड़ दें,उसकी बिल्कुल चिंता-फिक्र न करें क्योंकि परिणाम हमारे हाथ में है भी नहीं,हो सकता भी नहीं,होगा भी नहीं।पुरुषार्थ करें,आत्मविश्वास के साथ।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में विद्यार्थी के लिए अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (5 Ways to Help Students Themselves),अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (5 Ways to Help Yourself) के बारे में बताया गया है।

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6.बेचारा अकेला है (हास्य-व्यंग्य) (Poor Student is Alone) (Humour-Satire):

  • तीन तीसरी कक्षा के छात्र रास्ते में खड़े होकर बातें कर रहे थे।अचानक उस रास्ते कॉलेज का विद्यार्थी गुजरा।वहां चौराहे पर खड़े
  • एक छात्र ने कहाःएक कॉलेज के छात्र हमसे कुश्ती लड़ोगे?
  • तो दूसरे दोनों छात्रों ने उसे रोकते हुए कहा,अरे रहने भी दो बेचारा अकेला है।

7.विद्यार्थी के लिए अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (Frequently Asked Questions Related to 5 Ways to Help Students Themselves),अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (5 Ways to Help Yourself) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नः

प्रश्न:1.आदर्श विद्यार्थी में कौनसे गुण होते हैं? (What are the qualities of an ideal student?):

उत्तर:विद्याध्ययन में गहरी रुचि,भविष्य सँवारने की तीव्र उत्कंठा,गुरुजन के प्रति श्रद्धाभाव,चित्त की एकाग्रता,सुदृढ़ संकल्पशक्ति,आत्म-विश्वास,जिज्ञासु प्रवृत्ति,परिश्रमी,संतोषी,सहिष्णुता,सच्चरित्रता,विनम्रता,समय की कद्र करना,सद्बुद्धि,धैर्य आदि इतने गुण विद्यार्थी में होने चाहिए तभी वह विद्यार्थी जीवन का सही उपयोग कर अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकेगा।

प्रश्न:2.विद्यार्थी को किनसे बचना चाहिए? (What should the student avoid?):

उत्तर:काम क्रीड़ा,काम (सेक्स) संबंधी एवं अश्लील बातें करना,साहित्य पढ़ना या विचार-विमर्श करना,काम क्रीड़ा संबंधी छेड़छाड़,हंसी मजाक,इशारे करना,हाथापाई करना,छुप कर कामुक दृश्य देखना,गुपचुप काम क्रीड़ा या विषय वासना संबंधी बातें करना,काम क्रीड़ा करने का विचार या संकल्प करना,मैथुन करने के उपाय करना,तिकड़म लगाना,जानबूझकर ऐसे कार्य करना जिससे वीर्यपात हो आदि कार्य करने से बचना चाहिए।

प्रश्न:3.विद्यार्थी कौनसे अवगुणों से दूर रहे? (What defects should the students stay away from?):

उत्तर:काम,क्रोध,लोभ,स्वाद,श्रृंगार,खेल-तमाशे,बहुत ज्यादा सोना और अधिक सेवा कार्य करना इन आठ कामों को न करें।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा विद्यार्थी के लिए अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (5 Ways to Help Students Themselves),अपनी सहायता खुद करने के 5 उपाय (5 Ways to Help Yourself) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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