7 Spells of Dealings With Difficulties
1.कठिनाइयों से कैसे जूझे के 7 मंत्र (7 Spells of Dealings With Difficulties),विद्यार्थियों के लिए कठिनाइयों से जूझने की 7 तकनीक (7 Techniques for Students to Cope with Difficulties):
- कठिनाइयों से कैसे जूझे के 7 मंत्र (7 Spells of Dealings With Difficulties) से विद्यार्थियों को कठिनाइयों से पार पाने की तकनीक मालूम पड़ेगी।यों कठिनाइयों को अच्छा नहीं समझा जाता है,परंतु ये कठिनाइयाँ ही है जो हमारे व्यक्तित्व को गढ़ती है।
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2.कठिनाइयाँ हमारे लिए वरदान (Hardships are a boon for us):
- विपत्ति हमें बड़ी तीव्रता से भगवान की ओर (अच्छे कार्यों की ओर,अध्ययन की ओर) मोड़ती हैं।विपत्ति या विपरीत परिस्थिति में हम अत्यंत संवेदनशील हो जाते हैं और उसी अनुपात में भगवान की ओर (अध्ययन की ओर) चल सकते हैं।विपरीत परिस्थितियाँ हमें किसी भी वस्तु,स्थिति,व्यक्ति या घटना के प्रति विरक्त कर परमात्मा की ओर मुड़ने में सहायक हो सकती हैं।सामान्य स्थिति में मन किसी भी चीज से जो उसे सुकून देती है,वहाँ दो पल ठहर जाना चाहता है,परन्तु विपरीत परिस्थिति में वह सुकून नहीं मिलता और हम तीव्रता के साथ उच्चस्तरीय चेतना के साथ हो सकते हैं।विपरीत परिस्थितियाँ वरदान हैं;जबकि हम इन्हें अभिशाप मानते हैं।
- विपरीतता कई माने में सहयोग करती है।यह हमें अति मोह से जगाती है और बताती है कि जिन्हें तुम चाहते हो,वे तुम्हारे नहीं है,यह तो मात्र परिस्थिति है,जिससे वे तुम्हारे साथ जुड़े हुए हैं।संबंधों का विश्लेषण इसी समय पता चलता है।अपने-पराए का परिचय इसी अवस्था में ज्ञात होता है।जिन्हें हम अपना मानकर जान छिड़कते हैं,वे कितने अपने हैं,इसी दौरान इसकी परीक्षा हो जाती है।कहते हैं,विपरीत परिस्थिति के दुर्दिनों में कोई साथ नहीं देता है,सभी साथ छोड़ जाते हैं।ऐसे नितांत अकेलेपन में बहुत कुछ छूटता,टूटता,बिखरता है,परंतु जो कुछ मिलता है,इन सबसे बेशकीमती एवं मूल्यवान होता है।इस नीरव एवं एकांत पल में,जब हमारे साथ कोई भीड़ नहीं होती तो हम स्वयं होते हैं।भीड़ में तो हम स्वयं खोए रहते हैं,पर इस पल में हमारा स्व हमारे साथ खड़ा होता है।
- विपरीत स्थिति हमें बोध कराती है कि जो भीड़ हमारे इर्द-गिर्द खड़ी है,वह हमारी नहीं है,वह तो तमाशबीन है,जो किसी मदारी की आवाज पर खड़ी हो जाती है तमाशा देखने के लिए,पर विडंबना यही है कि हमने उसे अपना मान लिया है।वास्तविक है कि यह भीड़ हमारी अपनी नहीं है और इसी वास्तविकता का बोध हमें इन विपरीत स्थितियों में होता है।विपरीतताएँ हमें वास्तविकता का बोध कराती है।इससे बड़ा वरदान और क्या हो सकता है,पर बात यह है कि हमें ठोकरो से उठना,जागना और संभलना नहीं आता है।हर ठोकर पल भर के लिए हमारे अंदर कुछ झलकियां दिखा देती है,परंतु जड़ता इतनी है कि वह सब कुछ भुला बैठती है।विपरीत समय में पीड़ा पहुंचाने वाली घटनाओं से बचना चाहिए,लेकिन बारम्बार हम वही कहानी दोहराते हैं।खराब समय में चिल्लाते हैं,दूसरों पर दोषारोपण करते हैं,हाय-हल्ला मचाते हैं और सुख के दिनों में इतना खो जाते हैं कि जब तक परिस्थितियाँ फिर से ठोकर न मार दें बस,खोए रहते हैं।
- विपरीतता हमें सिखाने आती है,बहुत कुछ बताने आती है।सीखने वाली मानसिकता से बहुत कुछ सीख जाती है,इसके संकेतों को पहचान लेती है।नेपोलियन अपने दुर्दिनों में भगवान के संकेत को पहचान नहीं सका और इसी कारण यातनापूर्ण जेल जीवन में उसकी इहलीला समाप्त हुई।कठिनाइयों से जूझने के लिए कभी-कभी भगवदीय संकेत आता है।जो इस संकेत को समझ लेता है और पुरुषार्थ करता है,वही संघर्ष के दरिया को पार कर लेता है।
3.कठिनाइयों से जूझने पर फौलाद बन जाता है (Becomes steel when battling difficulties):
- कठिनाइयों से जूझता इंसान जब वहां से निकलता है तो बहुत मजबूत बन जाता है।कठिनाइयों में कुछ ऐसा रसायन है,जो आदमी को फौलाद के समान बना देता है।हर साधक का जीवन इन्हीं भीष्ण कठिनाइयों से होकर गुजरता है।यदि उनके जीवन से इन संघर्षों को हटा दिया जाए तो और कुछ नहीं रह जाएगा।पुरुषार्थ का चरम तपस्या कहलाती है और तपस्या इन्हीं चरम विपरीताओं के बीच संपन्न होती है।इसी कारण साधक और तपस्वी का जीवन सदा विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरता है।वे हर चुनौती को सफलता के साथ पार कर लेते हैं।सामान्य जीवन के लिए यह संभव असंभव जैसा है,पर तपस्वी हर असंभव को संभव बनाने में कुशल एवं दक्ष होता है।
- जितने भी गणितज्ञ और वैज्ञानिक हुए हैं उनमें अधिकांश ने प्रतिकूलताओं में खोज की।वर्षों तक एकांत में (प्रयोगशाला) में बैठकर तप करना पड़ा तभी कहीं जाकर वे अनुसंधान कर सके।यूक्लिड को वर्षों तक कई देशों की खाक छाननी पड़ी तब कहीं जाकर उन्होंने ज्यामिति का ज्ञान प्राप्त किया और उसे तार्किक आधार पर खड़ा किया।उन्होंने अनेक चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया और उनसे धैर्य और साहसपूर्वक उबर सके।पराक्रमी अर्जुन को एक वर्ष तक बृहन्नला का जीवन बिताना पड़ा,पर वे इन सबसे हारे-घबराए नहीं,बल्कि उन्होंने डटकर मुकाबला किया और भावी महाभारत युद्ध तथा इसके पश्चात राज्य संभालने के लिए पूरी तैयारी उनने कर ली।ठीक इसी प्रकार भगवान राम केवल अयोध्या में रहते और 14 वर्ष का वनवास संपन्न नहीं करते तो उनके शौर्य और पराक्रम का पता कैसे चलता।वे निखरकर भी न आते,असुरता भी न मिटती।
- बुद्धिमान एवं समझदार व्यक्ति विपरीत स्थिति में हिम्मत और हौसला नहीं हारते और उससे इतना कुछ सीख लेते हैं,जितना की सामान्य स्थिति में जीवन भर नहीं सीख-समझ पाते।यदि साहस और दूरदृष्टि हो तो कठिनाइयों का भरपूर उपयोग किया जा सकता है।साहस चुनौतियों से सामना करने का सम्बल प्रदान करता है और दूरदृष्टि बताती है कि किस योजना-विधि से इसका सामना किया जाए।दूरदृष्टि हो तो जीवन में कठिनाइयों से बड़ा वरदान और कुछ नहीं हो सकता।
- वस्तुतः जो बड़ी उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं,वे संघर्षों की चुनौतियों को पार करके ही हुई हैं।अतः कठिनाइयों को ही सफलता का पर्याय माना जाता है।अनुकूल परिस्थिति में सुख और यश की ललक इतनी प्रबल होती है कि श्रेष्ठ कर्म पूरे मनोयोग से हो नहीं पाते हैं।सुख और यश प्राप्त करने में लगभग पूरी ऊर्जा चली जाती है।अतः विशिष्ट कार्य करने के लिए जिस जिजीविषा की जरूरत पड़ती है,वह लग नहीं पाती है।विपरीताओं में सुख और यश का सम्मोहन स्पर्श नहीं करता है।इसमें कार्य को अस्तित्व बचाने के समान किया जाता है।इस दौरान ऊर्जा एक बिंदु पर सिमट जाती है,इसलिए सफलता मिल जाती है।
- कठिनाइयाँ और विपरीत परिस्थितियाँ उपलब्धि तभी बनती हैं,जब हम उन परिस्थितियों में मनोबल नहीं खोते,हिम्मत नहीं हारते और धैर्य बनाए रखते हैं।जीवन के महासंग्राम में विपरीत परिस्थितियाँ सहयोगी होती हैं,क्योंकि वे हमें सजग,सतर्क और सावधान बनाती हैं।सुख के क्षण में व्यक्ति खो जाता है,निज को भुला देता है।इसलिए जीवन में विपरीताओं का सम्मान करना चाहिए।इनसे जूझना चाहिए और डरना-घबराना नहीं चाहिए।अगर हम धैर्य,साहस और बुद्धिमानपूर्वक इनका सामना कर सकें तो ये हमें बहुमूल्य उपलब्धियों व वरदानों से भर सकती हैं।अतः हमें इनका सामना करना चाहिए।
4.मन की क्षमता और कमजोरी (Ability and weakness of the mind):
- विपरीतताओं से टक्कर लेने के लिए मनोबल बहुत सहायक है।परंतु मन बड़ा ही चंचल एवं संवेदनशील होता है।वह किस क्षण प्रसन्न हो जाता है या उदास हो जाता है,कुछ कहा नहीं जा सकता।”मन का हाल तो पूछिए मत…….बड़े-से-बड़े उद्योग के उतार-चढ़ाव को तो समझा जा सकता है,पर मन तो अचानक ही ‘लो’ हो जाता है और फिर हफ्तों लग जाते हैं,उसे चार्ज होकर पहले जैसा उत्साहित बनने में।”
- यह बात सच है कि ‘मन’ की उदासी कभी-कभी बेवजह ही हो जाती है।मन के उदास होने के कई प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कारण हो सकते हैं।प्रत्यक्ष कारणों में मन की अतिसंवेदनशीलता है।इसलिए आस-पास की दुनिया की हर छोटी-छोटी घटनाएं व्यक्ति के मन पर असर डालती हैं और देर-सबेर उसका मन उदास हो जाता है,दुखी हो जाता है।अप्रत्यक्ष कारणों में हमारे जीवन की अतीत की दुःखद घटनाएं होती हैं,जो मन की गहरी परतों में अंकित होती हैं।जब कभी ये घटनाएं मनःपटल पर स्पष्ट रूप से उभरती हैं और व्यक्ति उनसे स्वयं को जोड़ लेता है,तब उस समय मन में उठने वाला चिंतन यदि नकारात्मक है तो व्यक्ति उदास एवं दुखी हो जाता है और यदि वह सकारात्मक है तो व्यक्ति का मन इन्हीं घटनाओं से जीवन का अनुभव ग्रहण करता है और जीवन के अग्रिम मार्ग को प्रशस्त करता है।
- कई बार व्यक्ति को यह पता ही नहीं होता है कि उसका मन क्यों दुखी है।उसे मन में अजीब सी बेचैनी महसूस होती है,मन में नकारात्मक चिंतन चलता है,किसी भी कार्य में उसका मन नहीं लगता और घुटन सी महसूस करता है।इसका कारण अपनों से जुड़े हुए परिजनों की पीड़ा,बिछोह या आने वाली किसी गंभीर परेशानी का पूर्वाभास या विश्व में घटने वाली किसी भी तरह की आपदा के संकेत हो सकते हैं।मन जितना संवेदनशील होता है,उतनी ही दूरी की तरंगों को महसूस करता है।अधिकतर लोगों का मन अपने प्रियजनों से इतना जुड़ा होता है कि उनके सुख-दुःख,बीमारी के समय कष्ट-पीड़ा को वे जान पाते हैं।
- हम सभी आपस में सूक्ष्म तरंगों से जुड़े हुए हैं।जैसे स्थिर पानी में उठने वाली छोटी सी तरंग पूरे पानी के स्तर में फैलती है,उसी प्रकार इस विश्व-ब्रह्मांड में होने वाली हलचलें भी हमें प्रभावित करती हैं।यह बात मन की ग्रहणशीलता पर निर्भर है कि कभी हम इसे स्पष्ट अनुभव कर पाते हैं और कभी बिल्कुल भी नहीं।यदि मन शांत,स्थिर,जागृत एवं संवेदनशील है,तब निश्चित तौर पर इन घटनाओं का पूर्वाभास किया जाता है।इसी के आधार पर अनेक व्यक्तियों ने भविष्यवाणियाँ की हैं और वे सत्य प्रमाणित हुई है।ध्यानी,योगी व्यक्ति इन घटनाओं को अपने दिव्य चक्षुओं से देख भी लेते हैं और आवश्यक प्रयोग पीड़ा-निवारण एवं नवसृजन हेतु करते हैं।
- यदि मन कमजोर है तो जिंदगी के कठिन झंझावातों से जूझ पाना आसान नहीं होता;जल्दी निराशा होती है और अवसाद घेर लेता है।मन के कमजोर होने पर कई तरह की परेशानियां,समस्याएं घेरे रहती हैं।मन शांत नहीं रह पाता और उसकी इम्युनिटी भी घटती रहती है।जैसे छोटे बच्चे को थोड़ी सी चोट लगने पर वह उसे सह नहीं पाता,रोने लगता है;थोड़ा सा भी डाँटने पर दुखी होकर आंसू बहाने लगता है।उसी प्रकार बच्चे की मनःस्थिति के समान उम्र में बड़े हो जाने के बावजूद मन छोटा ही रह जाता है,उसका विकास नहीं हो पाता और जीवन की परेशानियों,असफलताओं,आने वाली घुमावदार मोड़ों से वह हताश होने लगता है।
5.मन की सामर्थ्य बढ़ाएं (Increase the power of the mind):
- ऐसी अवस्था में जरूरत है मन को विकसित करने की,उसकी इम्यूनिटी (प्रतिरोधक क्षमता) बढ़ाने की,ताकि किसी भी कठिन या दुःखद परिस्थिति में वह टूटकर गिरे नहीं,बल्कि मजबूती के साथ संभल जाए और दूसरों का भी सहारा बने।जीवन में घटित होने वाली सभी घटनाएं प्रकृति के नियमों से आबद्ध हैं,इसलिए हमें प्रकृति के नियमों को समझना चाहिए और यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि जीवन की हर घटना,हर परिस्थिति हमारे विकास के लिए सर्वोत्तम अवसर लेकर आती है,इसलिए हर घटना महत्त्वपूर्ण है।हमारा दृष्टिकोण कैसा है और हम क्या करते हैं,इस पर ही सब कुछ निर्भर करता है।हमारी मानसिक संकीर्णता ही होती है,जो हमें जीवन की गहराई में छिपे हुए महत्त्वपूर्ण तथ्यों से अनभिज्ञ रखती है और खुलकर सही ढंग से सोचने नहीं देती।यदि हम इस संकीर्णता से उबरें तो हमें जीवन के कई आयामों,नवीन विचारधाराओं और महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों का पता चलता है,जिन्हें जानने अपनाने से मन का सर्वोत्तम विकास होता है और उसकी सामर्थ्य एवं क्षमता बढ़ती है।
- मन की क्षमता एवं सामर्थ्य बढ़ाने के लिए कुछ अभ्यास किए जा सकते हैं;जैसे (1.)नियमित स्वाध्याय (इसके लिए आप प्रेरणादायक पुस्तकों को पढ़ें,समझें और चिंतन-मनन करें); (2.)सत्संग (अच्छे विचारों के सतत संपर्क में रहना,आपको कहीं से भी मन को उठाने वाले विचार मिलें,तो आप उनके संपर्क में रहें);(3.)स्वसंकेत (अच्छे विचारों को बार-बार मन में पूरे विश्वास के साथ दोहराना,जैसे आप स्वयं से बार-बार यह कह सकते हैं कि आपकी सामर्थ्य बढ़ रही है और आप सब कुछ करने में सक्षम हैं);(4.)पौष्टिक आहार (यह आपको शारीरिक रूप से स्वस्थ रखने के साथ-साथ मानसिक रूप से उत्साहित रखेगा);(5.)पर्याप्त श्रम (शारीरिक एवं मानसिक रूप से किए जाने वाले कार्य शरीर एवं मन को संतुष्टि प्रदान करते हैं एवं सामर्थ्य बढ़ाते हैं);(6.)उपासना (इसकी शुरुआत आप अपनी दिनचर्या में थोड़े समय की पूजा से कर सकते हैं,जिसमें आपको भगवदीय सत्ता के प्रति मन को तल्लीन करना है,इसके लिए जप,ध्यान,प्राणायाम या अन्य किसी भी तरह की विधि को अपना सकते हैं)।(7.)नियमित रूप से सरस्वती स्तोत्र का पाठ करना,सरस्वती की आरती मन ही मन बोलना और एकाग्रचित्त होकर पूर्ण श्रद्धाभाव से स्त्रोत का पाठ करना।
- मन की सामर्थ्य बढ़ाने में उपासना की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।इसकी शुरुआत भले ही छोटे रूप में की जाती है,लेकिन जैसे-जैसे यह विकसित होती है तो इसके दिव्यपलों में ही अंत:प्रेरणा मिलती चली जाती है,समस्याओं के समाधान मिलते हैं और जीवन की दुर्गमताओं में आगे बढ़ने के लिए राह मिलती है।कठिनाइयों में भी अडिग रहने का साहस एवं सतत भगवदीय सत्ता के सान्निध्य का अनुभव उपासना की चरम परिणति होती है और इसके द्वारा मन अपनी समझ,सामर्थ्य एवं क्षमता को इतना विकसित कर लेता है कि असंभव कार्य को भी संभव कर दिखाने में तनिक भी डगमगाता नहीं है,भयभीत नहीं होता और हर क्षण विकसित होता जाता है।अतः मन की क्षमता बढ़ाने के लिए उपासना,साधना,स्वाध्याय का सतत अभ्यास करना चाहिए।इससे मन शांत एवं स्थिर होता है और उसकी क्षमता में भी आश्चर्यजनक वृद्धि होती है।
6.विद्यार्थी मनोबल बढ़ाएँ (Boost student morale):
- विद्यार्थी के सामने अध्ययन करते समय अनेक कठिनाइयां आती हैं,अनेक गुत्थियाँ सुलझ नहीं पाती हैं,सवालों के हल नहीं हो पाते हैं,प्रश्नों के उत्तर नहीं सूझते हैं,इससे मन विचलित हो जाता है और अध्ययन से विरक्ति हो जाती है।अतः विद्यार्थियों को ऊपर बताए गए उपाय तो करने ही चाहिए।साथ ही सवालों को हल करने,प्रश्नों के उत्तर जानने,पाठ को स्मरण करने के लिए बार-बार अभ्यास करना चाहिए।मन में आए हुए बुरे विचारों को कंपनी नहीं देनी चाहिए।अभ्यास और वैराग्य से अध्ययन में रुचि बढ़ती है और कठिनाइयां धीरे-धीरे सॉल्व होने लगती है।हिम्मत ना हारे,हौसला बनाए रखें और धैर्यपूर्वक सतत परिश्रम करते रहें।ज्यों-ज्यों कठिनाइयां हल होने लगती हैं तो आनन्द की अनुभूति होने लगती है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में कठिनाइयों से कैसे जूझे के 7 मंत्र (7 Spells of Dealings With Difficulties),विद्यार्थियों के लिए कठिनाइयों से जूझने की 7 तकनीक (7 Techniques for Students to Cope with Difficulties) के बारे में बताया गया है।
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7.स्कूल क्यों नहीं गया? (हास्य-व्यंग्य) (Why Didn’t I Go to School?) (Humour-Satire):
- पिताजीःसुरेश,आज तुम स्कूल क्यों नहीं गए।
- सुरेश:कल गणित की टीचर ने इतने कठिन सवाल दिए कि हल ही नहीं हो पा रहे थे,कह रहे थे कि मैं देखता हूं कठिनाइयों को कैसे हल करते हो।मैं इसलिए स्कूल नहीं गया कि जब स्कूल ही नहीं जाऊंगा तो कठिनाइयाँ आएंगी ही नहीं।न रहेगा बांस,न रहेगी बांसुरी।
8.कठिनाइयों से कैसे जूझे के 7 मंत्र (Frequently Asked Questions Related to 7 Spells of Dealings With Difficulties),विद्यार्थियों के लिए कठिनाइयों से जूझने की 7 तकनीक (7 Techniques for Students to Cope with Difficulties) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.कठिनाई क्यों आवश्यक है? (Why is difficulty necessary?):
उत्तर:कठिनाई आए बिना व्यक्तित्व का निर्माण नहीं होता है,समझ नहीं बढ़ती है,मन के विकार दूर नहीं होते।
प्रश्न:2.कठिनाई क्यों आती है? (Why is there difficulty?):
उत्तर:कठिनाई हमारा निर्माण करने के लिए आती है,हमारी चेतना खंड-खंड रहती है इसलिए कठिनाई आती है।
प्रश्न:3.कठिनाई का महत्त्व क्या है? (What is the significance of difficulties?):
उत्तर:निरंतर सफलता हमें संसार का केवल एक ही भाग दिखाती हैं;कठिनाई हमें चित्र का दूसरा भाग भी दिखाती है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा कठिनाइयों से कैसे जूझे के 7 मंत्र (7 Spells of Dealings With Difficulties),विद्यार्थियों के लिए कठिनाइयों से जूझने की 7 तकनीक (7 Techniques for Students to Cope with Difficulties) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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