6 Techniques to Follow Yama and Niyam
1.यम और नियम का पालन करने की 6 तकनीक (6 Techniques to Follow Yama and Niyam),यम और नियम का पालन कैसे करें? (How to Follow Yama and Niyam?):
- यम और नियम का पालन करने की 6 तकनीक (6 Techniques to Follow Yama and Niyam) के आधार पर आप जान सकेंगे कि यम और नियम क्या हैं,यम कितने हैं और नियम कितने हैं? इनका पालन करना जरूरी क्यों है और किस तरह से इनका पालन किया जाए?
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2.यम और नियम के कितने अंग हैं? (How many parts are there in Yama and Niyama?):
- योगशास्त्र में यम-नियमों के नाम से जिन 10 सूत्रों के द्वारा निर्देश दिया गया है,उनमें सभी धर्मशास्त्रों,सत्प्रेरणाओं,मानवीय गुणों और आध्यात्मिक भावों का समावेश हो जाता है।कर्मकांड और विधि-विधान की बारीकियों में नहीं जाना पड़े,तो इन आदर्शों के बाद किसी धर्म-संप्रदाय की आवश्यकता नहीं रह जाती।यम:अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह तथा नियम:शौच,संतोष,तप,स्वाध्याय और भगवद् भक्ति को साध लिया जाए,तो समूचा धर्म-अध्यात्म सध गया।यह मानने की जरूरत नहीं है,इसे प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।मनीषियों ने इन दस गुणों अथवा भावों को सार्वभौम धर्म कहा है।
- जिस ग्रंथ में इनका उपदेश किया गया,उस पातंजल योगसूत्र में भी धार्मिक कर्मकांडों का विस्तार नहीं है,उनका प्रतिपादन भी नहीं है।योगसूत्र मनुष्य की प्रवृत्ति,आंतरिक स्थिति और संभावनाओं के तालमेल के साथ दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति का मार्गदर्शन करता है।कोई विधि-व्यवस्था नहीं देता।समाजशास्त्र,राजनीति,भौतिक विज्ञान,मनोविज्ञान,चिकित्सा,मौसम,कृषिविज्ञान,नक्षत्र-विद्या और उत्खनन,निर्माण आदि विज्ञानों में सिद्धांत-नियम बदलते रहते हैं।इन विद्याओं में आए दिन नई खोजें होती हैं।नए निष्कर्ष सामने आते हैं।उनके कारण प्रचलित मान्यताएं बदलनी पड़ती हैं,लेकिन गणित के नियमों में कहीं कोई फेरबदल नहीं किए जाते। कारण कि वे ध्रुव सत्य हैं।योगसूत्रों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है।
- अध्यात्म-दर्शन की स्थापनाओं और अनुभूतियों-अभिव्यक्तियों में अंतर हो सकता है।भारतीय दर्शन की मान्यताएं ईसाई या इस्लाम की दार्शनिक अवधारणाओं से भिन्न हो सकती है।भारतीय दर्शन में ही वेदांत,भक्ति,शैव,शाक्त आदि दार्शनिक धाराओं में अंतर है।उनकी स्थापनाएं एक-दूसरे से विरुद्ध होंगी,लेकिन योग के सिद्धांतों और सूत्रों का किसी दार्शनिक विचार से कोई विरोध नहीं है,वे सार्वभौम हैं।उन्हें सभी देश-कालों में सिद्ध किया जा सकता है।सिद्ध कर लिया जाए,तो चेतना को सर्वोच्च लक्ष्य तक विकसित किया जा सकता है।
- यम-नियमों के रूप में जिन आदर्शों का निर्देश दिया गया है,वे कर्मकांड प्रधान नहीं है।उनका सिद्धांत ऐसा नहीं है कि पालन करने के लिए बारीकियों का ध्यान रखना पड़ेगा।सभी गुण आंतरिक हैं।उनके प्रति श्रद्धा जगा ली जाए,तो व्यवहार में उतारने के लिए सावधानी और सजगता रखना भर पर्याप्त है।अहिंसा,सत्य आदि यम-नियम व्यवहार से सिद्ध होने लगे,तो आत्मिक प्रगति अबाध रूप से होने लगती है।
- दस गुणों या आदर्शों को बोलचाल की भाषा में व्रत्त कहा जाता है।योगसूत्र के ऋषि ने इन्हें दो वर्गों में बाँटा है,यम और नियम वर्गीकरण का उद्देश्य उनका सूक्ष्म और स्थूल रूप है।उन्हें आंतरिक और व्यवहार में दिखाई देने वाले बाहरी व्रत भी कह सकते हैं।अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को विभिन्न संप्रदाय में पंच व्रतशील और धर्म के रूप में भी निरूपित किया है।इन व्रतों के प्रति निष्ठा और धारणा पर जोर दिया जाता है।निष्ठा जमा ली जाए,संकल्प कर लिया जाए,अपनी आस्था में इन व्रतों को समेट लें,तो व्रत 80% सिद्ध हो जाते हैं।20% भाग व्यवहार में अपने आप प्रकट होने लगता है।समुद्र में तैरने वाले हिमखण्डों की तरह इन व्रतों का तीन-चौथाई हिस्सा आंतरिक चेतना में स्थिर होता है।एक-चौथाई भाग ही व्यवहार-क्षेत्र में प्रकट होता है।स्मरण रहे व्यवहार में दिखाई देने वाले स्वरूप का आंतरिक स्थिति के बिना कोई आधार भी नहीं है।
3.यम-नियम का संक्षिप्त विवरण (Brief description of Yama and Niyama):
- शौच,संतोष,तप,स्वाध्याय और भगवद-भक्ति के पांच व्रतों को नियम की संज्ञा दी गई है।योगशास्त्र को व्यवस्थित विज्ञान का रूप देते हुए महर्षि पतंजलि के इन निर्धारणों का स्वरूप आंतरिक और बाह्य दोनों हैं।आस्था क्षेत्र में जिस गहराई तक ये स्थिर होते हैं,उससे कई गुना विस्तार बाह्य जगत में होता है।
- विभिन्न आचार्यों-उपदेशकों ने यम-नियमों को शुष्क शास्त्रीय ढंग से ही समझाया है।अध्यात्म और योग के प्रति प्रगाढ़ रुचि हो तो संकेत रूप में समझाया गया शास्त्र और सिद्धांत भी पर्याप्त है।लोग उसे अपनी लगन से ही ग्रहण कर लेंगे।लेकिन चारों ओर प्रमाद व्याप्त हो,लौकिक जीवन में इतनी ज्यादा उलझने और आपाधापी हो कि उनसे सिर उठाने की फुर्सत ही ना मिले,तो महाव्रतों का व्यावहारिक स्वरूप स्पष्ट करना जरूरी है।यम-नियमों को,दस व्रतों को चित्त,बुद्धि-व्यवहार में किस तरह उतारा जाए,यह बताए बिना समाधान नहीं होता।
- सामान्य अर्थों में दस व्रत गूढ़ नहीं है।शब्दकोश में अथवा योगदर्शन की साधारण टीकाओं में देखकर इनके अर्थ समझे जा सकते हैं,बहुत सरल हैं।उदाहरण के लिए टीकाओं में लिखा मिलेगा कि अहिंसा का अर्थ है,प्राणीमात्र का मन,वचन और कर्म से किसी भी प्रकार कष्ट नहीं देना।सत्य अर्थात् जैसा देखा,सुना और समझा गया है,उसे उसी रूप में प्रकट कर देना।चोरी नहीं करने का नाम अस्तेय है।इस व्रत में दूसरों के स्वत्व पर मन में रुझान भी नहीं आने देना चाहिए।जननेन्द्रियों का संयम ब्रह्मचर्य है।ममत्व-बुद्धि से पदार्थों के संग्रह का नाम परिग्रह है।वस्तुओं में ममत्व का भाव न रखा जाए और न ही उन्हें इकट्ठा किया जाए।यह अपरिग्रह हुआ।पांच यमों के बाद पांच नियमों का विवेचन भी इसी शैली में किया गया है।शौच का अर्थ है शरीर,मन और आसपास के क्षेत्र की स्वच्छता।जो मिल जाए उससे अधिक की कामना नहीं करें यह संतोष हुआ।अपने धर्म का पालन करने के लिए कष्ट सहने का अभ्यास तप कहा गया है।स्वाध्याय का अर्थ है ज्ञान,वैराग्य,भक्ति में रुचि जगाने वाले शास्त्रों और ग्रन्थों का अध्ययन।दसवें व्रत या अंतिम नियम के रूप में भगवान का स्मरण,चिंतन और ध्यान करना भगवद् भक्ति है।
- दस व्रतों के सांकेतिक अर्थों ने साधकों के मन में उलझने खड़ी की हैं।जिन दिनों डेढ़-दो घंटे प्रतिदिन शास्त्र-चिंतन किया जाता था,चर्चाएँ चलती थी और विद्वज्जनों की गोष्ठियां होती थीं,उन दिनों एक-दो पंक्ति में की गई परिभाषाएं पर्याप्त थीं।लेकिन आज ये परिभाषाएँ जटिल ही हैं।व्यवहार-क्षेत्र में इनसे कोई सहायता नहीं मिलती,इसलिए पढ़-सुनकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं।उनके प्रति श्रद्धा जागने के स्थान पर उपेक्षा के भाव ही आते हैं।₹8-10 में मिलने वाली टीकाओं से खीझकर कुछ आलोचकों ने तीखी टिप्पणियां की हैं।उनके अनुसार इस तरह की पुस्तकें आठ-दस रुपए में भगवान तक पहुंचाने का टिकट हैं।भगवान् तक पहुंचाने का कोई टिकट नहीं हो सकता,इसलिए छलावा है।
4.यम और नियम का लौकिक महत्त्व (Cosmic Significance of Yama and Niyama):
- ये यम-नियम सिर्फ आंतरिक अनुशासन ही नहीं है,लौकिक जीवन में सफलता,समृद्धि और यश भी इनसे प्राप्त किया जा सकता है।महाभारत ने जिस धर्म को मोक्ष का ही नहीं अर्थ और काम को भी सिद्ध करने वाला विज्ञान बताया है,वह इन व्रतों में गुँथा हुआ है।सही भी है,जो चाबी भगवान या मोक्ष जैसे परम पुरुषार्थ का द्वार खोलती है,वह लौकिक जीवन के द्वार कैसे छोड़ देगी।यह जीवन परमात्मासत्ता का प्रारंभिक परिचय ही तो है।अहिंसा,सत्य,अस्तेय आदि व्रतों की तुलना उन संख्याओं से की गई है,जिनके मिलाने पर नंबर से संचालित ताले और द्वार खुल जाते हैं।जरूरी है कि इनका उपयोग और बारीकियां समझी जाएँ।
- दसों व्रतों को क्रम से समझने के लिए व्यावहारिक जीवन की कठिनाइयों को ध्यान में रखना चाहिए।उदाहरण के लिए,कहना आसान है कि प्राणीमात्र को किसी भी प्रकार कष्ट नहीं दिया जाए।यह स्थिति जिसे प्राप्त करना है।लेकिन इसे व्यवहार में कैसे उतारें।दैनिक जीवन में पग-पग में इस व्रत की अवहेलना होती है।सुबह जल्दी उठकर काम पर जाना हो,तो परिवार के लोगों को कष्ट पहुंचाने के रूप में ही व्रत टूटने लगता है। दफ्तर या कारोबार में कोई निर्णय लेना पड़े,तो उससे कुछ लोगों को सुविधा होगी और कुछ को कष्ट।विरोधाभासों का क्या समाधान है? दस व्रतों का शाब्दिक या साधारण अर्थ मानने पर इस तरह के कितने ही प्रश्न खड़े होंगे।
- अपने आसपास की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप दस व्रतों का निर्वाह किस तरह हो सकता है,यह मंथन जरूरी है।मंथन किया जाए,तो संजीवनी विद्या की वह सिद्धि हो सकती है जिसमें अपना,दूसरों का और पूरे समाज का हित है।सभी को प्रसन्न और संतुष्ट नहीं किया जा सकता,यह सही है,लेकिन यह भी सही है कि दूसरों को खिन्न और रुष्ट किए बिना स्वयं प्रसन्न रहा जा सकता है।आत्मिक प्रगति का यह राजमार्ग दस व्रतों के चिंतन-मनन से खुलता है।
5.छात्र-छात्राओं के लिए यम और नियम की महत्ता (Importance of Yama and Niyama for Students):
- छात्र-छात्राएं विद्या अध्ययन के समय कच्ची उम्र के होते हैं।अतः उन्हें नियम,संयम और अनुशासन का पालन करने की अधिक जरूरत होती है।यम के पालन करने को ही संयम कहते हैं।विशेष कर यौन-विषय से दूर रहना चाहिए या माता-पिता बच्चों को यौन विषय से दूर रखना चाहिए।छात्र-छात्राएं भले-बुरे को जानने के विवेक से शून्य होते हैं।यदि इस अवस्था में इस विषय से दूर और अनजान रखा जाए और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर ही इस विषय (यौन विषय) से उसका संपर्क हो तो वे फिर कोई गलत काम यौन विषय के मामले में कर ही नहीं सकेंगे और अच्छे संस्कार युक्त होने से पालन भी कर सकेंगे।बच्चों को तथा अभिभावकों को इस विषय में लापरवाही नहीं करनी चाहिए।
- हमारे ऋषि-मुनि,संत-महात्मा बड़े दूरदर्शी और मनोविज्ञान के गहरे जानकार थे तभी उन्होंने यम (अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह) और नियम (शौच,संतोष,तप,स्वाध्याय और भगवद् भक्ति) का पालन करने का विधान प्रस्तुत किया था ताकि छात्र-छात्राएं यौन विषय से दूर रहकर अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन करके विद्या अध्ययन कर सकें।यौन-विषय में चस्का लगने पर विद्या अध्ययन करना बहुत मुश्किल है।गृहस्थाश्रम में भी यौन विषय का उचित मात्रा में प्रयोग किया जाए तो औषधि का काम करता है और अति मात्रा में प्रयोग किया जाए तो घातक सिद्ध होता है।छात्र-छात्राओं की कच्ची उम्र में इस दुधारी तलवार को हाथ में देना अनिष्टकारी सिद्ध होगा।
- छात्र-छात्राएं किसी विषय में जितने समर्थ और बलवान होंगे उतना ही उस विषय का उपयोग कर सकेंगे।अतः जितना संयम रखा जाए,ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए उतनी ही शक्ति इकट्ठी होगी।और इस शक्ति को विद्या अध्ययन,कला-कौशल तथा व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने में उपयोग किया जा सकेगा।
- एक प्रश्न यह उठता है कि मन को वश में रखना कठिन होता है।किसी सुंदर लड़की के संपर्क में आने पर तथा घनिष्ठता होने पर मन में कामवासना संबंधी विचार आ ही जाते हैं।परंतु इस प्रश्न और तर्क में दम नहीं है क्योंकि अपनी बहन,मां के साथ रहने पर ऐसे कामुक विचार उत्पन्न नहीं होता है क्योंकि विवेक का मन पर नियंत्रण होता है।जब सुंदर युवा बहन को देखने पर मन पर नियंत्रण बना रह सकता है तो यह कहना कि मन वश में नहीं रहता,बहानेबाजी ही है।मन के ही आप गुलाम बन जाएं,मन को ही पापी बना लें तो फिर कई बहाने बना सकते हैं।मन तभी वश में रहता है जब आप भले-बुरे का विवेक न छोड़ें और आगा पीछा सोचकर विवेकपूर्ण कार्य करें।
- विद्या अध्ययन करने,आचरणवान बनने के लिए यम और नियम के इन दस अंगों का पालन प्रत्येक विद्यार्थी को करना ही चाहिए।इन अंगों का पालन करने के लिए मन को बलपूर्वक दबाना या दमन करना नहीं है बल्कि मन को अच्छे विचारों,सत्साहित्य का अध्ययन,अपने कोर्स की पुस्तकें पढ़ने की तरफ लगाना है।स्वाध्याय,सत्संग,अच्छी बातों का चिंतन-मनन करने से मन बुरे कामों से दूर रहता है।फिर विद्यार्थी को बलपूर्वक मन को दबाना नहीं पड़ता बल्कि ऐसे विद्यार्थी के लिए यम,नियम के अंगों का पालन करना,संयम और अनुशासन रखना स्वभाव में शामिल हो जाने से बहुत सरल हो जाता है।
- जो छात्र-छात्राएं अपने आचरण का निर्माण,अच्छी बातें सीखने,धारण करने,स्वाध्याय,सत्संग करने की तरफ ध्यान नहीं देते वे अबोधपन और सही जानकारी के अभाव में गलत आदतों के शिकार हो जाते हैं।वे यह समझ ही नहीं पाते हैं कि अनजाने में वे कैसी गलत राह पर चल निकले हैं जो उनकी जीवन यात्रा को कष्टमय और संकटों में डाल देगी।होना तो यह चाहिए कि उन्हें इस उम्र में अच्छी बातें और उन्नति में सहायक बातों की जानकारी दी जाए अथवा वे स्वयं प्राप्त करें।छात्र-छात्राओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि विवेक व बुद्धि के अभाव में उनके संकल्प कभी शुभ और कल्याणकारी ना हो सकेंगे।जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे उनके संकल्प और संकल्पशक्ति इसी दिशा में मजबूत होकर आगे भी इसी दलदल में फंसाए रखने में कारण बने रहेंगे और फिर इस मनोवृत्ति से छुटकारा पाना बड़ा कठिन हो जाएगा और यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि अधिकांश बालक-बालिकाएं कच्ची उम्र में ही इसके (गलत आदतों) के लपेटे में आ जाते हैं।
- हम हमारी कमजोरी के लिए दूसरों पर दोषारोपण करते हैं परंतु सच्चाई यह है कि जो-जो कमजोरी हमारे अंदर मौजूद है उसका कारण हम स्वयं होते हैं ना कि दूसरे।यह भी ध्रुव सत्य है कि अपनी कमजोरी को दूर भी हम ही कर सकते हैं,हमारी कमजोरी को दूर करने में दूसरा निमित्त कारण या सहायक कारण तो हो सकता है परंतु मूल कारण नहीं।जब हम चाहेंगे ही नहीं तब तक कमजोरी दूर भी नहीं हो सकती है।और केवल चाहने से ही कमजोरी दूर नहीं होगी,यदि केवल चाहने मात्र से ही सब कुछ हो जाया करता तो कोई भी कमजोर नहीं होता।सिर्फ चाहना और वैसा उपाय न करना शेखचिल्ली की तरह सिर्फ मन के लड्डू खाना ही है।ऐसे लोग सोचते व चाहते तो बहुत कुछ है पर करते कुछ नहीं या कह लीजिए कर नहीं पाते।नतीजा होता हैःबुरी संगतों के जाल में फंसना,आचरणहीन होना आदि।
- जब तक आप यम-नियम और संयम,अनुशासन का पालन न करेंगे,सही जानकारी प्राप्त न करेंगे तब तक व्यर्थ सपने देखने से कुछ नहीं होगा।पानी-पानी कहने से प्यास नहीं बुझती और जल में कूदकर अभ्यास किए बिना तैरना नहीं आता।हम सिर्फ चाहें और नियमों का पालन नहीं कर सकें यही हमारी मुख्य कमजोरी है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में यम और नियम का पालन करने की 6 तकनीक (6 Techniques to Follow Yama and Niyam),यम और नियम का पालन कैसे करें? (How to Follow Yama and Niyam?) के बारे में बताया गया है।
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6.सवाल क्यों हल नहीं करते हो? (हास्य-व्यंग्य) (Why don’t you solve the question?) (Humour-Satire):
- टीचर:आखिर तुम सवाल हल क्यों नहीं करते हो?
- सर:लड़कियों को देखकर मन फिसल जाता है।
- टीचरःनियम-संयम का पालन करो और ऐसी बेहूदा हरकते करना बंद करो।
- छात्र:सोचता तो हूं परंतु यह सोचकर नियम-संयम का पालन नहीं करता कि यह समय दोबारा थोड़े आएगा।
7.यम और नियम का पालन करने की 6 तकनीक (Frequently Asked Questions Related to 6 Techniques to Follow Yama and Niyam),यम और नियम का पालन कैसे करें? (How to Follow Yama and Niyam?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.संयमी से क्या आशय है? (What do you mean by temperance?):
उत्तर:अपनी ऊर्जा को केंद्रित करके विद्या ग्रहण करना।इंद्रियों को वश में रखनेवाला संयमी होता है।संयमी की ही एकाग्रता सधती है और विद्यार्जन कर सकता है।
प्रश्न:2.नियमों का पालन करने का क्या परिणाम है? (What is the consequence of not following the rules?):
उत्तर:जो नियम-संयम का पालन नहीं कर सकता है वहां कोई भी अनर्थ पैर फैला सकता है।ऐसा व्यक्ति का पतन हो जाता है।
प्रश्न:3.अनुशासन का क्या लाभ है? (What is the benefit of discipline?):
उत्तर:अनुशासन अव्यवस्था के लिए वही काम करता है जो तूफान और बाढ़ के समय किला और जहाज। अनुशासन जीवन में उन्नति और विकास में सहायक है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा यम और नियम का पालन करने की 6 तकनीक (6 Techniques to Follow Yama and Niyam),यम और नियम का पालन कैसे करें? (How to Follow Yama and Niyam?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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