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Top 7 Tips on How to Manage Life

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1.जीवन का प्रबंधन कैसे करें की 7 टॉप टिप्स (Top 7 Tips on How to Manage Life),जीवन का प्रबंधन कैसे करें? (How to Manage Life?):

  • जीवन का प्रबंधन कैसे करें की 7 टॉप टिप्स (Top 7 Tips on How to Manage Life) से हम जानेंगे कि जीवन प्रबंधन क्या है और इसे किस तरह प्रबंधित करें? जीवन प्रबंधन हमारे लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है,क्या जीवन जीने की कला और जीवन प्रबंधन पर्यायवाची हैं।
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2.जीवन प्रबंधन क्या है? (What is Life Management?):

  • जीवन एक कला है और इसे आनंदपूर्वक सीखना एवं जीना चाहिए।जीवन जीने की कला किसी भी कला,विद्या एवं प्रतिभा से बड़ी होती है।अन्य कलाओं एवं विद्याओं में हमारा सीखने और जानने का केंद्र  उसके संदर्भ विषय में होता है;जबकि जीवन विद्या में हम स्वयं को जानने,समझने एवं उनके अनुरूप कार्य करते हैं।इसका केंद्र हम स्वयं होते हैं,स्वयं के अस्तित्व का अध्ययन ही सच्ची जीवन जीने की कला है और यही जीवन का रहस्य है।जीवन को समुचित एवं ठीक-ठाक समझ लेना किसी भी कला एवं विद्या से सर्वोपरि है और इससे भी बड़ी बात है,अपनी क्षमताओं को पहचान कर इनका उपयोग करने की कुशलता।इसे ही जीवन प्रबंधन कहा जाता है।
  • प्रतिभाएं निस्संदेह दैवी अनुदान-वरदान होती है।क्षेत्र विशिष्ट की प्रतिभाओं की अपूर्ण क्षमता एवं इसे क्रियान्वित करने की अद्भुत कुशलता बेशक चमत्कारी एवं हतप्रभ करने वाली है।साहित्यकार की संवेदना से उपजे कविता एवं छंद किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को संवेदित करने में सक्षम होते हैं।इनकी भावाभिव्यंजना,भाषा सौंदर्य,अनूठी शैली से हृदय अभिभूत हो जाता है।
  • गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक जब मानव संवेदना को समझकर आविष्कार करते हैं तो मानव जाति की सुख-सुविधा और उसको बचाने से संबंधित आविष्कार व अनुसंधान करते हैं।संगीतकार का संगीत भी इसी संवेदना से नूतन आकार पाता है।बेजोड़ स्वरलहरियों,रागों एवं गायनों से मानव मन ही नहीं,मानवेतर जीव भी झूमने लगते हैं।
  • ठीक इसी तरह मूर्तिकार बेजान प्रस्तरखंड में जीवन्त प्राण भर देता है।चित्रकार की आड़ी-तिरछी रेखाएं एक नवीन सृष्टि को जन्म देती हैं।वास्तुकार-मूर्तिकार आदि सभी अपनी कल्पनाओं को ऐसे उकेरते हैं कि सब कुछ जीवित एवं मुखरित होने लगता है।आधुनिक युग में भी प्रतिभाओं की कार्य कुशलता अपूर्व एवं अनोखी है। तकनीकी विशेषज्ञ,सूचना एवं कंप्यूटर विशेषज्ञ,रक्षा,सैन्य,भूमि,जल एवं ऊर्जा के विविध क्षेत्र के वैज्ञानिकों की प्रतिभा एवं कुशलता भी आश्चर्य एवं रोमांचित करने वाली होती हैं।ये प्रतिभाएं किसी भी समाज,राष्ट्र एवं विश्व की धरोहर होती है,क्योंकि ये अपने-अपने क्षेत्रों एवं विषयों में नई दिशा प्रदान करती है,परंतु आवश्यक नहीं कि संसार के विभिन्न क्षेत्रों को दिशा देने वाले ये सभी कलाकार,विशेषज्ञ,विद्वान एवं वैज्ञानिक अपने निजी जीवन के प्रति भी इतने सजग,सतर्क एवं कुशल होंगे।अपने क्षेत्र विशिष्ट में अपनी बुद्धि से चमत्कार पैदा करने वाली इन प्रतिभाओं का आंतरिक जीवन भी इतना अद्भुत एवं अपूर्ण होना आवश्यक नहीं है।

3.प्रतिभाओं का जीवन प्रबंधित क्यों नहीं है (Why is the life of the talented not managed?):

  • आधुनिकतम सर्वेक्षण के आंकड़ों का अवलोकन करने पर अविश्वसनीय तथ्य प्रकट होते हैं।इन तथ्यों को देखने पर विश्वास ही नहीं होता है कि ऐसे प्रतिभावनों का निजी जीवन इतना विखंडित,बँटा एवं विभाजित होगा। इस अप्रकट सच्चाई से अवगत होने पर पता चलता है कि ऐसे धुर महारथी एवं विशेषज्ञों को अपनी सामान्य जिंदगी को चलाने के लिए नशा,शराब और अनेक मादक द्रव्यों का सहारा लेना पड़ता है।अपने विषय में पारंगत एवं प्रवीण ये अपने निजी जीवन में इतने कमजोर,दुर्बल एवं असहाय क्यों? क्या प्रतिभावान होना जीवन से मुख मोड़ना है? संभवत: ऐसा इसलिए है कि उनने अपने जीवन की सच्चाई एवं मूल्यों को अनवरत अनदेखा किया।जीवन की सुकोमल संवेदनाओं,उर्वर विचारों एवं व्यवहार कुशलता के बीच की कड़ियों को न जोड़ने के कारण ही निजी जीवन इतना कड़ुवा एवं कषैला-सा हो गया है।अतः प्रतिभावान होने का अर्थ यह नहीं है कि हम जीवन जीने की तकनीकी से भी अवगत होंगे।
  • प्रतिभावनों की ऊर्जा की दिशा अपने विषय में सिमट जाने से जीवन एकांकी हो जाता है और आवश्यक एवं अपरिहार्य चीजें अछूती रह जाती हैं।यदि भौतिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की क्षमताओं एवं सामर्थ्य का कुशल नियोजन एवं प्रबंधन संभव है तो यह भी संभव है कि जीवन को भी इसी ढंग से देखा,परखा,समझा तथा जिया जाए।जीवन के प्रति इतनी ही कुशलता से प्रबंधन किया जाना चाहिए,जितना कि विषय विशेष में किया जाता है तो कोई कारण नहीं है कि आज के प्रतिभावनों का जीवन ऐसी दुरावस्था में होता।हमने जीवन में अपने जीवन के अलावा अन्य सभी को महत्त्व दिया और इसका परिणाम है सब कुछ सुधरा,लेकिन जो अतिमहत्त्वपूर्ण है,अनसुलझा और अछूता रह गया।समृद्धि मिली,भौतिक विकास खूब हुआ,पर जीवन छूट गया,संवेदना सूख गई,व्यवहार कुशलता हाथ न लगी और आंतरिक जीवन खंडहर-सा,सन्नाटा भरा एवं खोखला रह गया।
  • अन्य को जानने के फेर में हमने स्वयं को खोया।स्वयं को जानने वाला,समझने वाला भले ही प्रतिभावनों की पंक्तियों में न आता हो,उसे इतनी प्रसिद्धि,सम्मान एवं समृद्धि भले ही नहीं मिल पाई हो,पर वह किसी भी प्रतिभावान से कम भी नहीं है।जिस कुशलता एवं प्रबंधन का परिचय बाह्य जीवन में दिया गया,यह कुछ अंश में यदि निजी जीवन के प्रति दिया गया होता तो आज की यह दुरावस्था नहीं होती।यह मानना एवं जानना चाहिए कि जीवन एकांकी नहीं है।जीवन बहुआयामी एवं बहुरंगी है,ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार यह संसार है।इन रंगों और आयामों में संवेदनशील संबंध व रिश्ते,विचारों की सर्जनशीलता तथा व्यवहारों का अपूर्व माधुर्य समाहित एवं सन्निहित है।इसी को जानना,समझना एवं व्यवहार जगत में उपयोग करना जीवन जीने की कला है।
  • जीवन जीना एक तकनीक है,कला है।जो इसे जानता है,सही मायने में वही कलाकार एवं प्रतिभावान है।यह न तो व्यवहार जगत का निषेध करता है और न आंतरिक चेतना के परिष्कार के लिए आवश्यक पद्धतियों की अवज्ञा करता है।अपनी क्षमता की पहचान एवं सामर्थ्य का सुनियोजन इसका प्रमुख सूत्र है।हमारे अंदर वह कौन-सा गुण है,जो हमें संवेदित करता है,जिसके सोचने और करने से आनंद का अनुभव होता है,गीतकार इसे ही स्वधर्म कहते हैं।इसकी पहचान के पश्चात इसका विकास करना तथा उचित एवं उपयुक्त परिस्थिति,परिवेश में इसे नियोजित करना है।नियोजन के लिए हमें आवश्यक जानकारी होनी चाहिए।संबंधों के धरातल में भावनाओं का प्रसून खिलता है,यदि इस स्थान पर बुद्धि का गणित बुन लिया जाए तो संबंध कभी स्थिर,टिकाऊ एवं सुदृढ़ नहीं बन पाएंगे।यहां केवल भावनाओं की जरूरत है।

4.व्यवहार एवं भाव जगत में तालमेल (Harmony in the world of behavior and emotion):

  • व्यवहार जगत में भावनाओं के स्थान पर बुद्धि एवं तर्क का महत्त्व है।किससे किस प्रकार का व्यवहार किया जाए,किस स्थान पर कैसा बर्ताव करना चाहिए आदि।ये सभी गणित के प्रमेय के समान हैं।सेल्समैन व्यवहार कुशल होते हैं।उनकी मीठी मुस्कान एवं आत्मीयता भरे व्यवहार के पीछे उनके उत्पादों का विक्रय करने का स्वार्थ निहित होता है।उनके व्यवहार से प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है।यहाँ भावना नहीं,बुद्धि का नियोजन आवश्यक है।अतः व्यवहार जगत एवं भाव जगत का हमें घालमेल नहीं करना चाहिए।इसका संतुलित व्यवहार ही हमारे व्यक्तित्व का परिचायक है।जीवन जीने की कला का प्रथम सोपान है-सुंदर,सुघड़ व्यक्तित्व का निर्माण।व्यक्तित्व व्यवहार जगत का प्रमुख कारक है और इसका विलय जीवन की शुरुआत है।पहले बनाना,फिर उसे विलीन करना विकास की विभिन्न अवस्थाएं हैं।ये दोनों प्रक्रियाएं जीवन विद्या का मर्म हैं।इस मर्म में अनेकों रहस्य आवृत हैं।इन्हीं रहस्यों को अनावरण करती है-जीवन जीने की कला।जो इस कला को जान,समझ एवं सीख लेता है,वही सही मायने में जीना जानता है।

5.समय और जीवन प्रबंधन (Time and Life Management):

  • हमने इससे पूर्व लेख में बताया था कि समय,जीवन और दिनचर्या एक-दूसरे से संबंधित हैं।अतः यदि जीवन का प्रबंधन सीख लिया तो समय प्रबंधन की कला विकसित हो जाएगी।दिनचर्या व्यवस्थित कर ली तो जीवन जीना आ जाएगा और समय को साधने की कला भी विकसित हो जाएगी।समय,जीवन और दिनचर्या अलग-अलग दिखाई देते हैं जबकि इन्हें हम मोटे तौर पर,ऊपरी तौर पर देखते हैं परंतु जब गहराई से इन तीनों का विश्लेषण करते हैं,सूक्ष्म दृष्टि से देखते हैं तो तीनों में समानता दिखाई देती है।
  • जीवन जीने की कला एक दिन में विकसित नहीं होती है,इसे साधने का मतलब है कि अपने सांसारिक,व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन को साध लेना।जीवन दृष्टि में हमारे सभी कार्यकलापों का सुनियोजन सम्मिलित है,इससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहता है।जीवन जीने की कला समग्र दृष्टि से विकसित होती है।केवल बुद्धि के प्रखर व तेजस्वी होने से जीवन को व्यवस्थित नहीं किया जा सकता है।अपने मानवीय गुणों और संवेदनशीलता को भी उभारना पड़ता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य को अत्यधिक संवेदनशील होना चाहिए।बुद्धि और संवेदना में संतुलन होना चाहिए।न तो बिल्कुल बुद्धि के आधार पर ही जीवन जीना चाहिए और न अत्यधिक संवेदनशील होना चाहिए।बुद्धि,संवेदना और भावनात्मक परिपक्वता होगी तभी जीवन को कुशलता के साथ जीया जा सकता है। इसमें संतुलन रखना एक बहुत बड़ी साधना है।किसी भी एक पक्ष को अत्यधिक महत्त्व देना असंतुलन पैदा कर देता है।

6.विद्यार्थी जीवन प्रबंधन के गुर सीखें (Learn the tricks of student life management):

  • उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि जीवन प्रबंधन की कला शुरू से सीखने का प्रयास करना चाहिए।हमारे जीवन की शुरुआत यों तो जन्म लेते ही शुरू हो जाती है परंतु फिर भी शिक्षण संस्थान में प्रवेश लेते ही इसकी शुरुआत कर देनी चाहिए।शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेते समय बालक अबोध होता है,उसे अच्छे-बुरे,सही-गलत का पता नहीं होता है।अतः इस समय में माता-पिता की सबसे अधिक जिम्मेदारी होती है और उसके बाद शिक्षकों व अन्य का उत्तरदायित्व होता है।
  • सिलेबस में जीवन जीने की कला का समावेश ना होने के कारण विद्यार्थी साथ-संगत,दूसरों की नकल करने,पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण गलत आदतें सीख लेता है।धीरे-धीरे दुनियादारी की ज्यों-ज्यों हवा लगती है तो वह चालाकी,छल-कपट,झूठ बोलना जैसे कई ऐबो को सीख लेता है।जीवन जीने,परीक्षा में सफल होने के लिए वह इन्हीं हथकण्डों को सीखना जरूरी समझता है।माता-पिता भी मोहवश या अपने काम की व्यस्तता के कारण बच्चों पर ध्यान नहीं देते हैं।ये ऐब बच्चे में परिपक्व होकर अपना प्रभाव दिखाने लगते हैं तब माता-पिता की आंख खुलती है कि ऐसा कैसे हो गया,ऐसा क्यों कर हो गया? परंतु तब तक बच्चा उनके हाथ से निकल चुका होता है।
  • वह दुनियादारी के रंग में रंग चुका होता है।इसके कारण आज के विद्यार्थी,कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ व्यक्तियों के मुकाबले ज्यादा चालाक,अहंकारी,पाखंडी और बेईमान हो गए हैं।दूसरों को मूर्ख बनाने और शोषण करने की कला में बहुत कुशल हो गए हैं।परिणामस्वरूप वे जीवन में उलझन,दिखावा,तिकड़मबाजी,तनाव और छल-कपट करने में ज्यादा-से-ज्यादा पारंगत होते जा रहे हैं।बुद्धि प्रकृति के तीन गुणों से प्रभावित होती हैःसतोगुण,रजोगुण,तमोगुण आदि।जिस गुण का जितना प्रभाव रहता है बुद्धि उतनी ही उस गुण के अनुसार काम करती है।बुद्धि तमोगुण से प्रभावित होती है तो हम दूसरे को नुकसान पहुंचाकर अपना लाभ प्राप्त करते हैं यानी अपने लाभ के लिए दूसरों को हानि पहुंचाने में,अपने सुख के लिए दूसरों को दुःखी करने में नई हिचकिचाते।जब बुद्धि रजोगुण से प्रभावित होती है तब हम अपने लाभ के साथ-साथ दूसरे के लाभ के लिए भी सोचते हैं वैसे प्रयत्न करते हैं और जब हमारी बुद्धि सतोगुण से प्रभावित होती है तब हम अपने लाभ को भूलकर दूसरों के लाभ के विषय में सोचते हैं,अपना भला भूलकर दूसरों के भले के विषय में सोचते हैं और दरअसल भला करने पर यह हमारा तालमेल संवेदनशीलता के साथ होता है।
  • सतोगुण बुद्धि वाले विद्यार्थी भी विनम्र,सरल और विद्यावान होते हैं।सतोगुण यानी सद्बुद्धि वास्तविक सांसारिक व्यवहार कुशलता और सफलता देती है।जो विद्यार्थी इस मर्म को समझते हैं वे ही अपने अंदर जीवन जीने की कला में पारंगत होने के लिए सद्बुद्धि धारण करते हैं।छल-कपट,बेईमानी,धूर्तता,चालाकी आदि से दूर रहते हैं।ना तो ऐसे ऐबो वाले विद्यार्थी के साथ रहते हैं और न अपने अंदर इन दुर्गुणों को पनपने देते हैं।ऐसे विद्यार्थियों में सद्बुद्धि का विकास अपने आप नहीं हो जाता है।इसके लिए वे जागरूक और सचेत रहते हैं। अपनी कोर्स की पुस्तकें पढ़ने के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान और अध्यात्म की पुस्तकें पढ़ते हैं।अपने आचरण को उज्ज्वल बनाने का प्रयत्न करते हैं।माता-पिता भी ऐसे बच्चों के बहुत नेक,सरल और विनम्र होते हैं।लेकिन ऐसे छात्र-छात्राएं आज के जमाने में बहुत कम होते हैं,लेकिन होते हैं और इसीलिए ये आगे जाकर श्रेष्ठ महामानव,गणितज्ञ,वैज्ञानिक आदि बनते हैं।इन्हीं के कारण पृथ्वी टिकी हुई है अन्यथा इस पृथ्वी को नष्ट करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है।आप भी ऐसे गुणों को धारण करने की कोशिश करें,संवेदनशील बने और सही मायने में जीवन जीने की कला सीखने का प्रयास करें।इससे न केवल आपका भला होगा बल्कि अन्य लोगों का भी।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में जीवन का प्रबंधन कैसे करें की 7 टॉप टिप्स (Top 7 Tips on How to Manage Life),जीवन का प्रबंधन कैसे करें? (How to Manage Life?) के बारे में बताया गया है।

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7.जीवन का प्रबंध सिखाने वाला (हास्य-व्यंग्य) (Teaching Life Management) (Humour-Satire):

  • जग्गू:भैया,आपकी दुकान के पास जीवन का प्रबंधन सिखाने वाले सेंटर के ताला क्यों लगा हुआ है,वह कहां है,मुझे जीवन प्रबंधन के गुर सीखने थे।
  • दुकानदारःउसके लकवा आ गया है,वह अब जीवन की अंतिम सांसे अपने घर के बिस्तर पर गिन रहा है।

8.जीवन का प्रबंधन कैसे करें की 7 टॉप टिप्स (Frequently Asked Questions Related to Top 7 Tips on How to Manage Life),जीवन का प्रबंधन कैसे करें? (How to Manage Life?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.चित्त प्रसन्न कैसे रह सकता है? (How can the mind remain happy?):

उत्तर:मनुष्य का जीवन जितना सादा,सरल और स्वाभाविक होगा उसी के अनुसार उसका चित्त अधिक प्रसन्न रहेगा।

प्रश्न:2.जीवन का महत्त्व कब है? (What is the importance of life?):

उत्तर:जीवन महत्त्व तभी है जब वह किसी महान ध्येय के लिए समर्पित हो।समर्पण,ज्ञान और न्यायुक्त हो।

प्रश्न:3.जीवन जीने से क्या तात्पर्य है? (What does it mean to live life?):

उत्तर:जीवन को व्यर्थ बर्बाद करने के बजाय मानवीय गुणों को संगठित करने में अपने समय का अधिक उपयोग करो।

प्रश्न:4.जीवन का विकास को स्पष्ट करो। (Explain the evolution of life):

उत्तर:जीवन विकास का सिद्धांत है,स्थिर रहने का नहीं।निरंतर विकसित होना,स्थिर अवस्था के रहने की अनुज्ञा नहीं देता।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा जीवन का प्रबंधन कैसे करें की 7 टॉप टिप्स (Top 7 Tips on How to Manage Life),जीवन का प्रबंधन कैसे करें? (How to Manage Life?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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