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Questioning teaching method in math

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1 1.गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि का परिचय(Introduction to Questioning teaching method in math)-
1.2 3.प्रश्न पूछने की आवश्यकता(Need to ask questions)-

1.गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि का परिचय(Introduction to Questioning teaching method in math)-

गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math) प्राचीनकाल से शिक्षण की एक उत्तम विधि मानी जाती है। यदि कोई अध्यापक उचित प्रश्न कक्षा में पूछता है तो उसे योग्य अध्यापक समझा जाता है। प्रेरणादायक प्रश्नों को पूछने की योग्यता और बालकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उचित उत्तर प्रदान करने की क्षमता-एक अच्छे अध्यापक का सबसे मूल्यवान गुण है। कोई भी प्रारम्भिक और माध्यमिक कक्षाओं का अध्यापक अपने शिक्षण में सफल नहीं हो सकता है जब तक कि उसे प्रश्नोत्तर की कला का पूरा अधिकार नहीं है।
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2.गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math )-

प्रश्नो को अच्छे प्रकार से पूछना श्रेष्ठ कला है।कक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों को उचित रूप में रखना आवश्यक है। परन्तु क्योंकि शिक्षक को उन्हें इस प्रकार से बनाकर पूछना होता है कि उत्तर से यह पता लग जाए कि विद्यार्थी को कितना ज्ञान है, इसलिए इनका बनाना सरल कार्य नहीं है।इसके लिए अच्छे प्रश्नों में क्या गुण होने चाहिए, विभिन्न प्रकार के प्रश्न क्या है,प्रश्न करने का ढंग क्या है इत्यादि के सम्बन्ध में अध्यापक को अच्छा ज्ञान होना चाहिए।

3.प्रश्न पूछने की आवश्यकता(Need to ask questions)-

गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन विधि (Questioning teaching method in math) इसलिए है कि-
(1.)यह पता लगाया जाय कि गणित में बालक का पूर्व ज्ञान क्या है?इस बात का पता लगाना पूर्व ज्ञान को प्रस्तुत पाठ से सम्बद्ध करने के लिए आवश्यक है।
(2.)बालक का ध्यान शिक्षक की ओर केन्द्रित रहे और वह पाठ में रुचि ले।
(3.)यह पता लग जाए कि बालक गणित की एक्सरसाइज समझ रहा है अथवा नहीं।
(4.) गणित की एक्सरसाइज दोहरा ली जाए ताकि मस्तिष्क में दृढ़ हो जाए।
(5.)बालक की गणित पढ़ने में जिज्ञासा जाग्रत रहे।

4.गणित में प्रश्न पूछने के उद्देश्य(Objective of asking questions in mathematics)-

गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math) में प्रश्न पूछने की आवश्यकता के साथ ही साथ हम प्रश्न करने के उद्देश्यों का भी वर्णन कर सकते हैं।प्रश्न पूछने की जो आवश्यकताएं होती हैं, उन्हें हम दूसरे रूप में प्रश्न करने के उद्देश्य के रूप में रख सकते हैं।
(1.) विद्यार्थियों के ध्यान को पूर्व ज्ञान की ओर केन्द्रित करना।
(2.) विद्यार्थियों की गणित की एक्सरसाइज के सम्बन्ध में रुचि जाग्रत करना।
(3.) विद्यार्थियों का गणित की एक्सरसाइज के महत्त्वपूर्ण स्थलों की ओर ध्यान केंद्रित करना।
(4.) विद्यार्थी गणित में कितना सीख पाए हैं इसका अनुमान लगाना।
(5.) विद्यार्थियों की गणित में व्यक्तिगत कमजोरियों का पता लगाना।
(6.) गणित की एक्सरसाइज की पुनरावृत्ति करना।
(7.) विद्यार्थियों को गणित में ओर नवीन ज्ञान अर्जित करने की प्रेरणा देना।
(8.) गणित में विद्यार्थियों की कल्पना शक्ति का विकास करना।
( 9.) विद्यार्थियों की गणित में रुचियों के सम्बन्ध में पता लगाना।
(10.)नये ज्ञान का नयी परिस्थितियों में प्रयोग करना।
(11.) बालकों को गणित में अभ्यास करा देना।

5.गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि के लिए सफल प्रश्नोत्तर की दशाएं(Successful Question & Answer Conditions for Questioning teaching method in math)-

गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math) की सफलता के लिए आवश्यक है कि अध्यापक में कुछ व्यक्तिगत योग्यताएं हों।
(1.) अध्यापक में स्पष्ट तथा शीघ्र चिन्तन की योग्यता हो।
(2.) अध्यापक शीघ्रता से यह निर्णय कर सके कि कौन से प्रश्न आवश्यक है और कौन से अनावश्यक।वह यह भी समझे कि बालकों को किन प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए और किन पर उस समय ध्यान न देना चाहिए।
(3.)प्रश्नों को सुन्दर एवं प्रभावशाली भाषा में रखने की योग्यता हो तथा उसमें आत्म-विश्वास हो।

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6.गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि में अच्छे प्रश्नो के लक्षण(Characteristics of good questions in the Questioning teaching method in math)-

(1.)प्रश्नों की शब्दावली निश्चित होनी चाहिए।बिना बात के प्रश्नों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं पूछना चाहिए।प्रश्न इस प्रकार से होना चाहिए-“10 व 15 का लघुत्तम समापवर्त्तक क्या है?” न कि इस प्रकार कि” 10 व 15 का लघुत्तम समापवर्त्तक तुम जानते हो कि क्या होगा,जरा जल्दी से बताओ।”इस प्रश्न की भाषा को व्यर्थ में तोड़-मरोड़ दिया गया है और बेकार की शब्दावली को प्रश्न में जोड़ दिया गया है।
(2.)प्रश्न इस प्रकार के हों कि उनके चिन्तन की आवश्यकता पड़े। बहुत से अध्यापक ऐसे प्रश्न पूछते हैं जिनका ठीक उत्तर बालक बिना सोचे भी दे देते हैं। जैसे 10 तथा 20 का योग कितना होता है? प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनसे कल्पना शक्ति के विकास में सहायता मिले।
(3.)प्रश्न ऐसे होने चाहिए कि उनका एक ही उत्तर हो।जब एक से अधिक उत्तर वाले प्रश्न पूछे जाते हैं तो बालक प्रश्न को समझने में कठिनाई का अनुभव करते हैं।ऐसे प्रश्नों के उत्तर निश्चित नहीं होते हैं और शिक्षक जो बात प्रश्न के उत्तर में कहलाना चाहता है,उस पर बालक घूम फिरकर आ पाते हैं। उदाहरण के लिए ऐसा प्रश्न नहीं करना चाहिए जैसे” योग कब किया जाता है?इस प्रश्न का उत्तर न तो निश्चित ही हो सकता है,न कोई एक उत्तर हो सकता है।इसके स्थान पर यदि यह पूछा जाए कि 10 तथा 15 का योग कितना होता है? तो निश्चित उत्तर आने की संभावना है।
(4.)प्रश्न बालकों की आयु तथा योग्यता के अनुसार होने चाहिए।एक कम आयु तथा छोटी कक्षा का बालक गुणनखंड नहीं कर पाएगा जबकि एक अधिक आयु और उच्च कक्षा का बालक गुणनखंड आसानी से कर सकता है।
(5.) प्रश्नों का रूप इस प्रकार का न हो कि उत्तर प्रश्न में ही सम्मिलित हो।जैसे-“10 तथा 15 का योग 25 होता है न ?”
(6.)ऐसे प्रश्न जिनका उत्तर हां या नहीं में आता है नहीं पूछने चाहिए।इस प्रकार के प्रश्न बालकों को विचार किए बिना किसी भी उत्तर को देने की प्रेरणा नहीं देते हैं।जैसे-“क्या त्रिभुज के तीनों कोणों का योग दो समकोण होता है?”इस प्रकार के उत्तर में बालक बिना विचारे ही कह देते हैं,हां या नहीं। कहीं ऐसे प्रश्न करना आवश्यक ही हो जाए तो यह ध्यान रहे कि बालक विचार करके ही प्रश्न का उत्तर दें। कुछ ओर प्रश्नों की सहायता से यह पता भी लगा लेना चाहिए कि बालक समझकर ही उत्तर दे रहे हैं।
(7.)प्रश्न एक विचार के सम्बन्ध में ही हो।वह प्रश्न जो एक प्रश्न के रूप में ही अधिक विचारों को व्यक्त करते हैं,कठिनता से याद रहते हैं और उनके विचारों में अस्पष्टता ले आते हैं। जैसे यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए-” 2 तथा 2 का म.स. तथा ल.स. 2 क्यों होता है?बल्कि पूछना चाहिए कि 2 तथा 2का म.स. क्या होता है?2 तथा 2 का ल.स. क्या होता है?
(8.)प्रश्नों को एक निश्चित उद्देश्य से पूछा जाना चाहिए।जब प्रश्न उद्देश्यहीन रूप से पूछे जाते हैं तो बालकों की रुचि को नष्ट कर देते हैं।
(9.)प्रश्नों में पाठ्य-पुस्तक की शब्दावली का प्रयोग नहीं करना चाहिए।ऐसा करने से बालक अपने वाक्यों में उत्तर न देकर पाठ्य-पुस्तक के रटे हुए वाक्यों में ही उत्तर देना पसंद करते हैं।ऐसी दशा में अध्यापक को यह निर्णय लेने में कठिनाई होती है कि बालक ने समझकर उत्तर दिया है या नहीं।
(10.)पाठ के प्रत्येक प्रश्न की भाषा एक-सी नहीं होनी चाहिए। सम्पूर्ण एक्सरसाइज में कभी-कभी अध्यापक दो ही प्रश्न करते देखे जाते हैं कि” मैंने क्या किया?” “तुमने क्या देखा?” यह ठीक नहीं है।भाषा में विभिन्नता लाना आवश्यक है अन्यथा बालकों की रुचि समाप्त हो जाती है।
(11.)प्रश्नों को एक-दूसरे से संबंधित होना चाहिए। एक्सरसाइज हल कराते समय ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाने चाहिए जो एक दूसरे से भिन्न प्रतीत हो, उनमें सह-संबंध होना चाहिए।जैसे एक प्रश्न ल.स. व म.स. से संबंधित पूछकर दूसरा प्रश्न समान्तर माध्य से पूछा जाए तो ऐसा करने से पाठ के उद्देश्य प्राप्त नहीं हो पाएंगे।

7.कक्षा में शिक्षक के प्रश्न पूछने का ढंग(How to ask teacher’s questions in class)-

गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math) में शिक्षक का प्रश्न पूछने का ढंग प्रभावशाली होना चाहिए। इसके लिए निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
(1.)प्रश्न पूरी कक्षा से पूछना चाहिए। इसके बाद किसी एक बालक को उत्तर देने के लिए सम्बोधित करना चाहिए।प्रश्न ऐसे नहीं होने चाहिए कि” मोहन तुम बताओ,समान्तर माध्य किसे कहते हैं?”प्रश्न को इस प्रकार पूछने से केवल मोहन ही प्रश्न पर ध्यान देगा और दूसरे बालक उदासीन हो जाएंगे। प्रश्न को पूरी कक्षा से पूछने से यह लाभ होता है कि
(क.) पूरी कक्षा का ध्यान प्रश्न की ओर केन्द्रित हो जाता है।
(ख)पूरी कक्षा के सदस्यों को इस बात का अवसर मिल जाता है कि प्रश्न के सम्भावित उत्तर पर विचार कर सके।
(ग)प्रश्न का जो उत्तर दिया जाता है,उसकी ओर पूरी कक्षा का आलोचनात्मक ध्यान केन्द्रित हो जाता है।
(2.)प्रश्नों का वितरण ऐसा होना चाहिए कि पूरी कक्षा के बालकों को उनका उत्तर देने का अवसर मिल सके।यह ठीक नहीं होगा कि प्रश्न केवल आगे की पंक्ति में बैठने वाले विद्यार्थियों से ही पूछे जाएं।
(3.) उत्तर पूछने से पहले बालकों को प्रश्नों का उत्तर सोचने का अवसर देना चाहिए। अतः प्रश्न पूछने के पश्चात् थोड़ा समय दिया जाना चाहिए।
(4.)प्रश्नों को इस प्रकार पूछा जाए कि बालकों को उत्तर का निर्देश मिल जाए।
(5.)यदि कोई बालक उत्तर देने में अपनी असमर्थता दिखाए तो उस पर विश्वास कर लेना चाहिए।
(6.)प्रश्नों को बार-बार दोहराना ठीक नहीं है।
(7.)उत्तरों की बार-बार पुनरावृत्ति न की जाए। बहुत से बालक जो कुछ बालक उत्तर देते हैं,उसको स्वयं बिना किसी उद्देश्य के दोहरा देते हैं,यह ठीक नहीं है।
(8.)जब किसी बालक का ध्यान गणित की एक्सरसाइज की ओर न हो तो उससे प्रश्न पूछा जाए।
(9.)प्रश्नों को सरल और विश्वासपूर्ण ढंग से पूछा जाना चाहिए।
(10.)एक छात्र ठीक से उत्तर न दे पाए तो दूसरे से प्रश्न पूछना चाहिए।
(11.)यदि कक्षा किसी प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हो तो उसकी भाषा में परिवर्तन करके प्रश्न को सरल बनाकर पूछना चाहिए।
(12.)प्रश्नो को स्वाभाविक ढंग से पूछा जाए।गाकर या चीखकर प्रश्न नहीं पूछने चाहिए।
( 13.)प्रश्नों को केन्द्रीय विचारों के चारों ओर संगठित करना चाहिए।
(14.)पूछने की गति प्रयोजन के अनुरूप होनी चाहिए।

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8.प्रश्न के प्रकार(Type of question)-

गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math) में प्रश्नों के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कई प्रकार से प्रश्न पूछना आवश्यक है।
प्रश्नों के भेद कई आधार पर किये जाते हैं।एक आधार प्रश्नों का स्वरूप है। विभिन्न प्रश्न-सूचक शब्दों के आधार पर विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं।ये प्रश्न-सूचक शब्द हैं-क्या,कैसे,कौन,कब,कहां?दूसरा आधार मानसिक प्रक्रिया का होता है।मानसिक प्रक्रिया के आधार पर दो वर्ग किए जा सकते हैं-
(1.)स्मृति प्रश्न-वे होते हैं जिनमें पहले से याद किया हुआ पाठ पुनः स्मरण कराया जाता है।
(2.) विचार-प्रश्न-वे होते हैं जिनमें विचार करने को बाध्य किया जाता है।इन प्रश्नों का उत्तर देना बिना सृजनात्मक कल्पना किए हुए नहीं दिया जा सकता है।
पाठ्य-सामग्री के आधार पर जो प्रश्नों के प्रकार दिए जाते हैं,वे हैं-
(1.)खंडश प्रश्न (2.)विषयांगी प्रश्न
उद्देश्यों के आधार पर भी प्रश्नों के दो भेद किए जाते हैं-
(1.)शिक्षण-प्रश्न- वे प्रश्न होते हैं जिनकी सहायता से नवीन ज्ञान बालकों को दिया गया है।ये प्रश्न गणित की एक्सरसाइज के समय बालकों में निरीक्षण करने, चिन्तन करने,विवेचना करने, तुलना करने, परिणाम निकालने की मानसिक क्रियाओं को प्रोत्साहित करने के लिए पूछे जाते हैं।
(2.)परीक्षण-प्रश्न- वे प्रश्न होते हैं जिनके द्वारा यह पता लगाया जाता है कि बालक का पूर्व ज्ञान क्या है तथा प्रस्तुत एक्सरसाइज में उसने कितना समझा है।ऐसे प्रश्नों की सहायता से अध्यापक को यह भी पता लग जाता है कि उसका शिक्षण सफल हुआ अथवा नहीं।शिक्षण-प्रश्नों और परीक्षण-प्रश्नों में मुख्य अन्तर यह है कि शिक्षण-प्रश्न तो बालक को आगे की ओर ले जाते हैं और उसके ज्ञान की वृद्धि में सहायक होते हैं जबकि परीक्षण-प्रश्न जो बाते बालक ने सीख ली है,उनकी ओर केन्द्रित होते हैं।उनका ध्येय दिया हुआ ज्ञान ग्रहण किया गया है अथवा नहीं और कितना पूर्व-ज्ञान बालक रखते हैं,यह होता है।
परीक्षण प्रश्नों के तीन भेद किए जा सकते हैं-
(1.)प्रारम्भिक प्रश्न-इसका उद्देश्य बालकों के पूर्व-ज्ञान को उनके स्मृति-पटल पर ले आना है।ये प्रश्न ऐसे होते हैं कि बालक एक्सरसाइज़ सम्बन्धी पूर्व-ज्ञान को पुनः स्मरण कर लेता है।इस प्रकार वह पुराने ज्ञान की ओर चलने को तैयार हो जाता है।ऐसे प्रश्न प्रस्तावना के पद पर पूछे जाते हैं।
(2.)अन्वेषण प्रश्न-यह पता लगाने के लिए किए जाते हैं कि बालक को एक्सरसाइज के सम्बन्ध में क्या कठिनाइयां हैं।यह बालकों के भ्रम को दूर करने के लिए भी किए जाते हैं। कभी-कभी शिक्षक समझता है कि बालक ने एक्सरसाइज को ध्यानपूर्वक हल नहीं किया है तो वह ऐसे प्रश्न करके पता लगा लेता है कि बालकों ने एक्सरसाइज को समझा है या नहीं।
(3.) पुनरावलोकन प्रश्न-वे प्रश्न होते हैं जिनके द्वारा शिक्षक जान जाता है कि एक्सरसाइज़ समझी गई है या नहीं।ये अध्यापन की सफलता के सूचक होते हैं।दूसरे ये प्रश्न ज्ञान को बालकों के मस्तिष्क में दृढ़ बनाते हैं।इन प्रश्नों द्वारा एक्सरसाइज को दोहरा दिया जाता है और जो बातें एक्सरसाइज में महत्त्वपूर्ण होती है उनकी ओर बालकों का ध्यान केन्द्रित कर दिया जाता है।

9.छात्रों के प्रश्नों के प्रति अध्यापक क्या-क्या करे?(What should the teacher do to the students’ questions?)-

बालकों में जिज्ञासा होती है। गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि(Questioning teaching method in math) से जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने के लिए अध्यापक अनेक प्रकार के प्रश्न पूछते हैं। धीरे-धीरे बालक भी प्रश्न पूछने लगते हैं। विशेषकर जब वे किसी एक्सरसाइज में रुचि लेने लगते हैं और उनकी जिज्ञासा जाग्रत हो जाती है तो वे एक्सरसाइज के सम्बन्ध में अनेक प्रश्न करने लगते हैं।ये प्रश्न बहुधा एक्सरसाइज को अच्छे प्रकार से करने के लिए किये जाते हैं।एक कुशल अध्यापक को बालकों के प्रश्नों के प्रति उचित मनोवृत्ति अपनानी चाहिए।उनके प्रश्नों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। बालकों के प्रश्नों के सम्बन्ध में अध्यापक को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-
(1.) बालकों को प्रश्न करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
(2.) बालकों को ऐसे प्रश्न करने की प्रेरणा देनी चाहिए जो उस समय की एक्सरसाइज के लिए महत्त्वपूर्ण हो।
(3.)व्यर्थ के प्रश्न या जो प्रश्न एक्सरसाइज से किसी भी प्रकार सम्बन्धित न हो उनको नहीं पूछने देना चाहिए।
(4.)प्रश्नों को शिष्टतापूर्वक पूछने पर बल देना चाहिए।
(5.)एक समय में एक ही छात्र को प्रश्न पूछने देना चाहिए।
(6.)सरल प्रश्नों के उत्तर कक्षा में अन्य छात्रों की सहायता से निकलवाना चाहिए परन्तु कठिन प्रश्नों के उत्तर शिक्षक को स्वयं देना चाहिए।
(7.)जब शिक्षक प्रश्नों के उत्तर न दे सके तो उसे स्पष्ट रूप से बता देना चाहिए कि वह उस समय उत्तर देने में असमर्थ है।
(8.)उन बालकों को जो एक्सरसाइज को गम्भीरतापूर्वक सीख रहे हैं,अध्यापक द्वारा व्यक्त किए गए विचारों पर अपने संशय प्रकट करने की स्वतन्त्रता देनी चाहिए।

10.गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि में उत्तर निकलवाने का तरीका(Method of finding answers in the Questioning teaching method in math)-

प्रश्नों के साथ ही साथ उत्तर के सम्बन्ध में भी विचार कर लेना चाहिए।प्रश्न अध्यापक करता है तो उत्तर छात्र देते हैं। जैसे प्रश्न करना एक कला है, वैसे ही उत्तर निकलवाना भी एक कला है।कुशल शिक्षक को दोनों कलाओं में पारंगत होना चाहिए।
उत्तर निकलवाना प्रश्न करने से अधिक कठिन है। प्रशिक्षण विद्यालय के विद्यार्थी जब एक्सरसाइज कक्षा में पढ़ाने जाते हैं तो बहुधा वे बालकों के उत्तर के सम्बन्ध में कठिनाई का अनुभव करते हैं।कई घण्टे परिश्रम के उपरान्त वे पाठ-योजना बनाते हैं तथा उसमें सब प्रकार से अच्छे प्रश्न रखने की चेष्टा करते हैं। परन्तु जब कक्षा में जाकर प्रश्न करते हैं तो उल्टे-सीधे बेढंगे उत्तर आते हैं और वे आत्म-विश्वास खो देते हैं। फलस्वरूप गलत एक्सरसाइज हल कराना प्रारम्भ कर देते हैं।ऐसे अध्यापकों को याद रखना चाहिए कि उत्तर निकलवाना कोई यांत्रिक क्रिया नहीं है।वे मानव-बालकों को शिक्षण दे रहे हैं जिनमें तर्क,चिन्तन,कल्पना की शक्ति है और जिनकी प्रतिक्रियाएं प्रत्येक स्थिति में एक ही प्रकार की हों,ऐसा सम्भव नहीं है।अतएव जब तक ठीक उत्तर नहीं मिलते हैं तो धैर्य से काम लेना चाहिए और अपने प्रश्नों में हेर-फेर करके उपयुक्त उत्तर प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए।प्रश्नों को बदलने का कार्य शिक्षक को कक्षा में एक क्षण में ही कर देना चाहिए। इसके लिए उसे सदैव सतर्क रहना चाहिए। जैसे ही बालकों का उत्तर उसे गलत लगे,वह निर्णय कर ले कि किस प्रश्न द्वारा ठीक उत्तर आएगा।यदि वह प्रश्न भी ठीक उत्तर लाने में असफल रहे तो फिर नए प्रकार से कक्षा के समक्ष रखना चाहिए।
इस प्रकार हम देखते हैं कि शिक्षक द्वारा उत्तर निकलवाने में पर्याप्त कठिनाइयां आ सकती है।इन कठिनाइयों पर विजय पाने के लिए शिक्षक को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-

11.छात्रों के उत्तरों के प्रति शिक्षक की मनोवृत्ति(Teacher’s attitude towards students’ answers)-

गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math) मे छात्रों के उत्तरों के प्रति शिक्षक की मनोवृत्ति निम्न होनी चाहिए 

(1.) छात्रों के उत्तरों की ओर अध्यापक को धैर्य तथा सहानुभूति का भाव रखना चाहिए-
यदि कोई बालक गलत उत्तर दे रहा है तो अध्यापक को अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए।उसे सहानुभूतिपूर्ण ढंग से ही उत्तर निकलवाने की चेष्ठा करनी चाहिए।
(2.) उत्तरों को सदा छात्रों के पक्ष से लेना चाहिए-
छात्रों के उत्तरों में जो कुछ भी ठीक बात हो,उसे मान लेना चाहिए और आगे जो बात गलत हो,उसे ठीक कराने की चेष्टा करनी चाहिए।
(3.) साधारण रूप से बालकों को उत्तर देने में सहायता नहीं करनी चाहिए-
बालकों को यथासम्भव स्वयं उत्तरों को पूर्ण रूप से देने का अवसर प्रदान करना चाहिए।जो शिक्षक बालक के उत्तर को अपनी ओर से पूरा कर देते हैं या उत्तर देने में उसके जरा ही अटकने पर सहायता देने लगते हैं,वे बालकों में दूसरों पर आश्रित रहने की भावना को बढ़ाते हैं।
(4.) अशुद्ध उत्तरों को छात्रों द्वारा ही शुद्ध करना चाहिए-
यदि अध्यापक देखे कि बालकों द्वारा दिए गए उत्तर अंशत: शुद्ध है तो वह उन्हें स्वयं शुद्ध न करके बालकों द्वारा ही शुद्ध कराए।
(5.) उत्तर न मिलने पर छात्रों को डांटना-फटकारना नहीं चाहिए-
बहुत से अध्यापक उत्तर न मिलने पर अपना धैर्य खो देते हैं और छात्रों को बहुत बुरा-भला कहते हैं। कुछ तो उनको पीट भी देते हैं।ये सब बातें अमनोवैज्ञानिक हैं तथा बालकों की भावनाओं का दमन कर देती हैं और वे अपना आत्म-विश्वास खो बैठते हैं।
(6.) अच्छे उत्तरों की प्रशंसा की जानी चाहिए-
यदि बालक ठीक उत्तर देता है तो उसे कुछ ऐसे शब्द ‘शाबास ‘इत्यादि कहने चाहिए। इससे उन्हें प्रोत्साहन मिलता है परन्तु कुछ अध्यापक अपनी एक आदत बना लेते हैं कि प्रत्येक उत्तर आने पर ‘शाबास ‘कह देते हैं या ऐसा ही कोई शब्द कहते हैं,यह ठीक नहीं है।अध्यापक को जल्दबाजी से काम नहीं लेना चाहिए,उसे सोच-समझकर ही अच्छे प्रश्नों की सराहना करनी चाहिए।उसे यह भी याद रखना चाहिए कि उसे अशुद्ध उत्तरों पर ताड़ना नहीं देनी है।
(7.)प्रत्येक शुद्ध उत्तर को उन छात्रों से दुहरवाना चाहिए जिन्होंने अशुद्ध उत्तर दिया है-
ऐसा करने से जो छात्र अशुद्ध उत्तर देते हैं,वे अपनी त्रुटि स्वयं सुधार लेते हैं।
(8.)पूरी कक्षा को एक साथ उत्तर देने से रोकना चाहिए-
यदि पूरी कक्षा एक साथ उत्तर देगी तो कक्षा में बहुत शोर मच जाएगा और न तो अध्यापक की समझ में कुछ आएगा,न बालकों की। इसलिए अध्यापक को चाहिए कि कक्षा में उचित अनुशासन रखें और बालकों को एक-एक करके प्रश्नों का उत्तर देने का आदेश दे।
(9.)बे-मन,बिना विचारे तथा शरारतपूर्ण उत्तरों को सावधानी से रोके-
कुछ बालक प्रत्येक प्रश्न का बिना सोचे-विचारे उत्तर देने को तैयार होते हैं, उन्हें अध्यापक को प्रेम से समझाना चाहिए।यदि उत्तर शरारतपूर्ण ढंग से दिए गए हैं तो शिक्षक को चाहिए कि सहानुभूतिपूर्ण ढंग से बालकों का ध्यान उनकी शरारत की ओर दिला दे और उन्हें अच्छा व्यवहार करने की प्रेरणा दे।

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12.गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि में उत्तर किस रूप में होने चाहिए?(In the form of Questioning teaching method in math, how should the answers be?)-

गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math) में उत्तरों के स्वरूप का अच्छा होना भी नितान्त आवश्यक है।चाहे किसी प्रकार और कैसी भाषा में दिए गए उत्तरों को मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। उत्तरों में निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए-
(1.)भाषा की दृष्टि से उत्तर शुद्ध हों-
उत्तरों की भाषा की ओर शिक्षक को ध्यान देना आवश्यक है।व्याकरण अथवा उदाहरण की दृष्टि से अशुद्ध भाषा बोलने से बालक बहुत कुछ अशुद्ध बोलना सीख लेते हैं,यह ठीक नहीं है।भाषा की शुद्धता पर ध्यान देना प्रत्येक शिक्षक का कर्त्तव्य है।’उत्तरों की भाषा के दृष्टिकोण’से प्रत्येक पाठ को भाषा-पाठ के समान ही समझना चाहिए।इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि भाषा में दो शब्द अंग्रेजी के और दो शब्द हिन्दी के प्रयोग न किए जाएं। खिचड़ी भाषा की आदत पड़ना बहुत बुरी बात है।शिक्षक को इस प्रकार के उत्तरों को शुद्ध भाषा में परिवर्तित करा देना चाहिए।
(2.)उत्तर पूर्ण वाक्यों में हो-
उन्हीं उत्तरों को मान्यता देनी चाहिए जो पूर्ण वाक्यों में दिए जाते हैं। इससे बालकों में ठीक बोलने की आदत पड़ेगी और वे अपने भावों को अच्छी भाषा में रखना सीख सकेंगे।
(3.) उत्तर में उचित शब्दों का प्रयोग किया जाए-
बहुत से बालक अपने उत्तरों में भद्दे शब्दों का प्रयोग करते हैं,यह ठीक नहीं है।कक्षा में उन्हीं शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए जो सभ्य समाज में मान्य हैं।जैसे-यार इस सवाल का उत्तर क्या होगा? इसमें यार शब्द का प्रयोग शिष्ट नहीं है इसकी जगह मित्र शब्द का प्रयोग करना चाहिए।
(4.) उत्तरों में पूर्ण भावाभिव्यंजन हो-
जिन उत्तरों के अधूरे भाव व्यक्त किए जाते हैं, उन्हें मान्यता नहीं देनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से बालकों में अधूरे भाव व्यक्त करने की आदत पड़ जाती है।
(5.) उत्तर सार्थक हों-
उत्तर विषय में संगत ही होना चाहिए। बहुत से बालक ऐसा उत्तर देते हैं जो ठीक होते हुए भी जिन बातों के बारे में पूछा जाता है,उनको स्पष्ट न करके निरर्थक बातें जोड़ देते हैं।
(6.) उत्तर एक ही बात को बार-बार दोहराने वाले नहीं होने चाहिए और न उनमें व्यर्थ का शब्दाडम्बर ही होना चाहिए-
कभी-कभी बालक उत्तर देने में एक ही बात को बार-बार दोहरा देते हैं,यह उचित नहीं है। उत्तर में जो बात कहनी है उसे एक ही बार में स्पष्ट रूप से कहने की आदत डलवानी चाहिए।प्राय: छात्र समझते हैं कि उत्तर जितना लम्बा होगा उतना ही अच्छा होगा और इस कारण वे उत्तर देने में जो शब्दावली उन्हें आती है, उस सबको जोड़ने की चेष्टा करते हैं।इस प्रकार के उत्तरों में केन्द्रीय भाव छिप जाता है और उत्तर व्यर्थ-सा प्रतीत होने लगता है।
इस प्रकार गणित में प्रश्नोत्तर अध्यापन की विधि (Questioning teaching method in math) का प्रयोग करके शिक्षण को प्रभावी बनाया जा सकता है।

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