Pupil Was Enlightened by Mathematician
1.गणितज्ञ द्वारा विद्यार्थी को अंतर्ज्ञान हुआ (Pupil Was Enlightened by Mathematician),गणितज्ञ ने विद्यार्थी के ज्ञानचक्षु खोले (Mathematician Opened Student’s Innermost Eyes):
- गणितज्ञ द्वारा विद्यार्थी को अंतर्ज्ञान हुआ (Pupil Was Enlightened by Mathematician) और उसके जीवन की दिशाधारा ही बदल गयी।आज के जमाने में ऐसे दिव्य पुरुषों का सत्संग ही नहीं मिल पाता है और मिल जाता है तो पहचान नहीं पाते।
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2.विद्वानों द्वारा ज्ञान चर्चा (Knowledge Discussion by Scholars):
- भारत के सुदर्शनपुरी में विद्वान नित्यानंद अपनी विद्वता और ज्ञानचर्चा के लिए विख्यात थे।वे अक्सर ज्ञान चर्चा के लिए पंडितों और विद्वानों को बुलाया करते थे और शास्त्रार्थ,वाद-विवाद करवाते थे।ज्ञान चर्चा के आयोजन का संचालन वे स्वयं करते थे।वाद-विवाद,शास्त्रार्थ में किसी विद्वान द्वारा अड़ जाने,विवाद पैदा करने पर वे स्वयं ही उसका समाधान करके शांत करते थे।नित्यानंद का अपना लंबा-चौड़ा व्यवसाय था परंतु उनको व्यवसाय से भी अधिक ज्ञान चर्चा और शास्त्रार्थ अधिक रोचक लगता था।हालांकि वे जानते थे कि वाद-विवाद से किसी भी पक्ष को सही सिद्ध किया जा सकता है।वाद-विवाद से सही निष्कर्ष निकाल पाना बहुत कठिन होता है।जीवन के लिए जिस चीज की सर्वाधिक आवश्यकता है वह है साधना और तप।यों साधना और तप अलग-अलग दिखाई देते हैं परंतु साधना का प्राण तपश्चर्या है।साधना से जीवन में कोमलता का समावेश होता है तो तप संघर्ष की भट्टी से निकलने की प्रक्रिया है।
- तप से ही जीवन संचालित है और जीवन में उभरने वाले संस्कार को तप से ही निर्मूल किया जाना संभव है।सच्चा तपस्वी और साधक वाद-विवाद नहीं करता,वह तो स्वयं को तप की भट्टी में तपाता रहता है और तप की ऊर्जा से असंभव को संभव कर दिखाता है।नित्यानंद इस बात से परिचित थे और इसलिए किसी सच्चे साधक,तपस्वी,योगी एवं ज्ञानी की खोज में रहते थे।
एक दिन उनकी ज्ञान चर्चा में एक विचित्र सी घटना घटी।ज्ञान चर्चा में आज विद्वानों के कई विशिष्ट ग्रुप आए हुए थे।और उनके बीच गंभीर वाद-विवाद चल रहा था।ज्ञान चर्चा का विषय थाःगणित से विशेष मानसिक क्षमता का विकास।विद्वानों के कुछ ग्रुप गणित के अध्ययन से होने वाले विशेष मानसिक विकास पर अपने तर्कसम्मत विचार प्रस्तुत कर रहे थे,तो दूसरे कुछ ग्रुप इसका खंडन कर के बता रहे थे कि गणित का न व्यावहारिक जीवन में कोई खास उपयोग है और न ही गणित शिक्षा से कोई विशेष मानसिक विकास होता है,ये भी अपने तर्कसम्मत विचार प्रस्तुत कर रहे थे।दोनों पक्षों में ग्रुप बँटे हुए थे और अपना-अपना पक्ष रख रहे थे।पक्ष में तर्क देने वाले कह रहे थे कि गणित की सही विधि से न पढ़ाने के कारण छात्र-छात्राओं में गणित फोबिया हो जाता है और तर्क,युक्ति और सही शिक्षण विधि से उसका विशिष्ट मानसिक विकास होता है।
- विरोध में खड़े विद्वान कह रहे थे कि गणित की विषयवस्तु इतनी जटिल है कि इसकी थ्योरम,कांसेप्ट को छात्र-छात्रा समझ ही नहीं पाते हैं,उनमें (छात्र-छात्राओं में) एक तरह का डर घुस जाता है।ज्ञान चर्चा अपने चरम पर थी।इतने में विद्वान सुधाकर का पुत्र तक्षक अपने पिता को ढूंढते-ढूंढते ज्ञान चर्चा स्थल पर पहुंच गया।सुधाकर विद्वान थे,उन्हें ज्ञान चर्चा में आदरपूर्वक निमंत्रण दिया गया था।वे भी ज्ञान चर्चा का आनंद उठा रहे थे।
- तक्षक अपने पिता को देखते ही उछल पड़े और सरस्वती मंत्र का जाप जोर-जोर से करते हुए उनके पास पहुंच गए।उसका उच्चारण इतना ऊंचा था कि बरबस सबका ध्यान उसकी ओर खिंच गया।थोड़ी देर के लिए विद्वानों की ज्ञान चर्चा पर ब्रेक लग गया।कुछ विद्वान सुधाकर के पुत्र तक्षक के इस व्यवहार से बेहद नाखुश हुए और उसे ऐसे घूरने लगे कि मानों उसे वहीं भस्म कर देंगे।एक दो ने तो धीरे से सुधाकर की निंदा करके अपने मन की भड़ास निकाल ली।
3.विद्यार्थी तक्षक का अपमान (Insult to student Takshak):
- विद्वान अखिलेश ने कहा:तक्षक! तनिक यह तो बतला दो कि आने वाले दिन गणित के लिए अमावस है या पूर्णिमा? अखिलेश के स्वर में एक तीव्र कटाक्ष था,जो तक्षक के माध्यम से सुधाकर की ओर इंगित कर रहा था।तक्षक ने कहा श्रीमान आने वाले दिन गणित के लिए अमावस हैं! बस फिर क्या था,आने वाले दिन गणित का स्कोप बढ़ते हुए (पूर्णिमा) हुए को अमावस (गणित का स्कोप घटने) कहने पर ज्ञान चर्चा में उपस्थित सभी विद्वानजनों ने सुधारकर एवं तक्षक का भारी उपहास किया और कटु-कटाक्ष बाणों से इन दोनों को छलनी कर दिया।सुधाकर अपमान के बोझ तले दबकर सिर झुकाए तक्षक की बाँह मरोड़ते एवं घसीटते हुए बाहर ले आए।
- इस अपमान ने तक्षक को अंदर से झकझोर करके रख दिया।वस्तुतः उसका मन पढ़ने-लिखने में लगता ही नहीं था और गणित में तो बिल्कुल ही नहीं लगता था,परन्तु अब उसने निश्चय किया कि उन्हें पढ़ना है और इसी ज्ञान चर्चा में अपनी प्रतिभा का परिचय प्रस्तुत करना है।अध्ययन हेतु गुरु की तलाश में निकल पड़े।रास्ते में जाते हुए एक बदमाश और गुंडे किस्म का छात्र मिल गया।उसने उसको छेड़ दिया कि गणित सीखने के लिए निकल पड़े,बच्चू तुम क्या सीखोगे,क्या कर पाओगे? गणित सीखने के लिए आला दरजे का दिमाग चाहिए,जो तुम्हारे पास है नहीं।तक्षक के अंदर अपमान का जहर इतना तीव्र था कि वह उस बदमाश और गुंडे किस्म के छात्र पर टूट पड़ा,जैसे बाज कबूतर पर और बिल्ली चूहे पर झपटती है।वह गुंडा छात्र उसके वार को झेल नहीं पाया और लड़खड़ा कर गिर गया।तक्षक ने उसे तब तक मारा जब तक वह अधमरा नहीं हो गया,अधमरा होने पर उसने उसे एक तरफ पटक दिया।
- उस रास्ते में एक गणितज्ञ नीलकंठ गुजर रहे थे।उन्होंने तक्षक के इस उद्दाम साहस को देख कर और उस गुंडे छात्र को मुंह तोड़ जवाब देने पर अत्यंत प्रसन्न हुए।गणितज्ञ नीलकंठ ने कहा-वत्स! आज मैं तुम्हारा मनोरथ पूरा करने आया हूं।क्या मैं जो कहूं,तुम उसे पूर्ण कर सकोगे? मेरे बताएं मार्गदर्शन और मंत्र की साधना करने का साहस जुटा सकोगे? वत्स! गुरुकृपा अहैतुकी होती है और इसके लिए अपने सर्वस्व को होमना पड़ता है। क्या तुम ऐसा दुस्साहस करोगे? तक्षक को यह बात सुनकर अपार प्रसन्नता हुई और वह बोला:हे गुरुदेव! आपका वचन मेरे लिए मंत्र के समान है,परंतु आपसे एक विनम्र विनती है।पहले मेरी व्यथा सुन लें।गणितज्ञ नीलकंठ ने कहाःपुत्र: मैं तुम्हारी व्यथा से सुपरिचित हूं,फिर भी कहो अपनी अंतर्व्यथा।तक्षक ने अपनी सारी आपबीती सुना दी।गणितज्ञ मुस्कुराए और उसको अपनी छाती से लगाकर प्रेम से उसके उनके सिर पर हाथ फेरने लगे।मानवीय पीड़ारूपी विष का पान कर प्यार का अमृतवर्षण करना सच्चे गणितज्ञ का धर्म है और वे इसे पूरा कर रहे थे।तक्षक का तन-मन इससे भीगता जा रहा था।उसको लग रहा था कि उन्हें एक नया जीवन मिला है और उनके जीवन में एक नया प्राण घुल रहा है।गणितज्ञ नीलकंठ तक्षक को अपने साथ ले गए।
4.विद्यार्थी का कायाकल्प (Student Rejuvenation):
- तक्षक को गणित शिक्षा देने के लिए सबसे पहले उसे दीक्षित किया।तक्षक ने पूछा गणित शिक्षण के लिए क्या यह सब जरुरी है? नीलकंठ ने कहा गणित को संख्याओं और गणना तक सीमित करके ज्ञान प्राप्त करने से ज्ञान में पूर्णता नहीं आती है।गणित का ज्ञान इस तरह प्राप्त करना चाहिए जिससे बौद्धिक और तार्किक विकास के साथ-साथ अंतर्ज्ञान भी हो सके।तक्षक को यह सब स्वप्नलोक के समान लग रहा था।उसे लग रहा था कि वह दिव्य सुरभित पवन के साथ अंतरिक्ष में भारहीन हो तैर रहा है।एक सुंदर आसन पर बैठाकर गणितज्ञ नीलकंठ ने तक्षक को दीक्षा दी।सरस्वती मंत्र का जाप करते रहने को यथावत करते रहने को कहा और उसकी साधना-प्रणाली को ठीक से समझाया,आशीर्वाद दिया।गणितज्ञ नीलकंठ ने कहा:वत्स! गणित साधना में प्रमाद मत करना।तपस्या,सदाचरण एवं स्वाध्याय को जीवन का व्रत बनाना।मंत्र एवं जप की ऊर्जा का दुरुपयोग मत करना,किसी का नुकसान मत करना,सदा दूसरों का सहयोग एवं सेवा करना।जो पीड़ा तुमने झेली है,उसके निवारण के लिए कभी पीछे मत रहना।दूसरों की सेवा का अवसर आने पर उससे वंचित मत रहना।तक्षक ने संकल्प लिया-हे गुरुवर! आपका आदेश शिरोधार्य है।
- तक्षक ने अलोकिक गणितज्ञ नीलकंठ से लिए मंत्र की साधना प्रारंभ कर दी।साधना के लिए आवश्यक पुस्तकें,संदर्भ ग्रंथ और ऑनलाइन सामग्री का इंतजाम कर लिया।इन वस्तुओं में कुछ ऐसी चीजें थी,जो उसे मिलना संभव नहीं थी,लेकिन वे भी यथासंभव उपलब्ध हो गई।तक्षक को गुरु का मार्गदर्शन,पुस्तकें,संदर्भ ग्रंथ,सत्साहित्य,ऑनलाइन सामग्री आदि साधना की समस्त चीजें औचक एवं अचानक मिलती जा रहीं थीं।इस सबसे हतप्रभ एवं विस्मित तक्षक के अंदर गणितज्ञ गुरु नीलकंठ के प्रति अगाध श्रद्धा हो गई।उसे गुरुजी का बराबर सहयोग मिल रहा था।साधना हेतु जो भी चीज चाहिए थी,वह सब प्राप्त हो रही थी।यह केवल कल्पना नहीं थी बल्कि यथार्थ सच था और इसे वह अपने जीवन में घटित होते हुए देख रहा था।गुरुकृपा व्यर्थ नहीं होती। वह तो मंत्र के समान होती है,जिसे तक्षक अपनी साधना के समय प्रत्यक्ष देख पा रहा था।
तक्षक की साधना प्रारंभ हो गई थी।उसने गुरु के सामने जिज्ञासा प्रकट की कि
- प्रश्न:1.गणित के आने वाले दिन अमावस व पूर्णिमा कैसे हो सकते हैं? (How can there be a new moon and a full moon on the coming days of mathematics?):
नीलकंठःयदि गणित को केवल अंकों और संख्याओं का विषय मानकर पढ़ाया जाएगा या पढ़ेगा,उसे सही विधि से नहीं पढ़ेगा या पढ़ाया जाएगा,उसे पूजा या आराधना समझकर नहीं पढ़ेगा या पढ़ाया जाएगा तो उसके लिए आने वाले दिन अमावस के होंगे अर्थात् उसका क्रेज घट जाएगा। - तक्षकःपूर्णिमा के दिन कैसे हो सकते हैं? (How can there be full moon days?):
नीलकंठ:यदि गणित को भावपूर्ण ढंग से पढ़ा या पढ़ाया जाएगा।मानवता की रक्षा के लिए पढ़ा या पढ़ाया जाएगा यानी गणित का अध्यात्म के साथ,व्यावहारिक उपयोगिता को समझ कर,मानवता के कल्याण के लिए शोध और अनुसंधान किए जाएंगे तो इसके क्रेज में वृद्धि होगी,हर विषय में इसकी घुसपैठ हो जाएगी,इसके बिना किसी विषय को पढ़ना अपूर्ण महसूस होगा और ऐसी स्थिति में आने वाले दिन इसके लिए पूर्णिमा के होंगे। - तक्षक प्रश्न पूछता और नीलकंठ जी उत्तर देते जा रहे थे।प्रश्न:3.गणित साधना के लिए सबसे जरूरी क्या है? (What is the most important thing for math practice?):
- उत्तर:गणित की साधना,गणित का ज्ञान प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु प्रवृत्ति होनी चाहिए,बुद्धि शुद्ध होनी चाहिए और बुद्धि सत्वगुण वाली ज्ञान से होती है अर्थात् बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है।अतः विद्यार्थी को चाहिए कि वह अपने ज्ञान (विवेक) से बुद्धि को नियंत्रित और संचालित कर उसे शुभ गुणों से युक्त और अवगुणों से बचा कर रखे।विद्यार्थी ज्ञान तभी प्राप्त करता है जब वह श्रद्धाभाव से ज्ञान प्राप्त करता है।
- प्रश्न:4.समस्याओं से कैसे मुक्त हों? (How to get rid of problems?):
- उत्तर:किसी भी विषय में,किसी भी क्षेत्र में ज्ञान के बिना समस्याओं से मुक्त नहीं हो सकते।हमारे जीवन में छोटी-छोटी समस्याओं में भी जब तक उलझे-रहते हैं,परेशान होते रहते हैं,जब तक हमें उस समस्या के समाधान का ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता।जब तक हम अज्ञान में फंसे रहेंगे तब तक समस्या मुक्त न हो सकेंगे।
- प्रश्न:5.क्या सिर्फ ज्ञान पर्याप्त है? (Is knowledge alone enough?):
- उत्तर:ग्रंथ पढ़ने वाले,ग्रंथ को धारण करने वाले,ग्रंथ को समझने वाले (ज्ञानी) और तदनुकूल आचरण करने वाले,ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं।अर्थात् ज्ञान को आचरण में उतारना भी जरूरी है।अनुभव सिद्ध ज्ञान से ही हमारा कल्याण हो सकता है।
- प्रश्न:6.ज्ञान प्राप्त करने की सही दिशा कैसे मालूम हो? (How do you know the right direction to acquire knowledge?):
- उत्तर:ज्यों-ज्यों ज्ञान प्राप्त करते हैं तो हमें यह अनुभव होता जाता है कि हमने बहुत कम जाना है,जितना जानते जाते हैं तो अनुभव होता है कि ज्ञान तो अनंत है इस प्रकार की अनुभूति होने पर सही दिशा ज्ञात होती है।थोड़े से ज्ञान से अपने आप को पंडित समझने वाला खतरनाक होता है उसे स्वयं ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते हैं।अज्ञानी (नासमझ) को समझाना बहुत आसान है,भला-बुरा समझने वाले को समझाना और राजी करना और भी आसान है परंतु अल्पज्ञानी को कोई भी नहीं समझा सकता।कोई किसी विषय में कितना ही जानता हो परंतु वह अन्य विषयों में बालक ही होता है फिर चाहे उसकी उम्र कितनी ही हो।
- प्रश्न:7.ज्ञान का लाभ उठाने के लिए क्या करना चाहिए? (What should be done to take advantage of the knowledge?):
- उत्तर:ज्ञान को अमल में नहीं लेते तो उसे ज्ञान से लाभ नहीं उठा सकते।ज्ञान का लाभ उठाने के लिए मन को वश में रखकर उचित आचरण करना चाहिए।
- प्रश्न:8.मनुष्य के उत्थान के लिए क्या जरूरी है? (What is necessary for the upliftment of man?):
- उत्तर:किसी भी मनुष्य के उत्थान और विकास के लिए भक्ति,ज्ञान और योग का होना जरूरी है।जब भक्ति का रस हो,ज्ञान का तत्त्व हो और योग का सामर्थ्य हो तब शुभ कर्म बनता है और जब इनके साथ मनुष्य धर्म को आत्मसात कर लेता है तो वह कर्मयोगी हो जाता है। भक्ति की भावना माता की तरह वात्सल्यपूर्ण पोषण करती है,ज्ञान पिता की तरह रक्षण और संरक्षण करता है और योग गुरु की तरह आत्मा को परमात्मा से मिलाता है अतः सद्ज्ञान का होना जरूरी है।
- प्रश्न:9.श्रद्धा और ज्ञान में क्या संबंध है? (What is the relationship between faith and knowledge?):
उत्तर:श्रद्धा से युक्त,गुरुजनों की सेवा उपासना में लगा हुआ जितेंद्रिय व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त होता है,ज्ञान को प्राप्त करके वह शीघ्र ही परमशांति (मुक्ति) को प्राप्त करता है अर्थात् सब झंझटों से मुक्त हो जाता है।यानी इंद्रियों को वश में रखने वाला,समर्पित भाव वाला और संदेह रहित श्रद्धावान ज्ञान को उपलब्ध होता है। - गुरुजनों से बतलाए हुए विषय को न समझने वाला,गुरुवाक्य तथा शास्त्रों में श्रद्धा से शून्य एवं प्रत्येक वस्तु में संदेह रखने वाला साधक नष्ट हो जाता है।अपने वांछित अर्थ या साधन से पतित हो जाता है क्योंकि संदिग्धचित्त पुरुष के लिए न मानवलोक है और न आगामी जीवन ही है और न विषय सुख ही है अर्थात् संशयात्मा विनष्ट हो जाता है,कहीं भी अपने प्राप्त करने योग्य पदार्थ को नहीं प्राप्त कर सकता।
- जीवन में ज्ञान के समान पवित्र (चित्त को शुद्ध करने वाला) और कोई भी साधन नहीं है,कर्म योग के अनुष्ठान द्वारा सिद्धि (पूर्णता) को प्राप्त करता हुआ पुरुष यथासमय स्वयंमेव अपने आत्मा में आत्मज्ञान को प्राप्त करता है।
5.तक्षक के अंतर्चक्षु खुले (Takshak’s inner eyes open):
- गुरु के सानिध्य से उसके ज्ञान के नेत्र खुले,उसके अंतर के पट खुले,उसे अंतर्बोध हुआ।इस ज्ञान से उसका पूरी तरह रूपांतरण हो गया।उसने अपने आप को निर्भार महसूस किया।उसका प्रकाश दूर-दूर तक फैलने लगा। इस ज्ञान से तक्षक के शरीर का कण-कण आलोकित होने लगा और उसे अलभ्य आनंद की अनुभूति होने लगी।यह ज्योति उसके भृकुटि-मध्य (आज्ञा चक्र) केंद्रित होने लगी।मां सरस्वती मंत्र के जप,गुरु के मार्गदर्शन और उसकी तपश्चर्या व साधना से वह निहाल हो गया।तक्षक की चेतना पूर्ण स्वरूप में प्रकट होने लगी।गणितज्ञ नीलकंठ भी उसके अंदर रूपांतरण से गद्गद् हो गए।ऐसे शिष्य विरले ही होते हैं जो इतनी कड़ी साधना कर पाते हैं वरना आजकल की शिक्षा में तो डिग्री का सर्टिफिकेट लेना ही विद्यार्थी अपने जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मानते हैं।
- उसका यश,प्रतिष्ठा और साधना को सुनकर विद्वान नित्यानंद और ज्ञान चर्चा में भाग लेने वाले विद्वान सभी हतप्रभ थे।ऐसी अद्भुत घटना जो कभी घटी नहीं,कैसे घट गई।किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि यह एकाएक क्या हो गया है।बुद्धिमान विद्वान नित्यानंद जी को इस घटना को समझने में देर नहीं लगी।उन्होंने अपने सेवक को तक्षक को खोजने के लिए भेजा और हिदायत दी कि उन्हें ससम्मान यहाँ लाया जाए।तक्षक गुरु से विदा लेकर निश्चिन्त और आह्लादित होकर अपने घर वापस चले जा रहे थे।सेवक तक्षक को ससम्मान विद्वान नित्यानंद के पास ले आया।नित्यानंद जी ने उनको आदर और सम्मान के साथ अपने विद्वानों के साथ बिठाया।
- उपहास अपमान करने वाले सभी विद्वान लज्जित थे।उसका सिर शर्म से झुक गया।तक्षक ने कहाःहे विद्वानों! कभी किसी का उपहास नहीं करना चाहिए।पता नहीं,कब और कौन भगवान का कृपापात्र बन जाए।
- उपर्युक्त आर्टिकल में गणितज्ञ द्वारा विद्यार्थी को अंतर्ज्ञान हुआ (Pupil Was Enlightened by Mathematician),गणितज्ञ ने विद्यार्थी के ज्ञानचक्षु खोले (Mathematician Opened Student’s Innermost Eyes) के बारे में बताया गया है।
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6.ज्यादा ज्ञान क्यों प्राप्त करूं (हास्य-व्यंग्य) (Why should I gain more knowledge?) (Humour-Satire):
- टीचर:गणित का अध्ययन क्यों नहीं कर रही हो?
- छात्राःगुरु जी आप ही तो कहते हैं कि ज्ञान प्राप्त करना सबका हक है।इसलिए मैंने सोचा ज्यादा गणित की पढ़ाई करके किसी का हक क्यों मारू?
7.गणितज्ञ द्वारा विद्यार्थी को अंतर्ज्ञान हुआ (Frequently Asked Questions Related to Pupil Was Enlightened by Mathematician),गणितज्ञ ने विद्यार्थी के ज्ञानचक्षु खोले (Mathematician Opened Student’s Innermost Eyes) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.प्रज्ञा से क्या आशय है? (What do you mean by Pragya?):
उत्तर:वास्तविक ज्ञान को विजडम (wisdom) यानी प्रज्ञा कहते हैं।प्रज्ञा ज्ञान का सर्वश्रेष्ठ रूप है।अनुभव और बोध के साथ जब कोई जानकारी प्राप्त होती है तब मात्र ज्ञान नहीं रह जाता,प्रज्ञा हो जाता है।
प्रश्न:2.सबसे श्रेष्ठ चीज क्या है? (What is the most elevated thing?):
उत्तर:अनुभव सिद्ध ज्ञान जिसके बिना संसार की अच्छी से अच्छी चीज का सही उपयोग नहीं किया जा सकता।
प्रश्न:3.भक्ति और ज्ञान का आधार क्या है? (Where is the base of devotion and knowledge?):
उत्तर:भक्ति का आधार हृदय है और ज्ञान का आधार है स्थिर बुद्धि।भक्ति और ज्ञान ही हमें श्रेय मार्ग पर चलाते हैं।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणितज्ञ द्वारा विद्यार्थी को अंतर्ज्ञान हुआ (Pupil Was Enlightened by Mathematician),गणितज्ञ ने विद्यार्थी के ज्ञानचक्षु खोले (Mathematician Opened Student’s Innermost Eyes) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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