6Golden Tips of How to Do Philanthropy
1.परोपकार कैसे करें की 6 स्वर्णिम टिप्स (6Golden Tips of How to Do Philanthropy),परोपकार कैसे करें? (How to Do Benevolence?):
- परोपकार कैसे करें की 6 स्वर्णिम टिप्स (6Golden Tips of How to Do Philanthropy) के आधार पर आप परोपकार का अर्थ जान सकेंगे और परोपकार कैसे करें,के उपाय जान सकेंगे।परोपकार करना और वाकई में परोपकार करने में क्या फर्क है इसे जानेंगे?
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2.परोपकार करना पुण्य है (Doing charity is virtue):
- जिंदगी की सार्थकता को यदि खोजना है तो वह दूसरों की भलाई करने में है।संसार में उसी परिश्रम को सार्थक कहा गया है,जो दूसरों के लिए किया जाता है।वही मेहनत सफल कहलाती है,जिससे दूसरों का भला होता है।रूस के प्रसिद्ध और महान साहित्यकार टाॅल्सटाॅय का कथन है कि जो दूसरों के लिए कुछ नहीं करता है,वह कभी सुखी नहीं रह पाता।अपना पेट तो छोटी सी चींटी भी भर लेती है,दूसरे का पेट भरो और उन पेटों को भरो,जो खाली हैं,जिनमें क्षुधा (भूख) की आग दहक रही है।जिन्हें भोजन नसीब नहीं होता है,उनकी ओर देखो।इस प्रकार परोपकार के लिए जो कुछ भी किया जाता है,वह परिश्रम ही फलीभूत होता है।जो अपने लिए नहीं,दूजे के लिए कुछ करता है,वही सच्चा इंसान है।दूसरों के लिए किए गए इस तरह के परिश्रम में यदि निष्कामता का भाव हो,जनहित का भाव हो,तो ऐसा कर्म आध्यात्मिक कर्म बन जाता है,जिसका फल अनंत गुना मधुर एवं व्यापक होता है;जबकि व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले कामनाओं से युक्त स्वार्थपूर्ण कर्म अपनी मधुरता एवं व्यापकता को खोकर फीके एवं बेस्वाद हो जाते हैं।
- मनुष्य जीवन की किसी भी अवस्था में और किसी भी स्थिति में परोपकार किया जा सकता है।बस,इसके लिए संवेदनशील एवं उदार भावनाएं चाहिए।प्राचीन समय में एक बुड्ढा बेसहारा आदमी भिक्षा मांग कर अपना जीवन-निर्वाह करता था।उसका नित्य का नियम था कि वह अधिक से अधिक भिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करता था।इसी प्रयत्न में उसे सवेरे से लेकर रात हो जाती थी।वह भटकता रहता और हाथ पसारे भीख मांगता रहता।वृद्ध की दिनचर्या का एक हिस्सा यह भी था कि जैसे ही वह सवेरे सोकर उठता,सबसे पहले शुद्ध होकर मंदिर में जाता,वहां की पूजा में भाग लेता,भगवान को प्रणाम करता है,फिर लौट कर आता और भीख माँगने निकल जाता।अपनी कुटिया से मुख्य मार्ग की ओर जाते समय वह अनाज के दानों से मुट्ठियाँ भर लेता और जहाँ पक्षियों को देखता,वहाँ दाने बिखेर देता।दोपहर को जब खाना खाने बैठता तो आधे से अधिक खाना लोगों में बांट देता।उसे अपना पेट भरने की इतनी अधिक चिंता नहीं होती थी,जितनी दूसरे भूखे लोगों की होती थी।जिस दिन वह अधिक परमार्थ करता,उस रात उसे बड़ी गहरी नींद आती और वह निश्चिंतापूर्वक सो जाता।
- सामान्यतः मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति होती है और इस स्वार्थी संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है,जो केवल अपने लिए परिश्रम करते हैं।जो मनुष्य औरों के लिए नहीं सोचते,उनका जीवन व्यर्थ है।जीवन में सार्थकता तभी आती है,जब दूसरों के लिए कुछ किया जाता है।
- एक बार विद्यालय के कुछ छात्र-छात्राओं को लेकर शिक्षक वनभ्रमण के लिए ले गए।वहां पर पानी का कुंड था।सभी छात्र-छात्राएँ वहाँ स्नान कर रहे थे।अचानक एक छात्र का पैर फिसल गया और वह कुंड के गहरे पानी में गिर पड़ा।सब तरफ से शोर होने लगा।चिल्ला-चिल्लाकर मदद के लिए पुकारने लगे।दौड़ो,बचावो उसे नहीं तो वह डूब जाएगा……. ।सभी चिल्ला-चिल्लाकर पुकार रहे थे।सभी तमाशाइयों की तरह कुंड की ओर देखते और कोई भी उसे बचाने का साहस नहीं कर पा रहा था।
ऐसे में एक लड़का,अपने कपड़े उतार कर कुंड में कूद पड़ा।कुंड में गिरने वाला छात्र पानी में गोते लगा रहा था।कभी नीचे जाता तो कभी ऊपर आता।जैसे ही वह गोता खाकर ऊपर आया,बचाने वाले छात्र ने उसके बाल पकड़ लिए और फिर धीरे से उसका हाथ पकड़ कर तैरता हुआ कुंड के किनारे की ओर लाने लगा।उसने दूसरे के लिए अपनी जान जोखिम में डाली थी,इसीलिए उसका परिश्रम व्यर्थ नहीं गया।कुछ ही पलों बाद दोनों छात्र कुंड की सीढ़ियों पर आ लगे।जिस छात्र ने अपने साथी छात्र को बचाया था,वह हालांकि हाँफ रहा था,मगर उसके चेहरे पर आत्म संतुष्टि के ऐसे चिन्ह थे,मानों उसे दुनिया-जहान की दौलत मिल गई हो।कुछ पलों बाद ही उसके चेहरे पर गर्वीली मुस्कान-उभर आई और उसने वहां उपस्थित सभी छात्र-छात्राओं और लोगों की आंखों में अपने लिए प्रसन्नता एवं सम्मान के भाव को महसूस किया।
3.दूसरों की सहायता तो प्रकृति के जीव भी करते हैं (Even the creatures of nature help others):
- इसी प्रकार यदि राह चलता कोई छात्र-छात्रा अचानक बेहोश होकर गिर पड़ता है तो यह अन्य छात्र-छात्रा तथा मनुष्य का कर्त्तव्य है कि उसे फौरन उठाए और उसका प्राथमिक उपचार करने में सहयोगी बने।ऐसे परिश्रम जो दूसरों के लिए निस्स्वार्थ भाव से किए जाते हैं और मानवता के हित में होते हैं,वे प्रशंसनीय होने के साथ-साथ प्रकारांतर में दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत बनते हैं।
- दूसरों की सहायता करने की प्रेरणा तो प्रकृति हर पल देती है,लेकिन मनुष्य फिर भी इनके शिक्षण से अंजान बने रहकर इनकी सेवा को ग्रहण करता रहता है।झरना दूसरों के लिए बहता रहता है।निरन्तर बहता रहता है।प्रपात का निर्मल,शीतल और मधुर जल वन्य प्राणी तो पीते ही हैं,मनुष्य भी उसे पीकर तृप्त हो जाते हैं।वह हमें सिखलाता है कि देखो मैं दिन-रात औरों के लिए ही परिश्रम कर रहा हूं।तुम भी दूसरों का भला करना सीखो।पेड़-पौधे,जो भी फल-फूल देते हैं,उसका दूसरे लोग उपभोग करते हैं,इसी में उनकी महत्ता है,उनका गुणगान होता है।
- पक्षी अपना घोंसला बनाते हैं।घोसले में बैठे अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए चुग्गा लेकर आते हैं और उन्हें खिलाते हैं।वे सूर्योदय से लेकर शाम होने तक निरंतर अपना पेट भरने के प्रयास में लगे रहते हैं।लोग सोचते हैं कि पक्षी हमेशा अपने लिए ही श्रम करते हैं,लेकिन उनका श्रम दूसरों का भी भला करता है।ये पक्षी खेतों,पौधों और नालियों के किनारो के कीटाणु बीन-बीनकर खाते हैं।इस तरह वे किसानों और दूसरे लोगों का भला करते हैं।इस प्रकार उनका अपने लिए किया गया श्रम भी लगभग दूसरों के लिए ही होता है।
- सुकरात एक बहुत बड़े दार्शनिक थे।जीवन में उन्होंने जितना भी ज्ञान अर्जित किया,उनका कहना था कि वह सब दूसरों के लिए है।अरस्तु सुकरात के शिष्य थे और वे महान विजेता सिकंदर के गुरु थे।जब सिकंदर विश्व विजय की भावना लेकर भारतवर्ष की ओर चला तो उसने अपने गुरु अरस्तु से आज्ञा मांगी और पूछा कि वह उसके लिए श्रेष्ठ आर्यावर्त्त से क्या लाए? अरस्तू ने अपने शिष्य सिकंदर से कहा-“मेरे लिए आर्यावर्त्त से सोना-चांदी मत लाना।मुझे हीरे और मोती भी नहीं चाहिए,लेकिन तुम वहां से मेरे लिए भगवद्गीता लाना,जिसमें भगवान श्रीकृष्ण जी ने मनुष्य को निष्काम कर्मयोग और मुक्ति का मार्ग दिखलाया है।” सिकंदर अपने गुरु की आज्ञा का पालन नहीं कर पाया।उसकी अकालमृत्यु भारत से लौटते समय ही हो गई थी।उस महान विजेता ने अपने सेवकों से कहा था कि मेरे दोनों हाथ कफन से बाहर निकाल देना,ताकि लोग देख लें कि सिकंदर अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा रहा है।वह खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही जा रहा है।
4.समर्पित भाव से कर्म करें (Work with dedication):
- यदि व्यक्ति अच्छे कार्य करके उन्हें भगवान को समर्पित करता है,उनका बखान नहीं करता है तो ऐसे व्यक्ति के अंदर अहंकाररूपी कँटीली बेल उग नहीं पाती और उनके व्यक्तित्व का पौधा सहज रूप से सुरक्षित होता है।व्यक्ति के अंदर ऐसा जज्बा होना चाहिए कि जो उसकी राह में कांटे उत्पन्न करें,उसके लिए भी वह फूल उत्पन्न करे।अंत में वह व्यक्ति स्वयं देखेगा कि उसके द्वारा उत्पन्न किए गए फूल तो फूल ही हैं,जबकि दूसरों के द्वारा पैदा किए गए काँटे उनके लिए त्रिशूल बन गए हैं।इस प्रकार जो व्यक्ति दूसरों का भला करते हैं,जिनके मन में परोपकार की भावना बलवती होती है,वे जिंदगी भर मुस्कराते हैं।वे परिश्रम पर परिश्रम करते रहते हैं और कभी थकान भी अनुभव नहीं करते हैं।ऐसा उनके साथ इसलिए होता है,क्योंकि वे अपने किए गए कर्मों के प्रति फलों की आशा न रखकर अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करते हुए कर्म करते हैं,चाहे उसका फल कुछ भी मिले,उसे वे भगवान का प्रसाद समझकर स्वीकारते हैं।
- एक बार एक विद्वान एक गणितज्ञ के पास यह जानने के लिए गया कि इस वृद्धावस्था में भी वे अपने अध्ययन कक्ष में बंद रहकर कालकोठरी जैसा जीवन क्यों व्यतीत कर रहे हैं।उस विद्वान ने देखा कि गणितज्ञ महोदय वृद्धावस्था में भी दत्तचित्त होकर गणित के खोज कार्य में लगे हुए हैं और गणित की गुत्थी को सुलझाने में लगे हुए हैं।उस विद्वान ने पूछा कि जब तक आप इस गणित की समस्या का समाधान कर चुकोगे तब तक आपकी मृत्यु हो जाएगी।इस समस्या का हल करने पर इससे होने वाले लाभों को आप नहीं प्राप्त कर सकेंगे।वैसे ही आपके पास जीवन भर अनुसंधान कार्य से काफी धन-दौलत इकट्ठा है।आपके जीवन के थोड़े से दिन ही शेष हैं,फिर इस गणित की समस्या को सुलझाने से आपको क्या फायदा है?
- इस पर वे महान गणितज्ञ हँसे और उन्होंने सहज स्वर में उत्तर दिया-“गणित या विज्ञान में अनुसंधान इसलिए नहीं किए जाते हैं कि उसका फल हमें ही मिलेंगे।खोज कार्य करता कोई और है,उससे लाभ कोई और उठाता है।यह दुनिया की बहुत पुरानी रीति है।जिन सुख-सुविधाओं का उपयोग आज मैं कर रहा हूं,उनका आविष्कार मेरे पूर्वज गणितज्ञों एवं वैज्ञानिकों ने किए थे।मेरे द्वारा किए गए खोज कार्य से आगे आने वाली पीढ़ियां लाभ उठाएंगी।”नदी अपने लिए नहीं बहती।पेड़ अपने फल नहीं खाता।इससे यह सीख मिलती है कि व्यक्ति को सदैव दूसरों के हित के कार्य करने चाहिए।अपने लिए जो लोग जमीन-आसमान एक कर देते हैं,उनकी प्रशंसा कभी नहीं होती और जो दूसरों के लिए परिश्रम करते हैं,उनका पसीना भी गुलाब की खुशबू की तरह कीमती हो जाता है और दूर तक सुगंध फैलाता है।
- एक बार एक विद्यार्थी गणित के सवाल हल करने में बार-बार असफल हो रहा था।पास में ही उसका सहपाठी तीव्रगति से सवाल किए जा रहा था।असफल विद्यार्थी बार-बार मेधावी छात्र की ओर टकटकी लगाकर देख रहा था।असफल हो रहे छात्र के चेहरे पर चिंता की लकीरें थी क्योंकि परीक्षा बिल्कुल निकट ही थी,कुछ ही दिन शेष थे।मेधावी छात्र ने उसकी स्थिति को भाँप लिया और अपने सहपाठी की दयनीय स्थिति को देखकर,अपना अध्ययन कार्य छोड़कर उसके पास गया।उसकी हिम्मत बँधाई,ढाँढस दिया और उसको गणित के सवालों को हल करने में हर संभव सहायता की।हालांकि मेधावी छात्र को अपने अध्ययन करने का नुकसान उठाना पड़ा परंतु उसका सहपाठी परीक्षा में फेल होने से बच गया।
- मेधावी छात्र में इंसानियत जागी।उसके अंदर के इंसान ने कहा कि मुझसे ज्यादा गणित के सवालों को हल करने की जरूरत उसके सहपाठी को है।वह बिना कहे उसकी मदद करने के लिए उसके पास गया और उसकी तब तक सहायता करता रहा जब तक कि वह फेल होने से बचा जा सकता था।सहपाठी ने मेधावी छात्र के सहयोग से गणित के सवाल हल किए।यही है मानवता और इंसानियत।यही मानव धर्म है कि पहले दूसरों का हित सोचा जाए और फिर स्वयं के लिए सोचा जाए; क्योंकि दूसरों के हित के लिए कार्य करने से ही जीवन सार्थक एवं सफल बनता है और इस हेतु किया गया त्याग एवं बलिदान ही उसके व्यक्तित्व को प्रकाशित करता है।
5.सहायता प्राप्त करने हेतु पात्रता विकसित करें (Develop eligibility to receive assistance):
- मनुष्य इस संसार में अकेला नहीं है।उसके सत्प्रयत्नों,मनोभावों और सदुद्देश्यों के अनुरूप कहीं ना कहीं से दृश्य-अदृश्य सहायता अवश्य मिलती है।सृष्टि का यह शाश्वत नियम है कि भगवान उन्हीं की सहायता करता है,जो अपनी सहायता आप करते हैं।जीवन में आने वाली कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जो अपने उद्देश्य से विरत नहीं होते,ऐसे व्यक्तियों की सहायता करने के लिए अदृश्य सत्ताएँ सदैव तत्पर रहती हैं।देवी सत्ताओं के साथ ही वे महापुरुष भी,जिन्होंने अपने जीवन को किसी महत्त्वपूर्ण कार्य में नियोजित किया है,मरणोपरांत भी वे अपने उद्देश्य से विरत नहीं होते,वरन किसी सुपात्र माध्यम को सहायता देकर उसमें अपनी क्रियाशक्ति का स्थानांतरण करके उद्देश्य की प्राप्ति कर लेते हैं।
- नोलोनियम,रेडियम आदि का आविष्कार करने वाली मदाम मेरी क्यूरी के साथ ऐसा ही घटित हुआ था।पियरे क्यूरी एवं मेरी क्यूरी ने एक साथ अनुसंधान कार्य शुरू किया था।बीच में मिस्टर क्यूरी की मृत्यु हो गई,पर उन्होंने अपनी क्रियाशक्ति को मेरी क्यूरी में स्थानांतरित किया।समय-समय पर उन्होंने उनकी सहायता भी की और उनका महत्त्वपूर्ण कार्य पूर्ण हुआ।मदाम क्यूरी ने उल्लेखनीय आविष्कार करके विज्ञान जगत में महती भूमिका निभाई।
- संसार में समस्त प्राणियों की गतिविधियों का सुसंचालान कोई अदृश्य चेतना कर रही है,जिसे ‘इंफाइनाइट विजडम’ के नाम से जाना जाता है।यदि इस महान सत्ता का अस्तित्व नहीं रहा होता,तो वैसी सुव्यवस्था कहां देखने को मिलती।इस समर्थ सत्ता की अनंतता,अखंडता को ध्यान में रखकर मनुष्य के जीवन की अनंतता का आभास भी सहज ही होता रहता है,जिसके फलस्वरूप सत्कर्म करने की प्रेरणा उभरती और जीवन की गरिमा गले उतरती है।सत्प्रेरणाएँ सदुद्देश्यों के साथ जुड़ी हुई हैं। अदृश्य सहायता उन्हीं कार्यों को पूर्ण करने के लिए मिलती है।
- मनुष्य को अपनी उच्चस्तरीय स्वार्थ सिद्धि की कला से अवगत होना चाहिए।संसार कहां और किधर जा रहा है,इसकी चिंता न करते हुए अपनी दिशा का निर्धारण स्वयं करना चाहिए।दुनिया में परिवर्तन कर सकने की क्षमता व्यक्ति में कहां होती है।यह कार्य तो दैवीय सत्ता का,अदृश्य सहायकों का हो सकता है,परंतु इसकी पात्रता का विकास करने के लिए स्वयं में सुधार-परिवर्तन करना आवश्यक है।यदि अपना दृष्टिकोण,भावना एवं चिंतन,चरित्र को विधेयात्मक एवं सृजनात्मक दिशा प्रदान की जा सके,तो पग-पग पर दैवीय शक्तियों,अदृश्य सत्ताओं का सहयोग,सहायता सहज ही सुलभ हो सकता है।स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही प्रयोजनों को पूरा करते हुए व्यक्ति अपने जीवन को धन्य बना सकता है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में परोपकार कैसे करें की 6 स्वर्णिम टिप्स (6Golden Tips of How to Do Philanthropy),परोपकार कैसे करें? (How to Do Benevolence?) के बारे में बताया गया है।
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6.परोपकार का परिणाम (हास्य-व्यंग्य) (Consequences of Philanthropy) (Humour-Satire):
- एक बार विजय बीमार होकर अस्पताल पहुंचा।वहां उसने अपने सहपाठी छात्र किशन को बगल वाले बेड पर लेटे हुए पाया।विजय ने जानना चाहा।
- विजय:किशन भाई,आप इतने दूर के अस्पताल में कैसे पहुंच गए।
- किशनःभाई मैं लोगों की सहायता-सहयोग करता था। परोपकार का रंग ऐसा चढ़ा कि मैं रात-दिन कुछ भी नहीं देखता था।एक बार मैंने एक लड़की की आवाज सुनी।मैंने दरवाजा खटखटाया तो उसने मुझे पिटवाकर यहां पहुंचा दिया।
7.परोपकार कैसे करें की 6 स्वर्णिम टिप्स (Frequently Asked Questions Related to 6Golden Tips of How to Do Philanthropy),परोपकार कैसे करें? (How to Do Benevolence?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.परोपकार का क्या अर्थ है? (What does philanthropy mean?):
उत्तर:प्रीति,प्रेम,सहानुभूति,उदारता,बंधुत्व,मानव सौहार्द,मानव प्रेम,लोकहित,लोकोपकार,लोक कल्याण आदि अनेक अर्थ होते हैं।
प्रश्न:2.परोपकारियों का क्या स्वभाव है? (What is the nature of philanthropists?):
उत्तर:फल आने से वृक्ष झुक जाते हैं,नए वर्ष बरसाती जल से भरे हुए बादल खूब फैलकर झुक जाते हैं; समृद्धियों के आने से सज्जन पुरुष नम्र हो जाते हैं-परोपकारियों का यही स्वभाव है।
प्रश्न:3.विद्यार्थी के लिए परोपकार वर्जित क्यों है? (Why is philanthropy forbidden for students?):
उत्तर:विद्यार्थियों के लिए सहपाठियों का सहयोग,मदद करना और उचित सीमा तक परोपकार वर्जित नहीं है।अति सेवा वर्जित है क्योंकि अतिसेवा से उसका मूल्यवान समय नष्ट होगा।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा परोपकार कैसे करें की 6 स्वर्णिम टिप्स (6Golden Tips of How to Do Philanthropy),परोपकार कैसे करें? (How to Do Benevolence?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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