9 Traits of Charismatic Political Leaders in India: And What You Can Learn From Them
1.भारत में करिश्माई राजनीतिक नेताओं के 9 लक्षण: और आप उनसे क्या सीख सकते हैं (9 Traits of Charismatic Political Leaders in India: And What You Can Learn From Them):
- भारत में करिश्माई राजनीतिक नेताओं के 9 लक्षण (9 Traits of Charismatic Political Leaders in India) के द्वारा जानिए कि एक सच्चा नेता कैसा होता है? स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान और बाद में नेताओं का चाल-चरित्र कैसे बदलता गया? हमें उनसे क्या सीख लेनी चाहिए?
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2.राजनैतिक नेतृत्व की भूमिका (The Role of Political Leadership):
- यह एक निर्विवाद सत्य है कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था के केन्द्र में एक नेतृत्व होता है और राजनीतिक व्यवस्था के अभीष्ट आयामों को विकसित करने में उसकी अति महत्वपूर्ण भूमिका होती है।नेतृत्व के द्वारा न केवल व्यवस्था का दिशा-निर्देशन किया जाता है वरन् व्यवस्था के विभिन्न घटकों द्वारा व्यवस्था से की जा रही मांगों पर समुचित ध्यान देते हुए उनके मध्य सामन्जस्य स्थापित करना,आम जनमानस को न्यूनतम् सुविधाएँ उपलब्ध कराने की दृष्टि से विधियों का निर्माण करना और उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करना तथा अन्ततः संकट के समय व्यवस्था के दबावों (Stresses) से रक्षा करने में भी उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।ब्रिटेन में चर्चिल और लॉयड जार्ज,अमरीका में लिंकन और जेफरसन,चीन में माओ,यूगोस्लाविया में मार्शल टीटो तथा भारत में पं. नेहरू जैसे राजनेता सुधण नेतृत्व के ऐतिहासिक प्रमाण बन चुके हैं।
3.नेतृत्व की परम्परावादी विचारधारा (Traditionalist Ideology of Leadership):
- नेतृत्व की परम्परावादी विचारधारा नेतृत्वकर्ता के ‘विशिष्ट गुणों’ (Specific Qualities) पर बल देती है और नेतृत्व को ‘सत्ता’ (Authority) और ‘वीरता’ (Heroism) के सन्दर्भ में परिभाषित करती है। नेतृत्व और वीरता के सम्बन्धित होने की अवधारणा उस समय की है जब नेतृत्वकर्ता एक सैनिक शासक हुआ करता था।घोड़े की पीठ पर बैठे हुए शूरवीर की एक राजनेता के रूप में रूमानी कल्पना नेतृत्व पर रचित तमाम कृतियों में देखने को मिलती है।इसके ठीक विपरीत नेतृत्व की आधुनिक विचारधारा है जो मैक्यावेली और जॉन लॉक से उद्भूत् मानी जाती है और जिसके अनुसार नेतृत्च को एक प्रक्रिया और राजनीतिक नेतृत्व को परिस्थितियों की कृति (Product of Circumstances) माना जाता है। नेतृत्व के अध्ययन का स्थितिपरक उपागम (Situational Approach) नेतृत्व को कार्यों के आधार पर व्याख्यायित करता है न कि नेतृत्वकर्ता के व्यक्तित्व के परिप्रेक्ष्य में ऐसा व्यक्तित्व एवं प्रभावोत्पादक क्षमता,राजनीतिक माना जाता है कि नेतृत्व,नेतृत्वकर्ता के समुदाय की विशेषताओं,इसके दृष्टिकोण एवं आवश्यकताओं तथा इसके राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक कारकों के मध्य अन्तःक्रिया का परिणाम होता है।
- संक्रमणकालीन (Transitional) या विकासशील समाजों में नेतृत्व की अवधारणा एक आदर्शी (Idealistic) अवधारणा बन जाती है।इस प्रकार के समाजों में नेतृत्व को प्रगति और भौतिक संसाधनों की समृद्धता के आधार पर अपना औचित्य सिद्ध करना पड़ता है क्योंकि इस बात पर विद्वत्जनों में एक आम सहमति है कि आधुनिकीकरण का लक्ष्य रखने वाला नेतृत्व विशिष्ट लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध होता है।उसके कार्यक्रम में एक ओर औद्योगीकरण के माध्यम से आर्थिक विकास सम्मिलित होता है तो दूसरी ओर विशेष और नियोजित प्रयासों से सामाजिक प्रगति और राजनीतिक विकास।उसके नेतृत्व को प्रभावशाली (Effective) तभी माना जाएगा जब वह न केवल सामाजिक परिवर्तन के विप्लवकारी कारकों को परिसीमित कर सके बल्कि निश्चित प्रतिमानों को ध्यान में रखकर स्पष्ट रूप से लक्ष्य-निर्धारण करे और कार्यपालकों की पूरी टीम का तदनुकूल दिशा-निर्देशन कर सके।इस परिप्रेक्ष्य से देखने पर स्पष्ट है कि नेतृत्व को स्वप्नलोकीय (Utopian) न होकर रचनात्मक होना चाहिए और इस प्रकार के रचनात्मक नेतृत्व में जैसाकि चार्ल्स मेरियम ने लिखा है “सामाजिक संवेदनशीलता,वैयक्तिक सम्पर्क की कला, समूह सम्पर्क और समूह कूटनीति की कला,नाटकीय अभिव्यक्ति की क्षमता,राजनीतिक फार्मूला,विचारधारा और योजना की आविष्कारक क्षमता तथा उच्च-स्तर के प्रतियोगितात्मक साहस जैसे गुण होने चाहिए (पार्क एवं टिन्कर द्वारा सम्पादित लीडरशिप एण्ड पोलिटिकल इन्स्टीट्यूशन्स इन इण्डिया 1960)
4.स्वाधीनता संघर्ष के दौरान करिश्माई व्यक्तित्व (Charismatic personality during the freedom struggle):
- राजनीतिक नेतृत्व के उपर्युक्त सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में भारत में राजनीतिक नेतृत्व के प्रश्न पर विचार किया जा सकता है।स्वतन्त्र भारत में न्यूनाधिक रूप से राजनीतिक नेतृत्व के केन्द्र में उसकी करिश्माई विशिष्टताएं रही हैं।आधुनिक सन्दर्भ में रचनात्मक नेतृत्व की अवधारणा कभी भी भारतीय राजनीतिक परम्परा का हिस्सा नहीं रही।एक आम भारतीय नेतृत्व को कुछ इस प्रकार से देखता है जैसे उसमें दैवीय गुण हो।गांधी और काफी सीमा तक पं. नेहरू के साथ भारतीय जनमानस ने जिस दैवीयता (Divinity) का भाव बनाए रखा वह नेतृत्य के पाश्चात्य विश्लेषक को कम ही तार्किक लगता है।भारत में करिश्माई व्यक्तित्व की आज्ञापालन ही लोग नहीं करते वरन् उसका अंधानुकरण भी करते है।अधिकांश भारतीय आज भी तार्किक नेतृत्व (Rational Leadership) की अव धारणा से सर्वथा अपरिचित हैं।
- इस दृष्टिकोण से जुड़े भारत के सुदूर इतिहास में प्रसारित हैं।भारत का पूरा स्वाधीनता संघर्ष करिश्माई व्यक्तित्व वाले नेताओं से भरा पड़ा है जिसमें गांधी और पं. नेहरू सर्वाधिक चर्चित हुए।ये लोग आदर्शवाद से लबरेज थे तथा राजनीति की सुधारवादी-क्रान्तिकारी भूमिका (Reformist Revolutionary Role of Politics) के वशीभूत होकर सार्वजनिक और राष्ट्र को अपने व्यवहार के रूप में करिश्मा कहना कदाचित पूर्णतया उपयुक्त नहीं अपना लिया।वैसे गांधी के नेतृत्व को मात्र करिश्मा कहना कदाचित पूर्णतया उपयुक्त नहीं होगा,क्योंकि गांधी स्वतन्त्र भारत के अपने प्रकार के अकेले नेता थे जिनमें ‘रचनात्मक नेतृत्व’ की प्रायः सभी विशिष्टताएं विद्यमान थीं।वे सामाजिक संवेदशीलता (Social Sensivity) की प्रर्तिमूर्ति थे,सम्भवतः इसी कारण वे जाति व्यवस्था सहित परम्परावादी हिन्दू सामाजिक के सभी पक्षों पर तार्किक दृष्टिकोण अपना सके।वे समाज के विभिन्न समूहों को राष्ट्रीय आन्दोलन में समाहित करते हुए इसे जन-आन्दोलन का रूप देने में सफल हुए।1987 में प्रकाशित अपने आलेख में विपिन चन्द्र (थ्री गांधीज,दी संडे ऑब्जर्वर बन्बई, 26 अप्रैल, 1987) ने यह भलीभाँति दर्शाया कि राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान गांधी नेता थे जो निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दीर्घकालिक रणनीति (Long-Term Strategy) विकसित कर सके।
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5.स्वतन्त्रता के बाद राजनैतिक नेतृत्व (Post Independence Political Leadership):
- परन्तु स्वतन्त्रता के बाद भारत में ऐसा नेता नहीं हुआ जिसने राजनीतिक प्रबन्ध (Political Management) की दीर्घकालिक रणनीति के विकास का प्रयास किया हो।पं. नेहरू एक रणनीतिज्ञ नहीं थे वरन उनकी सफलता का मुख्य स्रोत उनके वैयक्तिक गुण थे।मार्गरेट फिशर (पार्क एवं टिंकर द्वारा सम्पादित ‘लीडरशिप एण्ड पोलिटिकल इंस्टीट्यूशन इन इण्डिया’ 1960) के अनुसार नेहरू की सफलता का सबसे बड़ा कारण एक नायक (Hero) के रूप में उनकी विशेषताएं थीं।श्रीमती इंदिरा गांधी निश्चित रूप से राजनीतिक रणनीतिज्ञ थीं,उनका व्यक्तित्व भी करिश्माई था परन्तु उनके पास एक दीर्घकालीन दृष्टि का अभाव था।1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद यह आशा थी कि श्रीमती गाँधी देश को एक सुघण,लोकतांत्रिक और विकासोन्मुख नेतृत्व प्रदान करेंगी परन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी पार्टी और देश दोनों के सन्दर्भ में अधिनायकवादी भूमिका ग्रहण कर ली जिसका परिणाम आपातकालीन स्थिति के रूप में पूरे राष्ट्र को भुगतना पड़ा।स्व. राजीव गांधी में करिश्माई व्यक्तित्व तो था परन्तु अनुभवहीन होने के कारण राजनीतिक इच्छा होते हुए भी वे कुछ खास नहीं कर पाए।दूसरी बात यह कि आवश्यकता से अधिक उत्साही होने के कारण वे भारत की विभिन्न समस्याओं के निराकरण हेतु किसी सुविचारित दीर्घकालिक रणनीति का निर्माण नहीं कर सके।तदर्थवाद’ (Adhocism) के आधार पर उनके द्वारा अपनाई गई ‘समझौते की राजनीति (Politics of Accords) अपरिपक्व राजनीतिक नेतृत्व का ही परिचायक थी।
- अधिकांश विकासशील देशों में राजनैतिक आधुनिकीकरण की इच्छा रखने वाले अधिकांश राजनीतिक नेता उच्च शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बन्धित थे।भारत के सन्दर्भ में भी यह सही है।संविधान सभा और स्वतन्त्र भारत के प्रारम्भिक काल में बने मंत्रि परिषद के सदस्यों के आधार पर यह सहज ही स्पष्ट है।
उदाहरण के लिए 1956 में गठित मंत्रिपरिषद में 10 स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त,8 विधि स्नातक,2 बी. एड.,2 पी.एच.डी.,2 डी. लिट तथा 4 विधि में स्नातकोत्तर सम्मिलित थे।इस मंत्रिपरिषद में 11 ऐसे सदस्य थे जिनके इतिहास,अर्थशास्त्र,राजनीति,धर्म,अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध तथा विधि जैसे क्षेत्रों में शोधपत्र/पुस्तकें प्रकाशित थीं।इसे अधिकांश महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सदस्य थे।कमोबेश रूप से 50 के दशक में भारत में राजनीतिक नेतत्व लक्ष्य-आधारित,आदर्शोन्मुख और करिश्माई (Charismatic) रहा जिसने राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका का कर्त्तव्य की भाँति निर्वाह किया।भारत जैसे नवोदित राष्ट्र के लिए इस प्रकार का नेतृत्व अवश्यम्भावी भी था यद्यपि माइरन वीनर (मॉडर्नाइजेशन: दि डायनमिक्स ऑफ ग्रोथ,1966) का यह मानना है कि राजनीतिक नेतृत्व के ‘करिश्माई’ पक्ष ने भारतीय राजनीति में अयथार्थता (Unreality) को जन्म दिया है।
6.सामजिक नियन्त्रण और नेतृत्व (Social Control and Leadership):
- भारत में राजनीतिक नेतृत्व के विकास में साठ का दशक विभाजक रेखा मानी जा सकती है।इस दशक के मध्यकाल तक पहुँचते-पहुँचते राजनीति के नेतृत्व का भार ऐसे लोगों के कंधे पर पड़ा जिनका स्वाधीनता संघर्ष के मूल्यों में कोई भावनात्मक आस्था न थी।अब राजनीति में भर्ती का मापदण्ड स्थानीय या सामुदायिक मामलों में सक्रिय भागीदारी बन गया।अब राजनीतिक नेतृत्व का केन्द्र बिन्दु केन्द्रीय न रहकर प्रादेशिक और स्थानीय बन गया।राजनीति के लोकतंत्रीकरण (Democratization) के साथ ही क्रमशः राजनीति में ग्रामीण परिवेश के नेताओं खासतौर से अपेक्षाकृत शिक्षित (जिनमें से कुछ मध्यवर्ती या निम्नतर जातियों के भी थे) जनों का प्रवेश होने लगा।ये नेता भारत के स्वदेशी (Vernacular) धरातल से सम्बन्धित थे जिनके राजनीतिक व्यवहार पर परम्परागत मूल्यों की छाप स्पष्ट थी।इसी के समानांतर प्रभावशाली नेतृत्व की परिभाषा भी बदलने लगी।अब प्रभावशाली नेता उन्हें माना जाने लगा जो अपने समुदाय का कार्य करते थे,जिनके अपने मुवक्किलों (Clients) से व्यावसायिक सम्बन्ध थे।
- इस अर्थ में कि अपने समर्थकों के कल्याण के निमित्त विभिन्न सुविधाओं को उपलब्ध करवाने में उनकी भूमिका कुछ ‘दलाल’ (Brokers) जैसी थी।यह वह समय था जब राष्ट्रीय नेतृत्व तो ‘राष्ट्रीय सहमति’ (National Consensus) की बात करता रहा पर प्रादेशिक और स्थानीय नेतृत्व ‘क्षेत्रीय’ या ‘स्थानीय’ हितों के सन्दर्भ में सोचता रहा।सत्ता में बने रहने के लिए सीमित हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले इन नेताओं ने एक ओर ‘स्थानीय गुटों से और दूसरी ओर शहरी क्षेत्र के ‘आर्थिक अभिजनवर्ग (Economic-elite) से सम्बन्ध स्थापित किया।60 के दशक में जिस राजनीतिक नेतृत्व का अभ्युदय हुआ उसमें विचारधारा (Ideology),कर्मठता (Competence),दृष्टि (Vision) और दीर्घकालिक रणनीति (Long-term strategy) का अभाव था और ऐसी स्थिति में यह तार्किक था कि ‘सत्ता के गलियारों’ तक पहुँचने के लिए किसी भी प्रकार की रणनीति अपनाई जा सकती थी।यह नये प्रकार का राजनीतिक नेतृत्व,जो प्रारम्भ में स्थानीय था धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण करने लगा।इस प्रक्रिया को निर्वाचन के माध्यम से वैधता मिली जहाँ ‘गुण’ की तुलना में ‘संख्या’ का अधिक महत्त्व होता है।
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- 60 के दशक के मध्य में सरकार कृषि के क्षेत्र में अधुनातन तकनीक अपनाने के जो प्रयास किए गए उससे हरियाणा,पंजाब और उ. प्र. के पश्चिमी भाग में धनवान कृषकों के एक वर्ग का उदय हुआ जिसका आज भी इस क्षेत्र की राजनीति में प्रभुत्व बरकरार है सन् 1971 में श्रीमती गांधी,अपने को सत्ता के केन्द्र में सुस्थापित कर लेने के उपरान्त,ग्रामीण भारत से आने वाले निम्न-वगीर्य और मध्यवर्गीय क्षेत्रीय नेतृत्व के उमड़ते सैलाब को परिसीमित करने में सफल हुई।श्रीमती गांधी के रूप में शहरी बौद्धिक वर्ग,अल्प संख्यकों और पिछड़ी जातियों को एक ‘मसीहा’ (Saviour) मिला जो ग्रामीण क्षेत्र के इस ‘अपरिष्कृत’ (Unsophisticated cated) और ‘गंवार’ (Rustic) नेतृत्व से उनकी रक्षा कर सकता था।
- प्रो रजनी कोठारी का मत है कि 70 के दशक के आते-आते एक नए राजनीतिक नेतृत्व का विकास हुआ जो शारीरिक बल और आर्थिक शक्ति से सम्पन्न था।इनमें से कुछ स्थानीय माफिया गिरोहों के सरगना थे जबकि कुछ अन्तर्राष्ट्रीय तस्करी गिरोहों और विदेशी मुद्रा गिरोहों से सम्बन्धित थे।इस प्रकार के नेताओं ने शक्ति,धमकी और धोखे के बल पर संसाधनों पर अपना नियंत्रण को कर लिया।स्व. संजय गांधी और यूथ कांग्रेस के अचानक अभ्युदय ने इस नए नेतृत्व को वैधता प्रदान कर दी और उनमें से कुछ ने तो मंत्री पद को भी सुशोभित किया।
7.भारतीय राजनीति में प्लेबाॅय राजनीतिज्ञ (Playboy Politician in Indian Politics):
- 80 के दशक में भारत के राजनीतिक नेतृत्व परिदृश्य में ‘प्लेबॉय’ (Play-boy) राजनीतिज्ञों की भरमार हो गई।तमिलनाडु की राजनीति में एम. जी. रामचन्दन और शिवाजी गणेशन जैसी फिल्मी हस्तियों का पहले ही प्रवेश हो चुका था।शीघ्र ही जयललिता जैसी चर्चित अभिनेत्री ने भी एम जी आर के निर्देशन में राजनीति में प्रवेश किया।परन्तु इस सबसे भी अधिक महत्वपूर्ण दक्षिण के ख्यातिलब्ध कलाकार एन.टी. रामाराव का दक्षिण की राजनीति में सफल प्रवेश था।आंध्र प्रदेश की जनता ने तहे दिल से ‘पर्दे के भगवान’ (Screen-God) एन.टी आर. (ज्ञातव्य हो कि तेलगू फिल्मों में एन. टी. आर. ने राम और कृष्ण की भूमिकायें भी की हैं) को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया।केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस भी पीछे नहीं रहना चाहती थी अतएव सुनील दत्त तथा अमिताभ बच्चन जैसे व्यक्तियों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश कराया गया।जिन्होंने क्रमशः राम जेठमलानी तथा हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञों को 1984 के लोकसभाई चुनावों में परास्त किया।
- इसी के समानान्तर राजनीतिक क्षेत्र में प्रबन्ध के क्षेत्र से विशिष्ट जनों (Managerial elite) का भी प्रदेश हुआ।यह कमोबेश रूप से उच्यः मध्यवर्गीय शहरी पृष्ठभूमि (Upper-Middle Class Urban Background) का था जिसका प्रारम्भ शिक्षा दून या लॉरेंस या सेण्ट पॉल जैसे स्कूलों में और उच्च शिक्षा देश या विदेश के विख्यात इंस्टीट्यूटों या प्रतिष्ठानों में हुई थी।इस वर्ग के सदस्य औद्योगिक क्षेत्र में विशेष सफल रहे थे।इसकी ‘राजनीतिक अस्मिता’ (Political Identity) राजीव गांधी के समय में स्थापित हुई और यह शीघ्र ही देश की राजनीति में प्रभावी हो गया।भारत के विशिष्ट परिवेश में इनकी उपयोगिता हमेशा संदिग्ध ही रही क्योंकि ये विशिष्ट जन भारत की ग्रामीण वास्तविकता से हमेशा अलग-थलक रहे,इनके पास समुचित राजनीतिक बुद्धि और अनुभव का अभाव था,इनका समाजीकरण भिन्न था और इनके द्वारा प्राप्त शिक्षा ऐसी थी जो इन्हें उद्योग या बड़े व्यवसायों में ही सफलता दिला सकती थी।अपने वर्ग चरित्र (Class-Character) के अनुरूप यह वर्ग व्यवस्था को यथावत् बनाए रखने में उत्सुक था न कि आय और धन के प्रगतिशील पुनर्वितरण में।
इस प्रकार 80 के दशक के अन्त तक भारत में राजनीतिक नेतृत्व कमोबेश रूप से यथास्थिति को बनाए रखने में ही रुचिवान रहा। - किन्तु 90 के दशक की शुरुआत में अनुसूचित जाति तथा पिछड़ी जातियों में जरूर कुछ राजनीतिक सक्रियता दिखाई पड़ी और उ.प्र. जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में इसका परिणाम भी देखने को मिला परन्तु ऐसा नहीं लगता कि इसका कोई दूरगामी परिणाम,भारत में राजनीतिक नेतृत्व की दृष्टि से आने वाले समय में आयेगा।यद्यदि इस नवोदित राजनीतिक नेतृत्व ने ‘जाति तोड़ों,समाज जोड़ों’ का नारा दिया है परन्तु इस राजनीतिक नेतृत्व का आधार ही जातिगत राजनीति है जो इस नेतृत्व की कार्य शैली (Style of Functioning) से भी स्पष्ट है।हाँ,इस प्रकार के नेतृत्व से समाज में जातीय संघर्ष और कटुता को जरूर बढ़ाया मिला है।
8.राजनैतिक नेतृत्व का निष्कर्ष (Conclusion of the political leadership):
- इस प्रकार कुल मिलाकर,प्रारम्भिक वर्षों को छोड़कर,भारत में राजनीतिक नेतृत्व वैसा नहीं रहा जैसाकि एक नवोदित राष्ट्र को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के दौरान आवश्यकता होती है।न्यूनाधिक रूप से भारत में राजनीतिक नेतृत्य अपने को सत्ता में बनाए रखने में अधिक रुचियान रहा न कि सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन (Transformation) लाने में।इसके लिए भारत का जनमानस भी उतना ही दोषी है एक आम भारतीय की दृष्टि में भारत का राजनीतिक नेतृत्व स्वार्थी है परन्तु यहीं भारतीय किसी नए नेता के अभ्युदय से अभिभूत हो जाता है।और उसके द्वारा किए गए नए वायदों के आधार पर उसे मसीहा मानने लगता है।यह स्थिति का व्यंग ही तो है कि ‘भ्रष्ट’ और ‘स्वार्थी’ नेता की निन्दा तो खूब की जाती है,परन्तु निर्वाचन में विजय उसी को मिलती है।
9.भारत में करिश्माई राजनीतिक नेताओं के 9 लक्षण का सारांश (Summary of 9 Traits of Charismatic Political Leaders in India):
- (A)नेतृत्व की खास बातें:
(i)नेतृत्व का अर्थ - नेतृत्व व्यक्तित्व और पर्यावरण के सम्बन्ध को स्पष्ट करने वाली एक धारणा है।यह इस स्थिति को स्पष्ट करती है जिसमें एक व्यक्त्ति ने एक विशेष पर्यावरण में इस प्रकार का स्थान ग्रहण कर लिया हो कि उसकी इच्छा भावना और अन्तर्दृष्टि किसी सामान्य लक्ष्य को पाने के लिए दूसरे व्यक्तियों को निर्देशित करती है तथा उन पर नियन्त्रण रखती है। -पिगर
नेतृत्व वह व्यवहार है,जो दूसरे लोगों के व्यवहार उससे कहीं अधिक प्रभावित करता है जितना कि दूसरे व्यक्त्तियों के व्यवहार नेला को प्रभावित करते हैं। -नेपिअर और फार्सवर्थ
“नेतृत्व का तात्पर्य एक व्यक्ति द्वारा की जाने वाली उन क्रियाओं से है जो दूसरे व्यक्त्तियों को एक विशेष दशा में प्रभावित करती है। – सीमेन तथा मॉरिस - (ii)नेतृत्व के सामान्य गुण
बौद्धक योग्यता,पूर्वानुमान की क्षमता,संकल्प शक्ति,आत्म विश्वास,सामाजिकता,लोचपूर्ण व्यवहार,नैतिकता की भावना,सरलता,निर्णय की तत्परता,जोखिम उठाने की क्षमता एवं आकर्षक व्यक्त्तित्व नेतृत्व के गुण है।
लोकतन्त्र में श्रेष्ठ नेतृत्व वही है जो जनता की आकांक्षाओं को समझकर मार्ग निश्चित करें और उस पथ का स्वयं अनुसरण करे,इसके अतिरिक्त जनसामान्य को प्रभावित करने और दूर दृष्टि से परिस्थितियों का उचित आकलन कर उसी के अनुसार सामाजिक जीवन की दिशा को मोड़ दे।लोकतन्त्र निरंकुश नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता। - (iii)सामाजिक नियन्त्रण और नेतृत्व के कार्य
योजना बनाना,नीति निर्धारण करना,विशेषज्ञ के रूप में कार्य करना,समूह का बाल्य प्रतिनिधित्व करना,आन्तरिक सम्बन्धों पर नियन्त्रण,मध्यस्थता करना,आदर्श प्रस्तुत करना,पथ प्रदर्शन करना,नवीन विचार देना शासक रूप में कार्य करना और प्रशासन को जनहित के लिए कार्य करने को प्रवृत करना नेतृत्व के प्रमुख कार्य हैं। - (B)राजनैतिक नेतृत्व से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं से कुछ खट्टे-मीठे प्रश्न (Some bitter-sweet questions from students related to political leadership):
- (1.) क्या नेतृत्व का गुण जन्मजात होता है या अर्जित किया जाता है? (Is the quality of leadership innate or acquired?)
(2.)क्या कॉलेज में राजनीतिक नेतृत्व का विकास होना चाहिए?(Should political leadership be developed in the college?)
(3.)आपके विचार से राजनैतिक नेता में कौन-कौनसे गुण होने चाहिए? (What qualities do you think a political leader should have?)
(4.)आप कैसे पहचानेंगे कि आपमें राजनीतिक नेतृत्व हेतु मौलिक प्रतिमा है या नहीं? क्या नेतृत्व में बहुमुखी प्रतिभा होनी चाहिए? (How do you know if you have the fundamental ideal for political leadership? Should leadership have versatility?)
(5.)आप धार्मिक तथा राजनैतिक नेतृत्व में किसे प्राथमिकता देगें? राष्ट्र को सर्वाधिक आवश्यकता कौनसे नेतृत्व की होती है? (Who would you give priority to in religious and political leadership? Which leadership is most needed by the nation?)
(6.) क्या भारत का नेतृत्व करने के लिए नेता को दलगत राजनीति से ऊपर उठना चाहिए ? यदि हाँ तो वह दलगत राजनीति से कैसे ऊपर उठ सकता है? (Should a leader rise above party politics priority to in religious and political leadership? Which leadership is most needed by the nation?)
(7.) क्या धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए? यदि हाँ तो क्या उपाय करने चाहिए ? यदि नहीं तो क्यों? (Should religion be kept separate from politics? If yes, what measures should be taken? If not, why?)
(8.) क्या स्कूलों और कॉलेजों में नेतृत्व की शिक्षा मिलनी चाहिए? (Should leadership education be provided in schools and colleges?)
(9.)नेतृत्व कितने प्रकार के होते हैं? आपको कौन-सा नेतृत्व पसन्द है? और क्यों? (What are the types of leadership? Which leadership do you like? And why?)
(10.) क्या आज के अधिकांश लोग राजनैतिक नेता का अनुकरण करते हैं? क्या आज के युवाओं को राजनैतिक नेतृत्व का अनुसरण करना चाहिए? यहि हाँ तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों नहीं? (Do most of today’s people emulate a political leader? Should today’s youth follow political leadership? If so, why? If not, why not?) - (C)राजनैतिक नेतृत्व से सम्बन्धित वास्तविक दिग्दर्शन (Real Directions Related to Political Leadership):
- (1.) राजनैतिक नेतृत्व की भूमिका (The Role of Political Leadership)
(2.) नेतृत्व की परम्परावादी विचारधारा (Traditionalist Ideology of Leadership)
(3.) स्वाधीनता संघर्ष के दौरान करिश्माई व्यक्तित्व (Charismatic personality during the freedom struggle)
(4.) स्वतन्त्रता के बाद राजनैतिक नेतृत्व (Post Independence Political Leadership
(5.) सामजिक नियन्त्रण और नेतृत्व (Social Control and Leadership)
(6.)भारतीय राजनीति में प्लेबाॅय राजनीतिज्ञ (Playboy Politician in Indian Politics
(7.)राजनैतिक नेतृत्व का निष्कर्ष (Conclusion of the political leadership)
उपर्युक्त आर्टिकल में भारत में करिश्माई राजनीतिक नेताओं के 9 लक्षण: और आप उनसे क्या सीख सकते हैं (9 Traits of Charismatic Political Leaders in India: And What You Can Learn From Them) के बारे में विस्तार और गहराई समझाया गया है। - ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
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10.राजनेता को छात्र ने उसका असली चेहरा दिखाया (हास्य-व्यंग्य) (The student showed the politician his real face) (humor-sarcasm):
- नेता (टीचर से):श्रीमन मैं चुनावों में खड़ा हो रहा हूँ।मुझे वोट दीजिए।
- नेता ने टीचर के मस्का लगाया :आप तो एक संत प्रकृति के व्यक्ति है।मुझे भगवान के बाद आप पर ही भरोसा है।मैं न्याय के मन्दिर के चरणों में पड़ा हूँ।
- टीचर (नेता से) : पर आपने गाँव में पिछली बार कोई विकास कार्य नहीं करवाया।
- नेताःमुझे विपक्षी पार्टी वाले काम ही नहीं करने देते है।
- टीचरःपरन्तु आपके घर के सामने रोड़ या पक्का रास्ता नहीं बनवा सके।आपके सामने कचरा फैला हुआ हैं,उधर से निकलना मुश्किल है।
- नेता (कुटिल हँसी के साथ):आप चिन्ता मत करें,इस बार मैं काम जरूर करवाऊँगा।
और उसके बाद नेता छात्र-छात्राओं को लच्छेदार भाषण से मुग्ध कर देता है। - नेता (छात्र-छात्राओं से) :बोलो मुझे भाषण देना और बोलना आता है या नहीं।
- एक छात्रा (व्यंग्यपूर्वक): नेताजी भाषणों से गाँव का विकास हो जाएगा क्या? अपना घर भरने (नोटो की गड्डियों) के अलावा आपको और कुछ नजर ही नहीं आता है।
- नेता (अपनी चाल बदली): देखों मैं आपके शिक्षण संस्थान में काफी कुछ सुख-सुविधाएँ जुटा दूंगा।चुनावों से पहले ही कुछ काम करवा देता है।
- छात्र-छात्राएँ : चुनाव के बाद नेताजी ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग गायब हैं।
नेताजी हाय-हाय,नेताजी मुर्दाबाद।खुद का विकास होता नहीं,चले हैं हमारा विकास करने।
11.भारत में करिश्माई राजनीतिक नेताओं के 9 लक्षण: और आप उनसे क्या सीख सकते हैं (Frequently Asked Questions Related to 9 Traits of Charismatic Political Leaders in India: And What You Can Learn From Them) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.क्या नेतृत्व का गुण जन्मजात होता है? (Is leadership innate traits?):
उत्तर:नेतृत्व का गुण जन्मजात भी होता है परन्तु उसे प्रशिक्षण और अभ्यास से विकसित किया जा सकता है। जिनमें जन्मजात गुण नहीं होता है इसे अर्जित भी कर सकते हैं।
प्रश्न:2.विद्यार्थी राजनैतिक नेतृत्व से क्या सीख सकते हैं? (What can students learn from political leadership?):
उत्तर:जाॅब में टीम का नेतृत्व करना हो या किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ना हो,हर कहीं विद्यार्थी को नेतृत्व करने की आवश्यकता होती हैं अतः उन्हें विद्यार्थी काल से ही नेतृत्व के गुणों को विकसित करना चाहिए।
प्रश्न:3.विद्यार्थी नेतृत्व के गुण कैसे विकसित कर सकता है? (How can a student develop leadership qualities?):
उत्तर:विद्यार्थी काल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों,महापुरुषों की जयन्तियों,क्रिकेट टीम,फुटबॉल टीम का नेतृत्व,स्वतंत्रता दिवस,गणतन्त्र दिवस,वार्षिकोत्सव आदि अनेक ऐसे अवसर आते हैं,उन अवसरों का लाभ उठाना चाहिए।कोई न कोई भूमिका निभानी चाहिए,इन अवसरों पर बोलना चाहिए।इसके अलावा आजकल प्रोफेशनल कोचिंग सेंटर्स भी होते हैं जहाँ नेतृत्व का गुण विकसित किया जा सकता है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा भारत में करिश्माई राजनीतिक नेताओं के 9 लक्षण: और आप उनसे क्या सीख सकते हैं (9 Traits of Charismatic Political Leaders in India: And What You Can Learn From Them) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*











