Ad-hocism is Stunting India’s Growth
1.तदर्थवाद भारत के विकास को रोक रहा है (Ad-hocism is Stunting India’s Growth):
- तदर्थवाद भारत के विकास को रोक रहा है (Ad-hocism is Stunting India’s Growth) तदर्थवाद (Adhocism),के द्वारा जानिए कि भारत का विकास कैसे प्रभावित हो रहा है? किन-किन फैसलों में तदर्थवाद की प्रक्रिया विकास को प्रभावित करती है? क्या सभी मामलों में तदर्थवाद बुरा है? आदि सम्पूर्ण डिटेल।
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2.भारत में तदर्थवाद के उदाहरण और अर्थ (Examples and Meanings of Ad-hocism in India):
- तदर्थवाद (Adhocism) यथास्थिति बनाए रखने या कामचलाऊ व्यवस्था की एक ऐसी विवशता है जो समस्याओं के निराकरण के लिए सुविचारित रणनीति तथा त्वरित निर्णयशक्ति (Well-thought-out strategy and quick decision-making) के अभाव में उत्पन्न होती है।सीधे सरल शब्दों में इसे इस तरह स्पष्ट किया जा सकता है कि राजनीतिक सूझ-बूझ और इच्छाशक्ति की कमी के कारण विपरीत स्थितियों पर नियंत्रण प्राप्त करने के सार्थक प्रयत्नों की जगह समस्या को अनिर्णय की स्थिति में लटकाए रखना ही तदर्थवाद है।
- यह समूची प्रक्रिया नेतृत्व की किंकर्तव्यविमूढ़ता तो प्रदर्शित करती ही है;उसकी अक्षमता और अकर्मण्यता की पोल भी खोलती है।यह ऐसी निराशावादी और पुरातनपंथी सोच (conservative thought) को प्रोत्साहित करता है जिसमें जो जहाँ है,जैसा है और जिस अवस्था में है उसमें किसी सुधार या बदलाव का खतरा उठाने की कोई गुंजाइश नहीं है।
- यहाँ यह स्पष्ट कर देना युक्तिसंगत होगा कि प्रतिक्षण परिवर्तनशील आधुनिक विश्व में एक बँधी-बँधाई लीक पर चलते रहना राष्ट्र की अस्मिता,अखंडता और प्रगति के लिए अंततोगत्वा घातक (fatal) सिद्ध होगा।
- पिछले समय में हम इसके अनेक उदाहरण देख चुके हैं।जैसे:चाहे वह राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद हो,असम-पंजाब और कश्मीर की विशुद्ध राजनीतिक समस्याएँ हों,निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता,शाहबानो प्रकरण या ऐसे ही दूसरे आंतरिक विवाद हों अथवा क्रायोजेनिक इंजन मसला,पाकिस्तान और चीन से सीमा विवाद,अमरीका और रूस से सम्बन्धों में प्राथमिकता के आधार पर निर्गुट नीति का पुनरीक्षण जैसे बाहरी मसले हों।
- वर्तमान समय के उदाहरण:परमानेंट स्टाफ के बजाय टेम्परेरी/काॅन्ट्रेक्ट पर टीचर रखना या मजबूत क्लाइमेट-रेजिलिएंट शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के बजाय मानसून सीजन से पहले जल्दी,कामचलाऊ सड़कें बनाना।
- हर अवसर पर शीर्ष नेतृत्व और सरकारी मशीनरी (Government machinery indecisive) अनिर्णय और यथास्थितिवादी प्रवृत्ति के कारण असमंजस और ऊहापोह की स्थिति से गुजरती नजर आती है।
- यदि भारत के वर्तमान संदर्भ में कहा जाए तो पॉलिटिकल,सोशल या एडमिनिस्ट्रेटिव शब्दों में,एडहॉकिज़्म का मतलब है समस्याओं से वैसे ही निपटना जैसे वे होती हैं,लॉन्ग-टर्म प्लानिंग के बजाय टेम्पररी तरीकों का इस्तेमाल करना।
- भारत में,लोग अक्सर बोलचाल की भाषा में इस रवैये को “जुगाड़” (Juggad) या इमरजेंसी मैनेजमेंट (Emergency Management) कहते हैं।भारत को “टेम्पररी तरीकों (एडहॉकिज़्म)” से “स्ट्रक्चर्ड,लॉन्ग-टर्म विज़न” (जैसे नेशनल हाईवे का विस्तार,डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉन्ग-टर्म एजुकेशनल पॉलिसी) की ओर बढ़ना चाहिए।
3.तदर्थवाद कोढ़ में खाज के समान (Ad-hoc is like an itch in a leprosy):

Temporary women officers stood silently in the meeting and this Ad-hocism is Stunting India’s Growth
- तदर्थवादी विचारधारा से प्रभावित निर्णय त्वरित गति और सही समय पर क्रियान्वयन न होने के कारण संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाते।यही कारण है कि कभी-कभी सही दिशा में एक कदम आगे अग्रसर राष्ट्र दो कदम पीछे हटने की मुद्रा में नजर आता है।पिछले समय अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक रंगमंच पर कश्मीर समस्या को एक बहुपक्षीय विवाद का रूप देने में पाकिस्तान को मिली नाकामी यद्यपि भारतीय राजनयिकों की सफल कूटनीति का प्रमाण है,तथापि इस अवसर को सही तरीके से भुनाया नहीं जा सका।
- यदि इस अवसर पर थोडे से राजनीतिक साहस का प्रयोग कर इस दिशा में कोई सार्थक पहल की जाती तो कश्मीर के जिन्न को सदैव के लिए बोतल में बंद किया जा सकता था।ठीक इसी तरह,अयोध्या विवाद भी तदर्थवादी मानसिकता के कारण ही सम्पूर्ण राष्ट्र के गले में फाँस की तरह चुभ रहा था जिसका अब जाकर निराकरण हुआ है।
- एक ऐसे राष्ट्र में जहाँ रोजी-रोटी,शिक्षा और स्वास्थ्य (Daily food,Education and health) जैसी प्राथमिकताएँ गौण हैं वहाँ धर्म जैसी विलासिता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।दुर्भाग्यवश स्थिति इसके विपरीत है।आज जब हिन्दू और मुसलमान आर्थिक मोर्चे पर एक ही कोटि की जद्दोजहद का सामना कर रहे हैं,दोनों धर्मों के अधिकांश अनुयायियों के लिए इस विवाद की कोई अहमियत नहीं है।फिर इस दिशा में कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जाना समझौते की राजनीति (Politics of accord) का एक अंग है।
- आखिर एक लम्बे अरसे से लटकाए रखी गई इस समस्या का दुष्प्रभाव सम्पूर्ण राष्ट्र को ही भोगना पड़ रहा है।इस निरर्थक विवाद में नष्ट होने वाला प्रत्येक जीवन और बहुमूल्य संसाधन तदर्थवाद की वेदी पर चढ़ाया गया बलिदान ही तो है।
- भारत या अन्य किसी भी विकासशील राष्ट्र के लिए तदर्थवाद कोढ़ में खाज के समान (Ad-hocism is an itch in the leprosy) है।ऐसी मानसिकता न सिर्फ निर्णयों की तीव्रता को प्रभावित करती है,अपितु उस पर दृढ़ रहने की क्षमता को भी क्षति पहुँचाती है।कुछ वर्षों पूर्व कर्नाटक राज्य की निरपराध और निरीह जनता इसके दुष्परिणाम भुगत चुकी है।केन्द्र सरकार द्वारा अविवेकपूर्ण निर्णय लेकर कन्नड़-उर्दू विवाद को हवा दी गई और इसका खामियाजा राज्य की निर्दोष जनता को भुगतना पड़ा।और इस सम्पूर्ण प्रकरण की विडम्बना तो देखिए कि तकनीकी कारणों (?) से दूरदर्शन (या केन्द्र सरकार ने?) ने उर्दू समाचार प्रसारण को अनिश्चित काल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया।इस प्रक्रिया में शारीरिक,भावनात्मक या आर्थिक रूप से आहत हुए लोगों की हानि की जिम्मेवारी सरकार या सरकारी मशीनरी के तदर्थवादी सोच पर ही डाली जा सकती है।
- यह कोई पहला या आखिरी वाकया नहीं जिसकी कीमत हमारे देश को चुकानी पड़ी।बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण इसी श्रृंखला की एक पुरानी कड़ी है।एक सभ्य समाज में ऐसी मिसाल शायद ही मिलेगी कि संविधान में उल्लिखित समानता के अधिकार पर मजहबी कठमुल्लेपन (Religious fundamentalism) को तरजीह दी गई।न्यायसम्मत पक्ष होने पर भी शाहबानो को हारना पड़ा और उसके साथ हारना पड़ा दबी-कुचली करोड़ों सताई गई औरतों को।
- यह तदर्थवाद का घातक परिणाम है कि इस देश में न्याय की एकरूपता की बात तो जोर-शोर से होती है,लेकिन लागू होता है मुसलमानों के लिए शरीयत और हिन्दुओं के लिए हिन्दू मैरिज एक्ट।इस पूरे विवाद में सरकार का नर्म और अत्यधिक लचीला रवैया आज भी देश की छवि को एक दाग की तरह बदनुमा बना रहा है।
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4.तदर्थवाद के कारण कई समस्याएं खड़ी (Many problems arose due to ad-hocism):
- तदर्थवाद की समस्या पर गहराई से सोचने पर हमें एक निहायत अनूठी चीज देखने के लिए मिलती है।चुनाव आयोग के निवर्तमान विवादास्पद मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी. एन. शेषन ने माया पाक्षिक को उस समय एक इंटरव्यू में इस चीज की चर्चा की थी।उनके अनुसार सभी राजनीतिक दलों (भाजपा को छोड़कर) में यह प्रवृत्ति बनी हुई है।एक दशकों से अधिक समय से इन दलों में ढाँचागत चुनाव नहीं हुए हैं।परिणामतः युवा नेतृत्व को सही अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।तदर्थवाद के तहत मनोनयन की राजनीति के कारण हावी अव्यावहारिक बूढ़े तदर्थवादियों (Impractical old ad-hocists) के हाथ में शासन सूत्र होने के कारण राष्ट्र की प्रगति संतोषजनक नहीं दिखाई देती है।
- असम,कश्मीर और पंजाब की अलगाववादी प्रवृत्ति या दक्षिणी राज्यों की भाषा समस्या के मूल में भी यही प्रवृत्ति रही है।तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा तत्कालीन परिस्थितियों में दलगत हितों के सामने राष्ट्रहित को तिलांजलि दिए जाने से ही ये समस्याएँ राष्ट्र के लिए नासूर बन गई है।
यदि इन समस्याओं का निदान समय रहते ढूँढ लिया जाता और वह ऊर्जा कल्याणकारी कार्यक्रमों में लगती तो शायद तस्वीर कुछ और होती,किन्तु ऐसा सम्भव कैसे होता? जिस राष्ट्र के नायकों की नजर राष्ट्रभाषा की उन्नति की तरफ नहीं जाती वहाँ आधी सदी के बाद भी एक विदेशी भाषा के प्रभुत्व में आश्चर्य कैसा? इस दिशा में यथास्थितिवादी मनोवृत्ति के कारण प्राप्ति ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली बात रही है। - आंतरिक मामलों से सर्वथा भिन्न विदेशी सम्बन्धों में भी स्थिति कमोबेस एकसी ही है।पंडित नेहरू के तदर्थवादी आदर्शवाद पर आधारित नीतियों के शव को ढोए जाने से देश घातक दुष्परिणाम उठाने पड़े हैं।आज की एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था में जहाँ शत्रु और मित्र की पहचान स्वार्थ और तात्कालिक आवश्यकताएँ तय करती हैं वहाँ जर्जर रूस की मैत्री में क्रायोजनिक मशीन प्रकरण (Cryogenic machine case) की तरह ही मुँह की खानी पड़ेगी।इसकी जगह हमें जापान,इजराइल और अमरीकी मित्रता को प्राथमिकता देनी होगी।अन्यथा परमाणु अप्रसार,मानवाधिकार या कश्मीर जैसे मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव का सामना करते रहना पड़ेगा।अपनी सामयिक आवश्यकताओं को परे रखकर तदर्थवादी नीतियों के अनुगमन से राष्ट्र को जो क्षति उठानी पड़ी है उससे यह सीख मिलती है कि तदर्थवाद राष्ट्र के हित में नहीं है।
- उपर्युक्त सारी विवेचना के बाद सरलता से कहा जा सकता है कि समूची व्यवस्था,शीर्ष नेतृत्व और सरकारी अमले की तदर्थवाद से संचालित नीति,अनिर्णय की प्रवृत्ति और क्रियान्वयन की कच्छप गति राष्ट्र की छवि पर कलंक और राष्ट्रवासियों की प्रगति में बाधक है।
5.भारत में तदर्थवाद के चिन्तन बिन्दु और सुझाव (Reflections and Suggestions of Ad-hocism in India):
- (1.)संस्थागत कमजोरी (Institutional Weakness):
तर्क:तदर्थ प्रमुख या अस्थायी विकल्प पर नियुक्त व्यक्ति बड़े और दीर्घावधि (long-term) फैसले लेने से डरते हैं।उन्हें लगता है कि उनका कार्यकाल अस्थायी है,इसलिए वो बड़े सुधार या नए बदलाव शुरू नहीं करते। - (2.)शिक्षा और अनुसंधान पर प्रभाव (Impact on Education & Research):
शैक्षिक परिप्रेक्ष्य:जब स्कूलों और विश्वविद्यालयों में स्थायी संकाय (faculty) के बजाय सालों-साल तदर्थ या अतिथि शिक्षक (guest teacher) पढ़ाते हैं,तो उनमें नौकरी की सुरक्षा न होने के कारण तनाव रहता है।इसका सीधा असर पढ़ाई की गुणवत्ता और शोध पर पड़ता है।छात्र का निष्पक्ष विकास नहीं हो पाता। - (3.)आर्थिक अक्षमता एवं प्रतिभा पलायन (Economic Inefficiency & Brain Drain):
तर्क:संविदा नौकरियों में प्रतिभा को सही पैसा और सम्मान नहीं मिलता।इस देश के बेहतर दिमाग (डॉक्टर,इंजीनियर,शोधकर्ता) विदेश चले जाते हैं (Brain Drain),जिसे भारत की ग्रोथ को सीधा नुक्सान होता है। - (4.)जवाबदेही का अभाव (Lack of Accountability):
तर्क:अस्थायी व्यवस्था में कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता।अगर कोई नीति विफल होती है,तो तदर्थ कर्मचारियों पर दोष डाल दिया जाता है,जिससे व्यवस्था में सुधार नहीं हो पाता। - (5.)आगे का रास्ता/समाधान (The Path Forward/Solutions):
स्थायी नियुक्तियाँ:सभी मुख्य संस्थानों और शैक्षणिक संस्थानों में समय पर स्थायी भर्तियाँ होनी चाहिए।
विज़न 2050 (दीर्घकालिक नीति):नीतियाँ सरकार बदलने के हिसाब से नहीं,बल्कि देश के 25-30 साल के विज़न के हिसाब से स्थिर होनी चाहिए।
तदर्थवाद पर योग्यता:तदर्थ नियुक्तियों में पारदर्शी (transparent) नियम हो,ताकी राजनीतिक हस्तक्षेप कम हो सके। - (6.)सारांश (Summary):
भारत को अगर एक वैश्विक महाशक्ति बनना है,तो हमें ‘जुगाड़ और तदर्थवाद’ की संस्कृति से निकल कर ‘स्थिरता और स्थायित्व’ (Sustainability aur Permanence) की तरफ बढ़ना होगा।स्थायी निवारण ही स्थायी विकास की चाभी है।
6.भारत में तदर्थवाद का निष्कर्ष (Conclusion of Ad-hocism in India):
- राष्ट्रहित हित में,राष्ट्र के विकास के लिए कुछ कठोर निर्णय भी लेने पड़ते हैं।लेकिन कठोर निर्णय के लिए शासक वर्ग बल्कि आमजन भी इसके लिए जिम्मेदार होता है।आमजन थोड़ी-सी समस्या उपस्थित होने पर सरकार के खिलाफ हो जाता है।
- जैसे तीन तलाक पर सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के हक में कानून बनाया तो जनता ही उसके विरोध में सड़क पर उतर गई।इसी प्रकार कश्मीर को विशेष दर्जा वाली धारा 370 को हटाने पर सरकार के खिलाफ आन्दोलन हुआ।इस प्रकार कठोर निर्णय लेने से पहले हर सरकार कई बार सोचती है।सरकार सत्ता क्यों गंवाना चाहेगी।राष्ट्र के हित (In the interest of the nation) में आमजन को त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए।सरकार की नीयत और मंशा ठीक हो और जनता भी अपने कर्त्तव्यों को समझे तभी तदर्थवाद की स्थिति खत्म हो सकती है।
- एक अकेली सरकार कुछ नहीं कर सकती है।जनता की ताकत के बल पर ही वह अच्छे बदलाव कर सकती है। लेकिन जिस प्रकार जनता की सोच और समझ बँटी हुई होती है उसी प्रकार राजनीतिक दलो की सोच और समझ एक सी नहीं हैं (Thinking and understanding are not the same)।एक राजनीतिक दल कोई नीति या कानून लागू करता है तो दूसरे राजनीतिक दल के सत्ता में आते ही उसे बदल दिया जाता है।इसलिए ज्यादातर राजनीतिक दल यथास्थिति (तदर्थवाद) की नीति को अपनाते है जिससे राष्ट्र की प्रगति रूक जाती है।अथवा राजकीनित दलों में आपस में इतना विरोध होता है कि सिरफुटोव्वल वाली स्थिति पैदा हो जाती है।यदि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सत्ताधारी दल काम करे तो ही राष्ट्र की उन्नति सम्भव है।
- आम जनता भी अपने स्वार्थ में अन्धी न होकर राष्ट्रहित के लिए हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहे तभी बात बनेगी।सत्ताधारी दल और आम जनता में आपसी तालमेल हो,वैचारिक समानता हो तभी राष्ट्र की चहुँमुखी उन्नति सम्भव है।
- यदि सत्ताधारी दल जनता को लुभाने के लिए पाकिस्तान के विरोध में ऐसा स्टेटमेंट दे दे कि कि हम घास की रोटियाँ खा लेंगे लेंगे परन्तु पाकिस्तान के सामने घुटने नहीं टेगेंगे।जनता को इस तरह के भावुक स्टेटमेंट से सामान्यजन को तो बरगलाया जा सकता है लेकिन प्रबुद्ध वर्ग को नहीं बहालाया-फुसलाया जा सकता है। इसके प्रत्युत्तर में प्रबुद्ध वर्ग के लोग ऐसे स्टेटमेन्ट भी दे सकते हैं कि शासन वर्ग के नेता (Leaders of the ruling class) पहले घास की रोटियाँ खाकर बतायें।भारत की आम जनता भी अब इतनी परिपक्व हो चुकी है कि राजनेताओं की मंशा को जान-समझ लेती है और उसके अनुसार ही आचरण करती है।लब्बोलुआब यह है कि जनता के बजाय शासक वर्ग को ज्यादा त्याग और समर्पण करने की आवश्यकता है तभी जनता उनसे सीख लेगी।’यथा राजा तथा प्रजा’ वाली कहावत चरितार्थ होती है।नेतृत्व करने वाले ही भ्रष्ट,आचरणहीत हों तो जनता से अच्छे आचरण,सद्व्यवहार की आशा नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त आर्टिकल में तदर्थवाद भारत के विकास को रोक रहा है (Ad-hocism is Stunting India’s Growth) के बारे में विस्तृत रूप से बताया गया है। - ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
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7.तेल की बचत (हास्य-व्यंग्य) (Oil Saving) (Humour-Satire):
- नेता (जनता से):देश पर तेल संकट छाया छाया हुआ हुआ है।सभी लोग एक टाईम चूल्हे पर रोटी बनाओ।
- एक व्यक्ति:श्रीमन क्या आप भी एक समय चूल्हे पर रोटी पकाकर खाएँगे,नेता की बत्ती गुल हो गई।
8.तदर्थवाद भारत के विकास को रोक रहा है (Ad-hocism is Stunting India’s Growth) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.सरल शब्दों में तदर्थ का क्या अर्थ है? (What is the meaning of Ad-hoc in simple terms?):
उत्तर:तदर्थ एक लैटिन शब्द है जिसका मतलब होता है “इस खास मकसद के लिए,केवल इस उद्देश्य के लिए” (किसी विशिष्ट कार्य के लिए अस्थायी व्यवस्था)।
प्रश्न:2.एडहॉकिज्म का सीधा मतलब क्या है? (What is the literal meaning of Adhocism?):
उत्तर:तदर्थवाद मैनेजमेंट या फैसले लेने के एक ऐसे स्टाइल को कहते हैं जहाँ पहले से तय,परमानेंट स्ट्रेटजी को फाॅलो करने के बजाय,तुरन्त होने वाली समस्या के के लिए टेम्पररी या खास तौर पर साॅल्यूशन बनाए जाते है।
प्रश्न:3.रोजाना के एडमिनिस्ट्रेशन में एक एडहॉक फैसले का एक उदाहरण क्या है? (What is an example of an adhoc decision in daily administrasim?):
उत्तर:अचानक आए संकट को हल करने के लिए एक अंतरिम कमेटी बनाना या परमानेंट इंस्टीट्यूशनल भूमिका निभाने के बजाय 6 महीने के प्रोजेक्ट के लिए कांट्रैक्ट पर स्टाफ रखना,एडहाॅक फैसलों के क्लासिक उदाहरण हैं।
प्रश्न:4.क्या भारत जैसे डवलपिंग देश के लिए एडहाॅकिज्म पूरी तरह से बुरा है? (Is Ad-hocism Completely Bad for a Doveloping Nation Like India?):
उत्तर:हमेशा नहीं।हालांकि स्टेबल ग्रोथ के लिए लम्बे समय की सिस्टेमेटिक प्लानिंग जरूरी है,लेकिन एडहाॅक फैसले (जल्दी से लिए गए उपाय) अचानक आने वाले संकटों या इमर्जेंसी को अच्छे से सम्भालने के लिए जरूरी फ्लेक्सिबिलिटी और स्पीड देते हैं।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा तदर्थवाद भारत के विकास को रोक रहा है (Ad-hocism is Stunting India’s Growth) की बेसिक टर्म्स के बारे में जानकारी दी गई है।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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Lekhak Ke Baare Mein (About the Author) **Satyam Narain Kumawat** **Website Name:Satyam Mathematics** *Owner:satyamcoachingcentre.in* *Sthan:Manoharpur,Jaipur (Rajasthan)* **Teaching Mathematics aur Anya Anubhav** ***Shiksha:**B.sc.,B.Ed.,(M.sc. star Ke Mathematics Ko Padhane ka Anubhav),B.com.,M.com. Ke vishayon Ko Padhane ka Anubhav,Philosophy,Psychology,Religious,sanskriti Mein Gahri Ruchi aur Adhyayan ***Anubhav:**phichale 23 varshon se M.sc.,M.com.,Angreji aur Vigyan Vishayon Mein Shikshaka Ka Lamba Anubhav ***Visheshagyata:*Maths,Adhyatma (spiritual),Yog vishayon ka vistrit Gyan* ****In Brief:I have read about M.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 23 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science. Updated on 18.06.2026









