Children Affected by Technology:9 Top Tips to Know Side Effects of Technology
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1.बच्चे तकनीकी से दुष्प्रभावित:तकनीकी के दुष्प्रभाव को जानने के 9 टॉप टिप्स (Children Affected by Technology:9 Top Tips to Know Side Effects of Technology):
- बच्चे तकनीकी से दुष्प्रभावित (Children Affected by Technology) होते जा रहे हैं।जानिए कैसे बच्चों पर तकनीकी का दुष्प्रभाव हो रहा है? कैसे उनकी जीवनशैली बिल्कुल बदलती जा रही है? कैसे-कैसे टीवी और सोशल मीडिया हथकण्डे अपनाते जा रहे हैं?
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2.बच्चे तकनीकी से दुष्प्रभावित (Children Affected by Technology):
(1.)बचपन से अनेक बातें छिनी (Many things were taken away from childhood):
- जब बात नई पीढ़ी के बच्चों की करें तो हम सभी को अपना बचपन याद आता है।कैसे हम पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा खेलते भी थे,मनोरंजन का समय भी निकल आता था,अपने बाबा,पिता,दादी,माँ के साथ बैठकर उनसे किस्से-कहानियाँ भी सुन लेते थे।
हम लोग भी इतने बूढ़े नहीं हुए कि हम साठ-सत्तर वर्ष पुरानी बात कह रहे हों।अभी तीस से पचास वर्ष पूर्व तक भी घरों में यही वातावरण रहा करता था।संयुक्त कुटुंब प्रथा थी।पिताजी का ट्रांसफर के कारण स्थान बदल भी जाता था तो जो नए स्थान पर मिलते थे,वे मार्गदर्शक से कम नहीं होते थे एवं दोस्त ढेरों की संख्या में हुआ करते थे। - न जाने क्या समय की मार पड़ी आज की नई पीढ़ी पर कि एक तरफ तो भारी बस्ते का बोझ पीठ पर आ गया,तो दूसरे घर में हमारा एक दुश्मन रंगीन लबादे में प्रवेश कर गया।पहले मात्र दूरदर्शन की खबरें व कृषिदर्शन दिखाने वाला यह बुद्धू बक्सा वास्तव में हमीं को बुद्धू एवं हमारी नई पीढ़ी को आकर्षक दाँव-पेच दिखाने-सिखाने वाला एक नया ट्यूटर बनकर आ गया है।इसने बच्चों से उनका बचपना छीन लिया है।
(2.)तकनीकी के गुलाम बच्चे (Enslaved children of technology):
- एक नहीं,दस नहीं,आज तीन सौ से ज्यादा चैनल उपलब्ध हैं,जिन्हें बच्चे देख सकते हैं।इनके अलावा आज के ‘ई-जेनरेशन’ (इलेक्ट्रॉनिक पीढ़ी) (Electronic Generation) वाले बच्चे मोबाइल फोन,कंप्यूटर्स,वीडियोगेम्स आदि के कारण ऐसे शिकंजे में फँस गए हैं कि उन्हें अकेलापन ही अब सुहाता है। बच्चे अब एक तरह से नई टेक्नोलॉजी के गुलाम हो गए हैं।उन्हें टाइम ही नहीं कि वे अपने नाना नानी,दादा-दादी के पास बैठकर दो पल गुजारें।प्रत्येक शहर,कस्बे,मुहल्ले की यही स्थिति है।
- न वे शिक्षाप्रद कहानियाँ नजर आती हैं और न वे बच्चों के खिलौने।अब बच्चे गुड्डे-गुड़ियों के खेल से भी दूर चले गए हैं।ऐसा कहा जाए कि बच्चे हाइटेक (High-Tech Childers) हो गए हैं तो कोई अत्युक्ति न होगी।जब माँ-बाप सभी नई टेक्नोलॉजी से चिपक गए हैं तो लाजमी है कि बच्चे भी ऐसा ही करेंगे।
घर आजकल ऑफिस में तब्दील हो गए हैं तो बच्चे भी अब नए शौक,नई तकनीकी पर हाथ चलाने के रूप में,अपनाने लगे हैं।वह भी उस उम्र में जिसे हम खेलने-खाने की उम्र कहते रहे हैं।
(3.)भावनात्मक विकास कुंद (Emotional development blunt):
- बच्चों का प्यारा सा बचपन आज कहीं खो सा गया है।कहानियाँ और लोरियाँ गायब हो गई हैं और रह गया है सेलफोन,कंप्यूटर,वीडियोगेम (Vediogame),कार्टून शो आदि आदि।इनसे सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि बच्चे समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं।देखने में वे भले ही छोटे लगें,लेकिन दिमाग की दृष्टि से अब वे ज्यादा शार्प,ज्यादा कुटिल,ज्यादा षड्यंत्री (More conspiratorial) बनते जा रहे हैं।
जो टी० वी० में देखते हैं,उसी को वास्तविक जिंदगी में अपनाने का उनका मन करता है।मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे बच्चों का विकास रुक जाता है एवं उन्हें शरीर व मन,दोनों ही स्तरों पर अच्छा-खासा संघर्ष करना पड़ता है।कभी-कभी भटकाव के रूप में इसके बड़े गलत प्रभाव देखने में आते हैं। - टेक्नोलॉजी ने बच्चों की कोमल संवेदनाओं को समाप्त कर दिया है।टेक्नोलॉजी को यदि डकैत कहा जाए तो वास्तव में उसने बच्चों की मासूमियत चुरा ली है।उनकी जिंदगी मशीन जैसी (Life is like a machine) बन गई है।कई तरह के अपराध अब बच्चों द्वारा होने लगे हैं।टीन एज में ही एक बच्चा अपने सहपाठी को पिता की पिस्तौल से मार दे,यह घटना हमने कभी सोची भी नहीं थी,पर अब ऐसा होने लगा है।सेक्स की ओर उनकी इच्छाएँ उम्र से पहले हावी होने लगी हैं एवं इनकी पूर्ति हेतु कई चैनल्स एवं इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी (pornography on Internet) का उपलब्ध होना एक खतरनाक संकेत है।
- कुछ घटनाएँ भी ऐसी घटी हैं,जिनसे लगता है कि यदि समय पर इन्हें सँभाला नहीं गया तो कुछ का कुछ हो सकता है।इंटरनेट ने जहाँ सूचनाओं व शिक्षा का एक विस्फोट किया है,वहाँ यह नुकसान भी पहुँचाया है कि इस पर किसी की रोक-थाम नहीं है।
(4.)’रिएलिटी शो’ नहीं शोषण शो है (It’s not a reality show,it’s an exploitation show):
- दूसरा खतरनाक प्रचलन आज हो गया है’रिएलिटी शो’। इस शो के नाम पर एस०एम०एस० के जरिए हर आदमी की जेब से बूंद-बूंद कर धन निकालकर कंपनियाँ मालामाल हो रही हैं।बच्चों के संगीत व नृत्य के कार्यक्रम अब बड़ों के कार्यक्रमों की तर्ज पर कई चैनल्स में होने लगे हैं।कमाई के इस जाल में,बाजारवाद के इस खेल में ‘प्रतिभा विकास’ (Talent Development) की बात होती तो समझ में भी आती,पर जब बच्चों की प्रतिभा का बाजारीकरण होने लगता है एवं उनकी संघर्षात्मक प्रतिद्वंद्विता होने लगती है,तब असफल होने वाले बच्चे किस तरह कुंठित होते हैं,यह बात समाज के अग्रणी नेताओं को समझ में क्यों नहीं आती ?
- अब तो आत्महत्याओं के इतने मामले,सीजोफ्रेनिया-अवसाद के ऐसे-ऐसे केस सामने आ रहे हैं कि प्रश्न उठने लगा है कि हम अपने बच्चों को कहाँ ले जा रहे हैं? कच्ची और कम उम्र में बड़ी बड़ी पुरस्कार राशियों के साथ उत्तेजक नृत्य-अभिनय (Provocative dance-acting) छोटे बच्चों से कराना कहाँ तक न्यायसंगत है,यह सोचा जाना चाहिए।इसमें वे महत्त्वाकांक्षी माता पिता भी उतने ही अपराधी हैं,जो अपने बच्चों को किसी भी कीमत पर टी० वी० पर देखना चाहते हैं।वस्तुतः ये कार्यक्रम बच्चों की संवेदनाओं की हत्या करने वाले कार्यक्रम हैं।
(5.)सुनियोजित षड्यंत्र (Well-planned conspiracy):
- पिछले दिनों एक प्रतियोगी कार्यक्रम में निर्णायकों की फटकार ने एक बच्चे को अस्पताल तक पहुँचा दिया है।बाल आयोग भी इस स्थिति पर चिंता जता चुका है।वास्तव में आज ‘बचपन’ (childhood) बाजार में नीलाम (Auction in the market) हो रहा है।बच्चे हॉस्टल जाने से मना कर देते हैं,क्योंकि टी० वी० चैनल ‘रिएलिटी शो’ का टेस्ट लेने के लिए पहुँच जाते हैं।
- ये बातें हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि संगीत-क्षेत्र में उचित शिक्षा की व्यवस्था करनी ही होगी,नहीं तो ये चैनल्स उसे फिर भटकाएँगे।मुंबई और पुणे में तो यह जगविख्यात तथ्य है कि इन टी० वी० कार्यक्रमों (TV programmes) में प्रवेश में प्रशिक्षण (पहले से गाए गीतों पर नृत्य:कमर मटकाना,भाव आदि दिखाना) हेतु संगीत-नृत्य के स्कूल घर-घर खुले हुए हैं और लोग-बाग मोटी रकम कमा रहे हैं।नवधनाढ्य माँ-बाप यह रकम खुशी-खुशी खरच करते हैं,अपने ईगो की संतुष्टि के लिए,सामाजिक सम्मान मिलने की स्थिति देखते हुए।
(6.)कोमल मन को आहत न करें (Don’t hurt the common mind):
- बच्चों के स्वस्थ विकास (Healthy development of children) के लिए प्रतियोगिताएँ और विभिन्न प्रकार की प्रतिस्पर्द्धाएँ जरूरी हैं,पर ये वहीं तक सही हैं,जहाँ उनकी बौद्धिक कलात्मक क्षमता का सही मूल्यांकन होता हो एवं हमारी संस्कृति की गरिमा के अनुरूप हो।किसी को प्रथम,द्वितीय,तृतीय के आधार पर भी आहत नहीं किया जाना चाहिए,विशेषकर बहुत छोटी उम्र में-कम से कम दस वर्ष तक।
- किसी और के गाए गीत पर कमर मटकाकर फिल्मी ढंग से जैसा प्रस्तुतीकरण किया गया था,वैसा ही जब छोटे बच्चों से कराया जाता है तो लगता है,हम उनकी मानसिकता से खिलवाड़ (Messing with the mentality) ही नहीं कर रहे,उनके समग्र विकास का पथ अवरुद्ध कर रहे हैं।अश्लील चिंतन न समझते हुए भी उनके विचारों में यह सब जल्दी प्रवेश कर जाता है एवं वे समय से पहले किशोर हो जाते हैं।
- टेलीविजन के इन ‘शो’ में तथाकथित संगीत के ज्ञाता-निर्णायक जब किसी को श्रेष्ठ कहते हैं और वोटों द्वारा किसी को पराजित घोषित करते हैं तो वस्तुतः उनकी मानसिकता पर बड़ा आघात पहुँचता है।
- लोकप्रियता के नाम पर यह बच्चों का भावनात्मक शोषण (Emotional abuse of children) है।माता-पिता का दबाव,मंच और उपस्थित बच्चों के समूह का दबाव बच्चों को तुरन्त डिप्रेशन में ले जाता है।वस्तुतः ऐसे कार्यक्रमों से बच्चे हर पल ‘मरते’ हैं।हम उम्रों के सामने अपमानित होना अच्छा नहीं लगता और मनोवैज्ञानिक रूप से यह एक अपराध है।
- आज टेलीविजन पर दिखाए जा रहे इन कार्यक्रमों को ‘रिएलिटी शो’ कहने पर भी यह कहा जा सकता है कि आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जिस तरह से जीता है,उसे रियल या यथार्थ कहा जाता है।जैसे ही कैमरा बीच में आ जाता है,वहाँ नाटक शुरू हो जाता है। अतः ये कार्यक्रम एक प्रकार से बनावटी व नाटकीय ही होते हैं।
- राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग ने पिछले कुछ वर्षों पहले सचेत होकर कुछ आचार संहिताएँ बनाने का कार्य शुरू किया है।कुछ वर्ष पूर्व एक कमेटी गठित की गई थी,जिसमें मनोश्चिकित्सक,विधिविशेषज्ञ,सामाजिक कार्यकर्ता एचं चैनल से जुड़े व्यक्ति भी थे,पर इन सबसे कुछ नहीं होगा,यदि जनमानस नहीं चेतेगा।
(8.)अपसंस्कृति को बढ़ावा (Promoting subculture):
- आज टी० वी० चैनल लोकप्रियता (popularity
Channel) भुनाने के लिए,टी० आर० पी० रेटिंग बढ़ाने के लिए हर मुमकिन रास्ता तलाश रहे हैं।बच्चे तो सिर्फ मोहरा बने हैं।हमें बच्चों की प्रतिभाओं का सम्मान (Respect of Talent of Children) करना चाहिए,पर माता-पिता की महत्त्वाकांक्षाओं को सीमित करने के लिए उनका लोक-शिक्षण भी होना चाहिए।लोकरंजन के,प्रतिभा प्रदर्शन के कई स्वरूप बन सकते हैं।विद्यालय स्तर पर संस्कृति मंडलों में ऐसी प्रतियोगिताएँ हो सकती हैं,पर मासूमियत पर कहर ऐसा तो न गिरे,जो इन रिएलिटी शो में होता है। - वस्तुतः टेलीविजन का भारतवर्ष में तेजी से आना,नए-नए मॉडल्स का जनसुलभ हो जाना,उतनी ही तेजी से नेटवर्कों की भरमार आ जाना एवं सिनेमा-चित्रहार जैसी चीजें चौबीसों घंटे घर में,अपने ही कक्ष में उपलब्ध होना-इस तथ्य ने हमारी भारतीय संस्कृति की मूल मान्यताओं पर कुठाराघात किया है।
हमारे बच्चों का बचपन हमसे छोना है एवं भावी पीढ़ी को राष्ट्र निर्माता बनाने के स्थान पर फिल्म कलाकार बनाने हेतु प्रेरित किया है।इनमें कहीं आदर्श नहीं जुड़े हैं। थिएटर की दुनिया कभी थी तो उसमें रचनात्मकता (creativity) थी।लोक-शिक्षण के नाटक हुआ करते थे,तो ‘हरिश्चंद्र’ जैसे नाटक से मोहनदास कर्मचंद गांधी को सत्यवादी बना देते थे,परंतु आज इलेक्ट्रॉनिक्स तकनीकी अपसंस्कृति के इस अंधाधुंध विस्तृत हो रहे नेटवर्क ने तो हमारे छोटे-छोटे प्यारे से मासूम बच्चों को हमसे दूर कर दिया है।
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(9.)दृष्टिकोण परिवर्तन ही एकमात्र मार्ग (Attitude change is the only solution):
- विचारों में सकारात्मक बदलाव एवं व्यापक स्तर पर सुधारात्मक सोच से ही हम समाज को वर्तमान विभीषिका (Current horrors) से उबार पाएँगे।यह जहर ऐसा आकर्षक है कि जब प्रवेश करता है,तो अश्लीलता की पराकाष्ठा पर जाकर जड़ों को समाप्त करके ही चैन लेता है।हमें ही सोचना है कि समाज का स्वरूप इक्कीसवीं सदी की इस शैशवावस्था में क्या हो एवं कैसे हम भारत के भविष्य (Future of India) के नागरिकों के मनों को स्वस्थ-सुसंस्कारी बना सकते हैं?
- आज के बच्चे छोटे-छोटे भी मोबाइल को चलाना सीख जाते हैं और मोबाइल न देने पर जिद करते है।तकनीकी का ऐसा पागलपन हमें कहीं का नहीं छोड़ता है।हमारे सोचने-समझने की क्षमता को कुंद कर देता है।आज किसी छात्र-छात्रा या बच्चे को किसी समस्या का हल चाहिए तो फौरन एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) (artificial intelligence) की शरण में चले जाते हैं। तनिक अपने दिमाग पर जोर भी नहीं डालना चाहते हैं? इन स्थितियों में मस्तिष्क की सोचने-समझने की क्षमता और सृजनात्मकता कैसे विकसित होगी?
- दरअसल यह लत माता-पिता और घर के माहौल तथा साथ-संगत से ही लगती है।माता-पिता और शिक्षकों को तकनीकी का इस्तेमाल करने में संयम बरतने की जरूरत है तभी बच्चों को तकनीकी के दुष्प्रभाव से रोका जा सकता है।
उपर्युक्त आर्टिकल में बच्चे तकनीकी से दुष्प्रभावित:तकनीकी के दुष्प्रभाव को जानने के 9 टॉप टिप्स (Children Affected by Technology:9 Top Tips to Know Side Effects of Technology) के बारे में विस्तार से बच्चों के तकनीकी से दुष्प्रभावित होने के बारे में बताया गया है।
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- अधिकांशत बच्चों के तकनीकी की लत लगाने में माता-पिता की भूमिका ।होती है और इस प्रकार बच्चे तकनीकी से दुष्प्रभावित (Children Affected by Technology) होते हैं।
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3.तकनीकी का कमाल (हास्य-व्यंग्य) (The wonder of technology) (Humour-Satire):
- बच्चे के जुकाम हो जाता है।वह एआई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पूछता है।एआई ने लम्बा-चौड़ा इलाज बताया।बच्चे ने किसी से बिना पूछे वे दवाइयाँ ले ली।शाम तक उसके चेहरे पर सूजन आ गया।माता-पिता घबराकर डाॅक्टर के पास जाते हैं।
- डाॅक्टर:ये हालत कैसे हो गयी?
- माता-पिता:एआई का कमाल है।
- डाॅक्टर:ये लो दो गोली ठीक हो जाएगा।
- माता-पिताःबस इनसे ठीक हो जाएगा।
- डाॅक्टर:एआई से दुनिया ठीक हो जाती तो फिर हमारा क्या काम है?
4.बच्चे तकनीकी से दुष्प्रभावित:तकनीकी के दुष्प्रभाव को जानने के 9 टॉप टिप्स (Frequently Asked Questions Related to Children Affected by Technology:9 Top Tips to Know Side Effects of Technology) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.बच्चे तकनीकी से दुष्प्रभावित कैसे हो जाते हैं? (How do children get affected by technology?):
उत्तर:माता-पिता शुरू में बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देते हैं जिससे उनके लत लग जाती है।
प्रश्न:2.बच्चों को तकनीकी के दुष्प्रभाव से कैसे बचाएँ? (How to protect children from the influence of technology?):
उत्तर:माता-पिता संयमित रूप से जरूरी होने पर ही गैजेट्स का इस्तेमाल करें।बच्चों की परवरिश पर ध्यान दें।उन्हें रियल दुनिया के सम्पर्क में रखें।
प्रश्न:3.आज का माहौल कैसा है? (How’s the atmosphere today?):
उत्तर:आज हर व्यक्ति की सोच व्यावसायिक हो गई है।बच्चों का इस्तेमाल भी व्यावसायिक दृष्टिकोण से करते हैं।अतः माता-पिता को बच्चों की परवरिश में आज अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा बच्चे तकनीकी से दुष्प्रभावित:तकनीकी के दुष्प्रभाव को जानने के 9 टॉप टिप्स (Children Affected by Technology:9 Top Tips to Know Side Effects of Technology) की बेसिक टर्म्स के बारे में बताया गया है।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*











