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7 Divine Spells to Know Secret of Love

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1.प्रेम का रहस्य जानने के 7 दिव्य मंत्र (7 Divine Spells to Know Secret of Love),पवित्र प्रेम का रहस्य कैसे जानें? (How to Know Secret of Pure Love?):

  • प्रेम का रहस्य जानने के 7 दिव्य मंत्र (7 Divine Spells to Know Secret of Love) में हम प्रेम क्या है,के बारे में जानेंगे,प्रेम क्यों जरूरी है और प्रेम का मूल आधार क्या है आदि के बारे में जानने का प्रयास करेंगे।
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2.प्रेम का मनोविज्ञान (The Psychology of Love):

  • प्रेम पवित्र शब्द है,जिसमें अनेक आयाम हैं।अनेक आयामों में एक आयाम है इसकी बायोकेमेस्ट्री।प्रेमरूपी प्यार की बायोकेमेस्ट्री बड़ी ही रोचक,रोमांचक एवं जटिल है;क्योंकि इससे जितने आवरण हटते हैं,उतना ही यह रहस्यमय प्रतीत होता है।ऐसा इसलिए है कि प्रेम के विभिन्न आयामों के बीच संबंध-सूत्र कमजोर होता है। प्रेम का मनोविज्ञान जितना मार्मिक है,उसकी बायोकेमेस्ट्री उतनी ही जटिल है।यदि भाव एवं व्यवहार के बीच एक सीधा पुल बन जाए तो शायद यह समझने में अधिक आसान हो,फिर भी अपने-अपने ढंग से इसकी व्याख्या की गई है।जो भी हो,प्रेम की बायोकेमेस्ट्री अनोखी है।
  • प्रेम का मनोविज्ञान भी बड़ा रोचक है।मनोवैज्ञानिक जानते हैं कि हम जिन्हे अंदर से चाहते हैं या दिल से सम्मान करते हैं तो कहीं ना कहीं हम उनसे आकर्षित होते हैं और उनके पास उठना,बैठना या बातचीत करना चाहते हैं।यदि यह आकर्षण दोनों पक्षों से हो तो एक गहरा भावनात्मक आकर्षण पैदा होता है और इस आकर्षण में सब कुछ विलीन हो जाता है।जानकार कहते हैं कि जिसे हम चाहते हैं,उसके साथ बिताया गया लंबा समय भी पलभर का लगता है;क्योंकि यहां पर भावनात्मक तृप्ति का अनुभव होता है।इसके ठीक विपरीत हम जिसे नापसंद करते हैं,उसके साथ का एक पल भी भारी लगता है;युगों जैसा असाध्य लगता है।योग मनोविज्ञानी इसी को घृणा एवं प्रेमरूपी द्विध्रुवीय स्थिति के रूप में निरूपित करते हैं।
  • अपनापन एवं प्यार एक द्विध्रुव है।उनके ठीक विपरीत घृणा खड़ी होती है।इंसान इन दोनों ध्रुवों के बीच डोलता रहता है।इन दोनों में अपनापन ही अच्छा है।योगी कहते हैं कि जो इन दोनों अवस्थाओं से गुजर जाता है या पार हो जाता है,उसी के दिल में प्रेम का अंकुर पनपता है। अतः प्रेम का दर्शन अत्यंत परिष्कृत एवं दिव्य है।यह तो मन एवं देह से परे होता है।ऐसा प्रेम तो विरले को मिलता है और विरलों में होता है,परंतु जिसे अपनापन एवं चाहत कहते हैं,वह दैहिक धरातल पर होता है और कुछ रूप में यह मानसिक एवं भावनात्मक स्तर पर झलकता है।प्रेम की यात्रा पवित्रता की यात्रा है।जो जितना इस देह से ऊंचा उठता है और अपने अंतर की ओर बढ़ता है,वह उतना ही पावन होता है,परंतु देखने वाली बात यह है कि देह में जब अपनापन या प्रेम की अभिव्यक्ति होती है तो कैसी होती है? कैसी उसकी फिजियोलॉजी होती है? ऐसी भाव दशा में किस प्रकार के हाॅर्मोन का स्राव होता है? यह घटना विशुद्ध रूप से बायोकेमेस्ट्री से संबंधित है।
  • व्यक्ति जिसे अपना मानता है और उसके साथ लंबे समय तक रहता है तो उन दोनों के बीच एक सहज आकर्षण पैदा हो जाता है।इन दोनों व्यक्तियों की बायोकेमेस्ट्री में काफी समानता मिलती है।यहां तक कि यदि एक का वजन बढ़ रहा है तो दूसरे का वजन भी प्रभावित होता है,परंतु जब हम गहरी भावनात्मक दशा में होते हैं तो हमारे शरीर में डोपामाइन नामक हाॅर्मोन क्रियाशील होता है।लंबे समय तक यदि यह स्थिति बनी रहती है तो फिर इसकी क्रियाशीलता कमजोर पड़ने लगती है।वैज्ञानिक कहते हैं कि स्वस्थ होने के लिए हमें विटामिन-6 और मैग्नीशियम की अधिक आवश्यकता पड़ती है और ये दोनों तत्त्व डोपामाइन पैदा करने के लिए उत्तरदायी होते हैं।

3.प्यार अद्भुत और अनोखा (Love is amazing and unique):

  • जिसे हम अपना मानते हैं,उसे हम देखना भी पसंद करते हैं।मनोविज्ञानी कहते हैं कि जैसे हमारी आंखें किसी से मिलती हैं तो खुशियों से छलक आती है।ऐसी स्थिति में मस्तिष्क से फेनीलेथामाइन हाॅर्मोन का स्राव होता है।इसका कार्यक्षेत्र बड़ा व्यापक है।यह धड़कनों को बढ़ाता है,सांस को तेजी से चलाता है,हथेलियों में पसीना लाता है तथा गालों और जननांगों में रक्त का प्रवाह बढ़ा देता है।पनीर एवं चॉकलेट खाने के बाद इसे पचाने के लिए इसी हार्मोन की आवश्यकता पड़ती है।यह आंखों की पुतलियों को फैला देता है।जब इंसान घबराने लगता है या डरता है,तो भी यह हाॅर्मोन स्रावित होता है।
  • कहते हैं,भावनात्मक दशा उफान पर हो तो भूख नहीं लगती।इसे इंडोक्राइनोलॉजिस्ट भी सही मानते हैं।इनके अनुसार एड्रिनैलिन हार्मोन के अधिक स्रवण होने से पाचन तंत्र की क्रियाशीलता घट जाती है और भूख में कमी आ जाती है।यह हाॅर्मोन हृदयगति एवं सांस,दोनों को तीव्र कर देता है।इंडोर्फिन हाॅर्मोन शरीर में दर्द पैदा करता है,परंतु प्यार एवं अपनेपन की दशा में इसका प्रभाव खुश,आनंदित एवं आल्हादित करने वाला होता है।जिस व्यक्ति को अधिक अपनापन मिलता है,उसके शरीर में इंडोर्फिन की कमी नहीं होती है।वसा,चॉकलेट और शक्कर खाने से इसका उत्पादन बढ़ जाता है।इसके ठीक विपरीत अपनेपन के अभाव में व्यक्ति डिप्रेशन (अवसाद) या मूडस्विंग का शिकार हो जाता है।इससे इस हाॅर्मोन का स्राव घट जाता है।अतः मूड को ठीक करने के लिए अपनेपन के दायरे को बढ़ाना चाहिए।
  • एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि पत्नीव्रता पतियों के शरीर में वेसोप्रेसिन हाॅर्मोन की अधिकता होती है।ऐसा क्यों होता है? अभी तक इसकी सही-सही जानकारी नहीं मिल पाई है,परंतु एक सर्वेक्षण से इसकी पुष्टि हुई है कि पुरुषों में यह हार्मोन ठीक उसी प्रकार कार्य करता है,जैसे महिलाओं में ऑक्सीटोसिन।जो व्यक्ति अधिक शराब का सेवन करते हैं,उनमें इसका स्राव न्यून हो जाता है।ऑक्सीटोसिन को मदर हाॅर्मोन कहते हैं।जब माँ अपनी संतान को स्तनपान कराती है तो इसका स्राव बढ़ जाता है।हाथ मिलाने एवं गले लगाने से भी इसका स्तर बढ़ता है।यह हाॅर्मोन आत्मविश्वास को बढ़ाता है एवं डर को कम करता है।
  • इंसान को सबसे बड़ी भूख प्यार की है।उसे यदि सच्चा अपनापन एवं प्यार मिले तो उसकी रचनात्मक शक्तियों में कई गुना अभिवृद्धि हो सकती है।जो व्यक्ति किसी को दिल की गहराई से चाहता है तो उसके लिए वह बड़े-से-बड़ा त्याग करने के लिए तत्पर रहता है।विज्ञानी कहते हैं कि ऐसी दशा में उसका फ्रंटल अधिक सचेतन हो जाता है।मस्तिष्क का यह भाग अतिमहत्त्वपूर्ण भाग है;क्योंकि यहीं से निर्णय क्षमता,बुद्धि-विवेक आदि संचालित होते हैं।प्यार का जादू शारीरिक सौंदर्य से बड़ा होता है।इसका रंग अनोखा एवं अनुकूल होता है और सौंदर्य का यह रंग दाएं मस्तिष्क से किसी कोने में छिपा रहता है।जैसे ही उसे सौंदर्य का बोध होता है,यह अतिक्रियाशील हो जाता है।
  • इसी कारण विद्वान एवं विज्ञानी,दोनों ही प्यार की बायोकेमेस्ट्री को अद्भुत एवं अनोखा मानते हैं,जिस दिन इस विज्ञान का समुचित शोध-अनुसंधान होगा,तमाम अज्ञात पहलुओं का खुलासा होगा।जो भी हो,अपनापन एवं प्यार हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं,परंतु इनका दूसरा पक्ष बड़ा ही खतरनाक होता है।भावुकता की दशा में यह प्यार अति संवेदनशील एवं घातक होता है।अतः व्यक्ति को अपनापन एवं प्यार का विकास करना चाहिए,परंतु भावुकता से बचना चाहिए तथा सदैव पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।यदि पवित्रता के साथ प्यार एवं अपनापन पनपता है तो यह विकास का उत्तम माध्यम बनता है और यदि इसमें व्यतिरेक होता है तो पतन और विनाश की राह दिखाता है।
  • हमें इंसान की देह से नहीं,उसके पवित्र भाव से प्यार करना चाहिए।इंसान के अंदर अवस्थित पवित्रभाव भगवान का प्रतीक है।इसलिए प्रेम को स्वयं भगवान कहा गया है।अतः हमें पवित्र प्रेम पर विश्वास रखना चाहिए।

4.प्रेम और भगवान (Love and God):

  • मनुष्य के जीवन में यदि कोई सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है तो प्रेम को उपलब्ध हो जाना।वास्तव में जो प्रेम है वह बड़ी ही दुर्लभ और अत्यंत कठिन साध्य चीज है।प्रेम अपने आप में अकेला ही पूर्ण होता है उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं होती।यदि प्रेम के साथ अन्य हो तो वह प्रेम होता ही नहीं क्योंकि प्रेम बिना शर्त होता है,अनासक्त होता है यानी कुछ पाने की कामना वाला नहीं होता।जहां कोई शर्त होती है,कुछ पाने की कामना होती है,किसी प्रकार की आसक्ति होती है वहाँ प्रेम होता ही नहीं वासना होती है,मोह होता है।यदि आसक्ति भाव होगा तो प्रेम नहीं मोह हो जाएगा और आसक्तिरहित हो तो यही प्रेम भक्ति हो जाएगा।प्रेम नीचे गिरता है तो मोह बन जाता है और ऊपर उठे तो भक्ति बन जाता है यानी प्रेम,मोह और भक्ति के बीच की स्थिति है।
  • प्रेम का विकृत रूप मोह है और उन्नत रूप भक्ति है और प्रेम का यह उन्नत रूप ही हमें भक्त बनाता है भगवान से मिलाता है इसीलिए प्रेम को भगवान (Love is God) कहा गया है क्योंकि प्रेम में अहंकार नहीं होता और जहां अहंकार नहीं होता वहीं भगवान होता है।जैसे जहां अंधकार होता है,वहाँ प्रकाश नहीं होता है वैसे ही जहां अहंकार होता है वहाँ प्रेम नहीं होता।जैसे जहां प्रकाश होता है वहाँ अंधकार नहीं होता वैसे ही जहां प्रेम होता है वहाँ अहंकार नहीं होता।जहां अहंकार नहीं होता वहाँ प्रेम होता है,वहीं भगवान होता है इसलिए प्रेम और भगवान पर्यायवाची हैं।प्रेम को प्राप्त कर लेना भगवान को प्राप्त कर लेना है।
  • प्रेम मोह और भक्ति के बीच अवस्था है,मध्यम मार्ग है।ऐसा मार्ग जो संसार की तरफ भी यात्रा करा सकता है और संसार से मुक्त कर भगवान की तरफ भी यात्रा करा सकता है और संसार से मुक्त कर भगवान की तरफ भी यात्रा करा सकता है।यदि प्रेम आसक्तिपूर्ण है तो वह मोह हो जाएगा और सांसारिक बंधनों में बाँधे रखेगा। ऐसा प्रेम शरीर से होता है आत्मा से नहीं,भौतिक जगत से होता है भगवान से नहीं।यदि प्रेम में आसक्ति ना हो तो वह भक्ति हो जाएगा और ऐसा प्रेम सब में भगवान को देखने लगता है इसलिए भगवान को देखने के लिए आसक्ति रहित प्रेम होना चाहिए।
  • आत्मा की परमश्रेष्ठ और निर्विकार स्थिति की अनुभूति होना,प्रेम की भावदशा में ही संभव होता है और हो सकता है।भगवान परमश्रेष्ठ और निर्विकार है इसलिए प्रेम को भगवान और भगवान को प्रेम कहा गया है।वासनारहित,अपेक्षारहित और चुनावरहित आत्मीय भाव ही प्रेम की भावदशा है जिसमें सिर्फ देने की भावना रहती है लेने की कामना नहीं होती।यह साधना आसान नहीं,जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है।प्रेम ही साधना है और साधना ही प्रेम है,प्रेम ही उपासना है और उपासना ही प्रेम है क्योंकि ये सब स्थितियां,निर्मल आनंदस्वरूप भगवान तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध होती है।प्रेम के बिना साधना नहीं होती,साधना के बिना प्रेम या भगवान तक पहुंचना संभव नहीं होता।
  • जो व्यक्ति प्रेम करता है वह कोई अपेक्षा नहीं रखता,कोई शर्त नहीं रखता,कुछ मांगता नहीं सिर्फ अपने कर्त्तव्य का पालन करता है और सबके भले की कामना करता है और सबमें भगवान ही देखता है।उसे अपने अंदर मौजूद भगवान ही सब में दिखाई देता है इसलिए वह सभी को प्रेम करता है।ऐसे प्रेमी विरले ही होते हैं,पर होते हैं जरूर।

5.प्रेम भयरहित अवस्था (Love is a fearless state):

  • भय एक ऐसी अनुभूति है जिसका अनुभव बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी को होता है और इंसान को ही नहीं पशु-पक्षियों को भी होता है।यूं तो भय होने का कारण प्रायः मन की कमजोरी,अज्ञानता,कायरता या लोकलाज आदि को समझा जाता है पर जरा गहरे में विचार करें तो भय का वास्तविक मूल कारण प्रेम का ना होना सिद्ध होगा।हालांकि एक कहावत प्रचलित है कि भय बिन प्रीत न होय पर ऐसी प्रीति,ऐसा प्रेम वस्तुतः प्रीति होती ही नहीं प्रेम होता ही नहीं बल्कि यह एक प्रकार की स्वार्थी भावना ही होती है फिर भले ही वह स्वार्थ किसी भी प्रकार का हो,किसी भी हेतु से हो।नैसर्गिक यानी स्वाभाविक प्रेम तो बिना शर्त होता है,कुछ पाने के लिए नहीं कुछ देने के लिए होता है।पाने के लिए किया गया प्रेम लोभ है,वासना है और व्यापार है,लेनदेन है।वास्तविक प्रेम भयरहित होता है इसलिए जिससे प्रेम होता है उससे भय हो ही नहीं सकता।भय के बल पर प्रेम प्राप्त नहीं किया जा सकता सिर्फ घृणा ही प्राप्त की जा सकती है।जो जिससे भयभीत होता है वह उससे कभी प्रेम नहीं कर सकता और जिससे प्रेम करता है उससे भयभीत नहीं हो सकता।हम भगवान से प्रेम नहीं करते इसलिए भयभीत रहते हैं।जो भगवान से प्रेम करता है वही अभय हो सकता है और उसे फिर कभी भी,कहीं भी तथा किसी भी स्थिति में भय नहीं लगता क्योंकि भगवान सर्वव्यापक है,सब हर जगह मौजूद है।

6.छात्र-छात्राओं के लिए प्रेम का महत्त्व (The Importance of Love for Students):

  • छात्र-छात्राओं का मुख्य कर्त्तव्य है अध्ययन करना,कठिन परिश्रम करके सही उत्तर लिखकर उत्तीर्ण होना।अध्ययन को पूरे मन से,एकाग्रचित होकर आत्मविश्वास के साथ करें और अपनी तरफ से कोई बाकी ना छोड़े तो परीक्षा में सफल होना निश्चित है।अगर अध्ययन आधे मन से,अस्थिर चित्त से,संशयग्रस्त मनोवृत्ति और उच्चाटन के साथ करेंगे तो सफल नहीं हो सकेंगे।यदि सफल हो जाते हैं तो प्रारब्ध के बलबूते पर हुआ ऐसा माना जाएगा।अस्थिर चित्त से प्रेम किया ही नहीं जा सकता है।अध्ययन में बोरियत भी इसलिए होती है क्योंकि हम पूर्ण समर्पण और एकाग्रचित्त होकर अध्ययन नहीं करते हैं।
  • हम अध्ययन के प्रति प्रेम की अनुभूति करें,अधिक से अधिक प्रेम की अनुभूति करें,प्रेम को भक्ति और पूजा तथा आराधना में परिवर्तित कर दें तो अध्ययन करना हमारे लिए सबसे बड़ी साधना है।पूजा और आराधना समझकर अध्ययन करेंगे तो बोरियत का नहीं बल्कि आनंद की अनुभूति करेंगे।श्रेष्ठ छात्र-छात्राएं,गणितज्ञ और वैज्ञानिक घंटों अभ्यास करते हैं तभी ऊंचाइयों को छूते हैं।जो अध्ययन को साधना समझकर करे और उसमें डूब जाए उसके लिए अध्ययन अच्छे परिणाम लाने वाला सिद्ध होता है।यदि अध्ययन में (साधना में) बोरियत होने लगे तो इसका मतलब है हम अध्ययन को बोझ समझकर करते हैं उसके प्रति प्रेम की भावना रखकर अध्ययन नहीं करते,ऐसी स्थिति में न तो परिणाम अच्छे हो सकते हैं और न साधना में आनंद की अनुभूति हो सकती है।

 

  • एक विद्यार्थी सच्चे मायने में तभी कर्मयोगी होता है,जब अध्ययन को कर्त्तव्य समझकर करता है,इस रूप में ही उसे सच्चा साधक कहा जा सकता है।परंतु असलियत यह है कि हम अध्ययन नहीं करते हैं,बल्कि अध्ययन करने का दिखावा करते हैं,ढोंग रचते हैं।हम अध्ययन के परिणाम के प्रति आसक्ति रखकर डॉक्टर,इंजीनियर आदि की कामना रखकर करते हैं।यह हमारा स्वार्थ होता है,मोह होता है।श्रेष्ठ गणितज्ञों,वैज्ञानिकों ने प्रेम,पूजा और आराधना का मार्ग अपनाकर ही अपने कर्म में सफलता पाई है।अधिकतर ऐसा होता है कि जिसे हम प्रेम समझते हैं वह मोह होता है,स्वार्थ होता है। प्रेम और मोह के अंतर को समझ नहीं पाते और अक्सर कहते रहते हैं कि मैं बहुत प्रेम करता हूं।प्रेम में कष्ट,कठिनाइयों में भी हम विचलित नहीं होते हैं और सुखप्रद स्थिति में बहुत अधिक प्रसन्न नहीं होते हैं।
  • विद्यार्थी अध्ययन को ऊपर बताए गए तरीके से करेंगे तो उसका आनंद ही ऐसा होगा जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है।ऐसे विद्यार्थी को विद्या ग्रहण करने में कष्ट,कठिनाइयां अध्ययन का अंग ही महसूस होती हैं।कष्ट-कठिनाइयों की वह शिकवा-शिकायत नहीं करता है।इससे उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।यदि वे अध्ययन में आनंद और समर्पण का अनुभव करते हैं तो ही समझा जा सकता है कि वे अध्ययन के प्रति प्रेम करने का दावा कर सकते हैं और यदि दुःख,तनाव,निराशा,हताशा,बोरियत का अनुभव करते हैं तो प्रेम नहीं कर रहे हैं बल्कि अध्ययन को मोहवश कर रहे हैं,स्वार्थवश कर रहे हैं।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में प्रेम का रहस्य जानने के 7 दिव्य मंत्र (7 Divine Spells to Know Secret of Love),पवित्र प्रेम का रहस्य कैसे जानें? (How to Know Secret of Pure Love?) के बारे में बताया गया है।

 

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7.आज के युग का छात्र (हास्य-व्यंग्य) (Student of Today’s Era) (Humour-Satire):

  • एक छात्र ने मैडम से पूछा:आई लव यू का अर्थ क्या होता है?
  • मैडम ने कहा:मैं तुमसे प्रेम करती हूं।
  • छात्र:बोला बिल्कुल ठीक कहा आपने,मैं भी ऐसी ही फीलिंग कर रहा हूं।

8.प्रेम का रहस्य जानने के 7 दिव्य मंत्र (Frequently Asked Questions Related to 7 Divine Spells to Know Secret of Love),पवित्र प्रेम का रहस्य कैसे जानें? (How to Know Secret of Pure Love?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.प्रेम और मोह में क्या अंतर है? (What is the difference between love and infatuation?):

उत्तर:प्रेम में आनंद और समर्पण का अनुभव होता है जबकि मोह में तनाव,बोरियत,दुःख का अनुभव करते हैं।प्रेम अहंकार रहित है,जबकि मोह में अहंकार बढ़ता है।प्रेम समर्पण भाव से परिपूर्ण होता है जबकि मोह समर्पण रहित होता है।

प्रश्न:2.आसक्तिरहित प्रेम और आसक्तियुक्त प्रेम में क्या अंतर है? (What is the difference between love without attachment and love with attachment?):

उत्तर:आसक्तिरहित प्रेम शाश्वत है,सदा ताजा है जबकि आसक्ति युक्त प्रेम,प्रेम नहीं मोह होता है,जो कभी न कभी सड़ता ही है,टूटता ही है।जो कभी न सड़े,कभी न टूटे वह प्रेम है,जो सड़ जाए,टूट जाए वह मोह है।

प्रश्न:3.हमने प्रेम किसे समझ रखा है? (Who do we think of as love?):

उत्तर:हमने स्वार्थ को प्रेम समझ लिया है और स्वार्थवश जो मीठा व्यवहार करते हैं उसे प्रेम कहते हैं।हमने कामवासना भरे व्यवहार को प्रेम समझ लिया है और काम संबंधी व्यवहार को प्रेम करना कहते हैं।जबकि प्रेम का तो स्वरूप ही अलग है अर्थ ही अलग है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा प्रेम का रहस्य जानने के 7 दिव्य मंत्र (7 Divine Spells to Know Secret of Love),पवित्र प्रेम का रहस्य कैसे जानें? (How to Know Secret of Pure Love?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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