6Secret of How to Improve Student Life
1.विद्यार्थी जीवन उन्नत कैसे बनें के 6 रहस्य (6Secret of How to Improve Student Life),व्यावहारिक जीवन उन्नत कैसे बनें? (How to Lofty Practical Life?):
- विद्यार्थी जीवन उन्नत कैसे बनें के 6 रहस्य (6Secret of How to Improve Student Life) के आधार पर विद्यार्थी जानेंगे कि विद्यार्थी जीवन को उन्नत करने हेतु किन सूत्रों का पालन करना आवश्यक है? उन्नत जीवन से क्या तात्पर्य है? आइए इसे समझें।
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2.विद्यार्थी जीवन उन्नत होने का अर्थ (What does it mean for a student’s life to be advanced?):
- मनोवैज्ञानिकों ने जीवन को सुखी,समुन्नत,आनंदमय,शांति और संतोषप्रद बनाने के लिए कुछ अमूल्य सूत्र बताएं गए हैं,जो हर विद्यार्थी के लिए हर परिस्थितियों में उपयोगी हैं।जिन्हें जीवन के अनमोल सिद्धांत समझे जा सकते हैं।प्रमुख सूत्र ये हैं: अपनी आन्तरिक शक्तियों को जानों,अपनी शक्तियों का सदुपयोग करो,आत्मिक संतुष्टि प्राप्त करो।
- अपनी शक्तियों को जानने से तात्पर्य अपने अंदर छुपी हुई शक्तियों को पहचानें।सामान्यतया विद्यार्थी अपने कोर्स की पुस्तकें पढ़ने में ही इतने तल्लीन रहते हैं कि इस अध्ययन से केवल उन्हें भौतिक जगत,शरीर इंद्रियां एवं ज्ञानेंद्रियों की जानकारी होती है।क्योंकि अक्सर वर्तमान शिक्षा के पाठ्यक्रम को पढ़ने के लिए शरीर,इंद्रियों,ज्ञानेंद्रिय और बुद्धि की जरूरत होती है।इसलिए समझा जाता है कि शरीर ही सब कुछ है और अपनी सत्ता भी शरीर ही तक है।अस्तु,शरीर को ही सब कुछ मानने एवं बोध क्षेत्र इंद्रियों तक ही सीमित रह जाने के कारण उनकी सीमित शक्ति का लाभ मिल पाता है।अधिकांश विद्यार्थियों का जीवनक्रम इस मान्यता के इर्द-गिर्द ही घूमता एवं लुढ़कता रहता है।फलतः खाने,पढ़ने एवं परीक्षा देने,खेल-कूदने की सीमा के सीमित दायरे से निकलते नहीं बनता।ना कुछ विशिष्ट करते बनता और न ही विशिष्ट सोचते।
- अपनी वास्तविक सामर्थ्य शरीर की क्षमता की तुलना में असंख्य गुनी अधिक है।चेतना आत्मिक शक्ति की पुंज है।इन्द्रियों की क्षमताएँ तो उसकी कुछ तरंगे मात्र हैं। असली सामर्थ्य का केंद्र तो आत्मा है,इस बोध के न होने से ही विद्यार्थी अपने को कमजोर,दीन-हीन,गया-गुजरा,असमर्थ,असहाय महसूस करता और किसी तरह जीवन के दिन पूरे करता है।इसके विपरीत अपनी भीतरी सामर्थ्य का बोध होते ही बाह्य जीवनक्रम एवं परिस्थितियों में भारी हेर-फेर हो जाता है।तब उसे अनुभव होता है कि आत्मा के भीतर प्रचण्ड शक्ति भरी पड़ी है।
- अपनी शक्तियों को पहचानने को ही आत्मविश्वास कहा जाता है।बिना अनुभव किए,बिना जाने-समझे आत्मिक शक्ति पर विश्वास करना अंधविश्वास होता है।परंतु जानने-समझने और अनुभव करने पर वही आत्मविश्वास होता है।जितना अपनी शक्तियों को जानते-समझते और अनुभव करते जाते हैं और उनका उपयोग करते जाते हैं तो आत्मविश्वास बढ़ता जाता है।आत्मविश्वास के उदय होते ही मनुष्य बाह्य परिस्थितियों को उतना महत्त्व नहीं देता,जितना कि मनुष्य के भीतर समाहित विशेषताओं को।
- मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन में अधिकांश विद्यार्थी इसलिए असफल रहते हैं कि उनमें आत्मविश्वास नहीं होता,अपनी शक्ति से अपरिचित होते हैं।अस्तु,उससे लाभ उठाते भी नहीं बनता।फलतः कुछ विशेष नहीं कर पाते,जबकि ऐतिहासिक सफलताएं आत्मविश्वासियों को मिलती है।असफलताओं का रोना रोने वाले निराशा के गर्त में डूबे विद्यार्थियों के लिए यह सुझाव दिया जा सकता है कि वे निराशा एवं अवसाद से निकलकर अपने भीतर झाँके और देखें कि उनके अंदर शक्ति का स्रोत (जखीरा) छिपा पड़ा है।
3.अपनी शक्तियों का सदुपयोग करो (Make the most of your powers):
- दूसरा प्रमुख सूत्र है अपनी शक्तियों का सदुपयोग करो। इसे अपने आपको उन्नत करने का दूसरा चरण समझा जा सकता है,जो कर्मयोग की प्रेरणा देता है।अपनी शक्तियों को जानना ही पर्याप्त नहीं है,वरन यह भी आवश्यक है कि विद्यार्थी जीवन का जो समय उपहार में मिला है उसे परमात्मा की तरफ से उपहार मानकर सहर्ष स्वीकार किया जाए।अर्थात् प्रदत्त शक्तियों का सदुपयोग किया जाए।अपने को दीन-हीन मानने की तुलना में यह समझा जाए कि हम इस संसार के महत्त्वपूर्ण घटक हैं तथा हमारा जन्म खाओ,पीओ और मौज करो जैसे निकृष्ट प्रयोजन के लिए नहीं,किसी महान उद्देश्य के लिए हुआ है।विश्व-वसुधा आंचल फैलाए हमारे सहयोग की अपेक्षा कर रही है।
- यह आवश्यक नहीं की हर विद्यार्थी को हर तरह की क्षमता प्राप्त हो।शरीर बल,बुद्धि बल,आत्म बल,संपत्ति में से किसी भी तरह की सामर्थ्य क्यों ना हो,सभी अपने में मह्त्वपूर्ण तथा उपयोगी हैं,यह सोचना निराधार है कि अमुक तरह की योग्यता होती अथवा साधन उपलब्ध होते तो महत्त्वपूर्ण कार्य किया जाता।जिस भी तरह की क्षमता-साधन प्राप्त हैं,उनके ही सदुपयोग द्वारा बहुत कुछ किया जा सकता है।यह तथ्य हृदयंगम किया जाना चाहिए कि महान कार्य योग्यता-प्रतिभा के बलबूते नहीं,उच्चस्तरीय आदर्श एवं सिद्धांतनिष्ठा द्वारा संपादित किए जाते हैं।योग्यता प्रतिभा का योगदान तो होता है,पर तभी जबकि वे उत्कृष्टता के पक्षधर बने।यह ध्यान रहे योग्यता और प्रतिभा का दुरुपयोग भी किया जा सकता है।जैसे रावण,कंस,जरासंध,कालयवन,हिटलर जैसे आततायियों ने किया था।
- अस्तु योग्यता संवर्द्धन के लिए प्रयत्न किए जाने चाहिए।पर इतने पर भी यदि किसी विशेष तरह की योग्यता अर्जित न हो सके तो यह नहीं समझा जाना चाहिए कि यह प्राप्त होती तभी महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकते थे।जो प्राप्त है उस क्षमता का ही नियोजन यदि ठीक प्रकार बन पड़े तो आत्मनिर्माण एवं लोककल्याण की दिशा में इतना कुछ किया जा सकता है,जितना कि विपुल साधनों के रहते भी नहीं किया जा सकता।अतएव आवश्यकता इस बात की है कि अनुपलब्ध साधनों अथवा योग्यताओं के कारण निराश ना हुआ जाए।जो उपलब्ध है,उसका अधिक से अधिक सदुपयोग किया जाए।
- महामानवों के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर यह पता चलता है कि अधिकांशतः विषम परिस्थितियों में जन्मे एवं पले।योग्यता एवं प्रतिभा की दृष्टि से भी उनसे असंख्यों आगे थे।किंतु सबको पीछे छोड़ते हुए वे आगे निकलकर महानता के उच्च शिखर पर जा पहुंचे।विचार करने पर इसका एक ही कारण नजर आता है कि उन्होंने अपने समय,श्रम एवं मनोयोग का पूरी तत्परता के साथ उपयोग किया।इसके विपरीत साधनों एवं योग्यताओं से संपन्न होते हुए भी उनका सदुपयोग न बन पाने के कारण कितने ही व्यक्ति सामान्य जीवनचर्या से आगे नहीं बढ़ पाते हैं।आत्मिक शक्ति का सदुपयोग करने पर हमारी हर असुविधा और अभाव,कष्ट कठिनाइयां हमारे लिए दिव्य वरदान बन जाते हैं।आत्मिक शक्ति हमें पर्वत जैसे विशालकाय मुसीबतों से बाहर निकाल ले जाती है।
4.आत्मिक संतुष्टि (Spiritual Contentment):
- सुखी संतुष्ट आनंदयुक्त जीवन के लिए तीसरा सूत्र है आत्मिक संतुष्टि का होना।प्रसन्नता,अप्रसन्नता का केंद्र सामान्यतया बाह्य परिस्थितियों एवं व्यक्तियों या विद्यार्थियों को बताया जाता है।परिस्थितियों तथा व्यक्तियों या विद्यार्थियों में परिवर्तन होते रहते हैं।उनके प्रभाव सुखप्रद अथवा दुःखप्रद दोनों ही तरह के हो सकते हैं।उनके भले-बुरे प्रभाव पड़ने पर भी स्वाभाविक है कि दृष्टिकोण बहिर्मुखी होने से विद्यार्थी को असंतोष ही हाथ लगता है।उपलब्धियां हासिल करने के लिए प्रयत्नशील रहा जाए,यह ठीक है।पर अनावश्यक ललक-लिप्सा तो हर दृष्टि से हानिकारक है।विद्यार्थी एवं वस्तुओं के प्रति भी आसक्ति इस सीमा तक न जोड़ी जाए कि उनके न रहने अथवा प्रतिकूल हो जाने पर निराशा एवं असंतोष की मनःस्थिति से गुजरना पड़े। अस्तु,प्रसन्नता का केंद्र बिंदु अपनी अंतरात्मा को मानना ही श्रेयस्कर एवं सहायक है।
- आत्मिक संतुष्टि ना हो तो अनंत कामनाएं,आसक्ति;इच्छाएँ हमें अति की ओर ले जाती है और अति हमें हमारे अंत की ओर ले जाता है।हमारा ही अंत हो जाता है परंतु कामनाओं व इच्छाओं का कोई अंत नहीं है और न अति की कोई सीमा है।फलस्वरूप विद्यार्थी कितना ही सफल हो जाए वह असंतुष्ट ही रहता है।असंतुष्ट विद्यार्थी कितनी ही सफलता अर्जित कर ले,कितनी ही धन संपदा अर्जित कर ले,कितनी ही सुख-सुविधाएँ प्राप्त कर लें वह सदा असंतोष की अग्नि में जलता रहता है।उसके मन के अंदर अनेक विकार इकट्ठा होकर उसे चिंता,शोक,हताशा,निराशा के जाल में फँसाते रहते हैं।
- संतोष धारण करने का अर्थ यह नहीं है कि अधिक प्राप्त करने का प्रयास ही न किया जाए।अधिक के लिए पुरुषार्थ तो करते रहना चाहिए परंतु अपना 100% योगदान देने के बाद जो कुछ उपलब्ध हो जाए उससे संतुष्ट रहना चाहिए।कई बार हमारे 100% एफर्ट (effort) के बावजूद भी मनोवांछित सफलता प्राप्त नहीं होती है क्योंकि यह प्रारब्ध और पुरुषार्थ का खेल है जिसे हम समझ नहीं सकते।हमारे जैसे सामान्य व्यक्ति तो क्या लगते हैं,बड़े-बड़े ऋषि-मुनि-तपस्वी भी नहीं समझ पाते हैं।अतः आत्मविश्वास के साथ किए गए अध्ययन के परिणाम,परीक्षा के परिणाम अथवा किसी जाॅब या टास्क के परिणाम से आत्मिक संतुष्टि का होना जरूरी है।
- मनोवांछित परिणाम न मिलने पर या असफलता मिलने पर आत्मनिरीक्षण करते रहना चाहिए और पता लगाना चाहिए कि हमारे प्रयासों में कहां कमी रह गई।उन कमियों को दूर करके पुनः अध्ययन में जुट जाना चाहिए।भरपूर प्रयास करने,अथक प्रयास करने,बार-बार प्रयास करने पर भी असफलता मिल रही हो तो फिर उसमें अपना दोष नहीं समझना चाहिए और ना किसी से किसी प्रकार की शिकवा-शिकायत करने की जरूरत ही है।संतोष धारण करके अपने कर्त्तव्य को सतत रूप से करता रहना चाहिए।जीवन इतनी जटिल पहेली है कि इसको समझना बहुत मुश्किल है,बड़े-बड़े पंडित भी मात खा जाते हैं।अतः अपने अध्ययन को कर्त्तव्य समझकर,धर्म समझकर करते रहना चाहिए।
5.चेतना के अस्तित्व को अनुभव करना (Experiencing the existence of consciousness):
- ऊपर के वर्णन से स्पष्ट है कि चाहे अध्ययन करना हो,जॉब करना अथवा उसमें उन्नत स्थिति को प्राप्त करने में चेतना की अनुभूति जरूरी है।चेतना का अपना भी कुछ स्वरूप,उद्देश्य,कार्यक्रम,बल वैभव है।उस संबंध में अनाड़ी बने रहने पर मात्र शरीर यात्रा ही चलती रहेगी।चेतना की अपनी निजी सामर्थ्य एक प्रकार से सोई ही पड़ी रहेगी।उसका निर्वाहरत पक्ष ही जाग्रत रहेगा,जिसे समग्र चेतना का कठिनाई से शतांश ही कहा जा सकता है।शेष अंश प्रसुप्त,उपेक्षित या अनगढ़ स्थिति में पड़ा रहे तो उसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।
- बुद्ध को जिस क्षण आत्मबोध उभरा,उसी क्षण वे भगवान बुद्ध बन गए।जिस वट वृक्ष के नीचे यह सुयोग बना वह ‘बोधि वृक्ष’ के रूप में श्रद्धास्पद बना,प्रख्यात हुआ और कृतकृत्य हो गया।आत्मज्ञान की महत्ता,प्रतिक्रिया एवं सिद्ध परिणति का इतना अधिक प्रतिपादन हुआ है कि उससे बढ़कर इस संसार में और कोई बड़ी उपलब्धि मानी ही नहीं गई।गीता में कहा है कि अपने को ही अपना मित्र और अपने शरीर को ही अपना शत्रु बताते हुए कहा है कि अपना उद्धार आप करो अपने को मत गिराओ।
सामान्यतया यह कथन कबीर की ‘उलटबाँसी’ और बच्चों की ‘कौतुक पहेली’ जैसी लगती है।क्योंकि हर विद्यार्थी का सोचना है कि अपने को कौन नहीं जानता? हर कोई अपना नाम,पता,वंश,धर्म,आयु,व्यवसाय,वैभव,ज्ञान,पद,पराक्रम,कौशल आदि पूछते ही बता सकता है।फिर अपने को न जानने की क्या बात रह गई? शरीर से आत्मा के पृथक होने की,उसे अजर-अमर मानने जैसी कोई बात हो तो उस प्रसंग को भी स्वाध्याय सत्संग में हजारों बार पढ़ा,सुना गया होगा फिर ‘ना जानने’ जैसी क्या बात रह गई,जिसके लिए ‘आत्मबोध’ की बात को इस तरह सिर पर उठाया जाए और उसमें सफल होने पर सामान्य से असामान्य बन जाने का माहात्म्य सुनाया जाता रहे? - बात की गंभीरता को समझा जाना चाहिए।हम अपने संबंध में मात्र उतना ही जानते हैं,जितना शरीर निर्वाह,परिपोषण या समाज व्यवहार के लिए दैनिक जीवन में काम आता है।कुशलता पदार्थ संबंध तक सीमित है,यह कहा जा चुका है।यह चेतना पक्ष समग्र चेतना का कठिनाई से शतांश होगा।इसके अतिरिक्त जो आत्मवैभव शेष रह जाता है,इसी से अनजान रहने की बात का बार-बार स्मरण कराया जाता है और कहा जाता है कि जिसके शतांश से जीवनचर्या का इतना बड़ा सरंजाम होगा,डकेला खेला जाता है,उसके शेषांश को भी महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए।
- उसे उपेक्षा के गर्त से निकाला जाना चाहिए और ऐसा अवसर देना चाहिए कि समान चेतना को अपने अध्ययन या जॉब की वे सभी प्रवीणता प्राप्त हो सके,जिसके सहारे विद्यार्थी वस्तुतः नर-पशु जैसे भव-बंधनों से निकलकर विराट चेतना के स्वच्छंद आकाश में विचरता है और वैसा दिव्य अनुभव करता है,जैसा स्वर्गलोक में निवास या जीवन मुक्ति जैसा हाथों-हाथ जैसा रसास्वादन है।
- उथली सांस लेने वालों के फेफड़ों का एक छोटा भाग काम में आता है और शेष ऐसे ही निष्क्रिय पड़ा रहता है। इसी क्षेत्र में विषाणु पलते और प्राण संकट उत्पन्न करते हैं।चेतना का निष्क्रिय पक्ष स्तरीय सक्रियता में संलग्न न होगा तो उस अँधेरी कोठरी में ऐसे तत्त्व पलेंगे जो पतन-पराभव के गर्त में व्यक्तित्व को गिराते रहे और सड़न उत्पन्न करके उस क्षेत्र को दुर्गंध से भरते रहे।
चेतना का कार्य क्षेत्र उससे कहीं अधिक व्यापक है,जितना कि परिवार,समाज के छोटे दायरों में बहिरंग जीवन में प्रयुक्त होता है।हाडमाँस की अपनी हस्ती और क्षमता है,किंतु इससे भी महत्त्वपूर्ण अदृश्य शरीर,आत्मा की उपलब्धि है और वे यदि सजग सक्रिय हो सकें तो स्थूल शरीर की तुलना में अत्यधिक महत्त्व के काम कर सकते हैं। - अतः अपनी आत्मिक शक्तियों के जागरण के लिए स्वाध्याय-सत्संग,अध्ययन-मनन-चिंतन करते रहना चाहिए तथा मन को विकारों से मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए।तभी आप अपनी अन्तर्निहित शक्तियों को जान सकेंगे और जगा सकेंगे।
- उपर्युक्त आर्टिकल में विद्यार्थी जीवन उन्नत कैसे बनें के 6 रहस्य (6Secret of How to Improve Student Life),व्यावहारिक जीवन उन्नत कैसे बनें? (How to Lofty Practical Life?) के बारे में बताया गया है।
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6.मां की आज्ञा (हास्य-व्यंग्य) (Mother’s Command) (Humour-Satire):
- मां:देखो बेटे घर में तमीज से रहना चाहिए।जब मैं कुछ बोलूं तो तुम्हें हाँ मिलानी चाहिए,समझे।
- बेटाःसमझ गया,पापा की तरह मिट्टी का माधो बनना है। अपनी आत्मा का हनन करके रहना है।
7.विद्यार्थी जीवन उन्नत कैसे बनें के 6 रहस्य (Frequently Asked Questions Related to 6Secret of How to Improve Student Life),व्यावहारिक जीवन उन्नत कैसे बनें? (How to Lofty Practical Life?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.शरीर और आत्मा के कार्य में क्या फर्क है? (What is the difference between the work of the flesh and the spirit?):
उत्तर:स्थूल शरीर बोझिल होने के कारण धीमे चलता है और जल्दी थकता है,पर सूक्ष्म शरीर का भार न होने से वह प्रकाश से भी अधिक गति के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचता है।
प्रश्न:2.शरीर का अस्तित्व कैसे बना हुआ है? (How does the body exist?):
उत्तर:पदार्थ और प्राण का,जड़ और चेतन का समन्वय ही शरीर का अस्तित्व बनाए हुए है।वे दोनों पृथक होते हुए भी परस्पर इतने गुँथे हुए हैं कि एक के बिना दूसरे की गति नहीं।
प्रश्न:3.शरीर के बिना प्राण क्या है? (What is Prana without Body?):
उत्तर:प्राण सत्ता आकाश में वायुभूत होकर भले ही घुमड़ती रहे पर दृश्य जगत में अपने अस्तित्व का परिचय देना या किसी प्रकार का अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर सकना सम्भव नहीं होता।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा विद्यार्थी जीवन उन्नत कैसे बनें के 6 रहस्य (6Secret of How to Improve Student Life),व्यावहारिक जीवन उन्नत कैसे बनें? (How to Lofty Practical Life?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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