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How is Experienced True Savant?

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1.अनुभवी सच्चा ज्ञानी कैसे हैं?(How is Experienced True Savant?),अनुभव से सच्चा ज्ञान कैसे हो (How Can There Be True Knowledge from Experience?):

  • अनुभवी सच्चा ज्ञानी कैसे हैं?(How is Experienced True Savant?) क्योंकि अनुभव ही ज्ञान के सही और गलत होने का बोध कराता है।केवल पुस्तकों को रट लेने से सैद्धांतिक ज्ञान तो हो जाता है परंतु उसकी परख अनुभव से गुजरे बिना नहीं हो सकती।
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2.अनुभवी कौन होता है? (Who is experienced?):

  • ‘मैं कहता आँखन देखी,तू कहता कागद की लेखी’,कबीरदास के अंतस् की अंतर्कथा में अनुभव का पुट गहरा है।अनुभव का यह तत्व बयाँ करता है कि जो स्वयं का सच है,खुद का देखा-परखा,जाना-पहचाना है,अपना है,इसी में अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति होती है।जो व्यक्त होता है,वही अपना होता है,शेष तो कागज की लेखी है।अर्थात् दूसरों का सच,अपना नहीं।जो अपना नहीं वह जूठा भी है और झूठा भी।जूठा इसलिए कि दूसरों ने कहा है और झूठा इसलिए कि हमने अनुभव नहीं किया।अनुभव ही सच्चा ज्ञान है।अनुभव ही संवेदित करता है।
  • अनुभव,जीवन का अनुभव! इसके फलक के विविध पहलुओं को जिसने संस्पर्श किया है,अंतस् की गहराई में जिसने पाया है,वही सच्चा ज्ञानी है और उसका अनुभव ही सच्चा ज्ञान है।वह ज्ञान चाहे किसी अनगढ़ हल चलाने वाले किसान का हो या आजीविका के साधन के लिए रिक्शा खींचने वाले का।वह ज्ञान आधुनिकता के श्रृंगार में थिरकते पांवों का हो या जनसेवा के लिए स्वच्छता अभियान में लगे हाथों का,सच्चा है।शेष तो अज्ञान है,क्योंकि वह दूसरों की सच्चाई की व्याख्या और बयान है।अनुभव अपने अंतर की गहराई में उतरकर ही पाया-जाना जाता है,इसके लिए चाहे कोई भी और कहीं भी क्यों ना हो।अनुभवी का ज्ञान अंतस् में उजाला भरता है,भावों को तृप्ति देता है,क्योंकि वह उसका बोध करता है,जो है।एवं आंगन के गर्भ में छिपा प्रकट होने वाला है।वहां भ्रम नहीं है,आंकड़ों का कुहासा नहीं है।’शायद ये है या वह’ का संशय नहीं है।अनदेखा संदेह नहीं है।
  • अनुभव जो देखता है,वही बोलता है।उसके देखने और बोलने में तारतम्य है,उसकी दृष्टि और वाणी में सच्चाई है,श्रृंगार है,संगीत है।संगीत तो भावों से फूटता है,सिंदूरी श्रृंगार की आभा इसी से झलकती है।वाणी वही बोलती है,जिसे आंखों ने गहराई से देखा हो।और वह मात्र बोलता नहीं,देखता नहीं,जीवन में वही करता भी है।ऐसी दुर्लभ घटना बिरलों में घटती है,परंतु घटती अवश्य है और जिसके जीवन में अनुभव की सच्चाई घटती है,वही तो एकमात्र सुंदर आंखों वाला है।फिर इसके लिए स्थूल आंखें खराब ही क्यों ना हों,सूरदास के समान आंखें अंधी ही क्यों ना हो,वह मनोहर कृष्ण की छवि को अपने अंतर में सदा देखता है और आनंदित होता है।शेष तो आंखें पाकर भी देख नहीं पाते,अंतर में छलकते उमड़ते-घुमड़ते भावों के अमृत से अपरिचित होते हैं और इस समंदर के कण मात्र को पाने के लिए बाहर भटकते फिरते हैं।अंदर उतरने की बजाय बाहर भटकने वाले भ्रम,संशय और संदेह में स्वयं और औरों को अधिक दिग्भ्रमित करते हैं तथा जीवन की सच्चाई से अनभिज्ञ-अनजान बने रहते हैं।

3.अनुभवी को बोध होता है (The experienced realizes):

  • अनुभव की आंखें आर-पार देखती हैं।वह ऐसा देखता है,जैसे किताबों के पृष्ठों में साफ-साफ उभरे अक्षर।वह अक्षरों के मेल से बने शब्द,शब्दों से संरचित वाक्य और वाक्यों से रचित ग्रंथ को पढ़ता ही नहीं,बूझता और बोध करता है।उसके लिए जीवन की किताब संसार की सभी चीजों से अनोखी,अद्भुत एवं रोमांचक होती है,क्योंकि उसके हर अक्षर,हर शब्द और प्रत्येक वाक्य की संरचना नित नवीन एवं नूतन परिभाषा गढ़ती है।वहां नवीनता कभी भी पुराने आवरणों से आच्छादित नहीं होती है,जो एक बार घटा,दूसरी बार नहीं घटता।जैसे अखंड प्रवाहित नदी की धारा में जल अपने स्रोत से सतत नया ही होता है।पंखुड़ियों में गिरती ओस की बूँदें प्राची से आती सुनहली किरणें कभी भी पुरानी और बासी नहीं होती हैं।ठीक उसी प्रकार जीवन के विविध आयाम सदा-सर्वदा अभिनव नयनाभिराम होते हैं यह कागज की लेखी नहीं,आंखन की देखी है।
  • अनुभवी अनोखा देखता है और बोलता भी ऐसा है,जिसे न कभी बोला गया और ना कभी सुना ही गया।इस अनबोले,अनकहे और अनसुने को जगत नकारता है,अस्वीकार करता है और कहता है कि जो आज तक कभी हुआ नहीं,देखा-जाना नहीं गया,वो कैसा सच हो सकता है।संसार की दृष्टि में सच तो यही बासी,पुरानी,सड़ी हुई चीजें ही हैं,जिसे आंखों वाले अंधे कहते हैं,प्रचलित मान्यताओं की अंधता से घिरे ये झूठ ही यहां की सचाई है।बड़ी विनम्रता से अंधेपन और झूठे शब्दों को लिखा जा रहा है,जिसका तात्पर्य है कि जो हमें दीखता नहीं और जिसे हम जान नहीं पाते।इस अंधता और झूठ के अभेद्य आवरण में आवृत संसार आंख वाले भेदक दृष्टि की वाणी के मर्म को भला कैसे स्वीकार कर ले।उसके लिए वही सच है,जो लोग कहते हैं और झूठ वही,जो लोक-मान्यता में प्रचलन में ना हो।इसे क्या लेना-देना,अनुभव के इस मर्म से,जिसमें सबके लिए एक नया प्रकाश है,जीवन के रहस्यों को भेदने के लिए नूतन एवं सामयिक,परंतु सार्वकालिक दृष्टि है।बैसाखी से चलने वाले को अपने पैरों पर भला कहां भरोसा होता है।यही हाल संसार का सच है।अतः यहां हर आने वाले देवदूत,अवतारी,संत,महात्माओं के अनुभवों से उपजी वाणी को झुठलाया जाता है।
  • अनुभवी निर्भीक,निडर हो अपने अंतर के संगीत की मिठास से सबको परिचय कराना चाहता है,परंतु सदियों से बहरे कान भला कैसे उन स्वर्गीय स्वरों को सुन सकेंगे।ना सुने इसमें भी भला है,पर उस संगीत को झूठा मानकर उसे जो अपमान,तिरस्कार,लांछन एवं क्रूर यातना देने का अमानवीय हथकंडा अपनाया जाता है,उसे क्या कहा जाए,क्या शब्द दें? सभ्य जगत की इस तथाकथित सभ्यता पर अनुभवों का सच मुस्कराता है।संसार की इस अंधी भीड़ में ‘आँखन देखी’ पर कागज की लेखी भारी पड़ती है।सच पर झूठ का कुहासा प्रबल होता है,परंतु सच का सतेज सूर्य झूठ की बदली में कब,भला कब तक ढका-ढँपा रह सकता है।सच की किरणें अंतस् को भेदती और उसमें उभरती चली जाती हैं।भ्रम और संशय के आवरणों को चीरती चली जाती है।बेहोशजनों को जगाती,भटकाओं से भटकों को उबारती,दिग्भ्रमितों को नूतन पथ देने वाली यह श्रेष्ठ आत्माएं अपना सर्वस्व बलिदान-कुर्बान करके भी सत्य का प्रकाश बाँटती हैं।व्यक्ति के अंतस् में संवेदना की सुरलहरी सजाती है।इस सत्प्रयास के अंत में ‘कागज की लेखी’ पर ‘आँखन देखी’ विजयी होती है।
  • अंतर का दिव्य आनंद,संवेदना का वह संगीत,सेवा-सहकार से उपजा वह उमंग-उल्लास सभी कुछ अनुभव की सच्चाई है।इन दिव्य तत्त्वों का सच,मात्र अनुभव का सच है,जिसे हम में से हर कोई पा,देख और जान सकता है।बस,क्रमशः अपने अंतर में उतरने की बात है।हर व्यक्ति अपनी स्थिति-परिस्थिति के अनुरूप,कुशल मार्गदर्शक एवं सलाहकार के मार्गदर्शन एवं सलाह से अपने भावों की गहराई में डूबकर वह सब कुछ पा सकता है,जिसकी प्राप्ति के अभाव में सब मात्र कपोल कल्पना लगता है।कबीर की वाणी,नानक के बोल,सूरदास के सुर और मीरा के गीत सब कुछ अनुभव का सच है,आँखन देखी है।इसे हम भी अनुभव कर सकते हैं,बस,हमें बाहर से अंदर की ओर मुड़ना होगा। अंदर मुड़कर जब गति और लय बन जाती है,अंदर-बाहर का भेद समाप्त हो जाता है,सब एक हो जाता है।अतः हमें अपने ही अंदर उतरकर अनुभव के दिव्य प्रसाद से,आस्वाद से आनंदित होने का प्रयास करना चाहिए।

4.अनुभव के लिए आचरण जरूरी (Conduct is necessary to be experienced):

  • केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही जरूरी नहीं है बल्कि व्यावहारिक और आध्यात्मिक ज्ञान भी जरूरी है।सैद्धांतिक ज्ञान को,किताबी ज्ञान को जब तक आचरण में नहीं उतारा जाता है,तब तक बात बनती नहीं है।अनुभवी होने के लिए अधिक उम्र का होना जरूरी नहीं है।एक अधिक उम्र के व्यक्ति से कम उम्र का व्यक्ति अधिक अनुभवी हो सकता है।उदाहरणार्थ सत्य बोलने की पुस्तक पढ़ लेने या उपदेश सुन लेने तथा उनको याद करने से इसे आप विद्वान तो बन सकते हैं परंतु ज्ञानी नहीं।क्योंकि सत्य बोलने के लिए नियम,तकनीक पता होने पर भी व्यावहारिक रूप से आप झूठ बोल सकते हैं या बोलते हैं तो सिर्फ विद्वान है ज्ञानी नहीं।
  • जिस व्यक्ति को कुछ भी पता नहीं है,अज्ञानी है उससे पुस्तकें और सत्साहित्य पढ़ने वाले श्रेष्ठ हैं,पुस्तकें और सत्साहित्य पढ़ने वालों से उनको धारण (स्मरण) करने वाले श्रेष्ठ हैं।स्मरण करने (धारण करने) वाले से ज्ञानी (पुस्तकों और सत्साहित्य को समझने वाले) श्रेष्ठ हैं और ज्ञानियों की अपेक्षा उसके अनुसार आचरण करने वाले श्रेष्ठ होते हैं।आचरणवान व्यक्ति को ही अनुभवी व्यक्ति कहा जा सकता है।
  • अनुभव अर्जित होता है जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने,अपने दुर्गुणों के विरुद्ध संघर्ष करने,जीवन की वास्तविक सच्चाइयों का ज्ञान होने से,पढ़े हुए पर अमल करने से।ऐसे अनेक महामानवों के उदाहरण मिल जाएंगे जिन्होंने कम उम्र में ही अनुभव कर लिया जिससे बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी भी अर्जित नहीं कर पाए थे।नचिकेता की उम्र क्या थी जब उन्होंने राजा वाजश्रवा (पिता) से यह कह दिया था कि उन्हें भी दान कर दिया जाए।बाल ब्रह्मचारी हनुमान की क्या उम्र थी जो उन्होंने सूर्य को ही धर दबोचा,ध्रुव और प्रहलाद ने अल्पायु में ही ऐसा ज्ञान प्राप्त कर लिया था जो ऋषि-तपस्वी,महर्षि भी प्राप्त नहीं कर पाए थे।
  • जो परिस्थितियों,संघर्षों से घबराकर भाग खड़ा हो जाता है वह अनुभव अर्जित नहीं कर सकता है,उसे अनुभवी नहीं कह सकते हैं।भगवान कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि न दैन्यं न पलायनम् अर्थात् न तो हार स्वीकार करना चाहिए और न कर्मक्षेत्र,कर्त्तव्य क्षेत्र से भागना चाहिए।

5.छात्र-छात्राएं अनुभवी हों (Students should be experienced):

  • छात्र-छात्राएँ अनुभवी कैसे हो सकते हैं,कैसे आचरणवान हो सकते हैं? अनुभवी होने के लिए मन,बुद्धि और आत्मा शुद्ध होनी चाहिए।विद्यार्थी काल केवल जॉब की तकनीक सीखने के लिए नहीं मिला है बल्कि इसके साथ विद्या भी ग्रहण करनी चाहिए।अनुभवी होने के लिए जरूरी है सत्य,विद्या,तप का होना।सत्य से मन शुद्ध होता है,क्योंकि सत्य में छल-कपट और मिथ्या तत्त्व नहीं होता इसलिए मन भी इन अवगुणों से बचा रहता है।जितने भी छल-कपट,बेईमानी,धूर्तता,परीक्षा में नकल करना,अनैतिक तरीकों से उत्तीर्ण होना,बलात्कार,अपहरण,डकैती,नशा करना आदि मन के पतन के कारण ही होते हैं।अतः मन को शुद्ध करने के लिए सत्य का आचरण करना चाहिए।
  • विद्या और तप से आत्मा का उत्थान और विकास होता है।आत्मा तो निर्विकार,शुद्ध,स्वच्छ और पवित्र होती है फिर आत्मा के शुद्धिकरण से क्या आशय है,क्या आशय हो सकता है? यहां आत्मा के शुद्ध होने से तात्पर्य है आत्मा पर छाए हुए मल,विक्षेप,आवरण और अज्ञान का पर्दा छाया रहता है वे विद्या और तप से हटने लगते हैं और आत्मा अपने पवित्र स्वरूप में प्रकट हो जाती है याकि आत्मा के शुद्ध स्वरूप का अनुभव हो जाता है।तप अर्थात् द्वन्द्वों जैसे सुख-दुःख,हानि-लाभ,सर्दी-गर्मी,जय-पराजय आदि को सहज भाव,समभाव रखना ही तप है।विद्या से अज्ञान का आवरण हटता है और आत्मा शुद्ध होती जाती है।
  • बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है और अज्ञान से बुद्धि अशुद्ध तथा मलिन होती है अतः ज्ञान को उपलब्ध करने का प्रयत्न जीवनपर्यंत निरंतर रूप से करते ही रहना चाहिए क्योंकि ज्ञान का कोई अंत नहीं,जितना ज्ञान प्राप्त करो उतना ही कम मालूम पड़ता है।
    विद्यार्थियों को यह समय इसीलिए मिला है कि ज्ञान अर्जित करें और अर्जित ज्ञान को अमल में लें क्योंकि अमल में नहीं लेने पर हम उस ज्ञान का लाभ नहीं उठा सकते हैं।ज्ञान का लाभ उठाने के लिए मन को वश में रखकर उचित आचरण करना चाहिए ।ज्ञान और अनुभव ही वास्तविक संपदा होती है क्योंकि ज्ञान और अनुभव न तो खर्च होता है और न नष्ट होता है जबकि अज्ञान से गुण नष्ट हो जाते हैं यही अज्ञानी की विपत्ति है।जो सद्गुणों की संपत्ति उपलब्ध कराएँ वही सच्ची शिक्षा है और जो सद्गुणों को आचरण में उतारता है वही शिक्षार्थी है।
  • विद्यार्थी में मानवीय गुण विद्या के कारण प्रकट होते हैं।जो विद्या विद्यार्थी में अहंकार,धूर्तता,चालाकी,छल-कपट और अन्यायपूर्ण आचरण करने की भावना पैदा करती है वह विद्या नहीं अविद्या होती है।विद्यावान विद्यार्थी विनयशील होता है अहंकारी नहीं।यदि विद्या या शिक्षा प्राप्त करके भी विनयशीलता न आए तो विद्या प्राप्त करना व्यर्थ हो जाता है।जो विद्या विद्यार्थी को विनयशील न बनाती हो वह दरअसल विद्या होती ही नहीं,अविद्या होती है।
  • थोड़े से गुणवाला विद्यार्थी भी उसको आचरण में उतारता है तो वह होशपूर्वक काम करने का अभ्यस्त हो जाता है।अनुभव से गुजरे बिना कोई ज्ञान,उपदेश,विद्या जीवन का अंग नहीं बन सकता है।जैसे तैरना सीखने के लिए पुस्तकें पढ़ना और उस पर लंबे-चौड़े भाषण देना अलग बात है और पानी में कूद कर तैरना अलग बात है।तैरना सीखने के लिए पानी में कूदना ही होगा,अनुभव से गुजरना ही होगा।जिस बात का हमें अनुभव नहीं होता उस बात से हमारे जीवन का तादात्म्य नहीं होता है,वह बात हमारी अनुभूति नहीं होती।जागरूक रहकर,होशपूर्वक जीवन के अनुभव प्राप्त करने से हमारे व्यक्तित्व का,हमारे चरित्र का निर्माण होता है।विद्यार्थी काल में विद्यार्थियों को विद्या अर्जित करने के लिए निर्देश,उपदेश दिया जाता है क्योंकि बाल्यकाल में संस्कार डालना आसान होता है।लेकिन परिपक्वास्था के बाद चरित्र का गठन मुश्किल होता है या जिस तरह का चरित्र का गठन हो जाता है वह वैसे ही करने का आदी हो जाता है।जैसे कच्चे घड़े पर मिट्टी चढ़ाई जा सकती है परंतु घड़े के पक जाने पर मिट्टी नहीं चढ़ाई जा सकती है।अतः इस काल में विद्या ग्रहण करने और अनुभव अर्जित करते रहना चाहिए केवल जॉब की तकनीक सीखना ही पर्याप्त नहीं है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में अनुभवी सच्चा ज्ञानी कैसे हैं?(How is Experienced True Savant?),अनुभव से सच्चा ज्ञान कैसे हो (How Can There Be True Knowledge from Experience?) के बारे में बताया गया है।

Also Read This Article:दूसरों के अनुभवों से सीखना

6.अनुभव का सच (हास्य-व्यंग्य) (Truth of Experienced) (Humour-Satire):

  • एक छात्र ने सवालों की फेहरिस्त बनाकर शिक्षक को हल करने के लिए पाठ्यपुस्तक और नोटबुक दे दी।शिक्षक ने उनमें से एक सवाल को हल करके बाकी सवाल बिना हल किये ही नोटबुक लौटा दी।शिक्षकःयह बाकी के सवाल तुम्हारे हल करने के लिए ही हैं।
  • छात्रःसर,ये सभी आपके हल करने के लिए है अतः इनको हल कर दो।
  • शिक्षक:मैं भी पहले ऐसे ही बेवकूफियां करता था इसी कारण मेरा यह हाल हो गया (सभी सवाल हल नहीं कर पाता)।

7.अनुभवी सच्चा ज्ञानी कैसे हैं?(Frequently Asked Questions Related to How is Experienced True Savant?),अनुभव से सच्चा ज्ञान कैसे हो (How Can There Be True Knowledge from Experience?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या अनुभव सीखने का सबसे सरल रास्ता है? (Is experience the simplest way to learn?):

उत्तर:नहीं,अनुभव सीखने का सबसे कठोर रास्ता है।जहर खाने से मृत्यु होती है उसे अनुभव करके देखने की जरूरत नहीं है।दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाना भी एक अनुभव है।

प्रश्न:2.अनुभव से क्या शिक्षा मिलती है? (What is the lesson from experience?):

उत्तर:अनुभव-प्राप्ति के लिए अत्यधिक मूल्य चुकाना पड़ता है,परंतु उससे जो शिक्षा मिलती है वह अन्य किसी साधन द्वारा नहीं मिल सकती।

प्रश्न:3.अनुभव और पुस्तकीय ज्ञान में क्या अंतर है? (What is the difference between Experience and Bookish Knowledge?):

उत्तर:कष्ट,कठिनाइयों,व्यथा और वेदना की पाठशाला में जो पाठ सीखे जाते हैं,वे पुस्तकों तथा विश्वविद्यालय में नहीं मिलते।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा अनुभवी सच्चा ज्ञानी कैसे हैं?(How is Experienced True Savant?),अनुभव से सच्चा ज्ञान कैसे हो (How Can There Be True Knowledge from Experience?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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