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9 Tips on How Not to Be Conservative

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1.रूढ़िवादी कैसे न बनें के 9 सूत्र (9 Tips on How Not to Be Conservative),रूढ़िवादी कैसे न बनें? (How Not to Be Conservative?):

  • रूढ़िवादी कैसे न बनें के 9 सूत्र (9 Tips on How Not to Be Conservative) के द्वारा हम समझेंगे कि रूढ़िवादी से क्या आशय है? हम रूढ़िवादी क्यों न बनें? रूढ़िवादी होना हमारे विकास में कैसे बाधक है?
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2.रूढ़िवादी कौन होते हैं? (Who are conservatives?):

  • जो परंपरा को पावन समझता है,समाज के विद्यमान क्रम को यथावत बनाए रखना चाहता है तथा सब प्रकार के परिवर्तनों एवं प्रगति का विरोध करता है,वे रूढ़िवादी होते हैं।
  • रूढ़िवादियों का विश्वास है कि नियति समाज पर शासन करती है,वे परंपरा से चिपटे हुए हैं,समाज में वर्ग-पद्धति की अपरिहार्यता में विश्वास रखते हैं तथा निजी संपत्ति और स्वाधीनता को सम्बद्ध करते हैं।रूढ़िवादी सामाजिक परिवर्तनों के प्रति प्रतिकूल अभिवृत्ति अपनाता है तथा निहित वर्गीय हितों का समर्थन करता है यानी रूढ़िवादी उनको यथापूर्ण स्थिति में रखना चाहता है।
  • माता-पिता और संतान की अभिवृत्तियों में शिक्षकों तथा शिष्यों की अभिवृत्ति की अपेक्षा अधिक समानता पाई जाती है।आमूल परिवर्तनवादी माता-पिता उदार तथा स्नेही होते हैं और अपने बच्चों को अधिक स्वतंत्रता देते हैं,जबकि रूढ़िवादी माता-पिता अधिक अनुशासन-प्रिय होते हैं तथा उन्हें अपने अधीन बनाए रखना चाहते हैं।

3.वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता क्यों पड़ी? (Why was the scientific approach needed?):

  • संसार में विज्ञान के विकास की आवश्यकता क्यों पड़ी? तथा इसके मूल में सिर्फ विश्व की भौतिक उन्नति कारणभूत है या कुछ और भी?अक्सर इस प्रकार के प्रश्न जिज्ञासुओं के मस्तिष्क को ज्वार-भाटे की तरह मथते रहते हैं,पर समाधान न मिल पाने के कारण उनकी उधेड़बुन ज्यों-की-त्यों बनी हुई है और वे यह निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि आस्थाओं,मान्यताओं,रूढ़ियों के परिवर्तन-परिष्कार में भी इसकी कोई भूमिका है क्या?
  • अंतिम प्रश्न पर विचार करने से पूर्व तनिक इस विषय पर चिंतन करना पड़ेगा कि वास्तव में विज्ञान है क्या? परिभाषा की दृष्टि से सोचें,तो किसी भी वस्तु के क्रमबद्ध और विवेकसम्मत ज्ञान को ‘विज्ञान’ कहते हैं।इसे इसकी समग्र और पूर्ण परिभाषा कही जा सकती है,कारण कि इसमें सूत्र रूप में वह सारी बातें सन्निहित हैं,जो इसकी समग्रता के लिए अभीष्ट और आवश्यक हों।इतने पर भी इन दिनों विज्ञान से प्रायः जिस विधा का अर्थ लगाया जाता है,वह है-तकनीकी या यांत्रिक ज्ञान।इसमें दो मत नहीं कि पदार्थ सत्ता के लगातार अन्वेषण और अनुसंधान के फलस्वरूप आज उसका वह स्वरूप ही सर्वसाधारण के सामने अधिक स्पष्ट और उजागर है,जिसे ‘मशीनी ज्ञान’ कहते हैं,तो फिर भी पदार्थ विज्ञान सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।स्थूल दुनिया के अंतर्गत पदार्थ से संबंधित जितने भी गोचर,अगोचर दृश्य एवं घटनाएं हैं,उन सभी को उस विभाग में रखना पड़ेगा और उनका अध्ययन-विश्लेषण कर उस तह तक पहुंचना पड़ेगा,जहां साधारण सोच और साधारण बुद्धि पहुंच पाने में असमर्थ है।संक्षेप में यही है विज्ञान और वैज्ञानिक चिंतन।इसकी कितनी ही शाखाएं हैं।फिर प्रत्येक की पृथक-पृथक अनेक शाखा-प्रशाखाएँ हैं।इनमें से किसी से भी संबंधित वह प्रकरण विज्ञान की ही विषयवस्तु कहलाएगी।इस प्रकार इसे तर्क और तथ्यसम्मत दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाला प्रामाणिक कहा जा सकता है।
  • वॉल्टर मरे अपनी पुस्तक ‘साइंस एंड सोसाइटी’ में लिखते हैं कि सम्प्रति संसार में जिस प्रकार का भौतिक उत्कर्ष हुआ है और जितने सुविधा-साधन बढ़े हैं,उसका श्रेय निश्चित रूप से विज्ञान को जाता है,पर उसको समाज के सिर्फ पदार्थपरक विकास तक ही सीमित नहीं माना जाना चाहिए,उसे विचारों में भी क्रांति आई और जनमानस में एक ऐसी सोच पैदा हुई,जिसे वैज्ञानिक कहा जा सके।इस नए चिंतन ने विकृत आस्थाओं पर कुठाराघात करना प्रारंभ किया।परिणाम यह हुआ कि लंबे समय से समाज में जड़ें जमाये रहने वाली अंधमान्यताएं,कुप्रथाएँ और चित्र-विचित्र परंपराएं अस्तित्व बचाए रखने वाले ठोस आधार के अभाव में अपनी मौत मरने लगीं।

4.विज्ञान के द्वारा भी अन्धमान्यताओं को प्रश्रय (Science also promotes superstitions):

  • परंपराएं और प्रथाएँ सदैव सामयिक आवश्यकताओं और तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए गढ़ी जाती हैं।इसी कारण से एक ही समय में अलग-अलग संस्कृतियों में पृथक-पृथक प्रचलन देखे जाते हैं।यह सनातन नहीं होते।समय के साथ-साथ  बदले परिवेश में तदनुकूल परिवर्तन इनमें आवश्यक होता है।यदि ऐसा नहीं हुआ,तो ओछी मान्यताओं और प्रतिगामी विचारों के कारण समाज की अवस्था पिछड़ों की-सी हो जाती है।वैज्ञानिक विचारधारा इसी हेय मनोदशा से समाज और संस्कृति को उबारकर उस स्थिति में पहुंचाती है,जिसे ‘प्रगतिशील’ कहा जा सके।विज्ञान को इसीलिए प्रगतिशीलता का पर्याय माना जाता और समझा जाता है कि वह हर प्रकार के बेतुके सिद्धांतों और भौंडी अवधारणाओं को विवेकशीलता की तराजू पर तोलते हुए अमान्य कर देगा।
  • दुर्भाग्य की बात है कि जो विज्ञान अब तक व्यक्ति और समाज को आगे बढ़ाने एवं ऊंचा उठाने में प्रयत्नशीलता था,अब उसी से पिछड़ेपन को प्रश्रय एवं प्रोत्साहन मिलने लगा है।इसके कई उदाहरण हमारे समक्ष हैं।आज से कुछ वर्ष पूर्व आस्ट्रिया के जीव-वैज्ञानिक फ्रैंक सलोवे ने ‘अमेरिकन एसोसिएशन फाॅर दि एडवांसमेंट ऑफ साइंस’ नामक अमेरिकी संस्थान में अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट भेजी।उसके द्वारा उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि प्रथम संतान प्रतिभा की दृष्टि से साधारण होती है,जबकि बाद की संताने अत्यंत प्रतिभाशाली।सलोवे के इस सिद्धांत के पीछे न तो कोई वैज्ञानिक तर्क था,न तथ्य।यह सिर्फ सर्वेक्षणों पर आधारित निष्कर्ष था।फिर उनके इस थ्योरी से विज्ञान जगत में तहलका मच गया,कारण कि यह अपने प्रकार का एकदम नवीन प्रतिपादन था।इसकी सत्यता जाँचने के लिए विश्वभर में अनेक अध्ययन हुए,पर एकाध को छोड़कर परिणाम ‘जन्म-क्रम सिद्धान्त’ के बिल्कुल विपरीत गया।
  • अनेक वर्षों तक इस क्षेत्र में लगातार अध्ययन करने के उपरांत स्वीडन के दो मूर्धन्य मनःशास्त्रियों सीसाइल आर्नेस्ट एवं जूलियस संगस्ट ने एक पुस्तक लिखी,नाम था-‘बर्थ ऑर्डर’।इसमें उन्होंने इस बात का स्पष्ट खंडन किया है कि जन्म-क्रम का प्रतिभा से कोई संबंध है।उन दोनों ने सलोवे जैसे प्रतिष्ठित विज्ञानवेत्ता द्वारा इस प्रकार का अवैज्ञानिक कथन करने पर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि केवल जन्म के आगे-पीछे होने मात्र से कोई प्रतिभावान बन जाए और दूसरा बालक प्रतिभाहीन बना रहे,यह बात गले नहीं उतरती।शरीर विज्ञान में ऐसा कोई सिद्धांत भी नहीं,जिससे इसकी पुष्टि होती हो।इस प्रकार उक्त मत निरस्त हो गया।

5.प्रतिभा के अजीब तर्क (Strange arguments of genius):

  • यह संसार विशाल है।इसमें अध्ययन द्वारा ऐसे कुछ उदाहरण मिलें भी कि बाद की संतति मेधावान होती हैं,तो इसे किसी निश्चित नियम के अधीन नहीं रखा जा सकता,केवल संयोग ही कहा जा सकता है और न उसके आधार पर किसी मत की स्थापना की जा सकती है,क्योंकि खोजबीन से इसके विपरीत प्रमाण भी इकट्ठे किए जा सकते हैं।तब दूसरा पक्ष इससे ठीक उल्टी स्थापना करना चाहेगा।इससे विज्ञान सुस्थापित शास्त्र न रहकर उपहास बन जाएगा,कारण कि केवल सर्वेक्षणों पर आधारित ज्ञान को विज्ञान नहीं कहते हैं,उसके पीछे ठोस आधार और कारण होने चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है? जब तक इस ‘क्यों’ का उत्तर नहीं मिलता,प्रतिपादन को वैज्ञानिक व्याख्या के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता।
  • पिछले समय विज्ञान क्षेत्र में इसी तरह का एक अन्य ऊटपटांग दावा किया गया।प्रतिपादनकर्ता थे-डॉक्टर रैण्डी थाॅर्नबिल।यह कोई सामान्य पढ़े-लिखे साधारण व्यक्ति नहीं,वरन् न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय में प्राणिशास्त्र के प्राध्यापक हैं।उनके अध्ययन-निष्कर्ष के अनुसार शरीर-सौष्ठव का बुद्धि से गहरा संबंध है।वे कहते हैं कि जो शरीर गठन और रूप-लावण्य की दृष्टि से जितना सुंदर और आकर्षक होगा,उसकी बुद्धि उतनी ही कुशाग्र होगी।उक्त निष्कर्ष पर पहुंचने से पूर्व उनने कुछ लोगों की शरीर-संगठन का अध्ययन किया।वे सभी उनकी अवधारणा में खरे उतरे।संयोग से उनने जिनका-जिनका अध्ययन किया,वे सब औसत बुद्धि से कुछ ऊंचे दर्जे के थे।बस,इसी आधार पर उन्होंने यह प्रतिपादन कर डाला कि संसार के सभी सौंदर्य संपन्न बुद्धिमान होते हैं।यदि वास्तव में ऐसी बात होती,तो दुनिया की समस्त सुंदरियाँ मेधावान होती,पर ढूंढने पर अगणित ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे,जो उनके इस मत का खंडन करते हैं।यहां ऐसी रूपसियों की कमी नहीं,जिनमें साधारण स्तर की भी बुद्धि का अभाव होता है और वे मन्दमती मानी जाती हैं।इसके विपरीत ऐसे लूले-लंगड़े तथा काने-कुबड़े भी देखे जाते हैं,जो मेधावान ही नहीं,प्रज्ञावान भी होते हैं।विरजानंद,सूरदास,अष्टावक्र आदि ऐसे ही नाम हैं।इस प्रकार थाॅर्नबिल की प्रस्तुत विचारधारा अमान्य हो जाती है।उनका यह मत लंदन के ‘संडे टाइम्स’ नामक प्रतिष्ठित पत्र में कुछ समय पूर्व प्रकाशित हुआ था।

6.लड़के-लड़की के जन्म के प्रतिगामी विचार (Retrograde Ideas of the Birth of Boys and Girls):

  • बात यहीं समाप्त नहीं होती।अब विज्ञानवेत्ता लड़के-लड़की के जन्म के संबंध में भी ऐसे ही प्रतिगामी विचार प्रकट कर रहे हैं।’न्यू साइंटिस्ट’ नामक लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका में विगत दिनों एक खबर छपी थी कि जिन लड़कियों को प्रथम संतान के रूप में बेटा चाहिए,उन्हें अपने से कई वर्ष बड़े पुरुष से शादी करनी चाहिए और जो पहली संतान बेटी चाहती हों,उनको अपने से कम उम्र या हम उम्र मर्द से विवाह करना चाहिए।
  • यह निष्कर्ष है इंग्लैंड के लिवरपूल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का।मूर्धन्य विज्ञानी जे. टी. मैनिंग और उनके सहयोगियों ने करीब 300 दंपतियों का अध्ययन किया,जिनमें दोनों प्रकार के जोड़े मौजूद थे,वैसे भी जिनकी पत्नियाँ पति से उम्र में छोटी थीं और वैसे भी,जो या तो अपने पति से बड़ी थीं या समवयस्क। उनका कहना है कि इस सर्वेक्षण का जो परिणाम सामने आया,उसी आधार पर उपर्युक्त दावा किया गया है।

7.अन्धमान्यताओं से विज्ञान पर उंगली उठती है (Superstitions raise fingers at science):

  • सच्चाई तो यह है कि इसे तथ्य नहीं,मात्र संयोग कहना चाहिए।यदि सैंकड़े में पांच-दस उदाहरण ऐसे मिल भी जाएँ,तो इतने से ही कोई स्थिर सिद्धांत तो नहीं बन जाता।फिर भारत में तो जोड़ी बिठाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि वर,वधू से दो-चार साल बड़ा हो।इतने पर भी सहस्त्रों लोग ऐसे मिल जाएंगे,जिनके प्रथम संतति कन्या हुई हो।इतना ही नहीं,उनमें अनेक ऐसे लोग भी सम्मिलित होते हैं,जिनकी पहली ही नहीं,बाद की भी सारी संताने लड़की होती हैं,आखिर क्यों? जबकि उम्र में आवश्यक अंतर बना रहता है।इस सवाल का जवाब वैज्ञानिकों के पास नहीं है,न ही वे उपर्युक्त प्रतिपादन के समर्थन में कोई विज्ञानसम्मत तथ्य प्रस्तुत कर सके कि आयु संबंधी कारण रज और वीर्य में आखिर किस स्तर का परिवर्तन क्यों और कैसे कर देता है कि उससे प्रथम संतान बालक के रूप में ही सामने आए? इसे अंधमतवाद ही कहना चाहिए।
  • अंधमान्यताएं दो स्तरों पर देखी जाती हैं-एक वह जो ग्रामीण स्तर पर अनपढ़ों और अज्ञों में दृष्टिगोचर होती हैं तथा दूसरी वे,जो तथाकथित बुद्धिजीवियों में दिखलाई पड़ती हैं।प्रथम स्थिति को तो सामान्य और स्वाभाविक माना भी जा सकता है,पर दूसरी अवस्था तो एकदम असहनीय है।इसे बौद्धिक रूढ़िवाद ही कहना पड़ेगा।मनुष्य विवेकशील होकर भी अविवेकियों की तरह आस्थाएं और धारणाएं अपनाये तो इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? विशेषकर आज जैसे प्रगतिशील और वैज्ञानिक युग में,जब मत-मतान्तरों के प्रत्येक पहलू को विज्ञान की दृष्टि से जांचा परखा जाता हो और यह सुनिश्चित किया जाता हो कि वे कितने युगानुकूल है।यह दशा तब और असत्य हो जाती है,जब प्रतिपादनकर्ता स्वयं विज्ञान का प्रबल पक्षधर और प्रवक्ता हो।
  • अवैज्ञानिक कथनों से विज्ञान की विश्वसनीयता पर अँगली उठती और संदेह पैदा होता है,लोग यह सोचने पर विवश होते हैं कि कहीं यह वैज्ञानिक अंधवाद तो नहीं? लोकमानस लंबे समय तक सामाजिक रूढ़ियों से ग्रसित रहा।अब यदि उसका स्वरूप और प्रतिपादक परिवर्तित हो जाए,तो इससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता।असत्य विद्वान बोले या मूर्ख-इससे क्या फर्क पड़ने वाला है? मिथ्या तो सदा मिथ्या ही रहेगी।आज हम ऐसी ही वैज्ञानिक रूढ़ियों और भ्रांतियों से घिरते चले जा रहे हैं।कहीं उसका यह रूढ़िवाद हमें युगों पीछे न धकेल दे,इससे हरेक को सचेत रहना चाहिए।

8.रूढ़िवादी बातों का निष्कर्ष (Conclusion of Orthodox):

  • संयोग और संभावनाओं के आधार पर निश्चित नियम और सिद्धांत नहीं बनाए जा सकते हैं।लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संयोग और संभावना का कोई महत्त्व नहीं है।विज्ञान के अनेक आविष्कार संयोगवश हुए हैं और उसके पीछे कोई कठोर परिश्रम का नहीं बल्कि सजगता और होशपूर्वक कार्य करना ही रहा है।इसके साथ ही तर्क,तथ्य और प्रमाण के आधार पर किसी बात को विज्ञानसम्मत मान लिया जाता है परंतु ऊपर हमने देखा है कि तथ्य और प्रमाण उपस्थित होने पर भी प्रतिभा के उक्त उदाहरण सही नहीं है क्योंकि ये तथ्य और प्रमाण संयोग से मिल गए हैं।अतः किसी भी मत को प्रमाणित करने के लिए तथ्य,प्रमाण के साथ-साथ जाग्रत,समझदारी,विवेक और सद्बुद्धि का होना भी जरूरी है अन्यथा उल्टे-पुल्टे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।ऐसी स्थिति में विज्ञान का उपयोग जहां रूढ़ मान्यताओं को हटाने में किया जाना चाहिए वही विज्ञान रूढ़िवादिता को प्रश्रय देने वाला बन सकता है।
  • प्रश्न यह है कि वैज्ञानिक इस तरह के निष्कर्ष क्यों निकालते हैं कारण स्पष्ट है कि अध्यात्म को न अपनाने के कारण।विज्ञान का आधार होता है सत्य दृष्टि,सनातन दृष्टि,अनेकांत दृष्टि,समग्र दृष्टि।जिसमें आग्रह है,दुराग्रह है,एकांत मान्यताओं एवं धारणाओं का पोषण है,मायावी आचरण है,भले ही उसका कितना ही विज्ञापन क्यों ना हो,वह विज्ञान नहीं हो सकता।विज्ञान की शर्त है सच्चा सो मेरा न कि मेरा जो सच्चा,प्राप्त सूचनाओं,प्रमाणों तथा प्रयोगों एवं परीक्षणों से उपलब्ध आंकड़ों का व्यवस्थित लिपिबद्ध संकलन और प्रस्तुतीकरण विज्ञान का एक पक्ष मात्र है।जब तक धर्म,कर्म,नियति,स्वभाव एवं काल के प्रभावों को नकारा जाएगा,सत्य समझ में नहीं आएगा।अध्यात्म के बिना विज्ञान अधूरा है,अपूर्ण है।विज्ञान के लिए सम्यक ज्ञान,सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण आवश्यक है।
  • आज के वैज्ञानिकों की ऐसी मान्यता है कि अधिकांश मनुष्य अपने ज्ञान का शतांश भाग भी विकसित नहीं कर पाते।हम अपनी क्षमताओं से कितने अपरिचित है यह चिंतन का विषय है।शरीर मात्र ढांचा ही नहीं,इसके साथ मन और आत्मा भी जुड़े हैं।मन और आत्मा का संचालन तथा नियंत्रण चेतना से होता है।हमारी संवेदनाएं,भाव,विचार,सोच,कर्म,नियति,स्वभाव,चिंतन, काल तथा जीवन-चर्या उसे प्रभावित करते हैं।भौतिक एवं आत्मिक बल को भौतिक यंत्रों से नहीं मापा जा सकता।इस कारण उस अनुभूत सत्य को नकारना असत्य,अवैज्ञानिक,तत्वहीन मानना कौन सी बुद्धिमत्ता है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में रूढ़िवादी कैसे न बनें के 9 सूत्र (9 Tips on How Not to Be Conservative),रूढ़िवादी कैसे न बनें? (How Not to Be Conservative?) के बारे में बताया गया है।

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9.स्कूल क्यों नहीं आए थे? (हास्य-व्यंग्य) (Why Didn’t You Come to School?) (Humour-Satire):

  • टीचरःकल तुम स्कूल क्यों नहीं आए थे?
  • छात्र:बिल्ली ने रास्ता काट दिया था तो मम्मी ने कहा कि अपशकून हो गया है,स्कूल मत जाओ।आ भी जाता तो अपशकुन के कारण कुछ भी समझ में नहीं आता।

10.रूढ़िवादी कैसे न बनें के 9 सूत्र (Frequently Asked Questions Related to 9 Tips on How Not to Be Conservative),रूढ़िवादी कैसे न बनें? (How Not to Be Conservative?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नः

प्रश्नः1.रूढ़ि से क्या तात्पर्य है? (What is meant by stereotype?):

उत्तर:प्रथा,मान्यताएं,परिपाटी,परंपरा आदि को रूढ़ि कहते हैं।रूढ़ियाँ कभी धर्म नहीं होती।वे एक-एक समय की बनी हुई सामाजिक श्रृंखलाएं हैं,वे पहले की श्रृंखलाएं जिनसे समाज में सुथरापन था,मर्यादा थी पर अब जो जंजीरें बन गई हैं।

प्रश्न:2.क्या परंपराओं का पालन करना चाहिए? (What traditions should be followed?):

उत्तर:परंपरा इतिहास को महत्त्वपूर्ण सहयोग देती है,परंतु उसकी बातों को सूक्ष्म रूप से जांच कर ही हमें उस पर विश्वास करना चाहिए।

प्रश्न:3.प्रतिभा क्या है? (What is talent?):

उत्तर:प्रतिभा एक प्रति सैंकड़ा प्रेरणा और 99% श्रम है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा रूढ़िवादी कैसे न बनें के 9 सूत्र (9 Tips on How Not to Be Conservative),रूढ़िवादी कैसे न बनें? (How Not to Be Conservative?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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