7 Tips to Balance Luck with Manliness
1.भाग्य को पुरुषार्थ से संतुलित करने की 7 टिप्स (7 Tips to Balance Luck with Manliness),भाग्य को पुरुषार्थ से कैसे संतुलित करें की 7 बेहतरीन टिप्स (7 Best Tips on How to Balance Luck with Valour):
- भाग्य को पुरुषार्थ से संतुलित करने की 7 टिप्स (7 Tips to Balance Luck with Manliness) के आधार पर आप समझ सकेंगे कि भाग्य के विपरीत प्रभाव को पुरुषार्थ से कैसे संतुलित करें? क्या भाग्य को समाप्त किया जा सकता है या सुख-दुःख को भोगना ही पड़ता है अर्थात् पाप-पुण्य का फल भोग ही पड़ता है क्या?
- आपको यह जानकारी रोचक व ज्ञानवर्धक लगे तो अपने मित्रों के साथ इस गणित के आर्टिकल को शेयर करें।यदि आप इस वेबसाइट पर पहली बार आए हैं तो वेबसाइट को फॉलो करें और ईमेल सब्सक्रिप्शन को भी फॉलो करें।जिससे नए आर्टिकल का नोटिफिकेशन आपको मिल सके।यदि आर्टिकल पसन्द आए तो अपने मित्रों के साथ शेयर और लाईक करें जिससे वे भी लाभ उठाए।आपकी कोई समस्या हो या कोई सुझाव देना चाहते हैं तो कमेंट करके बताएं।इस आर्टिकल को पूरा पढ़ें।
Also Read This Article:विद्यार्थी भाग्य और कर्म में किसको वरीयता दें?
2.भाग्य अच्छा या बुरा दोनों होता है (Luck is both good and bad):
- पुरुषार्थ का विशिष्ट महत्त्व है।यह महत्त्व तभी है,जब वह भाग्य से भारी (प्रबल) होता है,अन्यथा उसका कोई मूल्य नहीं है।पुरुषार्थ तभी सफल होता है,जब यह भाग्य को अपने पैरों तले कुचल-मसल देता है।पुरुषार्थ की तीव्रता एवं त्वरा भाग्य से अधिक होनी चाहिए,तभी भाग्य को अपने अनुकूल मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है,अन्यथा जीवन भाग्य के प्रबल आघात-प्रतिघातों से हिचकोले खाता रहता है।जीवन में भाग्य का प्रभाव तभी तक होता है,जब तक इसकी तीव्रता से कम प्रयास किया जाता है,इसे हल्के ढंग से आँका जाता है,परंतु जो भाग्य की सूक्ष्मता से परिचित होते हैं,वे कभी भी अपनी सामर्थ्य एवं क्षमता को बचाए नहीं रखते,बल्कि समय व भाग्य के अनुरूप अपना सर्वस्व झोंक देते हैं और सफल होते हैं।
- पुरुषार्थ कम होता है तो भाग्य अपना खेल खेलता हैं और इंसान इसके हाथों कठपुतली मात्र बन जाता है।भाग्य जैसे नचाता है,वह वैसे ही नाचता है।भाग्य रुलाता है तो इंसान रोता है और वह हंसाता है तो वह हंसता है,फिर उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है।भाग्य उस बाढ़ के समान है,जिसके प्रचंड प्रवाह में सब कुछ बहता जाता है।यह ऐसी आँधी-अँधड़ है,जो सबको उड़ाकर फेंक देता है।आँधी उठे तो फिर यह मौका नहीं रहता है कि क्या किया जाए,बस,उसके थपेड़ों को सहने एवं अपने को जितना संभव हो,बचाने की चेष्टा ही की जा सकती है।भाग्य का प्रवाह एवं प्रभाव कुछ इसी तरह होता है।
- भाग्य अचानक एवं औचक प्रकट हो जाता है।पता ही नहीं चलता है कि कब साफ-स्वच्छ आसमान में काले-काले बादल मँडराने लग जाते हैं और देखते-देखते मूसलाधार बारिश होने लगती है।अभी तक तो सब ठीक था,एकाएक क्या हो गया-पल भर में परिदृश्य भयावह एवं भीष्ण हो गया! हँसता-मुस्कराता पल असह्य,कठिन एवं भारी (प्रबल) हो जाता है तो यह भाग्य की मार होती है।भाग्य होता ही ऐसा है,जो चुपके से अनकहे दस्तक देता है और सब कुछ पल-क्षण में बदल देता है।भाग्य का तात्पर्य है पिछले जीवन का वह चैक एवं एटीएम कार्ड जिससे हम अपनी संचित निधि भुनाते हैं।यदि हम सजग-सचेष्ट हैं तो कब-कितना और कहां ड्रा करना है,जान समझ सकते हैं।इसके लिए भाग्य को समझना एवं पहचानना आवश्यक है,जिसके लिए उसके अनुरूप योजना भी होनी चाहिए।
- भाग्य अच्छा या बुरा,दोनों होता है और समय के अनुरूप जीवन में प्रकट होता है।हम इसकी अदृश्य घटनाओं से परिचित नहीं होते,इसी कारण यह हमें पहले जैसा जान पड़ता है,परंतु जो इसकी चाल से वाकिफ होते हैं,वे इसकी तीव्रता एवं त्वरा के आगे और अधिक चुनौती पेश करते हैं।उनका पुरुषार्थ कभी भी कमजोर नहीं पड़ता है।वे यह जानते हैं कि भोगकाल (फल भोगने की अवधि) में विगत एवं आगत की तपस्या की बड़ी पूंजी भी काम नहीं आती है।भगवान जीवात्मा को जब निश्चित भोग (सुख-दुःख का फल) प्रदान करता है तो उस समय उसे सभी ओर काटकर निहत्था कर देता है।कोई कितना बड़ा तपस्वी भी क्यों ना हो,उस अवधि में उसकी तपस्या क्रियाशील नहीं होती है।जीवात्मा वर्तमान में जितना पुरुषार्थ कर सकता है,सूझ-बूझ एवं विवेकपूर्ण बुद्धि से परिस्थितियों से जितना बच सकता है या जूझ सकता है,उसकी पूरी छूट होती है।
3.भोग को सहज भाव से भोगे (Indulge in enjoyment with ease):
- भोग (सुख-दुःख) को यदि बिना प्रतिक्रिया करके सहज भाव से भोग लिया जाए तो यह भोग (सुख-दुःख) चित्तशुद्धि का कारण बनता है।इससे वृत्तियाँ गिर जाती हैं और चित्तशुद्ध एवं परिमार्जित हो जाता है;क्योंकि प्रतिक्रिया करने से नवीन भाग्य की सृष्टि होती है,परंतु हम प्रतिक्रिया करने में सबसे आगे होते हैं।यदि कोई बुरा बर्ताव करता है तो उसके प्रति द्वेष,वैमनस्य आदि पनपता है और कोई सहयोग,सांत्वना प्रदान करता है तो उसके प्रति मोह पैदा होता है।ये दोनों स्थितियाँ प्रतिक्रियात्मक हैं,जो एक नए भोग (सुख-दुःख) का निर्माण करती हैं।भोगकाल में दोनों ही स्थितियां उत्पन्न होती हैं-चित्त के संस्कार उभरते हैं तो शत्रुभाव से प्रेरित व्यक्ति कष्ट देने आता है और मित्रभाव से प्रेरित व्यक्ति सहयोग देने आता है।भोग से निवृत्ति के लिए उपर्युक्त दोनों स्थितियों में स्वयं को तटस्थ एवं प्रतिक्रियाविहीन रखना पड़ता है।सामने वाला कैसा भी बर्ताव करे,परंतु स्वयं को ना तो बुरा बर्ताव करने वाले से दुश्मनी करनी है और न समभाव जताने वाले के प्रति प्रेम करना है-साक्षी भाव से इन दोनों ही स्थितियों से उदासीन होकर गुजर जाना चाहिए,परंतु यह इतना आसान नहीं होता है।यह अति दुष्कर कार्य है,इसी कारण तो चित्तशुद्धि को संसार का सबसे भीषण पुरुषार्थ कहते हैं।भोगकाल में जो सबसे बड़ी बाधा होती है,वह बुद्धि-विवेक में संतुलन नहीं बन पाना।इसमें व्यतिक्रम आ जाता है।दुःख के समय हम इसके कारण को स्वयं में खोजने के बजाय दूसरों में आरोपित करने लगते हैं और दूसरों से बैरभाव पैदा कर लेते हैं।भोग की तीव्रता भोग काटने के सभी अस्त्र-शस्त्र छीन लेती हैं।इंसान चीखने-चिल्लाने के अलावा और कुछ कर नहीं पाता।
- सृष्टि में तपस्या को सर्वोपरि पुरुषार्थ कहा जाता है।यह पुरुषार्थ ही भोग (सुख-दुःख) को काटने में समर्थ एवं सक्षम होता है,परंतु घनघोर विपरीताओं में स्वयं को संतुलित करके इस महापुरुषार्थ में झोंक पाना अपने आप में बड़ा पुरुषार्थ है।सामान्य क्रम में ऐसा नहीं हो पाता है,परंतु यह असंभव नहीं है,कठिन कितना ही क्यों ना हो।यहां पर विवेक की आवश्यकता पड़ती है।दुर्द्धर्ष तपस्वी और ऋषियों ने कहा है कि जो व्यक्ति अपने चरम भोगकाल में अपने विवेक को संतुलित कर लेता है तो समझना चाहिए कि उस पर भगवत्कृपा की वृष्टि हो रही है।वह भोगकाल में भी भगवान की सुरक्षा एवं संरक्षण में निश्चिंत होता है।कई गणितज्ञ और वैज्ञानिक अपने बाल्यकाल में उभरे सभी भोगों को भोगने के बावजूद विचलित नहीं हुए और अध्ययन-मनन चिंतन करते हुए शीर्ष पर जा विराजे।
- हर गणितज्ञ,वैज्ञानिक और महामानव के अपने-अपने भोग तो थे ही,उसके साथ उनके भोग को और भारी (प्रबल) करने के लिए अनेक लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी,परंतु उनका चरम पुरुषार्थ और उनका समर्पण था।उन्हें यह पता था कि भोग की अवधि सीमित एवं निश्चित होती है,परंतु पुरुषार्थ सीमातीत एवं अनंत होता है।भोग की लहरें झंझावात के समान समूल नष्ट कर देने के लिए उठती है।सामान्यजन इन लहरों में उठते-गिरते एवं नष्ट भी हो जाते हैं,परंतु परम पुरुषार्थी जानता है कि लहरें कितनी भी भीषण एवं भयानक क्यों ना हों,गिरेंगी ही।हां,उन लहरों के थपेड़ों एवं आघात को सहन कर लेने की क्षमता अर्जित कर लेनी चाहिए।पुरुषार्थी जब अपने पुरुषार्थ को भगवत अर्पित कर उसी के अनुरूप कार्य करने लगता है,अपनी इच्छाओं एवं आकांक्षाओं से स्वयं को निवृत्त कर लेता है तो भगवत्कृपा उसे हर भीष्ण एवं विनाशकारी कष्ट से भी बचा लेती है और वह साफ सुरक्षित हो जाता है।
4.भोगों का अंतहीन सिलसिला (Endless Cycle of Indulgences):
- एक विद्यार्थी के जीवन में भोगों का अंतहीन सिलसिला जो प्रारंभ हुआ तो अनेक वर्षों तक चला।उस अवधि में उसने अपने जीवन में सैकड़ो बार असफलताओं का सामना किया।अपनों का अपमान,तिरस्कार,उपेक्षा एवं निंदा रूपी घोर मानसिक यंत्रणा सही।अभाव एवं बीमारी ने उसके तन-मन को जर्जर कर दिया था।भावनात्मक पीड़ा उसने इतनी पाई कि लगा कि जीवन में सबकुछ समाप्त हो गया।सामाजिक एवं आर्थिक विपन्नता ने उसको दरिद्र एवं भिखारी बना दिया था,परंतु इतने दीर्घकाल की भीषण पीड़ा के बीच उसकी एक विशेषता थी कि वह अपने गुरु के प्रति अगाध निष्ठा एवं पुरुषार्थ के प्रति प्रबल आस्था रखता था।इन्हीं दोनों अस्त्रों के कारण वह भीष्ण कष्टों में भी मुस्कराता ही नहीं,हंसता रहता था।हजारों विरोधियों एवं शत्रुओं के बीच भी निर्द्वन्द्व विचरता था,जैसे उसे अपने आस-पास बुने हुए षडयंत्रों से कोई सरोकार नहीं है।वह जानता सब कुछ था,परंतु भावभरे हृदय से क्षमा भी कर देता था।
- विद्यार्थी का दुःख कम होने का नाम नहीं लेता था।जन्मांतरों के भोग संघनित होकर उसे चित्र-विचित्र परिस्थितियों से अचंभित करते रहते थे।किसी भी रूप में उसका जीवन सामान्य नहीं था।रात और दिन उसे फर्क नहीं था,उसे अध्ययन करने,कोर्स को पूरा करने,पाठ याद करने,परीक्षा की तैयारी करने आदि विभिन्न प्रकार के कार्यों का दबाव।गिरते-पड़ते वह कार्य (अध्ययन आदि) करता और अपने मार्गदर्शक की हर कही हुई बात को मंत्र मानकर यथासंभव अमल करता था।उसकी यही खासियत थी कि जो टास्क दिया जाता,सो पूरा करना है,फिर चाहे उसका परिणाम कैसा भी क्यों ना हो और आश्चर्यजनक रूप से उसे सफलता भी मिलती थी।वह सफलता से कभी उन्मादित नहीं होता और गुरु के चरणों में सभी सफलताओं को अर्पित कर देता था।उसका पुरुषार्थ यही था कि वह अपने गुरु के प्रति निष्ठा को कभी भी डिगने नहीं देता था।हजारों आते और उसके गुरु को ठगकर चले जाते,परंतु उसने कभी भी अपनी निष्ठा पर आँच आने नहीं दी।
- विद्यार्थी अपनी प्रशंसा में मुस्कराकर कहता था-सब कुछ गुरुकृपा है,भगवान का वरदान है।उसने अपनी इस निष्ठा एवं आस्थारूपी पुरुषार्थ से पिछले सभी जन्मों के भोगों को काट दिया;क्योंकि उसने अपने जीवन में सभी कष्टों एवं पीड़ाओं को तटस्थ भाव से,साक्षी भाव से,बिना प्रतिक्रिया किए झेला।भोगों की त्वरा एवं तीव्रता में चीखता-चिल्लाता हुआ वह कभी भी अपने पुरुषार्थ से विचलित नहीं हुआ और न डिगा।भगवान की कृपा एवं गुरु के सतत मार्गदर्शन से उसके भोगों की तीव्रता की तुलना में उसका वर्तमान में किया गया पुरुषार्थ कभी भी कमजोर नहीं पड़ा और परिणामस्वरूप वह विद्यार्थी जन्मांतरों के भोगों को भोगकर आनंद के सागर में मग्न हो गया।
- ऋषि कहते हैं-जीवन में कुछ अनिवार्य भोग होते हैं और उन्हें भोग लेना चाहिए; इसी में भलाई है।भले ही यह भोग कितना भी भयावह एवं विप्लवी क्यों ना हो,परंतु उससे डरे बिना तपस्या रूपी चरम पुरुषार्थ से उसका सामना करना चाहिए।तपस्या से भोग समाप्त तो नहीं होता,परंतु इसकी तीव्रता घटकर सहने योग्य हो जाती है।यदि तपस्या सतत चलती रहे तो तप की भट्टी में सूक्ष्म में स्थित भोग के बीज गल जाते हैं और स्थूल में उतरे भोग कमजोर हो जाते हैं।यह अलग बात है कि हर भोग के अनुरूप उसको काटने एवं कमजोर करने का अपना निश्चित विधान होता है।इसे योग्य एवं कुशल नेतृत्व में जाना और किया जा सकता है।सरस्वती स्तोत्र सभी भोगों को काटने-मिटाने में समर्थ है।अतः पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ उसका स्मरण और पाठ करके निष्काम पुरुषार्थ करते रहना चाहिए जिससे जीवन की पीड़ाओं से मुक्ति पानी चाहिए।
5.भाग्य और पुरुषार्थ एक ही सिक्के के दो पहलू (Luck and manhood are two sides of the same coin):
- प्रायः विद्यार्थियों का ध्यान भाग्य की ओर जाता ही नहीं है,ध्यान तभी जाता है जब असफलता मिलती है,बार-बार असफलता मिल रही हो या किसी संकट,दुःख या कष्ट से पीड़ित होता है वरना सुख,सफलता,सम्पन्नता और मौज-मजे में भाग्य को कौन याद करता है और बात है भी ठीक।परंतु तनिक यह विचार करें कि जीवन में कई घटनाएं ऐसी होती है जो हमें इस ओर इशारा करती हैं।जैसे किसी विद्यार्थी को थोड़ा सा परिश्रम करने पर सफलता मिल जाती है,किसी विद्यार्थी को बहुत अधिक परिश्रम करने पर भी उतनी सफलता नहीं मिलती है।किसी को गड़ा हुआ धन मिल जाता है या लॉटरी लग जाती है और इनाम जीत जाता है यह किस पुरुषार्थ का फल है।इसी प्रकार कोई दुर्घटना में बच जाता है तो कोई मर जाता है,यह किस पुरुषार्थहीनता का परिणाम होता है।इसे केवल संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता।
- हमें या विद्यार्थी को किसी विकट संकट या घोर कष्ट में पड़ने पर और कोई उपाय कारगर सिद्ध नहीं होने पर भाग्य याद आता है और हम समझते हैं कि भाग्य विपरीत है इसलिए पुरुषार्थ सफल नहीं हो रहा है।नीति शास्त्र में कहीं पर भाग्य को महत्त्व दिया गया है और कहा गया है कि सब जगह भाग्य फलित होता है,विद्या या पुरुषार्थ नहीं।कहीं पर पुरुषार्थ को महत्त्व दिया गया है।
वस्तुतः पुरुषार्थ और भाग्य दरअसल कर्मरूपी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं अतः दोनों का महत्त्व और प्रभाव एक समान है।मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है पर फल भोगने में नहीं और फल भोगना ही भाग्य है इसलिए भाग्य यानी प्रारब्ध भी पुरुषार्थ के समान ही महत्त्वपूर्ण है।एक हद तक पुरुषार्थ द्वारा भाग्य को सुधार संवारा जा सकता है।
- प्रबुद्ध विद्यार्थी प्रायः इस दुविधा में पड़े रहते हैं कि भाग्य अधिक बलवान होता है या पुरुषार्थ क्योंकि जीवन में बार-बार ऐसी स्थिति सामने आती है कि जी तोड़कर पुरुषार्थ करने पर मनोवांछित सफलता नहीं मिलती जिससे मन में निराशा और टीस भर जाती है,साथ ही यह ख्याल आता है कि क्या नतीजा निकला इतने पुरुषार्थ का? ठीक ही कहा गया है कि प्रारब्ध ही बलवान है।यदि यह ख्याल मन को धीरज देने और निराशा से बचने के लिए किया जाए तो बुरा नहीं।असफलता से निराश और दुःखी होना ठीक नहीं बल्कि धैर्य के साथ बुद्धिमानी विवेक और साहस से भी काम लेना चाहिए क्योंकि विपत्ति के समय जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती वह बच जाता है।
- कर्मों के फल को ही प्रारब्ध (भाग्य) कहते हैं।इस तरह कर्म यानी पुरुषार्थ और प्रारब्ध यानी कर्मफल (भाग्य) दो अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही है।यदि पुरुषार्थ में कोई कमी रह गई हो,कोई भूल चूक हो गई हो,मनुष्य को कर्मों के अनुसार फल मिलता है और बुद्धि भी कर्मों के अनुसार ही चलती है फिर भी विद्वान व्यक्ति भलीभाँति सोच-विचार करके ही कोई कार्य करते हैं।बिना ठीक से सोचे-विचारे,अचानक कोई कार्य करना विपत्ति का कारण हो जाता है।कार्य में कोई भूल चूक हो तो इसे सुधार कर पुरुषार्थ करते रहना चाहिए क्योंकि भाग्य पर भरोसा रखते हुए भी पुरुषार्थ करना नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि पुरुषार्थ किए बिना,तिलों में तेल होते हुए भी,तेल प्राप्त नहीं हो सकता।शोक,चिंता व निराशा को छोड़कर मनुष्य को विवेक,धैर्य और साहस से काम लेकर पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।
- उपर्युक्त आर्टिकल में भाग्य को पुरुषार्थ से संतुलित करने की 7 टिप्स (7 Tips to Balance Luck with Manliness),भाग्य को पुरुषार्थ से कैसे संतुलित करें की 7 बेहतरीन टिप्स (7 Best Tips on How to Balance Luck with Valour) के बारे में बताया गया है।
Also Read This Article:अपने भाग्य के निर्माता कैसे बनें?
6.भाग्य का खेल (हास्य-व्यंग्य) (Game of Luck) (Humour-Satire):
- एक विद्यार्थी अंकतालिका देखकर,सिर पकड़कर बैठ गया।फिर सँभलकर गणित शिक्षक से शिकायत की।सर,मेरी अंकतालिका में गणित में कुछ भी नम्बर नहीं हैं।
- गणित शिक्षक:यह सब भाग्य का खेल है,तुम्हारे भाग्य में गणित में अंक प्राप्त करना नहीं लिखा है।
- छात्र:सर मैंने पूरी मेहनत की थी,पेपर भी अच्छा हुआ था,बहुत कोशिश (पुरुषार्थ) का यह फल कैसे?
- गणित शिक्षक:बच्चे,यह भाग्य व पुरुषार्थ का खेल है,तुम नहीं समझोगे।
- छात्र:मेरे भाग्य और पुरुषार्थ का आपको कैसे पता? मेरे भाग्य में क्या लिखा है आपको क्या पता? क्या आप त्रिकालदर्शी हैं या भगवान हैं? आप उत्तर पुस्तिका को पुनः जाँचें और नम्बर दें।
7.भाग्य को पुरुषार्थ से संतुलित करने की 7 टिप्स (Frequently Asked Questions Related to 7 Tips to Balance Luck with Manliness),भाग्य को पुरुषार्थ से कैसे संतुलित करें की 7 बेहतरीन टिप्स (7 Best Tips on How to Balance Luck with Valour) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.क्या भाग्य के भरोसे बैठना चाहिए? (Should we rely on luck?):
उत्तर:भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर भाग्य सोया रहता है और हिम्मत बाँधकर खड़े होने पर भाग्य भी उठ खड़ा होता है।
प्रश्न:2.पुरुषार्थहीन की क्या गति होती है? (What is the speed of the effortless people?):
उत्तर:पुरुषार्थहीन पुरुष को विपत्तियाँ आक्रान्त कर लेती हैं।विपत्तियों से आक्रान्त होने पर उसकी भावी उन्नति रुक जाती है,जिससे उसका गौरव नष्ट हो जाता है।गौरव नष्ट होने पर राज्यश्री के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता,जिसका वह आश्रय ले सके।
प्रश्न:3.पुरुषार्थ करने से क्या लाभ है? (What is the benefit of making effort?):
उत्तर:पुरुषार्थ करने पर दरिद्रता नहीं रहती,जपने वाले को पाप नहीं लगता,मौन होने से कलह नहीं होता और जागनेवाले के निकट भय नहीं आता।पुरुषार्थ करने पर ही भाग्य फलित होता है,पुरुषार्थ न करने पर भाग्य किसी को कुछ नहीं दे सकता।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा भाग्य को पुरुषार्थ से संतुलित करने की 7 टिप्स (7 Tips to Balance Luck with Manliness),भाग्य को पुरुषार्थ से कैसे संतुलित करें की 7 बेहतरीन टिप्स (7 Best Tips on How to Balance Luck with Valour) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
No. | Social Media | Url |
---|---|---|
1. | click here | |
2. | you tube | click here |
3. | click here | |
4. | click here | |
5. | Facebook Page | click here |
6. | click here | |
7. | click here |
Related Posts
About Author
Satyam
About my self I am owner of Mathematics Satyam website.I am satya narain kumawat from manoharpur district-jaipur (Rajasthan) India pin code-303104.My qualification -B.SC. B.ed. I have read about m.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 15 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science.