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6Surefire Spells on How to Aweken Mind

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1.मन को कैसे जगाएँ के 6 अचूक मंत्र (6Surefire Spells on How to Aweken Mind),मन को कैसे जगाएँ? (How to Aweken Mind?):

  • मन को कैसे जगाएँ के 6 अचूक मंत्र (6Surefire Spells on How to Aweken Mind) के आधार पर मन को साधने,मन को जगाने के लिए मस्तिष्क की कार्यप्रणाली जान सकेंगे और अपनी रुचि,प्रतिभा के अनुसार मन के उस हिस्से को सक्रिय कर सकेंगे।
  • यह लेख बोर्ड परीक्षार्थियों,काॅलेज स्टूडेंट्स,प्रवेश परीक्षार्थियों और प्रतियोगिता परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए उपयोगी है।
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2.मन के दो गोलार्द्ध (Two hemispheres of the mind):

  • तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण शोधों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि मस्तिष्क की दो स्तर की भूमिकाएं हैं:एक वह,जो दिव्य ज्ञान तथा अनुभूतियों को जगाने-उभारने से संबंधित हैं।इसे उसका ‘परा’ पक्ष कह सकते हैं।दूसरा पहलू ‘अपरा’ के नाम से जाना जाता है।इसमें भौतिक स्तर की जानकारियां,बुद्धि,स्मृति,तर्क,विचार आदि सम्मिलित हैं। अध्यात्म विज्ञान बहुत पहले से इस तथ्य को स्वीकारता रहा है।अब पदार्थ विज्ञान भी उसी निष्कर्ष के निकट पहुंचता जा रहा है।
  • सर्वविदित है कि मस्तिष्क के,दाएं-बाएं दो हिस्से-दो गोलार्द्ध हैं।उसका दायाँ भाग शरीर के बाएं हिस्से को नियंत्रित करता है,जबकि बायाँ खंड काया के दाहिने पार्श्व को।अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि मस्तिष्क के दोनों हिस्से स्वतंत्र रूप से चेतना के दो विपरीत,किंतु एक-दूसरे के पूरक आयामों का संचालन करते हैं।कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के तंत्रिकाशास्त्री रोजर स्पेरी एवं सहयोगियों ने जब मिर्गी के कुछ गंभीर मामलों के अंतिम उपचार के रूप में अपने रोगियों के मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों के संबंध-सूत्र को विच्छेद कर दिया,तो न सिर्फ रोगी ठीक हुए,वरन कई चौंकाने वाले तथ्य प्रकाश में आए।इससे मस्तिष्क के कार्य करने संबंधी अनेक महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलीं तथा योग-विज्ञान के दृष्टिकोण की पुष्टि हुई।अध्यात्म विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान दोनों ही अपने-अपने अन्वेषणों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मनुष्य की सक्रियता के दो भिन्न माध्यम हैं।मस्तिष्क के परिपथ इडा और पिंगला,चेतना या ज्ञान तथा क्रिया अथवा शारीरिक शक्ति पर आधारित हैं एवं इनका तंत्रिकातंत्र के सभी तीन प्रमुख स्तरों से संबंध है।केंद्रीय तंत्रिका तंत्र इन सबमें प्रमुख है।इसमें मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु सम्मिलित हैं,साधना-विज्ञान के आचार्यों का मत है कि नाड़ियों एवं चक्रों का अस्तित्व केंद्रीय स्नायु संस्थान के अंतर्गत मेरुरज्जु एवं मस्तिष्क में है।यदि विभिन्न साधना-विधानों द्वारा इनकी शुद्धि करके एवं शक्तिशाली बनाकर इन्हें सही रूप से परस्पर जोड़ा जा सके,तो शरीर एवं मन दोनों का कायाकल्प संभव है।शरीर एवं मन की जटिल क्रिया-प्रणाली इडा,पिंगला एवं सुषम्ना-इन तीन आधारभूत शक्तियों के बल पर क्रियाशील रहती है।यह जानने के बाद अब यह समझना सरल होगा कि अधिकांश साधना-उपचारों में इडा,पिंगला के प्रवाह में संतुलन एवं इनके उतार-चढ़ाव के प्रति सजगता-वृद्धि को इतना महत्त्व क्यों दिया जाता है।
  • साधनाविज्ञानियों के अनुसार शारीरिक स्तर पर मस्तिष्क का दायाँ हिस्सा इडा नाड़ी तथा बायाँ हिस्सा पिंगला नाड़ी से संबंध है।स्पेरी,माइर्स,गजेनिगा,बोगेन प्रभृति शोधकर्ताओं ने लंबे काल के अध्ययन-अनुसंधान के उपरांत यह पता लगाया है कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा बुद्धि,विचार,तर्क,वाणी,विश्लेषण आदि के लिए जिम्मेदार है,जबकि दाएं भाग संबंध ज्ञान,अनुभूति,पवित्रता,शांति जैसे तत्त्वों से है।योगशास्त्र के ज्ञाता भी पिंगला की प्रकृति स्थूल बुद्धिपरक एवं इडा की सूक्ष्मज्ञान और अनुभूतिपरक बताते हैं।इस दृष्टि से विचार पक्ष अलग-अलग मार्गो से चलकर एक ही बिंदु पर पहुंचते हैं।

3.दिमाग का कौन-सा गोलार्द्ध क्या काम करता है? (What is the function of which hemisphere of the brain?):

  • डिपार्मेंट ऑफ बिहेवियरल न्यूरोलॉजी,यूनिस केनेडी सेंटर फाॅर्स मेंटल रिटार्डेशन,वाल्थाम,मेसासुसेट्स के न्यूरोबायोलॉजिस्ट तथा न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट मार्शल किंसबोर्न ने अपनी शोध (‘सैड हेमिस्फीयर,हैप्पी हेमिस्फीयर’ मई 1981,साइकोलॉजी टुडे) से प्रमाणित किया है कि मस्तिष्क की भावनात्मक क्रियाशीलता के दो प्रमुख आधार हैं।यह आधार उनके अपने ही दो गोलार्द्ध हैं।
    उक्त अनुसन्धान से विदित हुआ है कि प्रसन्नता एवं सकारात्मक विचारों का संचालन दाएं गोलार्द्ध से और अप्रसन्नता एवं नकारात्मक विचारों का संचालन बायें गोलार्द्ध से होता है।कई मौकों पर देखा गया है कि मस्तिष्क के दाएं गोलार्द्ध के क्षतिग्रस्त हो जाने पर प्रायः रोगी मलिन व्यक्तित्व,असंतुलन,क्रोध,अपराधी-भाव एवं निराशा जैसी मनःस्थिति से ग्रसित हो जाता है।इसके विपरीत बायें गोलार्द्ध के क्षतिग्रस्त होने पर व्यक्ति प्रसन्न तथा मस्त दीखते हैं।सामान्य अवस्था में मस्तिष्क के गोलार्द्ध बारी-बारी से क्रियाशील रहते हैं,किंतु चरम अवस्था में नहीं पहुंच पाते,जैसा कि मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त होने पर होता है,पर फिर भी यदि हम संतुलित एवं स्वस्थ नहीं है,तो गोलार्द्ध के कार्यकाल परिवर्तन का प्रभाव दुःखद हो सकता है।किंसबोर्न का विचार है कि मस्तिष्क की ये दो वृत्तियाँ हमारी पसंद (पिंगला) एवं नापसंद (इडा) से संबंधित है।हमारी पसंद के कार्य बायें मस्तिष्क द्वारा संपन्न होते हैं।वह उन पर विचारता है,तदुपरान्त उस वस्तु अथवा स्थिति विशेष तक पहुंचने का प्रयत्न करता है।हमारे सक्रिय पक्ष अर्थात् बहिर्मुखी पिंगला नाड़ी के बारे में सामान्य धारणा यही है।जो परिस्थितियाँ हमें अच्छी नहीं लगती,उनसे हम बचना चाहते हैं।यह स्थिति हमारे लिए कहीं अधिक कठिन होती है,जिसे दिमाग के उस दाएं खंड द्वारा संपादित किया जाता है,जिसका संबंध हमारी ग्रहणशीलता,अंतर्मुखता तथा इडा से है।
  • मस्तिष्क की इन दोनों प्रणालियों में संतुलन आवश्यक होता है।यदि ऐसा ना हुआ,तो व्यक्तित्व अनगढ़ और अस्त-व्यस्त हो जाएगा।योगमार्ग के मर्मज्ञों का मत है कि सर्वोच्च स्तर पर क्रियाशीलता सुषुम्ना के कार्यरत होने तथा मानक-तत्त्वों एवं क्षमताओं के अधिकतम विस्तार के लिए नाड़ियों में सामंजस्य नितान्त जरूरी है।दुर्भाग्यवश इस प्रकार के संतुलित व्यक्तित्वों की संख्या वर्तमान समय में एकदम न्यून है।अधिकांश लोग इडा के सूक्ष्म अंतर्ज्ञान एवं अनुभव पक्ष की अपेक्षा पिंगला अर्थात् पूर्णतः बहिर्मुखी भौतिक एवं तकनीकी पक्ष की ही ओर आकर्षित रहते हैं।ऐसी विसंगतियों से सामान्य जीवन पर क्या असर पड़ता है,इसका वैज्ञानिक अध्ययन पिछले समय किया गया।
  • हावर्ड गार्डनर एवं सहयोगियों ने ऐसे व्यक्तियों का अध्ययन किया,जिनका दायाँ मस्तिष्क (इडा पक्ष) गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त था।उनने देखा कि ऐसे लोगों में आवश्यक औसत समझ भी नहीं थी अर्थात् वे किसी यांत्रिक मस्तिष्क युक्त रोबोट की भाँति थे।अध्ययन के दौरान यह भी देखा गया कि दिमाग के दोनों गोलार्द्धों के सक्रिय रहने पर ही हम किसी वाक्य के भावार्थ को भली-भांति समझ सकते हैं,किसी भावना को शब्द प्रदान कर सकते हैं अथवा आमोद-प्रमोद का वास्तविक आनंद-लाभ ले सकते हैं।
    एक उदाहरण द्वारा इसे और अच्छी तरह समझा जा सकता है।यदि कोई कहे कि उस पर आसमान टूट पड़ा,तो ऐसा व्यक्ति,जिसका दाहिना भाग क्षतिग्रस्त है,वाक्य में निहित भाव को न समझ कर शब्दार्थ में उलझ जाएगा और प्रश्न करेगा कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? करण कि आसमान टूटने वाली वस्तु तो है नहीं।विशेषज्ञ बताते हैं कि यह स्थिति इसलिए उत्पन्न होती है,क्योंकि वे प्रत्यक्ष को तो देखते हैं,पर उसका विश्लेषण और व्याख्या नहीं कर पाते।स्पष्ट है-दायाँ मस्तिष्क,जिसे योगियों ने इडा अथवा ग्रहणशील मन कहा है,आपसी संबंधों एवं संपूर्ण वस्तुस्थिति के मूल्यांकन तथा समझदारी के लिए जिम्मेदार है।

4.मस्तिष्क का दायाँ भाग का कार्य (Function of the right side of the brain):

  • यह दाहिने मस्तिष्क का सामान्य और लौकिक पक्ष हुआ।अनुसंधानों से इस तथ्य की भी पुष्टि हुई कि यह भाग अंतर्ज्ञान एवं आध्यात्मिक अनुभूतियों का भी केंद्र है।पेंसिलवानिया मेडिकल स्कूल यूनिवर्सिटी के मनोचिकित्सक प्रभाग के प्राध्यापक इजिन डी. ऑकली एवं एम. ब्लैक (ब्रेन फ्लैश-दि फिजियोलॉजी ऑफ इंस्पिरेशन अगस्त 1982,साइंस डाइजेस्ट) के अनुसार क्षतिग्रस्त मस्तिष्क संबंधी शोध बताती है कि मस्तिष्क के इस हिस्से में चेतना को उच्चत्तर आयामों में ले जाने वाला क्षेत्र मौजूद है।अध्यात्म विज्ञान की भी ऐसी ही मान्यता है कि मस्तिष्क आत्मचेतना और परमात्मचेतना का समागम स्थल है।उन्होंने भगवान की अनुभूति व्यक्त करने वाली एक गणितीय व्याख्या दी है,जिसमें व्यक्ति संसार के साथ पूर्ण तादात्म्य का अनुभव करते हुए वास्तविकता को समझ सकता है।उसे प्रतीत होता है कि मानो यह मस्तिष्क के दाएं सुप्त क्षेत्र ‘पैराइटल ऑक्सीपिटल’ का उत्पादन हो,जो किसी तरह मस्तिष्क के क्रिया-कलापों पर नियंत्रण करने लगता है।समय रुका हुआ प्रतीत होता है।एकत्व तथा अद्वैत की दिव्य अनुभूति होती है।
  • वैज्ञानिकद्वय कहते हैं कि चेतना की उच्च भूमिकाओं में पहुंचना मस्तिष्क की सुसुप्ति को हटाए-मिटाए बिना संभव नहीं।योगियों का भी ऐसा ही मत है।इसके लिए वे अचेतन का परिवर्द्धन-परिष्कार आवश्यक बताते और कहते हैं कि इस हेतु इडा-पिंगला अर्थात् मस्तिष्क के दोनों भागों पर नियमन-नियंत्रण स्थापित करना पड़ेगा। योगविज्ञान में इसके लिए ‘स्वरयोग’ की एक सुनिश्चित प्रक्रिया है अर्थात् श्वसन क्रिया को नियंत्रित कर मस्तिष्क पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है।अब इसकी पुष्टि पदार्थ विज्ञान ने भी कर दी है।वैज्ञानिक इसे स्वीकारने लगे है कि मस्तिष्क और साँस का परस्पर गहरा संबंध है।
  • डलहौजी यूनिवर्सिटी,नोवा-स्कॉटिया के मनोवैज्ञानिक रेमण्ड क्लीन एवं रोजेन आर्मिटेज द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि बायें तथा दाएँ मस्तिष्क के कार्यों में 90 से 100 मिनट के अंदर परिवर्तन होते रहते हैं।जिन व्यक्तियों पर उक्त अध्ययन किया जा रहा था,वे 90 मिनट तक उन कार्यों को कुशलतापूर्वक करते देखे गये,जो दाएँ दिमाग से संबंधित थे और अगले 90 मिनट तक उन कार्यों को,जो बाएं भाग से संबंध थे।इस अध्ययन की अनेक आवृत्तियों के पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि 90 मिनट के इस चक्र का श्वसन से गहरा संबंध है।
  • साॅक इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज,अमेरिका के वैज्ञानिकों डेविड शनहाक एवं खालसा ने अपने अध्ययनों में पाया कि सामान्य श्वसन प्रक्रिया द्वारा भी आवश्यकतानुसार मस्तिष्क के गोलार्द्धों की क्रियाशीलता परिवर्तित की जा सकती है।वे कहते हैं कि जब हम किसी एक नासाछिद्र से साँस ले रहे होते हैं,तो उस समय उसके विपरीत भाग का गोलार्द्ध सक्रिय होता है।यह एक अतीव महत्त्वपूर्ण तथ्य है।यही कारण है कि साधना प्रतिक्रियाओं में प्राणायाम के दौरान बायीं नासिका से गहरी साँस लेने और दायीं से छोड़ने का विधान है।ऐसा करने से मस्तिष्क का दायाँ अथवा आध्यात्मिक भाग जाग्रत होने लगता है और इसके साथ ही बायें अथवा भौतिक जीवन से गहन संबंध रखने वाले मस्तिष्क खंड की सक्रियता मंद पड़ने लगती है।इस प्रकार उक्त अध्ययन से प्राणायाम की उपादेयता और वैज्ञानिकता सिद्ध हो जाती है।इसके अतिरिक्त ई. ई. जी. द्वारा मस्तिष्क से उत्पन्न अल्फा,बीटा,थीटा और डेल्टा तरंगों में से किसी की भी प्रमुखता की स्थिति में श्वसन एवं मस्तिष्क गोलार्द्धों के मध्य एक सुनिश्चित संबंध की सूचना मिलती है।

5.साधना के लिए मस्तिष्क की भूमिका (The Role of the Brain for Sadhana):

  • साधना मार्ग के पथिकों के अनुसार अस्वस्थता की दशा में गोलार्द्धों की चक्रीयता में व्यतिक्रम पैदा हो जाता है और उसकी लयात्मकता समाप्त हो जाती है।उनके अनुसार जब दुःखी (पिंगला) एवं प्रसन्न (इडा) गोलार्द्धों में एक निश्चित समय तक संतुलन बना रहता है,तो चेतना की एक दिव्य अवस्था का अनुभव होता है।साधना विज्ञान की भाषा में कहें,तो इसे यों भी कह सकते हैं कि जब इडा और पिंगला नाडी अर्थात् नासिका के दोनों स्वर साथ-साथ क्रियाशील होते हैं,तो इस अवस्था में सुषुम्ना का मार्ग प्रशस्त हो जाता है और वह गतिशील होते हैं,तो ऐसे समय में व्यक्ति की प्रकृति अंतर्मुखी हो जाती है,शुभ कार्यों एवं श्रेष्ठ चिंतन की ओर रुझान बढ़ जाता है,मन बार-बार भगवान की ओर उन्मुख होने लगता है एवं व्यक्ति स्वयं को एक असाधारण,आंनदायक तथा उदात्त मनोदशा में अनुभव करता है।
  • किंतु सामान्य आदमी के साथ अक्सर ऐसा देखा जाता है कि वह कार्यवश या स्वभावश अपने किसी एक गोलार्द्ध का प्रयोग कर पाता है।उदाहरण के लिए किसी गणित के प्रोफेसर,कंप्यूटर ऑपरेटर अथवा नीति-निर्धारक को लिया जा सकता है।ऐसे सभी कार्यों में बायें मस्तिष्क का ही उपयोग होता है।उसका दायाँ भाग अनुपयोगी पड़ा रहता है।लंबे समय तक यह अवस्था यदि बनी रहे,तो अनुपयोगी हिस्से की क्षमता घटने लगती है।यह स्थिति यदि दिमाग के दाएं खंड के साथ प्रस्तुत हुई हो,तो आदमी का आध्यात्मिक जीवन चौपट हो जाता है,उसकी रुचि और रुझान इस ओर से एकदम हट जाती और वह विशुद्ध भौतिकवादी बन जाता है,जो खतरनाक है।
  • सहज ज्ञान,इलहाम या अंत:स्फुरणा आध्यात्मिक जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम हैं।जिसके अंतःकरण में यह घटित होते हैं,उसके जीवन की जटिल-से-जटिल समस्याओं का समाधान पलक झपकते हो जाता है।कुछ मिली सेकंड से भी कम समय में समाधानकारक ऐसा चित्र अंतराल में उभरता है,जो उसकी मुश्किलों को तत्काल हल कर देता है।यह तभी संभव है,जब दायाँ मस्तिष्क क्रियाशील एवं जाग्रत हो तथा व्यक्ति का जीवन पवित्र हो।असंयम,आलस्य,उन्माद,तनाव,व्यग्रता,अस्वस्थता,तामसिक आहार,दृष्टिदोष,छिद्रान्वेषण,भ्रष्ट चिंतन एवं दुष्ट-आचरण यह सभी अंतःस्फुरणा के विकास में बाधक है तथा दाहिने गोलार्द्ध की क्षमता को कुंद बनाते हैं।
  • शरीर-संरचना विज्ञान और शरीर-क्रिया विज्ञान ने अब इस तथ्य को एकदम सुस्पष्ट कर दिया है कि मस्तिष्क का संबंध केवल नासिका से ही नहीं,वरन शरीर के सभी अवयवों से है।योगी इसे हजारों वर्षों से जानते थे।वे ध्यानगत अनुभव में शक्ति के प्रवाह का नाड़ियों द्वारा मस्तिष्क तथा संपूर्ण शरीर में प्रवाहित होते अनुभव करते एवं अपने अस्तित्व के कहीं अधिक सूक्ष्म स्तरों को ग्रहण करने में समर्थ थे,कारण कि उन्होंने ऐसी विधा विकसित की थी कि उसके माध्यम से संवेदना की शक्ति को अपरिमित रूप से बढ़ाया जा सके।इसके अतिरिक्त इसके द्वारा वे नाड़ियों,मस्तिष्क तथा सभी शारीरिक क्रियाओं पर नियंत्रण रख सकते थे।
  • साधना-विज्ञान में मुद्राएं और त्राटक-ध्यान ऐसे साधना उपचार है जो इडा और पिंगला को संतुलित करके आज्ञाचक्र का जागरण करते हैं।यदि यह सत्य है और साधना-मार्ग के अन्वेषकों द्वारा बतलाई गई नाड़ियों का मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है,तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों का संतुलन संभव है।मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर हुए अनुसंधान इस तथ्य को सिद्ध करते हैं।
  • किंसबोर्न अपने ‘सैड हेमिस्फीयर,हैप्पी हेमिस्फीयर’ नामक शोध-निबंध में इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि हमारे दृष्टिक्षेत्र की बाईं और दीखने वाले दृश्य और बाएं कान में सुनाई पड़ने वाली ध्वनियाँ-दोनों जब दाहिने मस्तिष्क तक पहुंचते हैं,तो मस्तिष्क उनके प्रति उतना ग्रहण-शील नहीं होता,जितना कि विपरीत अवस्था होने पर।ऐसे ही इस बात की भी पुष्टि शोधों द्वारा हुई है कि जब व्यक्ति उदास होता है,तो उसकी दृष्टि सामान्यतः बायीं ओर रहती है और दाएं मस्तिष्क को प्रभावित करती है,जबकि प्रसन्नता की दशा में ठीक इसका उल्टा होता है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में मन को कैसे जगाएँ के 6 अचूक मंत्र (6Surefire Spells on How to Aweken Mind),मन को कैसे जगाएँ? (How to Aweken Mind?) के बारे में बताया गया है।

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6.मन को जगाने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (How to Awaken Mind) (Humour-Satire):

  • अध्यापिका:कल मैंने तुम्हें गणित के सवाल हल करने के लिए दिए थे,उन्हें हल करके क्यों नहीं लाए?
  • छात्र:क्या करूं मैडम,जैसे ही मैंने सवाल हल करना शुरू किया और मेरा मस्तिष्क निष्क्रिय हो गया और मेरा मस्तिष्क काम करना बंद कर दिया।

7.मन को कैसे जगाएँ के 6 अचूक मंत्र (Frequently Asked Questions Related to 6Surefire Spells on How to Aweken Mind),मन को कैसे जगाएँ? (How to Aweken Mind?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या मस्तिष्क केवल शरीर का अंग है? (Is the brain only a part of the body?):

उत्तर:मस्तिष्क बुद्धि,प्रतिभा,ज्ञान,कौशल जैसी भौतिक विभूतियों का केंद्र भर नहीं है,इनसे अनेकों गुना क्षमतावान,ऐश्वर्य का उद्गम स्थल भी है।

प्रश्न:2.शांभवी मुद्रा और त्राटक का क्या महत्व है? (What is the significance of Shambhavi Mudra and Trataka?):

उत्तर:मुद्रा (शांभवी) और त्राटक मस्तिष्क के दोनों भागों की सक्रियता के बीच संतुलन स्थापित करते हैं।इसका स्पष्ट कारण है-शांभवी में दृष्टि को भ्रूमध्य में टिकाया जाता है तथा त्राटक में सामने की ओर।

प्रश्न:3.शाम्भवी मुद्रा और त्राटक से क्या अनुभव होता है? (What is the experience of Shambhavi Mudra and Tratak?):

उत्तर:इन क्रियाओं के अभ्यास के दौरान मस्तक-मध्य एक दबाव का अनुभव किया जा सकता है।यह दबाव और कुछ नहीं,आज्ञाचक्र की क्रियाशीलता और जागरण का प्रमाण है।ऐसा पाया गया है कि इससे इडा-पिंगला दोनों नाड़ियाँ प्रभावित होती हैं।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा मन को कैसे जगाएँ के 6 अचूक मंत्र (6Surefire Spells on How to Aweken Mind),मन को कैसे जगाएँ? (How to Aweken Mind?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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