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Success with Resolution/Force/Wisdom

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1.संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (Success with Resolution/Force/Wisdom),3 चीजों संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (3 Things Success Through Determination/Strength/Intellect):

  • संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (Success with Resolution/Force/Wisdom) के द्वारा जानेंगे कि इनमें किसी अकेले के दम पर सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है।सफलता के लिए इन तीनों गुणों की सहायता लेनी होगी,इन तीन गुणों को अपने अंदर विकसित करते रहना होगा।
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2.संकल्प से सफलता? (Success with Resolve):

  • सफलता का श्रेय किसको मिलना चाहिए संकल्प,बल,बुद्धि,विवेक,धैर्य,सतत अभ्यास या विवेक को।क्या केवल संकल्प के सहारे सफलता अर्जित नहीं की जा सकती है।प्रतियोगिता परीक्षाओं या शैक्षिक अथवा प्रवेश परीक्षा में भाग लेने वाले परीक्षार्थियों में कुछ गुणों की कमी की वजह से,वे सफलता से वंचित रह जाते हैं।किसी लेख में संकल्प के बारे में पढ़कर उन्हें लगता है कि संकल्प के सहारे सफलता अर्जित की जा सकती है।संकल्प शक्ति में आत्मिक शक्ति निहित होती है और किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने की योजना विचार पूर्वक बनाई जाती है।संकल्प-शक्ति में भावना शक्ति और इच्छाशक्ति का समावेश होता है।
  • एक छोटे विद्यार्थी को या कमजोर विद्यार्थी को कोई कठिन-सा सवाल दे दिया जाए तो उसको चुनौती मिलने पर वह भरसक प्रयास करता है परंतु निष्फल रहता है और सवाल को हल नहीं कर पाता है।वह बार-बार संकल्प के सहारे उसे हल करने की कोशिश करता है परंतु बल और बुद्धि के बिना वह उसे हल नहीं कर पाता है।जब तक उसमें बल और सामर्थ्य का विकास नहीं होगा,जब तक उसकी बुद्धि का विकास नहीं होगा तब तक केवल संकल्प के बल पर उसे हल नहीं कर पाएगा।इससे यह निष्कर्ष निकला कि केवल संकल्प मात्र से सफलता अर्जित नहीं की जा सकती है।

3.बल से सफलता (Success by force):

  • अब यदि किसी शारीरिक बल से संपन्न,हृष्ट-पुष्ट,स्वस्थ छात्र-छात्रा को वही सवाल दे दिया जाए तो ठस बुद्धि के कारण वह उसे हल नहीं कर पाएगा।प्रतियोगिता परीक्षाओं में घंटों बैठकर सतत अभ्यास करना पड़ता है।कमजोर और लुंजपुंज छात्र-छात्रा देर तक टिककर बैठ नहीं पाते हैं अतः परिणामजनक तैयारी नहीं कर पाते हैं।इसलिए जैसे-तैसे वे परीक्षा में सफल होने का जुगाड़ बिठाते देखे जाते हैं।
  • ठस बुद्धि के छात्र-छात्रा हों लेकिन शारीरिक रूप से सशक्त होने पर भी परीक्षाओं में ही क्या,किसी भी क्षेत्र में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाते हैं।जैसे-तैसे अपने दिन गुजारते हैं।कुश्ती-दंगल में भी शक्तिशाली,बलवान व्यक्ति को यह सोचना पड़ता है कि कब,किस समय कौन-सा दाँव चलाना है? बिना सोचे-विचारे केवल बल के सहारे कुश्ती,दंगल में सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है।
  • तात्पर्य यह है कि केवल अकेला बल बुद्धि के बिना सफलता नहीं दिला सकता है।शारीरिक बल से सशक्त छात्र-छात्रा अधिक देर तक टिककर पढ़ने में समर्थ है परंतु चंचल बुद्धि के कारण टिककर नहीं बैठता है,न अभ्यास कर पाता है।निष्कर्ष यही निकला कि केवल बल के सहारे मैदान नहीं जीता जा सकता है,सफलता अर्जित नहीं की जा सकती है।एकाकी बल अधूरा है उसे संकल्प और बुद्धि की आवश्यकता पड़ेगी ही।

4.बुद्धि से सफलता (Success with intellect):

  • क्या बुद्धि के सहारे जंग जीती जा सकती है।परीक्षाओं में लंबे-चौड़े सिलेबस को देखकर ही छात्र-छात्रा हाथ-पांव फूला बैठते हैं।बिना हिम्मत बल व संकल्प शक्ति के बुद्धि के सहारे कब तक व कहां तक चल पाएंगे।घंटों परीक्षा की तैयारी के लिए साहस व हिम्मत चाहिए,संकल्प चाहिए।आत्मिक शक्ति का सहयोग न मिले तो बुद्धि कुछ नहीं कर पाती है।बुद्धि के बल पर अध्ययन करने वाले व्यक्तियों में संवेदना का अभाव होगा,अन्य गुणों का अभाव होगा तो आगे बढ़ने के रास्ते बंद हो जाएंगे।
    हां,यह अवश्य है कि हम एक-एक गुण का विकास करते जाएंगे तो अन्य गुणों का विकास करना सरल और संभव हो जाएगा।यदि सभी गुणों को एक साथ विकसित करना चाहें तो बहुत कठिन होगा।हां,जो संकल्प शक्ति के धनी हैं वे एक झटके में अपने आप को बदल डालने का माद्दा रखते हैं।परंतु ऐसे लोग बहुत कम होते हैं।
  • जैसे किसी व्यक्ति की एकदम से चेतना जागृत हो जाती है,एकदम झटका लगता है और होश में आ जाता है तो उसके जीवन की दिशाधारा ही बदल जाती है।कोई अपमानजनक,मर्मान्तक,झकझोरने वाली घटना घटित हो जाती है तो उसका जीवन बदल जाता है।जैसे कालिदास की बुद्धि के पट बंद थे,ठस बुद्धि के थे परंतु उनकी पत्नी ने पहली ही रात उनकी बुद्धि को पहचान कर घर से बाहर निकाल दिया,धक्का देकर निकाल दिया तो इस अपमानजनक घटना ने उनके अंदर के चक्षु खोल दिए।इसी प्रकार तुलसीदास जी कामासक्त होकर पत्नी के पास उनके पीहर चले गए।घर के पिछवाड़े से सर्प को पकड़कर ऊपर चढ़ गए।जब प्रकाश में उनकी पत्नी ने उन्हें दिखाया कि वह सर्प को पकड़कर ऊपर चढ़े हैं।पत्नी ने समझाया कि शरीर तो मिट्टी है,इसके प्रति इतनी आसक्ति उचित नहीं है।इस घटना ने उनकी बुद्धि व हृदय के द्वार खोल दिए और उन्होंने बाद में ऐसी अमरकृति रामचरितमानस का लेखन किया जो आज जन-जन में लोकप्रिय है।

5.सद्बुद्धि धारण करें (Possess Wisdom):

  • जो भी अध्ययन किया जाए उसे समझना बुद्धि का काम है।यदि किए गए अध्ययन को समझ न सके तो यह बुद्धि का दोष माना जाएगा।यदि बुद्धि ठीक काम नहीं करती है,सतोगुण बुद्धि नहीं है तो विद्यार्थी सफलता प्राप्त करने के लिए अनैतिक और गलत तरीके अपनाता है।’विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ के अनुसार जब विद्यार्थी का विनाशकाल आता है तो बुद्धि उलटी चलने लगती है। वह परीक्षा में नकल करेगा,परीक्षक को डराएगा,धमकाएगा,परीक्षा से पूर्व रिश्वत द्वारा प्रश्न-पत्र प्राप्त करने की जुगत भिड़ाएगा,अपनी पहुंच का इस्तेमाल करेगा या परीक्षा में अपनी एवज में किसी अन्य विद्यार्थी को बिठाकर उत्तीर्ण होने का प्रयास करेगा आदि।ये सभी खोटे,निकृष्ट कार्य हैं जो उलटी बुद्धि,कुबुद्धि के कार्य हैं।
  • सही तरीके से उत्तीर्ण होने के लिए परीक्षार्थी को सद्बुद्धि धारण करना होगा।कुछ विद्यार्थी ऐसे होते हैं जो जानबूझकर गलत कार्य करते हैं,बुद्धि का या तो उपयोग ही नहीं करते और अगर करते भी हैं तो दुरुपयोग करते हैं अर्थात् बुद्धि का गलत राह पर प्रयोग करना।
  • जो प्रज्ञावान (wisdom) यानी सद्बुद्धि से युक्त विद्यार्थी होते हैं उसमें बुद्धि,धैर्य और स्मरणशक्ति ये तीनों गुण पाए जाते हैं।इन तीनों का उपयोग करने वाला गलत कार्य नहीं करता,गलत तरीके नहीं अपनाता है।मन जब दूषित विचारों और गलत वृत्तियों से प्रभावित रहता है तब वह बुद्धि,धैर्य और स्मृति से काम नहीं लेता और मनमानी करता है इस तरह बुद्धिहीन होकर  उतावली (अधैर्य) के साथ किए गए गलत कामों को ही प्रज्ञापराध कहा है।इसका परिणाम क्या होगा यह समझना कोई मुश्किल काम नहीं।
  • गलत काम करने वाले विद्यार्थी सफलता प्राप्त करने के अनेक तरीके ईजाद कर लेते हैं।और यह गलत काम कराने वाला हमारा मन ही है।यह मन की गुलामी,मन की तृष्णा के शिकार आज के विद्यार्थी या व्यक्ति रहे हैं ऐसी चिंता में मत पड़ जाना।ऐसा तो हमेशा से ही होता रहा है और हमेशा होता ही रहेगा।यही तो मनुष्य की विडम्बना है कि बचपन से ही ऐसे वातावरण में पैदा होता है पलता है और बड़ा होता है कि नाना प्रकार की गलत आदतें,दुष्प्रवृत्तियां,कामनाएं,लालसाएं और वासनाएं उसे घेर लेती हैं उसके मन में बस जाती हैं और बड़ी उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मन को अपने जाल में ऐसा लपेट लेती है कि इस जाल से छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है।और यह मुश्किल इस वजह से भी सुलझ नहीं पाती कि सुलझाये कौन? जो मन खुद ही उलझा हुआ और फंसा हुआ है वह खुद कैसे सुलझ सकता है? यदि आप नकल करने वाले को कहें तो नकल करने वाला रहेगा या ईमानदारी पूर्वक सही उत्तर लिखने वाला रहेगा,दोनों नहीं हो सकता है।नकल करने वाला,गलत तरीके अपनाने वाला होगा तो सही व आचरणवान नहीं रहेगा,सही अच्छा और आचरणवान रहेगा तो नकल करने वाला तथा गलत तरीके अपनाने वाला न हो सकेगा।मन की भी यही दशा है कि यदि वह खुद बेईमान और गलत काम करने वाला हो गया तो हम उससे अच्छे आचरण की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं।नकल करके परीक्षार्थी खुद ही परीक्षक को जाकर थोड़े ही कहेगा कि लो मैंने नकल कर ली,मुझे पकड़ लो और सजा दे दो।
  • तो जरा सोचिए कि यदि मन की प्रवृत्तियां किसी भी कारण से दूषित हो चुकी हों,भ्रष्ट हो चुकी हों और हानिकारक सिद्ध हो रही हों तो इसको सुधारने का क्या उपाय किया जा सकता है? यदि आप ध्यानपूर्वक इस लेख को यहां तक पढ़ चुके होंगे तो इसका उत्तर तुरंत आपके दिमाग में आ जाएगा और वह उत्तर होगा कि विवेक से काम लेकर मन की गलत और दूषित प्रवृत्तियों को रोका जा सकता है,बदला जा सकता है।यह बात जरूर है कि अकेला विवेक यह काम नहीं कर सकेगा।विवेक की मदद के लिए हमें धैर्य,संकल्प शक्ति और निरंतर अभ्यास-इन तीन सद्गुणों को भी विवेक के साथ रखना होगा क्योंकि विवेक अपने आप में शक्तिशाली नहीं होता।धैर्य,संकल्प शक्ति और निरन्तर प्रयत्न यानी सतत अभ्यास-ये तीनों विवेक के बल हैं।जब ये चारों इकट्ठे हो जाते हैं और एकजुट होकर हमारे साथ होते हैं तब हम मुश्किल काम को भी करने में सफल हो जाते हैं फिर मन को सुधारना और सही राह पर ले आना कोई मुश्किल काम नहीं रहता।हां,सफल होने में देर हो सकती है पर अंधेर नहीं हो सकती।

6.सफलता के लिए संकल्प/बल/बुद्धि जरूरी (Determination/strength/wisdom is necessary for Success):

  • उपर्युक्त विवरण इसलिए प्रस्तुत किया गया है कि संकल्प,बुद्धि का भी दुरुपयोग किया जा सकता है।दुरुपयोग करके,गलत तरीके अपनाकर,अनैतिक तरीके अपनाकर परीक्षा में सफल होना या जाॅब प्राप्त करना,जाॅब में सफलता प्राप्त करना वास्तविक रूप में सच्ची सफलता नहीं है।परीक्षा में सही तरीके से,सही उत्तर लिखकर उत्तीर्ण होना सच्ची सफलता है और इसी के लिए संकल्प शक्ति,बल और बुद्धि का उपयोग करना चाहिए।तब ऐसी बुद्धि सत्वगुण वाली बुद्धि होती है।
  • सही लक्ष्य,सही उद्देश्य चुनकर फिर उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी संपूर्ण शक्ति लगा देनी चाहिए।सही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संकल्प शक्ति,बल और बुद्धि का उपयोग करने का आनंद ही ओर होता है।नेक इरादे,शुभ निष्ठा और धैर्य के साथ परीक्षा की तैयारी करते रहें,करते रहें।ऐसी सफलता में देर हो सकती है लेकिन इस प्रकार से प्राप्त सफलता का अपूर्व आनंद होता है।कई संघर्षों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।गिरते हैं,पड़ते हैं,चोटे लगती हैं,फिर से उठते हैं और चल पड़ते हैं जब तक कि आप अपने लक्ष्य तक पहुंच नहीं जाते हैं।
  • भरसक प्रयास करें,बिना थके,बिना रुके आगे बढ़ते रहें।सोए नहीं रहे,मदहोश में न रहें,जागरूक रहे,सचेत रहें।किसी कार्य को हाथ में लें चाहे आप विद्यार्थी हैं या किसी प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तीनों का सहयोग लें।तीनों का सम्मिलित रूप ही आपको सफलता दिला सकता है।एक गुण के आधार पर आप अधूरे हैं और अधूरेपन से सफलता प्राप्त नहीं होती है।परफेक्शन से,पूर्णता से ही सफलता प्राप्त होती है।इन तीनों गुणों के बिना खर्राटे लेते रहना होता है,नींद की खुमारी में रहना होता है।खर्राटे लेते रहने,खुमारी में रहने पर सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है।कुछ छात्र-छात्राएं परीक्षा के समय माता-पिता,शिक्षकों की आंखों में धूल झोंकने के लिए पुस्तक हाथ में लिए रहेंगे,लेकिन उनका मन कहीं ओर उड़ान भर रहा होता है,कहीं ओर खोया रहता है,कल्पना लोक में विचरण कर रहा होता है,ऐसे विद्यार्थी असफलता को प्राप्त होते हैं।
  • वस्तुतः ऐसे विद्यार्थी दूसरों को नहीं खुद को धोखा दे रहे होते हैं।असफलता मिलती है तो सबसे ज्यादा वे ही प्रभावित होते हैं,उनका भविष्य बर्बाद होता है,किसी ओर का नहीं।ऐसे विद्यार्थी अपनी असफलता का दोष दूसरों पर मढ़ते हैं।यथा पेपर कठिन था,टीचर ने ठीक से नहीं पढ़ाया,अच्छी स्कूल में दाखिला नहीं लिया,घर में शोरगुल था (पढ़ने का माहौल नहीं था) आदि।उनकी नजर में कोई न कोई दोषी होता है और स्वयं को बिल्कुल पाकसाफ साबित करते हैं।ऐसे छात्र-छात्राओं को कितनी ही सुख-सुविधाएँ मिल जाएँ तो वे उनका कोई भी फायदा नहीं उठा पाते हैं।किन्हीं भी साधन-सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए खुद में काबिलियत होनी चाहिए।
  • यदि संकल्प के साथ शक्ति जुड़ जाती है तो यह संकल्पशक्ति होती है।यह बल कौन-सा है अर्थात् आत्मिक-बल है।आत्मिक शक्ति जब संकल्प के साथ जुड़ जाती है तो यह प्रचंड शक्ति संपन्न हो जाती है और उसके साथ यदि सद्बुद्धि सहयोग करे तो जटिल से जटिल,कठिन से कठिन कार्यों को संपन्न कर डालती है।तीनों में तालमेल हो,तो तीनों से किसी एक लक्ष्य को प्राप्त करने,सफलता प्राप्त करने में संदेह नहीं रहता है।पर अक्सर होता यह है कि कहीं संकल्प के धनी छात्र होते हैं तो उनके पास सद्बुद्धि नहीं रहती है।सद्बुद्धि हो तो संकल्प शक्ति का अभाव रहता है।संकल्प शक्ति और सद्बुद्धि दोनों का मिलना बहुत कम छात्र-छात्राओं में अथवा व्यक्तियों में पाया जाता है।
  • अब प्रश्न यह उठता है कि सफलता का श्रेय संकल्प शक्ति और सद्बुद्धि में से किसको मिलना चाहिए? संकल्प शक्ति और सद्बुद्धि में कोई भी छोटा-बड़ा नहीं होता है।दोनों का अपनी-अपनी जगह महत्त्व है।एक के बिना दूसरा कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं हैं।अतः दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।छात्र-छात्राओं को विद्यार्थी काल से ही अपनी संकल्प शक्ति और बुद्धि को विकसित करना चाहिए।सत्साहित्य का स्वाध्याय,सत्संग,चिंतन-मनन करने से सद्बुद्धि विकसित और परिमार्जित होती है।इसी प्रकार कठिन सवालों,प्रश्नों और समस्याओं का समाधान करने के लिए जूझने,संघर्ष करने से संकल्प शक्ति विकसित होती है।विकार कट-कट कर,गल-गल कर निकल जाते हैं और आत्मा पर छाए हुए मल-विक्षेप,अज्ञान का पर्दा हटता जाता है।आत्मिक तेज,चेतना के वास्तविक स्वरूप का हमें अनुभव होने लगता है।जितना अज्ञान का पर्दा हटता जाता है,उतनी आत्मा प्रकाशित,शुद्ध स्वरूप में प्रकट होने लगती है।अतः छात्र-छात्राओं को मन लगाकर अध्ययन करना,विद्या ग्रहण ग्रहण करना चाहिए।आत्मा विद्या और तप से ही शुद्ध होती है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (Success with Resolution/Force/Wisdom),3 चीजों संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (3 Things Success Through Determination/Strength/Intellect) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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7.संकल्प शक्ति बुद्धि का प्रथम बार प्रयोग करने वाला (हास्य-व्यंग्य) (A first-time user of determination and intellect) (Humour-Satire):

  • टीचर:संकल्प शक्ति का प्रथम बार प्रयोग करने वाले कौन थे?
  • स्टूडेंट:ऋषि अंगिरा।
  • टीचरःशाबाश और दूसरी चीज सद्बुद्धि का प्रयोग किसने किया।
  • स्टूडेंट:दूसरी चीज सद्बुद्धि का प्रयोग भी ऋषि अंगिरा ने ही किया होगा,आखिर ऋषि अंगिरा दिमाग से पैदल तो थे नहीं।

8.संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (Frequently Asked Questions Related to Success with Resolution/Force/Wisdom),3 चीजों संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (3 Things Success Through Determination/Strength/Intellect) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नः

प्रश्न:1.अच्छे कार्य में किसकी जरूरत पड़ती है? (Who is needed for a good work?):

उत्तर:अच्छे काम को करने में धन की आवश्यकता कम पड़ती है,पर अच्छे हृदय और संकल्प की अधिक।

प्रश्न:2.सबसे बड़ी शुभ निष्ठा क्या है? (What is the greatest good loyalty?):

उत्तर:संकल्प कर लो,सोच समझ कर लो,किंतु करने के बाद उसे मत छोड़ो।सत्य संकल्प ही भगवान के प्रति सबसे बड़ी शुभ निष्ठा है।

प्रश्न:3.बुद्धिमान की बुद्धि किसके समान होती है? (What is the intellect of the wise like?):

उत्तर:बुद्धिमान की बुद्धि दर्पण के सदृश है।वह स्वर्ग का प्रकाश लेकर उसे परिवर्तित कर देती है।बुद्धिमानों की बुद्धि के सम्मुख संसार में कुछ भी असाध्य नहीं है।

प्रश्न:4.बुद्धि किसे कहते हैं? (What is called intellect?):

उत्तर:जो विवेचन कर सकती है और ज्ञान की जननी है उसे श्रुति ने बुद्धि कहा है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (Success with Resolution/Force/Wisdom),3 चीजों संकल्प/बल/बुद्धि से सफलता (3 Things Success Through Determination/Strength/Intellect) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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