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9 Techniques of How to Awaken Talent

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1.प्रतिभा को कैसे जगाएँ की 9 तकनीक (9 Techniques of How to Awaken Talent),प्रतिभा को कैसे जगाएँ? (How to Awaken Talent?):

  • प्रतिभा को कैसे जगाएँ की 9 तकनीक (9 Techniques of How to Awaken Talent) से आप समझ सकेंगे कि सुप्त प्रतिभा का जागरण कैसे किया जाए अर्थात् इस लेख के आधार पर प्रतिभा संवर्द्धन कैसे किया जाए के बारे में जानेंगे।प्रतिभा यदि सुप्त ही रह जाए,उसका जागरण करने का प्रयास नहीं किया जाए तो वह साधारण मानवों की गिनती में आता है।वही जब उसके जागरण का सत्प्रयास करता है तो दिव्य विभूतियों से संपन्न हो जाता है।
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2.प्रतिभावान और साधारणजनों में अंतर (Difference between talented and ordinary people):

  • प्रतिभा एक दैवी स्तर की विद्युत चेतन है,जो मनुष्य के व्यक्तित्व और कर्तृत्व में असाधारण स्तर की उत्कृष्टता भर देती है।उसी के आधार पर अतिरिक्त सफलताएं आश्चर्यजनक मात्रा में उपलब्ध की जाती हैं;साथ ही इतना और जुड़ता है कि अपने लिए असाधारण श्रेय,सम्मान और दूसरों के लिए अभ्युदय के मार्ग पर घसीट ले चलने वाला मार्गदर्शन वह कर सके-मांझी की तरह अपनी नाव को खेकर स्वयं पार उतरे और उस पर बैठाकर अन्यान्यों को भी पार उतारने का श्रेय प्राप्त कर सके तथा गिरों को उठाने,डूबतों को उतारने और किसी तरह समय गुजारने वालों को उत्कर्ष की ऊंचाई तक उछालने में समर्थ हो सके।
  • प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं:विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है।साधारणजनों को तो जिंदगी के दिन पूरे करने में ही दौड़-धूप करनी पड़ती है,झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है,उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं।पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है,किंतु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है,वे तारागणों के बीच चंद्रमा की तरह चमकते हैं।उनकी चांदनी सर्वत्र शांति और शीतलता बिखेरती है।वे स्वयं सुंदर लगते और अपनी छत्रछाया में आने वालों को शोभा-सुंदरता से जगमगा देते हैं। प्रतिभावानों को उदीयमान सूर्य भी कह सकते हैं,जिसके दर्शन होते ही सर्वत्र चेतना का एक नया माहौल उमड़ पड़ता है।

3.प्रतिभा ही नहीं जाग्रत प्रतिभा जरूरी (Not only talent but also awakened talent is necessary):

  • संपदा का इन दिनों बहुत महत्त्व आँका जाता है।इसके बाद समर्थता,बुद्धिमत्ता आदि की गणना होती है,पर और भी ऊंचाई की ओर नजर दौड़ाई जाए तो गणितज्ञ,वैज्ञानिक,दार्शनिक,शासक,कलाकार,वैज्ञानिक,निर्माण एवं जागरूक लोगों में मात्र परिष्कृत प्रतिभा का ही चमत्कार दीखता है;साहसिकता उसी का नाम है।दूरदर्शिता,विवेकशीलता के रूप में उसे जाना जा सकता है।यदि किसी को वरिष्ठता या विशिष्टता का श्रेय मिल रहा हो तो समझना चाहिए कि यह उसकी विकसित प्रतिभा का ही चमत्कार है।
  • भगवान ने काय-कलेवर तो आरम्भ से ही बिना मूल्य दे दिया है,पर उसके बाद का दूसरा वरदान है:जागृत प्रतिभा।इसी के सहारे कोई महामानव स्तर का बड़प्पन उपलब्ध करता है।इतनी बहुमूल्य संपदा प्राप्त करने के लिए वैसा ही साहस एकत्रित करना पड़ेगा,जैसा कि मानव जाति के विकास के लिए महान गणितज्ञों एवं वैज्ञानिकों ने उन्नत खोज करने के लिए अपनाया था।ध्यान रहे मानव जाति के विनाश के लिए जो खोजें की जाती है,विनाशक हथियार किए जाते हैं,उन्हें मानव जाति को उन्नत करने के लिए अर्थात् उच्चस्तरीय प्रयोजन में प्रयुक्त नहीं माना जाना जाएगा।यदि मानव जाति को बचाना है और ऐसा मार्ग प्रशस्त करना है तो इसके लिए जागृत प्रतिभाओं की ही आवश्यकता है और वही इस काम को कर सकती हैं।

4.बड़े काम के लिए मनस्विता जरूरी (Mindfulness is necessary for big work):

  • किसी की वरिष्ठता उसके पारमार्थिक पौरुष के आधार पर ही आँकी जाती है।श्रेष्ठों-वरिष्ठों का आकलन इसी एक आधार पर होता रहा है;साथ ही यह भी विश्वास किया जाता है कि बड़े कामों को संपन्न करने में उन्हीं की मनस्विता काम आती है।पटरी पर से उतरे इंजन को उठाकर फिर उसी स्थान पर रखने के लिए मजबूत और बड़ी क्रेन चाहिए।उफनती नदी में जब भंवर पड़ते रहते हैं,तब बलिष्ठ नाविकों के लिए यह संभव होता है कि वे डगमगाती नाव को खेकर पार पहुंचाएँ।समाज की सुविस्तृत व संसार की उलझनभरी बड़ी समस्याओं को सही तरह सुलझा सकना उन साहसी और मेधावीजनों से ही बन पड़ता है,जिन्हें दूसरे शब्दों में मेधावान भी कहा जा सकता है।
  • श्रेष्ठ कार्यों,उत्कृष्ट खोजों जैसे महान प्रयोजन को हाथ में लेने और उसे पूरा करने के लिए साहसिक और प्रतिभावानों के वश की बात है।
  • आड़े समय के लिए ऐसे ही प्रखर प्रतिभावानों को ही खोजा,उभारा और खरादा जाना चाहिए।
    प्राचीनकाल में जब धर्मांधता के कारण मानव जाति पीड़ित थी,पाखंड का बोलबाला था तो उस समय प्रतिभावान गणितज्ञों और वैज्ञानिकों ने ही वैज्ञानिक और गणितीय खोजें करके अंधविश्वास व पाखंड को दूर किया,धर्मांधता का खात्मा किया।इसमें हाईपेटिया जैसी गणितज्ञा व आर्किमिडीज जैसे गणितज्ञ व वैज्ञानिकों को अपना बलिदान भी देना पड़ा।इसके बाद तो ऐसे मनस्वी वैज्ञानिक व गणितज्ञ निकल पड़े,जो आदर्शों के निर्वाह में बड़े से बड़ा जोखिम उठाने के लिए तत्परता दिखाने लगे।और उसके बाद एक-से-एक गणितज्ञ और वैज्ञानिक नई-नई खोजे करने लगे,अंधविश्वासों,रूढ़ मान्यताओं और पाखंडों का पर्दाफाश करने लगे और आधुनिक विश्व विज्ञान व तकनीकी की नींव पर खड़ा हो पाया।

5.भगवान पुरुषार्थी की सहायता करता है (God helps the man who has help themselves):

  • भगवान उनकी सहायता करता है,जो अपनी सहायता आप करते हैं।प्रतिकूलताएं हटतीं और अनुकूलताएं जुटती चली जाती हैं।आज विश्व से नरबलि,पशुबलि,ढोंग,प्रतिभा को कैसे जगाएँ की 9 तकनीक (9 Techniques of How to Awaken Talent) से आप समझ सकेंगे कि सुप्त प्रतिभा का जागरण कैसे किया जाए अर्थात् इस लेख के आधार पर प्रतिभा संवर्द्धन कैसे किया जाए केपाखंड,अंधविश्वास काफी कुछ खत्म हो गया है।लोगों को दास प्रथा,गुलामी,सतीप्रथा जैसी अनेक प्रथाओं से मुक्ति मिली है,अनेक बंधनों से छुटकारा मिला है तो इसके पीछे प्रतिभावानों का त्याग,तप और साधना को ही श्रेय दिया जाना चाहिए।प्रतिभावानों पर विश्वास करके निर्बल व्यक्ति भी उत्साह और साहस से भर जाते हैं और प्रतिभावान दुर्बलों में प्राणचेतना,ऊर्जा से ओतप्रोत कर देते हैं और समर्थ लोगों की उनके पास एक मंडली तैयार हो जाती है जो कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहती है।दूसरी ओर प्रतिभावान समर्थ होते हुए भी प्रमाद में पड़े हुए हों तो कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं हो पाते हैं।
  • निष्कर्ष यही निकलता है कि जागृत प्रतिभा,दुर्बल सहयोगियों की सहायता से भी बड़े से बड़े काम संपन्न कर लेती हैं,जबकि डरकर समर्थ व्यक्ति भी हाथ-पैर फुला बैठते हैं।
  • मनुष्य के काय-कलेवर के द्वारा जो अनेक चमत्कारी काम होते ही दीख पड़ते हैं,वे मात्र हाड-मांस की उपलब्धि नहीं होते,वरन उछलती उमंगों के रूप में प्रतिभा ही काम करती है।स्वयंवर में माला उन्हीं के गले में पड़ती है,जो दूसरों की तुलना में अपनी विशिष्टता सिद्ध करते हैं।चुनावों में वे ही जीतते हैं,जिनमें दक्षता प्रदर्शित करने और लोगों को अपने प्रभाव में लाने की योग्यता होती है।मजबूत कलाईयाँ ही हथियार का सफल प्रहार कर सकने में सफल होती हैं।
  • बड़े काम बड़े व्यक्तित्वों से ही बन पड़ते हैं।भारी वजन उठाने में हाथी जैसे सशक्त ही काम आते हैं,बकरों और गधों को उतना नहीं बन पड़ता;भले ही कल्पना करते,मन ललचाते या डींग हाँकते रहें।प्रतिभा जिधर भी मुड़ती है,उधर ही बुलडोजरों की तरह मैदान साफ करती चलती है।
  • सृजनशिल्पियों के समुदाय को अग्रगामी बनाने में लगी हुई केंद्रीय शक्ति अपने और दूसरों के अनेकानेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह विश्वास दिलाती है कि यह पारस से सटने का समय है:कल्पवृक्ष की छाया में बैठ सकने का अवसर है।प्रभात पर्व में जागरूकता का परिचय देखकर हममें से हर किसी को प्रसन्नता,प्रफुल्लता और सफलता की उपलब्धियों का भरपूर लाभ मिल सकता है;साथ ही जागृत-प्रतिभायुक्त व्यक्तित्व सँजोने का भी।

6.प्रतिभा जागरण हेतु संघर्ष की भट्टी में तपना पड़ता है (For the awakening of talent,one has to be heated in the furnace of struggle):

  • मौलिक या आरंभिक रूप में हर वस्तु कच्ची या अनगढ़ ही होती है।उसे प्रयत्नपूर्वक सुंदर-समुन्नत बनाना पड़ता है।खदान में से लोहा या सोना मिट्टी मिले हुए सामान्य स्थिति में मिलता है।उन्हें धधकती भट्टी में गलाकर शुद्ध स्थिति में पहुंचाया जाता है।इस गली हुई धातु में से जो उपकरण बनाने होते हैं,उनकी तदनुरूप सांचे में डालकर ढलाई की जाती है,तभी औजारों या आभूषणों के रूप में उनकी उपयोगिता सिद्ध हो पाती है।इस प्रक्रिया में से गुजरे बिना उनका मूल्यांकन हो ही नहीं पाता।मिट्टी को गीली करके उससे जो बनाया जाए,वह कच्चा ही होता है।कुम्हार चाक पर घुमाकर उसको शक्ल तो दे सकता है,पर वह निर्माण कच्चा ही रहता है।ठोकर लगने पर टूट जाता है।पानी पड़ने पर गल जाता है।उसे यदि चिरस्थायी एवं सुदृढ़ बनाना हो तो आंवें की आग में पकाए बिना और कोई चारा नहीं।पकने वाले को इसमें असुविधा हो सकती है,पर उससे बच निकलने का और कोई विकल्प है नहीं।परिष्कृतता प्राप्त करने के लिए तपाने तपने के अतिरिक्त और किसी तरह समर्थता विनिर्मित होती नहीं।
  • तप का महात्म्य आचार्यजनों और आप्तजनों द्वारा विस्तारपूर्वक बताया गया है।तपस्वी ऋद्धि-सिद्धियां प्राप्त करते हैं,स्वर्ग और मुक्ति जैसी समुन्नत स्थिति में पहुंचते हैं।ऋषिकल्प मनस्वियों का सुसंस्कृत इतिहास इसी आधार पर विनिर्मित हुआ।वे उत्पन्न तो सामान्यजनों जैसी परिस्थिति में ही हुए,पर अपनी तप-साधना द्वारा धरती पर रहकर भी स्वर्गलोग में निवास करने वाले देवमानवों जैसे बन गए,दिव्य संपदाओं,विभूतियों और शक्तियों के अधिष्ठाता बने।कहा जाता है कि तप के बल पर ही ब्रह्मा,विष्णु,महेश अपने सुविस्तृत दायित्व वहन करते रहने में समर्थ होते हैं।जितने भी ऋषि-मुनि,योगी,गणितज्ञ,वैज्ञानिक कठिन कार्य में तभी सफलता पाई,जब वे कठोर तप की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके।इन सभी की साधनाओं द्वारा उत्पन्न हुए प्रतिफल का गंभीरतापूर्वक मूल्यांकन किया जाता है।

7.तप से प्रतिभा निखरती है (Talent shines through Tenacity):

  • पानी को गर्म करने से वह भाप बनता है और बादलों के रूप में बरसता है।वाष्पीकृत जल ही स्टीम इंजन चलाता है,प्रेशर कुकर के रूप में अपनी उपयोगिता दिखाता है।चिकित्सा के काम आनेवाली बहुमूल्य रसायनें तभी बनती हैं,जब उनके अनेक अग्नि संस्कार होते हैं।तपाने,पकाने पर ही अनगढ़ खाद्य स्वादिष्ट व्यंजनों के रूप में परिणत होता है।सूर्य की ऊर्जा तप से उपजी है। प्राणियों और वनस्पतियों में प्राण संचार करने में समर्थ होती है।घोर शीत के रहते तो जीवन का किसी रूप में उदय संभव नहीं हो पाता।सौरमंडल के दूरवर्ती ग्रह-उपग्रह इसी कारण निर्जीव हैं कि उन तक सूर्यताप अभीष्ट मात्रा में पहुंच नहीं पाता।
  • मनुष्य जीवन पर तो यह बात शत-प्रतिशत घटित होती है कि तप-साधना अपनाकर ही प्रगतिशीलता और वरिष्ठता का लाभ उपलब्ध होता है।शरीर का स्वाभाविक तापमान घटने पर निष्क्रियता आ दबोचती है और मृत्यु आ धमकती है।ताप आवश्यक है।विषाणु उसी के प्रभाव से मरते हैं।धूप पाकर ही उद्यान में फूल खिलने और फलने लगते हैं।
  • उच्च उद्देश्यों के लिए किया गया पराक्रम या कष्ट सहना ही तप है।इसका प्रतिफल प्रत्येक महान प्रयोजन में नियोजित हुआ देखा जाता है।आलसी-प्रमादी किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं,जबकि साहस के धनी पुरुषार्थ परायण अपनी प्रचंड लगन और पुरुषार्थ के आधार पर तेजी से आगे बढ़ते और तूफान की तरह ऊंचे उठते हैं।

8.एकांत साधना भी तपश्चर्या है (Solitary meditation is also penance):

  • प्रतिभा-परिष्कार की उपयोगिता-आवश्यकता समझने वालों को उसके लिए सहमत किया जाना चाहिए कि वे किसी प्रकार ढर्रे का जीवन जीकर दिन गुजारते रहने की सरल प्रक्रिया अपनाए रहने तक संतुष्ट न रहेंगे,वरन आदर्शों के परिपालन में तत्परता बरतने और कटिबद्ध होने के लिए अपनी संकल्पशक्ति का समग्र प्रयोग करेंगे।
  • संसार के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर एक ही तत्व उभरकर सामने आता है कि जिन्होंने आदर्शवाद की दिशाधारा अपनाने के लिए कठोरतापूर्वक आत्मानुशासन बरता;जो अवांछनीयताओं से डटकर जूझे; जिन्होंने नवसृजन के लिए प्राणपण से प्रयत्न किए; वे ही ऐसा श्रेय अर्जित कर सके,जिसे अभिनंदनीय या अनुकरणीय कहा जा सके।महामानव बनने की बात इससे कम में बनती नहीं।जो इसके लिए कटिबद्ध प्रयत्नरत हैं,उसे और कुछ करने की आवश्यकता नहीं।
  • तपश्चर्या का एक स्वरूप एकांत साधना और कष्टसाध्य तितिक्षा का भी है,पर वह हर किसी के लिए अनिवार्य नहीं।सदुद्देश्यों के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ भी एक प्रकार का सर्वसुलभ तप है।उसे अपनाकर असंख्य महामानव अपना और संसार का भला करने और हर दृष्टि से धन्य बनने में समर्थ हुए हैं।गांधी,विनोबा,विवेकानंद,दयानंद जैसों की तपश्चर्या सेवा संदर्भ से ही जुड़ी रही।उन्होंने अपने को इतना परिष्कृत किया कि उनका व्यक्तित्व दूसरों पर गहरी छाप छोड़ सके और अपनाए हुए कठिनाइयों से भरे मार्ग पर अनेकों को चला सकने में सफल हो सके।इसके अतिरिक्त उन्होंने लोकमंगल के लिए इतना सृजनात्मक प्रयास-पुरुषार्थ किया कि उसका प्रभाव बहुमुखी अभ्युदय के रूप में सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत हुआ।
  • आपातकाल में एकांत साधना से भी बढ़कर सेवा साधना का महत्त्व बन जाता है।संकटों,विपत्तियों से जनसमुदाय को बचाने के लिए जो भावनापूर्वक जुटते और उदार सेवा साधना का परिचय देते हैं,उन्हें आत्मसंतोष भी मिलता है और लोकसम्मान भी।साथ ही दैवी अनुग्रह का प्रत्यक्ष रसास्वादन करने का अवसर भी हाथों-हाथ उपलब्ध होता है।तप-साधना का भी अंतिम लक्ष्य यही है।ऋषि ने देवदूत के प्रश्न का उत्तर देते हुए अपनी आंतरिक आकांक्षा इतने भर में व्यक्त कर दी कि उन्हें न स्वर्ग चाहिए,न राज्य और न मुक्ति।मात्र इतनी इच्छा है कि दुःख-दैन्य से घिरे हुए प्राणियों की व्यथा-निवारण के कुछ काम आ सकूँ।वस्तुतः ऐसे ही देवात्मा बिना कंदराओं के खोजें,जनसाधारण के बीच रहते हुए अपनी उदारता का परिचय देते हुए उसी पद को प्राप्त करते हैं जो तपस्वियों के लिए निश्चित है,निर्धारित है।
  • आत्मपरिष्कार और लोकपरिष्कार की संयुक्त साधना ऐसी है,जिसे अपनाकर कामकाजी व्यक्ति भी सामान्यजनों जैसा गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भी अपने साथ अनेकानेकों की प्रतिभा-परिष्कार कर सकने में सफल-समर्थ हो सकता है।यह युग का आपातकाल है।इसमें अवांछनीयताओं से जूझना आपत्ति धर्म है। साथ ही वातावरण को सुधार-परिष्कार की ऊर्जा से भर देना भी महत्त्वपूर्ण कार्य है।इस समय इस प्रक्रिया को प्रतिभा जागरण के लिए अपनाया जाना चाहिए।प्रतिभा को जगाने के लिए प्रचंड पुरुषार्थ और तप-साधना करने की जरूरत है।जितनी मात्रा में पुरुषार्थ और तप साधना की जाएगी अर्थात् संघर्ष की भट्टी में गुजरने पर ही प्रतिभा का जागरण होता है अन्यथा सुप्त प्रतिभा सड़-गल जाती है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में प्रतिभा को कैसे जगाएँ की 9 तकनीक (9 Techniques of How to Awaken Talent),प्रतिभा को कैसे जगाएँ? (How to Awaken Talent?) के बारे में बताया गया है।

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9.प्राचीन गणित की प्रतिभाओं के बारे में (हास्य-व्यंग्य) (About Genius of Ancient Mathematics) (Humour-Satire):

  • गणित टीचर (छात्रों से):तुम प्राचीन गणित की प्रतिभाओं के बारे में क्या बता सकते हो? क्या जानते हो?
  • गणपत छात्र:यही कि प्राचीन गणित की जितनी भी प्रतिभाएं हैं वह अब इस संसार में नहीं है,मर चुके हैं।

10.प्रतिभा को कैसे जगाएँ की 9 तकनीक (Frequently Asked Questions Related to 9 Techniques of How to Awaken Talent),प्रतिभा को कैसे जगाएँ? (How to Awaken Talent?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.प्रतिभा के लक्षण क्या है? (What are the traits of genius?):

उत्तर:प्रतिभा के माने हैःबुद्धि में नई-नई कोपलें फूटते रहना।तभी कल्पना,नया उत्साह,नई खोज,नई स्फूर्ति ये सब प्रतिभा के लक्षण हैं।

प्रश्न:2.प्रतिभा के उत्कर्ष के लिए और क्या आवश्यक है? (What else is needed for the flourishing of talent?):

उत्तर:प्रतिभा के साथ जब शुभ निष्ठा एवं लगन का सामंजस्य हो जाता है तो व्यक्ति के गुण कस्तूरी की गंध में बोलने लगते हैं।

प्रश्न:3.प्रतिभा और गुणी को स्पष्ट करो। (Explain the genius and the virtuous):

उत्तर:प्रतिभा वही कार्य करती है जो वह करने के लिए बाध्य है एवं गुणी वही कार्य करता है जो वह कर सकता है।

प्रश्न:4.प्रतिभाशाली कैसे नष्ट होता है? (How is the genius destroyed?):

उत्तर:प्रतिभाशाली व्यक्ति यदि नष्ट होता है तो प्रायः अपने ही द्वारा नष्ट होता है अर्थात् दुर्गुणों को अपनाने और अहंकार के कारण नष्ट होता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा प्रतिभा को कैसे जगाएँ की 9 तकनीक (9 Techniques of How to Awaken Talent),प्रतिभा को कैसे जगाएँ? (How to Awaken Talent?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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