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9 Keynote Not to Get Misled for Youth

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1.युवाओं के लिए दिग्भ्रमित न होने के 9 मूलमंत्र (9 Keynote Not to Get Misled for Youth),युवा दिग्भ्रमित होने से कैसे बचें? (How to Avoid Being Young Disoriented?):

  • युवाओं के लिए दिग्भ्रमित न होने के 9 मूलमंत्र (9 Keynote Not to Get Misled for Youth) के आधार पर ज्ञात होगा कि आज की युवा पीढ़ी किस तरफ बढ़ती जा रही है।एक अंधी गली में जिससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल है।
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2.युवा पीढ़ी दिशाहीन (The younger generation is directionless):

  • युवा शक्ति इसी राष्ट्र की उज्ज्वल आशा का प्रतीक है।देश एवं समाज का भविष्य इसी पीढ़ी के हाथों में होता है।यह एक सार्वभौमिक एवं शाश्वत सत्य है,लेकिन आज यह एक मुहावरा बनकर रह गया है,जिसे हर नेता और उपदेशक अपने मुंह से सुनाया करता है।जबकि इस समय देश का भविष्य तय करने में जवान अपनी कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं।युवा पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में दिग्भ्रमित है।उसके सामने न कोई आदर्श है,न उच्च उद्देश्य।ऐसे में उपभोक्तावादी संस्कृति के निरंकुश भोगवाद का दंश उसे विक्षिप्तता एवं पतन की राह पर धकेल रहा है।परिणामस्वरूप टूटे स्वप्नों,बिखरे अरमानों एवं अतृप्त आकांक्षाओं की मारी युवा पीढ़ी का जीवन पुष्प खिलने से पूर्व ही मुरझाकर दम तोड़ रहा है।कालचक्र के विषम प्रवाह में युवा शक्ति को रचनात्मक दिशा में मोड़ने एवं उसे अपने जीवन व राष्ट्र-समाज के सृजन में प्रेरित एवं नियोजित करने की आवश्यकता पहले से अधिक गंभीर हो गई है।
  • युवा शक्ति की वर्तमान दुर्दशा का कारण बहुत कुछ अपनी स्वतंत्रता काल की दोषपूर्ण नीतियों में खोजा जा सकता है।आजादी के बाद विकसित देशों के साथ अंधी दौड़ में युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण की आवश्यकता की पूरी तरह अनदेखी की और उपभोक्तावाद के हामी व आधुनिकता के प्रहरी बनने के लालच में उन्हें मानसिक स्तर पर अपसंस्कृति के दुष्प्रभावों एवं इसकी सुलगती हिंसा के सहारे छोड़ दिया।इससे उपजी हताशा ही युवाओं में कभी तोड़-फोड़,हिंसा,बलात्कार,अपहरण और अतिवाद के रूप में,तो कभी भ्रष्टाचार और घोटालों के रूप में हमारे सामने खुला तांडव करती दिखाई देती है।

3.उपभोक्तावादी संस्कृति में पले युवा (Young people growing up in a consumer culture):

  • उपभोक्तावादी संस्कृति में पली युवा पीढ़ी तात्कालिकता में जीने में विश्वास करती है और भविष्य के प्रति बेखबर है।वह इंतजार करना नहीं चाहती,इसी क्षण सब कुछ पाना चाहती है।इंस्टेंट कॉफी और इंस्टेंट फूड की तरह सुख-समृद्धि,धन-दौलत,प्यार-मोहब्बत सब इंस्टेंट पाना चाहती है।परिणामस्वरूप पतन की खाई में गिरने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है।कम से कम महानगरीय युवक जो समाजशास्त्रियों के विचार एवं चिंता की परिधि में आते हैं,उनमें तो यह प्रवृत्ति साफ-साफ दिख रही है।महानगरीय युवकों में बड़ी तेजी से हिंसा,मूल्यहीनता,आत्मकेंद्रिकता,कुंठा और कल्पनाहीनता बढ़ रही है और उनकी जीवन की समझ बहुत उथली एवं विकृत होती चली गई है।
  • भगत सिंह ने कभी कहा था,”युवाओं में इतना प्यार होता है कि वह तो पेड़-पौधों,नदी-पहाड़ों,झरनों और जंगल तक के इश्क में डूबे रहते हैं।” किंतु आज के दौर में सच्चाई दूसरी ही है।आज उनके प्रेम की यह उदात्त परिभाषा दैहिक सुख एवं वासना की परिधि में सिमट कर कलुषित हो चुकी है।वह ‘वर्चुअल रियलिटी’ पर यकीन रखता है।सब कुछ हकीकत में पाना चाहता है।आधुनिक विज्ञान विशेषज्ञों ने उनके मत को पुष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।जहां पूर्व में फ्रायड के आधे-अधूरे सिद्धांत और उन्मुक्तता को पुष्ट करते थे,वहीं अमेरिकी रसायनज्ञ एवं मनोशास्त्रियों ने कुछ वर्ष पूर्व ही अपनी पुस्तक ‘द केमिस्ट्री ऑफ लव’ में अपने आधे-अधूरे निष्कर्षों से प्रेम की उदात्त भाव की जड़ों पर कुठाराघात किया है।उनके अनुसार प्रेम कोई अहसास जैसी चीज नहीं है,जैसा कि सदियों से कवियों एवं दार्शनिकों ने उसे प्रतिपादित किया है।लेबोनिट्ज ने साफ-साफ कहा है कि शरीर में विद्यमान एस्ट्रोजन और एंड्रोजन की कुछ निश्चित रासायनिक संक्रियाओं का परिणाम ही प्रेम या रूमानी अहसास जैसी चीज है। वस्तुतः इस विचारधारा में पल-बढ़ रही युवा पीढ़ी के लिए प्रेम जैसा पवित्र भाव दैहिक खिलवाड़,यौन उन्मुक्तता एवं स्वछंदता का पर्याय बन गया है।

4.आदर्शहीन युवा पीढ़ी (Idealistic young generation):

  • उपभोक्ता संस्कृति के इन हमलों ने युवा पीढ़ी को आदर्शों एवं उच्च उद्देश्य के प्रति पंगु बना दिया है।यह मोहपाश इस कदर कसा जा रहा है कि उसे धन एवं भोग के अतिरिक्त और कुछ सूझ नहीं रहा है।संयम,सदाचार,त्याग,सेवा,नीति,मर्यादा आदि की बातें दकियानूसी मानी जाती हैं।तथाकथित विकास के अंतर्गत एक स्वप्नहीन-अराजक पीढ़ी बहुत तेजी से बढ़ रही है।जब हर्षद मेहता को करोड़ों की धोखाधड़ी के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था और पूरा मीडिया हर्षदमय हो गया था,उस दौरान भारत के चार महानगरों में युवाओं के बीच सर्वेक्षण हुआ था कि उनके पसंदीदा नायक कौन हैं और स्वयं क्या बनना चाहते हैं।इस सर्वेक्षण के नतीजे ने संवेदनशील समाजशास्त्रियों को झकझोर कर रख दिया।60% से अधिक युवकों की संख्या ऐसी थी,जो हर्षद मेहता जैसा बनना चाहते थे।इन युवकों का पसंदीदा नायक हर्षद मेहता था।71 प्रतिशत युवक इससे बेपरवाह थे कि हर्षद ने आखिर क्या किया और उसने जो किया वह देश के अहित में है।इन सर्वेक्षण परिणामों का स्पष्ट निष्कर्ष था कि पैसा और कामयाबी हासिल करने के लिए कुछ भी किया जा सके,बिना किसी हिचक और अपराधबोध के करना चाहिए।

5.कभी युवाओं के आदर्श महामानव थे (Once upon a time,the ideal of youth was a great man):

  • एक समय था जब हाईस्कूल और कॉलेज में प्रवेश करने वाली युवा पीढ़ी सोचती थी कि हम गोखले बनेंगे,तिलक बनेंगे,स्वामी विवेकानंद,गांधी,जवाहरलाल नेहरू,सरदार पटेल,भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद बनेंगे,लड़कियां सोचती थीं कि हम भगिनी निवेदिता,सरोजिनी नायडू,कमला देवी चट्टोपाध्याय,अरुणा आसफ अली,हंसा मेहता बनेंगी।आज ये आदर्श एवं सपने धूमिल पड़ गए हैं।आज युवा पीढ़ी के पास सिर्फ फिल्म स्टार या टी.वी. स्टार बनने का सपना है।फिल्मों और टी.वी. की मायावी दुनिया ने उनके सामने एक छद्म स्वर्ग पैदा किया है और वे इसमें खो गए हैं।इस छ्द्म स्वर्ग में सभी समस्याओं के इंस्टेंट समाधान मौजूद हैं।बात ही बात में सभी समस्याएं हल हो जाती हैं।फिल्मी हीरो माफिया गिरोह का अकेले ही सफाया कर सकता है। अदना-सी नौकरी के लिए भटकने वाला युवक अचानक किसी जादुई चमत्कार से करोड़पति हो जाता है।एक ईमानदार दिखने वाला फिल्मी अभिनेता भ्रष्ट व्यवस्था को बदल देता है।सच्चाई से कोसों दूर ये चित्र और बिम्ब चूँकि हमें इंस्टेंट तृप्ति देते हैं,युवा इन्हीं में खो जाते हैं और भविष्य के प्रति अपनी आंखें बंद कर लेते हैं।’कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे धारावाहिक आज की युवा पीढ़ी को अधिक आकर्षित करते दिखाई देते हैं।

6.संकल्पविहीन युवा पीढ़ी (Young generation devoid of determination):

  • अपनी गहनतम इच्छा प्रकृति एवं आत्मा के स्वभाव के विपरीत कठपुतली की तरह का यह व्यवहार युवाओं की दिशाधारा पर गंभीर प्रश्न लगा देता है।अपनी इच्छा,अपना संकल्प और अपना ज्ञान,जो मनुष्य जीवन के लक्षण हैं,आज युवा पीढ़ी ही नहीं,प्रौढ़ों और बूढ़ों की पीढ़ी में भी गायब होते जा रहे हैं।सांस्कृतिक और आर्थिक गुलामी में जकड़े देश की यही नियति हो सकती है।लेकिन प्रौढ़ों और बूढ़ों में इनका गायब होना इतना कष्टदायक नहीं है,जितना युवा पीढ़ी में इनका गायब होना।जिनके सामने भविष्य खुला पड़ा है,उनका भविष्य के प्रति उदासीन हो जाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है,यह वैसे ही है जैसे कि हंसते-खेलते,उछलते-कूदते बच्चों को अचानक लकवा मार जाए।
  • नौजवान जो अपने स्वभाव से,प्रकृति से स्वतंत्र इच्छा,अदम्य संकल्प और अनंत जिज्ञासा लिए होता है,यदि अपने भविष्य के संबंध में बिल्कुल संवेदनशून्य हो जाए,अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति को किसी के सामने गिरवी रख दे,जो आने वाला है,उसके संबंध में जिज्ञासा करना बंद कर दे और जो उस पर थोपा जा रहा है,उसका विरोध भी ना करें तो यही कहा जाएगा कि जवानी को लकवा मार गया है।

7.युवा शक्ति का वास्तविक अर्थ (The Real Meaning of Youth Power):

  • युवा शक्ति उस उद्दाम ऊर्जा का नाम है,जिसने हर युग में व्यवस्था की जड़ता के इन क्षणों में अपनी आवाज को बुलंद किया है।इतिहास के हर मोड़ पर इस वर्ग ने,परिवर्तन के हर चौराहे-चौराहे पर कफन बांधकर दमन और दुर्व्यवस्था का मुकाबला किया है।1779 की फ्रांस की राज्य क्रांति को भले ही मध्यम वर्ग अथवा बुर्जुआ क्रांति के नाम से जाना जाता है,किंतु उसका असली वाहक वहां का नवयुवक ही था।रूस की बोल्शेविक क्रांति के वाहकों में 80% लोग 18 से 35 वर्ष की आयु के थे।
  • ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गहन तमस के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम के आंदोलन की संपूर्ण ज्योति युवा शक्ति की अदम्य ऊर्जा की आभा से उद्दीप्त थी।1905 के बंग भंग से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन व 1947 की आजादी तक,सभी महत्त्वपूर्ण दौर में युवा शक्ति अग्रिम पंक्ति पर रही।तिलक युग से लेकर गांधी युग तक इस समुदाय ने सदैव ही बलिदानी एवं क्रांतिकारी परंपरा में अग्रणी भूमिका निभाई।भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,सुखदेव,राजगुरु सभी युवा थे।ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए,तो 20वीं सदी के आरंभिक 50 वर्षों में छात्र आंदोलनों ने भारतीय जनमानस की वैचारिक,सामाजिक,राजनैतिक एवं राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में निर्णायक योगदान दिया और 1947 में देश के आजाद होने तक इनकी अपनी युगांतरकारी भूमिका रही।

8.युवाओं को सही दिशा देने के मंत्र (Mantras to give the right direction to the youth):

  • सांस्कृतिक पुनर्जागरण के आधार पर समाज निर्माण एवं राष्ट्र उत्थान के पुनीत कार्य में कई संगठन सक्रिय हैं।उदाहरणार्थ महर्षि श्री श्री रविशंकर द्वारा स्थापित अरविंद आश्रम,श्री कैलाश सत्यार्थी,श्री मोरारजी बापू द्वारा राम कथा का आयोजन आदि अनेक संतों द्वारा ऐसा सत्प्रयास किया जा रहा है।अपने कार्यक्रमों में युवा शक्ति के प्रभावी एवं सार्थक नियोजन के लिए ये और इन जैसे संगठन कटिबद्ध है।इनमें युवा शक्ति के चरित्र निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है,विभिन्न सेमिनार,सम्मेलन,युग शिल्पी सत्रों के अंतर्गत लोकसेवा के कार्य में अपनी प्रतिभा एवं शक्ति के नियोजन का प्रशिक्षण दिया जाता है।युग के इन अभूतपूर्व सृजन आन्दोलनों में सुशिक्षित युवावर्ग बुद्ध के युवा भिक्षु भिक्षुणियों,रामकृष्ण मिशन के युवा संन्यासी परिवाज्रकों,गांधी के युवा सत्याग्रहियों एवं सुभाष-भगत सिंह की परंपरा में त्याग-बलिदान के उच्च स्तरीय आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं।जाति-वर्ग,धर्म-संप्रदाय,भाषा-प्रांत आदि भेदभावों से परे ये आंदोलन सुसंस्कृत मानव एवं सभ्य समाज के नवनिर्माण के लिए संकल्पित हैं।इनकी रचनात्मक गतिविधियों के अंतर्गत सप्त क्रांतियां का बिगुल बज चुका है,जिसके अंतर्गत योग विद्या,युवाओं को चारित्रिक शिक्षा,कुरीति उन्मूलन,नशा निवारण एवं नारी जागरण,आध्यात्मिक शिक्षा जैसे कार्यों के द्वारा युवाओं को जोड़ा जा रहा है।भोगवादी संस्कृति के नागपाश में उलझी छात्र शक्ति इन अभियानों में अपनी ऊर्जा का नियोजन कर समाज व देश का निर्माण एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान के कार्य में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा सकती है।
  • आज की युवा पीढ़ी अधिकांश दिग्भ्रमित हो चुकी है।पंजाब में तो युवा नशेड़ियों की फैक्ट्री बन चुकी है।कमोबेश यही हाल अन्य राज्यों का है।अतः इतनी बड़ी युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण की सबसे बड़ी समस्या है।शिक्षा ही ऐसा माध्यम है जिससे युवा पीढ़ी को सुधारा जा सकता है।लेकिन जिस तरह की शिक्षा पद्धति इस समय लागू है,उसमें बदलाव करते ही,नैतिक और चारित्रिक शिक्षा लागू करते ही तथाकथित समाजवादियों,सेकुलर नेताओं के पेट में दर्द चालू हो जाता है।वैसे भी युवा पीढ़ी आज सबसे अधिक करियर को वरीयता देती है,धन कमाने को वरीयता देती है।अतः संभवतः न तो युवा ऐसा चाहते हैं और भारत की वर्तमान शासन पद्धति में सत्ता पक्ष के द्वारा इसे लागू करना सत्ता खोने के समान है।
  • अब एक रास्ता यही बचता है कि आध्यात्मिक और समाज निर्माण करने वाली संगठन ऐसे तपे हुए नेता तैयार करें,जो पूरे भारत में जगह-जगह ऐसे संगठन खड़े करें और उससे युवाओं को जोड़ें और चरित्र का निर्माण करें।युवा ऐसे संगठनों से क्यों जुड़ना चाहेंगे,इसका तरीका यही है कि उन संगठनों में कैरियर निर्माण,कैरियर गाइडेंस,स्किल निर्माण,करियर काउंसलर आदि की व्यवस्था हो और साथ में चरित्र निर्माण का कार्य भी किया जाए।यह कार्य है तो कठिन पर असंभव भी नहीं है।जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के मद में अंधे बने हुए नेताओं को सन्मार्ग पर चलने के लिए जन आंदोलन चलाया था और उससे युवा वर्ग जुड़ा था।लेकिन वह आंदोलन दीर्घजीवी नहीं रहा और सत्ता प्राप्त होते ही छिन्न-भिन्न हो गया।
  • एक अन्य तरीका यह भी है कि टी.वी.,समाचार पत्रों,धार्मिक संगठनों आदि द्वारा नैतिक एवं चारित्रिक शिक्षा दी जाए।तरीके और भी हो सकते हैं।परंतु एक बात तय है कि जो भी युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण का सूत्रधार बनेगा,लीड करेगा उस लीडर को सदियों तक भारत के लोग याद रखेंगे।वरना फुटकर रूप से तो अनेक ऐसे लीडर हुए हैं जिन्होंने अस्थायी परिवर्तन ही किया है,कर पाए हैं।अतः अपनी पहचान सीमित समय तक ही रख पाए हैं।भारत की युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण की सबसे महत्ती आवश्यकता है और सबसे विकट समस्या भी है।शासन करने वाले शासन करके चले जाते हैं और कुछ समय तक ही याद रखा जाता है।लेकिन गौतम बुद्ध जैसे अलख जगाने वाले महामानव विरले ही होते हैं जो सदियों तक याद किए जाते हैं।इसके लिए मरना पड़ता है,खपना पड़ता है,बहुत कुछ त्यागना पड़ता है।
  • आज समय की माँग है कि सभी शिक्षण संस्थानों में काउंसलर की नियुक्ति की जावे,ताकि युवाओं को अपना लक्ष्य तय करने में किसी प्रकार की परेशानियों का सामना न करना पड़े।इससे शिक्षण संस्थानों से पलायन को भी रोका जा सकेगा।यदि शिक्षण संस्थान में काउंसलर की व्यवस्था हो और स्किल तराशने का काम किया जाए तो युवावर्ग को दर-दर की ठोकरे नहीं खानी पड़ेगी।यदि शिक्षण संस्थानों को समय के साथ अपडेट और अपग्रेड नहीं किया जाएगा तो शिक्षण संस्थानों की महत्ता खत्म होती जाएगी।अतः आज आवश्यकता है शिक्षण संस्थानों के जीर्णोद्धार की।केवल अध्यापकों की नियुक्ति ही पर्याप्त नहीं बल्कि उनकी समय-समय पर मानिटरिंग भी करनी होगी।आज युवावर्ग भटका हुआ है,अपराध और अनैतिक कार्यों की तरफ अग्रसर है तो इसका यह भी एक कारण है कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम है।यदि शिक्षा में नवीनता,प्रगतिशीलता और परिवर्तनशीलता के तत्त्व नहीं है तो वह शिक्षा मृतक के समान है।शिक्षकों की इस थ्योरी को बदलना होगा कि वेतन दे दो और कुछ भी पढ़ा दो,कुछ भी मत पढ़ाओं और छात्र-छात्राओं की इस थ्योरी को बदलना होगा कि शिक्षण संस्थानों में तफरी मार के आ जाओ और मौज-मस्ती करो।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में युवाओं के लिए दिग्भ्रमित न होने के 9 मूलमंत्र (9 Keynote Not to Get Misled for Youth),युवा दिग्भ्रमित होने से कैसे बचें? (How to Avoid Being Young Disoriented?) के बारे में बताया गया है।

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9.टीचर का सुझाव (हास्य-व्यंग्य) (Teacher’s Suggestion) (Humour-Satire):

  • टीचर:बच्चों आपको चरित्रवान बनना चाहिए।
  • एक छात्रःइससे क्या फायदा होगा? क्या हमें नौकरी मिल जाएगी,क्या इससे हमें जॉब मिल जाएगा? क्या इससे हम धनवान बन जाएंगे?
  • टीचर:नौकरी तो नहीं मिलेगी,वो सब तो नहीं मिलेगा जो तुम चाहते हो परंतु तुम एक श्रेष्ठ व्यक्ति बन जाओगे।
  • छात्र:जिस चीज से कोई फायदा नहीं उसको अपनाकर क्या आचार डालना है? आज ऐसे व्यक्ति को मूर्ख समझा जाता है।

10.युवाओं के लिए दिग्भ्रमित न होने के 9 मूलमंत्र (Frequently Asked Questions Related to 9 Keynote Not to Get Misled for Youth),युवा दिग्भ्रमित होने से कैसे बचें? (How to Avoid Being Young Disoriented?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.युवाओं के भटकने का मूल कारण क्या है? (What is the root cause of young people wandering?):

उत्तर:दिशाहीन शिक्षा,उपभोक्तावादी संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति के दुष्प्रभाव और वर्तमान वातावरण के कारण।

प्रश्न:2.क्या युवाओं को चरित्रवान बनाना संभव है? (Is it possible to make the youth virtuous?):

उत्तर:आज के अर्थप्रधान व उपभोक्तावती संस्कृति के कारण युवा भटका हुआ है अतः यह कार्य असंभव सा लगता है।लेकिन जब-जब भी भारत में ऐसा संकट खड़ा हुआ है,तब-तब ऐसे महामानव प्रकट हुए हैं और उन्होंने सही दिशा दी है।

प्रश्न:3.इस घटाटोप में यह आशा कैसे दिखाई देती है? (How does this hope appear in this cloud?):

उत्तर:यह भारतीय संस्कृति की पहचान है।यहाँ के कण-कण में महामानवों का रक्त,त्याग,बलिदान समाया हुआ है।यह देव भूमि है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा युवाओं के लिए दिग्भ्रमित न होने के 9 मूलमंत्र (9 Keynote Not to Get Misled for Youth),युवा दिग्भ्रमित होने से कैसे बचें? (How to Avoid Young Disoriented?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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