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13 Strategy to Crack Competitive Exam

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1.प्रतियोगिता परीक्षा को क्रैक करने की 13 रणनीतियाँ (13 Strategy to Crack Competitive Exam),काॅम्पीटेटिव एग्जाम कैसे क्रैक करें? (How to Crack Competitive Exam?):

  • प्रतियोगिता परीक्षा को क्रैक करने की 13 रणनीतियों (13 Strategy to Crack Competitive Exam) के आधार पर आप प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर सकेंगे।आज के प्रतिस्पर्धा के युग में प्रतियोगिता परीक्षा में लाखों अभ्यर्थी भाग लेते हैं लेकिन उनमें से कुछ का ही चयन होता है।
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2.यह चुनौती पूर्ण करियर (This challenging career):

  • पैसा,पद और प्रतिष्ठा की चाहत सभी को होती है।सांसारिक व्यक्ति को तो छोड़िए,दुनिया से संन्यास ले चुके व्यक्ति भी इन तीनों की आकांक्षाओं से प्रायः मुक्त नहीं रह पाते हैं।ऐसा भी नहीं कि व्यक्ति इन तीनों में से किसी एक को पाकर ही संतुष्ट रह जाता हो।जिनके पास पैसा होता है वे पद और प्रतिष्ठा के लिए लालायित रहते हैं चाहे वह पद व प्रतिष्ठा सामाजिक स्तर पर ही क्यों ना हो।जहां तक युवा वर्ग का प्रश्न है,उनके लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उच्च पद और सरकारी सेवाओं में प्रशासनिक सेवाएं इन तीनों को एक साथ प्राप्त करने का एक अच्छा माध्यम है।वैसे तो जॉब या सेवाओं में प्रशासनिक सेवाएं इन तीनों को एक साथ प्राप्त करने का एक अच्छा माध्यम है।वैसे तो जॉब या नौकरी में होना ही कम से कम परंपरागत भारतीय समाज में तो प्रतिष्ठा की बात है।हालांकि अब समय के साथ-साथ सामाजिक मान्यताएँ और मापदंड भी बदल रहे हैं किंतु उच्च पदों पर नियुक्ति ‘सोने में सुहागा’ के समान है।अतः भारतीय समाज में डॉक्टर,इंजीनियर,सीए और लोक सेवाओं को बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।जो सामाजिक प्रतिष्ठा,वेतन-भत्ते,सेवा शर्तें तथा सुविधाएँ उच्च पदस्थ ऑफिसर्स व लोक सेवकों को प्राप्त है उन्हें देखते हुए शिक्षित युवा वर्ग में इन सेवाओं के प्रति अत्यधिक आकर्षित होना स्वाभाविक है।इन सेवाओं के प्रति ‘क्रेज’ का आलम यह है कि आईआईटी,एमबीए,एमबीबीएस जैसी व्यावसायिक डिग्रियाँ हासिल करने के बाद भी युवक इन सेवाओं के प्रति आकर्षित हो रहे हैं।प्रतिवर्ष व्यावसायिक डिग्रियाँ जैसी योग्यता होने के बावजूद भी वे उच्च पदस्थ सेवाओं में जा रहे हैं।
  • पद,प्रतिष्ठा व पर्याप्त धन आदि के अलावा भी एक और वस्तु है जो अधिकांश युवाओं को इन सेवाओं की ओर आकर्षित कर रही है।वह है अपनी प्रतिभा को उजागर करने और उसे निखारने के पर्याप्त अवसर।समाज में ऐसी सैकड़ों प्रतिभाएं हैं जिन्हें स्वयं को साबित करने का अवसर नहीं मिलता है।अपनी प्रतिभा साबित करने अथवा उसे निखारने के लिए जिन अवसरों व साधनों की आवश्यकता है वे प्रायः पर्याप्त होते हैं।बहुराष्ट्रीय कंपनियों,नामी-गिरामी कंपनियों के उच्च पद वाली सेवाओं तथा लोक सेवाओं में प्रतिभा प्रदर्शन के पर्याप्त अवसर मिलते हैं तथा पर्याप्त अधिकार व सामाजिक सम्मान भी मिलता है।
  • इन सेवाओं में वास्तविक कार्य की विविधता,जनता से सीधा संपर्क,चुनौती पूर्ण कार्य आदि इन सेवाओं में ही संभव है।इन सेवाओं तथा लोक सेवाओं में चयनित व्यक्तियों को इनके आका तथा सरकार सर्वज्ञ अथवा ऑलराउंडर मानकर किसी भी क्षेत्र में जिम्मेदारी सौंप देती है और प्रायः वे उसे निभाने में सफल भी रहते हैं चाहे वह क्षेत्र शिक्षा,संस्कृति आदि का हो अथवा वाणिज्य,व्यापार या वित्त आदि से संबंधित हो।वर्तमान परिस्थितियों में शायद ये धुरंधर (अधिकारी/ऑफिसर्स) ही उन लोगों की श्रेणी में आते हैं जिन्हें अपने ज्ञान व अपनी क्षमता के उचित विकास के इतने अवसर मिलते हैं और वह भी निजी कंपनियों व सरकारी खर्चे पर।यदि अपनी योग्यताओं में वृद्धि के लिए उच्च शिक्षा अथवा प्रशिक्षण के लिए विदेश जाना चाहें तो आपको अथवा आपके नियोक्ता को कई बार सोचना पड़ेगा।किंतु इन सेवाओं में यह काम बड़ी आसानी से संभव है।नियोक्ता (निजी सेवाओं के) अथवा सरकार आपको वेतन सहित अवकाश भी देगी और अनुदान अथवा ऋण भी उपलब्ध कराएगी।
  • एक और बात इन सेवाओं में उन प्रबुद्ध लोगों से स्पष्ट करना जरूरी है कि जो व्यवस्था में सुधार की आकांक्षा रखते हैं।समाज में कई ऐसी विशिष्ट प्रतिभाएं हैं जो वर्तमान व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं।हो सकता है कि इस व्यवस्था में कई कमियाँ हों।किंतु इनमें बदलाव तब ही आ सकता है जब उसके केंद्र में अथवा उसके निर्णायक स्थान पर हों।बाहर बैठकर किसी भी व्यवस्था को नकारने से बेहतर है उसका अंग बनकर वस्तुस्थिति को समझना और तदनुसार उसमें सुधार करना।टी. एन. शेषन से पहले भी कई चुनाव आयुक्त रह चुके हैं और किरण बेदी से पहले भी तिहाड़ जेल में कई महानिदेशक रहे होंगे।लेकिन लोगों को शेषन और बेदी ही याद रहे।आखिर क्यों?
  • कमोबेश इन्हीं कारणों से प्रायः सभी उच्च सेवाओं की ओर आकर्षित होते हैं तथा अपना करियर चुनते हैं।किंतु सफलता के लिए इन सेवाओं के प्रति आकर्षित होना ही पर्याप्त नहीं है।प्रतिवर्ष लाखों युवक इन सेवा परीक्षाओं में चयन के लिए अपना भाग्य आजमाते हैं किंतु चयनित होने वालों की संख्या का प्रतिशत कुल प्रतियोगियों के एक प्रतिशत से भी कम होता है।इन परीक्षाओं में भाग लेने वालों की संख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा उनका होता है जो केवल ‘आकर्षण’ के कारण परीक्षा देते हैं अथवा जिन्हें परीक्षा के पैटर्न की भी पूरी जानकारी नहीं होती।

3.परीक्षा की तैयारी (Preparing for the exam):

  • इन परीक्षाओं की तैयारी कब शुरू करनी चाहिए।इस विषय में काफी विरोधाभास है।इन परीक्षाओं की तैयारी पूरा करने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं।अगर अपने स्कूल के दिनों से इन परीक्षाओं को ध्यान में रखकर काफी अच्छी पढ़ाई की है तो आपको कम समय की आवश्यकता होगी।परीक्षा की गंभीरता को स्नातक के बाद समझने वाले परीक्षार्थी को अपेक्षाकृत ज्यादा समय की आवश्यकता होगी।10वीं-11वीं कक्षा से की गई तैयारी की तुलना स्नातक करने के बाद की गई तैयारी से नहीं की जा सकती।
  • किसी भी इमारत को बनाने से पहले नींव जरूरी होती है।इन सेवाओं की परीक्षा के पाठ्यक्रम की तैयारी भी इमारत बनाए जाने के बराबर है।स्कूल की पढ़ाई इस इमारत की नींव है।ज्यादातर परीक्षार्थी नवीं-दसवीं की पुस्तकें इस परीक्षा की तैयारी के आरम्भिक दौर में पढ़ते हैं क्योंकि उन्हें पढ़ने के बाद ही वे अपनी तैयारी की नींव का निर्माण कर पाते हैं।स्कूल की आखिरी कक्षाओं से या स्नातक से ही इस परीक्षा की तैयारी शुरू की जानी चाहिए।फलस्वरूप आपको मूलभूत तथ्यों की जानकारी के लिए पुनः पढ़ने की आवश्यकता नहीं होगी,साथ-साथ सामान्य ज्ञान के लिए अखबारों को नियमित पढ़ने और प्रमुख घटनाओं का सूक्ष्मता पूर्वक जानने का प्रयास भी काफी लाभदायक होता है।इसका सबसे बड़ा फायदा,स्नातक के बाद आपको अपने विषय की अच्छी जानकारी होने के साथ-साथ सामान्य ज्ञान का भी अच्छा भंडार जमा हो जाने के रूप में होगा।अन्य परीक्षार्थियों की तरह (जो कि परीक्षा देने की योजना स्नातक के बाद बनाते हैं) शुरुआती परेशानी से आप बच सकेंगे।
  • लंबी तैयारी न केवल विषय को गहराई से जानने के लिए आवश्यक है बल्कि इससे आत्मविश्वास भी बढ़ता है।कम समय और जल्दबाजी में की गई तैयारी आपको सफलता के लिए पूर्णतः आश्वस्त नहीं करती।आत्मविश्वास डगमगाता रहता है।कभी आप सफलता के प्रति निश्चिंत होते हैं तो कभी सफलता मृगमरीचिका लगती है।सफलता का आत्मविश्वास होना आपकी अच्छी तैयारी का परिचायक है।
  • लंबी तैयारी पक्की रणनीति पर आश्रित होनी चाहिए।लंबी अवधि तक आप अप्राकृतिक तरीकों से पढ़ाई नहीं कर सकते।इसलिए ‘स्लो बट स्टडी’ होने पर ज्यादा जोर देना चाहिए।लेकिन परीक्षा से 8-10 हफ्ते पहले आपको अपनी तैयारी को जबरदस्त गति प्रदान करनी चाहिए।इन हफ्तों में जितनी ज्यादा बार हो सके आप पढ़े हुए टॉपिकों को दोहराएं।पीछे मुड़कर देखने का समय (अर्थात् नए-नए पाठ्यक्रम सामग्री का उपयोग,नये पढ़ाई करने के तरीके इत्यादि) निकल चुका होता है।पढ़ी हुई सामग्री को परीक्षा से ठीक पहले अच्छी तरह दोहरा पाने पर ही आपकी सफलता निर्भर करती है।
  • वे परीक्षार्थी जो इस परीक्षा में सम्मिलित होने की योजना काफी कम समय रह जाने पर बनाते हैं,उन्हें जल्द से जल्द पढ़ाई शुरू कर देनी चाहिए,क्योंकि योजना बनाने और उस पर अमल करने के बीच जितना समय आप गँवाते हैं उसमें इस परीक्षा के शुरुआती दौर की तैयारी पूरी कर सकते हैं।
  • “जब जागो तभी सवेरा” की उक्ति यहाँ भी लागू होती है।परीक्षा की तैयारी के लिए कम से कम और ज्यादा से ज्यादा समय सीमा तय नहीं की जा सकती क्योंकि प्रत्येक विद्यार्थी का मानसिक स्तर भिन्न-भिन्न होता है और उसी के अनुसार विषय-वस्तु को पढ़ने समझने में भी समय लगता है।

4.प्रतिदिन कितना पढ़ें? (How much to read per day?):

  • प्रतिदिन कितने घंटे एक परीक्षार्थी को पढ़ाई करनी चाहिए इसके बारे में तरह-तरह के सुझाव दिए जाते हैं।कभी किस “टाॅपर” ने 8-10 घंटे प्रतिदिन की पढ़ाई को उपयुक्त बताया तो किसी ने 10-15 घंटे की पढ़ाई को भी अपर्याप्त बताया।अलग-अलग परीक्षार्थी के पास उपलब्ध समय,जानकारी और उसकी किसी विषयवस्तु को समझ सकने की क्षमता के आधार पर पढ़ाई करने की अवधि निश्चित की जानी चाहिए।
  • अगर आप स्नातक स्तर से ही इस परीक्षा को ध्यान में रखकर पढ़ाई करते हैं तो प्रतिदिन 5 से 6 घंटे की पढ़ाई निश्चित ही पर्याप्त है।प्रतिदिन पढ़ाई का अर्थ रोजाना कम से कम 5 घंटे पढ़ाई करने से है।अगर आप 10-11 घंटे किताब सामने रखकर एक ही पाठ को बार-बार पढ़ते हुए और फिर भी ‘कंफ्यूजन’ रहने को पढ़ाई मानते हैं तो इस भ्रम से बाहर निकलकर पढ़ाई समय की मांग नहीं करती,बल्कि एकाग्रता,गंभीरता और तेजी से विषयवस्तु को समझने की क्षमता की माँग करती है।
  • दिमाग में पढ़ी गई सामग्री को संचित करने की क्षमता की भी एक सीमा होती है।जैसे-जैसे पढ़ाई की अवधि बढ़ती जाती है दिमाग की संचयन क्षमता घटती जाती है।अगर आप तीन दिनों तक बिल्कुल पढ़ाई ना करें और चौथे दिन लगातार 12 घंटे पढ़ें तो आपको पढ़ाई से 50% ही लाभ होगा।जबकि अगर आपका प्रतिस्पर्धी प्रतिदिन 3 घंटे पढ़ रहा हो तो वह आपसे हमेशा आगे रहेगा क्योंकि कम-से-कम अवधि में लगातार पढ़ाई करने से दिमाग की किसी भी विषयवस्तु को संचित करने की पूरी क्षमता बरकरार रहती है।प्रतिदिन अगर 5 से 6 घंटे की पढ़ाई लगातार की गई हो तो वह किसी विद्यार्थी के एक दिन की 14-16 घंटे की पढ़ाई या चार दिनों में 15-15 घंटे की पढ़ाई की तुलना में ज्यादा लाभदायक होती है।आपको 5-6 घण्टे की पढ़ाई लगातार नहीं करना चाहिए।ज्यादा से ज्यादा दो से तीन घंटे की पढ़ाई के बाद आप स्वयं को आराम दें।पढ़ाई के दौरान आपको जब भी दबाव या चिड़चिड़ापन का अनुभव हो तो तुरंत ‘रिलैक्स’ हों।दबाव में की गई पढ़ाई को दिमाग की स्पष्टता से संचित नहीं कर पाता।अगर आप 5-6 घण्टे की पढ़ाई करने पर भी दबाव महसूस करते हैं तो शुरुआत प्रतिदिन सिर्फ दो-तीन घंटे की पढ़ाई से कर सकते हैं।जितनी देर पढ़ाई में आपको आनंद आए उतने समय तक आप ज्यादा सुगमता पूर्वक विषय को समझते हैं।आपने महसूस किया होगा कि जब आपमें उत्साह होता है तो कठिन से कठिन काम भी आप सरलता से कर लेते हैं जबकि हल्का सा दबाव आसान कार्य को भी कठिन बना देता है।
  • पढ़ाई भले ही कुछ ही समय की जाए परंतु नियमित और एकाग्रता पूर्वक की जानी चाहिए।ज्यादा पढ़ाई महत्त्वपूर्ण नहीं होती बल्कि क्या पढ़ा गया है और कितना दिमाग में संचय हुआ है इस पर ध्यान देना चाहिए।

5.योजनाबद्ध अध्ययन (Schematic study):

  • प्रतियोगी परीक्षाओं में योजनाबद्ध अध्ययन का बड़ा महत्त्व है।स्कूल व कॉलेज की परीक्षाओं के विपरीत इन परीक्षाओं के लिए आपको निर्धारित अवधि में व्यापक विषय सामग्री का इस प्रकार अध्ययन करना चाहिए कि कोई भी महत्त्वपूर्ण अंश छूट न जाए।यहाँ वही “परीक्षार्थी” सफल हो पाता है जो अपने कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर करता है।नियोजन के बिना आप यह तय नहीं कर सकते कि कितना कितना समय आपको किस-किस विषय पर देना है।या तो किसी विषय को अनावश्यक ज्यादा पढ़ लेंगे अथवा उसे बिल्कुल ही नहीं पढ़ पाएंगे।योजनाबद्ध अध्ययन से आप अपनी ऊर्जा का सही ढंग से उपयोग कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
  • पहले स्तर में आप सारे पाठ्यक्रम को जिसमें सामान्य अध्ययन भी पूरी तरह सम्मिलित है,अच्छी तरह पढ़ने की योजना बनाएं।इस स्तर में ज्यादा से ज्यादा बारीकी और विस्तार पूर्वक अध्ययन करना चाहिए।पूरे पाठ्यक्रम का ऐसा कोई भी हिस्सा नहीं रह जाए जिससे आपको भय की अनुभूति होती रहे।आपको अपने आत्मसंतोष का पूरी तरह से ख्याल रखना चाहिए।
    प्रथम स्तर को विभिन्न उपस्तरों में विभाजित कर देना चाहिए।दोनों विषयों के चार और सामान्य अध्ययन के दो पत्रों के लिए 6 उपस्तरों में पूरे पाठ्यक्रम का बँटवारा कर देना चाहिए।तत्पश्चात विभिन्न ‘टॉपिकों’ को उनकी महत्ता के हिसाब से चिन्हित करें।सबसे महत्त्वपूर्ण टॉपिकों की पढ़ाई पहले करते हुए क्रमशः महत्त्वपूर्ण टॉपिकों की तरफ बढ़ना चाहिए।जब आप एक बार पूरे पाठ्यक्रम को पढ़ लें तो,उसे दोहराने के समय क्रम उल्टा कर दें।अर्थात् पहले कम महत्त्वपूर्ण टॉपिकों को दोहराएं और जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाएं ज्यादा महत्त्वपूर्ण टॉपिकों को दोहराते जाएं।इसके बाद भी हो सकता है कि किसी टॉपिक पर आपकी पकड़ मजबूत ना हो।उन टॉपिकों को अलग-अलग चिन्हित करके,उन्हें समझने के लिए सहपाठियों की सहायता लें,जो कि इस परीक्षा की तैयारी कर रहे हों।
  • दूसरे स्तर में परीक्षा से पहले किए जाने वाले अभ्यास की ‘प्लानिंग’ करनी चाहिए।परीक्षा में बैठने से पहले वास्तविक परीक्षा के समान परिस्थितियों में घर में अभ्यास करना अत्यावश्यक है।इससे परीक्षार्थी को परीक्षा के वातावरण में खुद को स्थापित करने में सहायता मिलती है और उसे पता चलता है कि परीक्षा के वातावरण में कितनी हद तक वह अपनी क्षमता का उपयोग कर सकता है? सबसे महत्त्वपूर्ण उन कमजोरियों का पता लगता है जिस पर कि उसने ध्यान नहीं दिया।इसी स्तर की तैयारी का एक भाग अभ्यास करने के बाद आयी परेशानियों को दूर करने का होना चाहिए।अभ्यास करने से परीक्षार्थी पर दबाव वास्तविक परीक्षा में कम हो जाता है,जिसका उपयोग वह ज्यादा सरल और संतुलित ढंग से परीक्षा हाॅल में करता है।
  • आपका अभ्यास प्रारंभिक और मुख्य दोनों परीक्षा के लिए अलग-अलग होना चाहिए।मुख्य परीक्षा के लिए आपने जो जानकारी इकट्ठी की है उसे लिखकर किस हद तक व्यक्त कर पाते हैं इसका पर्यवेक्षण करना चाहिए।निःसंदेह आपका उत्तर ज्यादा से ज्यादा प्रासंगिक और कमबद्ध होना जरूरी है।अभ्यास से ही आप इनका विकास कर पाएंगे।अभ्यास के दौरान आपको निम्नलिखित बातों का पर्यवेक्षण और उसके अनुसार आवश्यक हो तो बदलाव करना चाहिएः
  • एक प्रश्न का उत्तर निर्धारित समय में कितनी अच्छी तरह आप दे पाते हैं?
    निर्धारित शब्द-सीमा के अंतर्गत क्या आप आवश्यक बातें लिख पा रहे हैं?
    कैसे प्रश्नों के उत्तर लिखने में आपको परेशानी हो रही है?
    निर्धारित समय के दबाव में आप किस तरह अपने उत्तर को संतुलित करेंगे?
    आपका वाक्य विन्यास कितना सही और सरल है?
    आपकी लिखावट सुस्पष्ट है या नहीं?
    किन-किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है?
  • अभ्यास की बात अपनी उत्तर पुस्तिका को या तो अपने किसी वरिष्ठ सहयोगी को ‘चेक’ करने के लिए दें या स्वयं को परीक्षक समझकर अपनी अभ्यास पुस्तिका “चेक”,करें।अभ्यास के दौरान आई कठिनाइयों को तत्काल दूर करें।अभ्यास पुस्तिका को चेक करते समय उसके कमजोर हिस्सों का ज्यादा गहराई पूर्वक परीक्षण करें।
  • इतने विस्तृत पाठ्यक्रम में से आपको उन्हीं टॉपिक पर ज्यादा देना चाहिए जो कि परीक्षा में लगातार महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हों।इसका अर्थ यह नहीं कि सिर्फ चुने हुए ‘टॉपिक’ आपको पढ़ने चाहिए।पढ़ाई संभवतः पूरे पाठ्यक्रम की करनी चाहिए परंतु आपके पढ़ने की शैली चुनावी होनी चाहिए।यह चयन प्राथमिकता के आधार पर हो तो अच्छा परिणाम मिल सकता है।
    एक ही ‘टॉपिक’ पर भिन्न-भिन्न तरह के प्रश्न लगातार पूछे जाते हैं।पढ़ाई करने से पहले आप तय कर लें कि ‘टॉपिक’ के किस भाग पर आपको ध्यान देना चाहिए।अगर आप थोड़ी तुलनात्मक पढ़ाई नहीं करेंगे तो हो सकता है कि आप दलदल में फँसते चले जाएं।प्रश्न किस टॉपिक पर है महत्त्वपूर्ण नहीं होता बल्कि टॉपिक के किस भाग से संबंधित है यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है।

6.कोचिंग का औचित्य (Justification of Coaching):

  • प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए कोचिंग का क्या महत्त्व? इस विषय पर निश्चित रूप से कुछ कह पाना मुश्किल है? कई सफल प्रत्याशियों ने अपनी सफलता में कोचिंग का योगदान स्वीकार किया है तथा कई प्रत्याशियों ने इसे अनावश्यक भी बताया है।वास्तव में कोचिंग की आवश्यकता निम्न परिस्थितियों में पड़ती हैः
  • (1.)आपके पास तैयारी के लिए समय कम है
  • (2.)किसी विषय में आप कमजोर हैं
  • (3.)परीक्षा के पैटर्न आदि से पूर्ण परिचित नहीं है।
  • (4.)परीक्षा के अध्ययन के लिए आपके आस-पास उपयुक्त माहौल तथा साथी उपलब्ध नहीं है।
  • (5.)सफलता के लिए किसी भी प्रकार की कमी नहीं छोड़ना चाहते हैं।
  • एक अच्छे कोचिंग संस्थान में परीक्षा के पाठ्यक्रम की तैयारी योजनाबद्ध ढंग से तथा उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए निर्धारित समय में संभव है।वहाँ आपको यह भी बताया जाता है कि परीक्षा में उत्तर किस प्रकार लिखा जाना चाहिए।
    किंतु कोचिंग के कारण आपकी सफलता संदिग्ध भी हो सकती है ऐसा निम्न कारणों से हो सकता हैः
  • (1.)कोचिंग का स्तर आपकी अपेक्षा के अनुरूप न हो,
  • (2.)कोचिंग की पाठ्य सामग्री के कारण भ्रम हो,
  • (3.)अध्ययन का तरीका संतोषजनक न हो,
  • (4.)कोचिंग के कारण स्व अध्ययन के लिए समय नहीं मिल पाता हो।
  • इन स्थितियों में आप तुरंत निर्णय लें तथा सफलता के लिए समझौता न करें।वास्तव में कोचिंग संस्थान की मदद लेने का निर्णय केवल दिखावे के लिए न होकर उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए।कई सफल प्रत्याशियों ने मुख्य परीक्षा में तथा कुछ ने केवल साक्षात्कार से पूर्व भी कोचिंग की मदद ली थी।

7.नियमित अध्ययन (Regular Studies):

  • चूँकि इस परीक्षा में आपको केवल सफल ही नहीं होना है बल्कि औरों से आगे भी रहना है इसलिए नियमित रूप से अध्ययन करें।जो परीक्षार्थी अपनी पढ़ाई को पहले टालते रहते हैं तथा परीक्षा की तिथि नजदीक आते ही जोर-शोर से जुट जाते हैं उनकी स्थिति उस खरगोश की तरह होती है जो अपनी क्षमता पर अत्यधिक विश्वास कर सो गया और अंततः कछुए से दौड़ में हार गया।समय रहते यदि आप अपनी क्षमता के अनुसार 4 घंटे भी प्रतिदिन पढ़ें तो सफलता प्राप्त कर सकते हैं किंतु ऐन वक्त पर 10-12 घंटे रोजाना पढ़कर भी सफलता संदिग्ध हो सकती है।
  • नियमित अभ्यास से असंभव को संभव,निराशा को आशा में बदला जा सकता है।पत्थर पर अगर रस्सी घिसी जाए तो वह भी अपना निशान बना देती है।नियमित अभ्यास सभी समस्याओं को सुलझाने के लिए एक जरूरत है।एक परीक्षार्थी जो इस प्रकार की उच्च सेवाओं (निजी या सरकारी) की परीक्षा की तैयारी कर रहा है उसके लिए यह पहला पाठ है।निरंतर पढ़ाई करना ठीक उसी तरह आवश्यक है जैसे दैनिक कार्यों को पूरा करना।जैसे आप किसी भी दिन भोजन करना नहीं भूलते ठीक उसी प्रकार प्रतिदिन पढ़ाई करना भी नहीं भूलना चाहिए।पढ़ाई एक दिन भी टालना आपके लिए अत्यधिक हानिकारक हो सकता है।आपकी तैयारी सिर्फ एक दिन पढ़ाई स्थगित करने से कितनी अपूर्ण रह गई,इसका अंदाजा परीक्षा से सिर्फ कुछ दिन पहले ही लगा सकते हैं।तब आप महसूस करेंगे कि आपके पास एक-दो दिन और होते तो आप शायद और भी अच्छी तैयारी कर पाते।

8.सभी विषयों के लिए यथोचित समय (Reasonable time for all subjects):

  • अपनी परीक्षा-योजना तैयार करने के समय से ही नियमित पढ़ाई जरूरी है।इस संदर्भ में पढ़ाई की ‘रूटीन’ भी महत्त्वपूर्ण है।सभी विषयों को प्रतिदिन या नियमित अंतराल के बाद समय दिया जाना अनिवार्य है।जो विषय आपके लिए कष्टप्रद हो उस पर ज्यादा समय देना चाहिए और जिस विषय में आपको सुविधा होती हो उस पर अपेक्षाकृत कम समय देना चाहिए।अक्सर देखा जाता है कि परीक्षार्थी आसान लगने वाले प्रश्नों को ही बार-बार दोहराता है जबकि उसे कठिन और दुरूह लगने वाले प्रश्नों पर भी भरपूर ध्यान देना चाहिए।विषय के सिर्फ एक भाग में प्रवीणता या किसी अन्य भाग में बिल्कुल अनभिज्ञता काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है।इसलिए आपकी अपनी पढ़ाई का ‘रूटीन’ इस तरह बनाना चाहिए कि कठिन हिस्से को आप ज्यादा दे पाने में सक्षम हों।

9.तैयारी में नोट्स की भूमिका (The Role of Notes in Preparation):

  • अपने ‘नोट्स’ तैयार किए जाने चाहिए या नहीं इसे लेकर परीक्षार्थियों में उहापोह की स्थिति बनी रहती है।नोट्स बनाने का अर्थ यह नहीं की भिन्न-भिन्न किताबों को पढ़कर आप थोड़े-थोड़े भाग जोड़ लें।नोट्स किसी टॉपिक को पूरी तरह समझ कर बिना किसी किताब या दूसरे नोट्स की सहायता से बनाने चाहिए।अपने नोट्स बनाने का मतलब है कि आप उस टॉपिक को किसी को भी अच्छी तरह समझा सकते हैं।किसी कारणवश अगर आप टॉपिक को विभिन्न किताबों से पढ़ कर लिखने में असमर्थ हैं तो पहले एक क्रम में विभिन्न सूचनाओं को किताबों या दूसरे नोट्स से पढ़कर लिखें,तत्पश्चात उसे बार-बार समझ कर पढ़ते हुए एक स्वतंत्र नोट्स बनाने का प्रयास करें।नोट्स की निम्न विशेषताएं होती हैं,जो कि आपको नोट्स में होनी चाहिएः
  • (1.)विभिन्न सूचनाएँ क्रमवार वर्णित होती हैं।
  • (2.)परीक्षार्थी की अपनी भाषा में लिखी गई होती है।
  • (3.)टॉपिक की परिधि से बाहर की बातें वर्णित नहीं होती
  • (4.)कम शब्दों में ज्यादा जानकारी इकट्ठी रहती है।
  • लेक्चर सुनते या किताब पढ़ते समय विभिन्न टॉपिकों को लिखना भी नोट्स बनाने का एक तरीका है,लेकिन सिर्फ महत्त्वपूर्ण टॉपिकों को नोट कर लेने से संभव है कि आप झूठे आत्मविश्वास का शिकार हो सकते हैं।जब आप महत्त्वपूर्ण ‘पॉइंट्स’ लिखते हैं तो आशा करते हैं कि सिर्फ ‘पॉइंट्स’ को याद रखकर आप उनका विस्तार पूर्वक विश्लेषण कर लेंगे।यह विश्वास कितना सार्थक है इसका पता या तो तब चलेगा जब आप परीक्षा से कुछ दिन पहले अभ्यास कर रहे होंगे या फिर सीधे परीक्षा हाॅल में।अगर आप अभ्यास करते समय इन पॉइंट्स को इच्छानुसार नहीं लिख पा रहे हैं तो अचानक दबाव में आ जाना स्वाभाविक है।जबकि सीधे परीक्षा हाॅल में पॉइंट्स को सुंदरतापूर्वक विश्लेषित करने में असफल रहना आपके लिए एक कड़वा अनुभव बन जाएगा।इसलिए निःसंदेह पहले महत्त्वपूर्ण ‘पॉइंट्स’ नोट कर लें,परंतु बाद में पूर्ण नोट्स संभव हो,तो (अर्थात् समय हो) जरूर बनाएं।
  • सिर्फ नोट्स बना लेने से ही आपकी सारी तैयारी पूरी नहीं हो जाती।नोट्स को बार-बार पढ़ना चाहिए और पढ़ने का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे कि आप कम से कम समय में ही उसे दोहरा सकें।आपको उन पॉइंट्स को “हाइलाइटर” से “मार्क” कर देना चाहिए जो महत्त्वपूर्ण है।जब भी आप ‘नोट्स’ दोहराएं तो इन ‘पॉइंट्स’ पर विशेष ध्यान दें।एक टॉपिक,पर सारी उपलब्ध सामग्री को पढ़ने के बाद ‘नोट्स’ बनाना सबसे ज्यादा प्रभावी होता है।एक पैमाना बन जाने के पश्चात् जब आप उसे बार-बार पढ़ते हैं तो पता चलता है कि कौन-कौन सी बातें हैं जो कि अनावश्यक ही आ गई हैं और कौन-कौन से ऐसे तथ्य हैं जिनके न होने से ‘नोट्स’ में परिपक्वता नहीं आ पा रही है या आपका उत्तर संतुलित नहीं हो पा रहा।

10.आराम के समय पढ़ाई नहीं (No study at rest):

  • पढ़ाई करने के अपने-अपने ढंग होते हैं लेकिन पढ़ाई इतनी भी आराम पूर्वक नहीं करनी चाहिए कि दिमाग विषयवस्तु को समझने में कम और आराम फरमाने पर ज्यादा जोर दे।आपके पढ़ने का तरीका ऐसा हो,जो आपको ज्यादा एकाग्र और सजग रखे।सदैव लेट कर पढ़ाई करना ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध नहीं होता।आराम करने की स्थिति में आपका दिमाग सुस्त पड़ जाता है।शिथिल शरीर कभी भी रचनात्मक दृष्टि से सफल नहीं होता।कुर्सी पर लगातार बैठकर पढ़ने के दौरान कुछ समय अपने शरीर को आराम देने के लिए लेट जाना परंतु कोशिश करनी चाहिए कि उस समय दिमाग को भी आराम दिया जाए अर्थात् आराम करने के समय पढ़ाई नहीं करनी चाहिए और पढ़ाई के समय आराम नहीं करना चाहिए।

11.प्राकृतिक नियमों का पालन (Adherence to natural laws):

  • प्रतियोगिता परीक्षाओं में किसी एक फार्मूले की तलाश में परीक्षार्थीगण भटकते रहते हैं।अर्थात् सफलता के लिए किस तरह की पढ़ाई करनी चाहिए,कितना सोना चाहिए,कितना खाना चाहिए,पढ़ाई किस समय करनी चाहिए इत्यादि इत्यादि।
  • जिस प्रकार सभी व्यक्तियों के पढ़ने का ढंग एक नहीं है,उनके सोचने का तरीका एक नहीं,विचार को व्यक्त करने का ढंग एक नहीं,तो फिर यह कैसे संभव है कि किसी सफल व्यक्ति की नकल करके दूसरा व्यक्ति भी सफलता पा ले? दरअसल नकल,सफल परीक्षार्थी के पढ़ाई करने के समय,खाने के ढंग,सोने,घूमने के समय की ना करके,वह क्या और कैसे पढ़ता है उसकी करनी चाहिए।कितना पढ़ना चाहिए,किस समय पढ़ना चाहिए इन बातों का फैसला आप स्वतंत्रतापूर्वक अपने सुविधानुसार करें।अगर एक उम्मीदवार दिन में सोना और रात को 10 घंटे पढ़ता है तो क्या आप भी ऐसी पढ़ाई कर सकते हैं? हो सकता है कि आपकी दिन में सोने की आदत ना हो और आप जबरन दिन में पढ़ने के समय सोने की कोशिश करें और रात को सोने के समय पढ़ने की कोशिश भी व्यर्थ जाए।ऐसे में आप पर मानसिक दबाव बढ़ता जाएगा।इसलिए जितनी सुविधा और एकाग्रतापूर्वक आप अपनी पढ़ाई दिन में कर सकते हैं रात में नहीं कर पाएंगे,जबकि उस उम्मीदवार (जिसकी आप नकल कर रहे हैं) ने शुरू से रात को एकाग्रतापूर्वक पढ़ने की आदत डाल ली है।वैज्ञानिकों के अनुसार रात में उन टॉपिकों को पढ़ना लाभदायक होता है जो नए हों।
  • सुबह उन्हीं विषयों या टॉपिकों को पढ़ना चाहिए,जो एकाग्रता की कम मांग रखते हों।सुबह-सुबह चूँकि दिमाग आलसी और सुषुप्त रहता है इसलिए उसे एकाग्र और सजग होने में समय लगता है।अगर आप कोई नया विषय या नया टॉपिक उस समय पढ़ना शुरू करते हैं तो संभवत आपका समय बिना कुछ समझे ही व्यस्त चला जाये।इसलिए उचित होगा कि उस समय आप किसी टॉपिक को दोहराने के लिहाज से पढ़ें।इस समय उन सवालों को हल करने से बचना चाहिए जो कि दिमाग के शत प्रतिशत इस्तेमाल की मांग करते हैं।मसलन गणित के सवालों को अगर आप खूब सुबह हल करने बैठते हैं तो बार-बार प्रयास करने के बावजूद आप सही उत्तर सम्भवतः नहीं निकाल पाएंगे क्योंकि उस समय दिमाग अचानक ज्यादा दबाव नहीं झेल पाता।सुबह-सुबह सामग्री को दोहराने से शुरू करके नए टॉपिको की तरफ आगे बढ़ना चाहिए।आपको अगर सुबह-सुबह उठने की आदत है तो उपरोक्त वैज्ञानिक विधि को अमल में लाएं।
  • सिर्फ रात या सिर्फ दिन में पढ़ना किसी भी परीक्षार्थी के लिए ज्यादा हितकर नहीं होता।शरीर प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुकूल काम करता है।आप रात को जितनी सोने की आवश्यकता महसूस करते हैं उतनी दिन में नहीं करते क्योंकि शारीरिक आवश्यकता प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।उसे दबाकर ज्यादा लाभ अर्जित नहीं कर सकते।मसलन,अगर सारी रात आप पढ़ते हैं तो दिन में आप उतनी गहरी नींद नहीं ले सकते जितनी रात में।अगर नींद पूरी हो भी गई तो आपकी पाचन क्रिया प्रभावित होगी।आपका नहाना,नाश्ता,खाना,सब कुछ अव्यवस्थित हो जाएगा। अंततः सबका असर आपको तनावपूर्ण और आलसी बना कर रख देगा।

12.तनाव से बचें (Avoid stress):

  • जैसे-जैसे परीक्षा की तिथि नजदीक आती है कई परीक्षार्थियों में एक अनजान भय समा जाता है और वे तनाव ग्रस्त रहने लगते हैं जिसका प्रभाव उसकी सफलता पर भी पड़ता है।ऐसा अवसर इन परिस्थितियों होता है:
  • (1.)परीक्षा का दूसरा अथवा तीसरा अवसर हो तथा पिछले अवसरों का अनुभव अच्छा न रहा हो।
  • (2.)तैयारी के लिए पर्याप्त समय न मिल पाया हो
  • (3.)कुछ टॉपिक छूट जाने तथा पर्याप्त तैयारी न होने का एहसास हो
  • (4.)परीक्षा में सफलता के लिए स्वयं परीक्षार्थी अथवा उसके परिजनों ने बहुत उम्मीदें लगा रखी हों।
  • इन स्थितियों से बचने का तरीका यही है कि आप समय रहते पर्याप्त तैयारी करें तथा अपना आत्मविश्वास बनाए रखें।साथ ही एक सच्चे कर्मयोगी की भाँति प्रयास करें तथा फल भगवान की इच्छा पर छोड़ दें।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में प्रतियोगिता परीक्षा को क्रैक करने की 13 रणनीतियाँ (13 Strategy to Crack Competitive Exam),काॅम्पीटेटिव एग्जाम कैसे क्रैक करें? (How to Crack Competitive Exam?) के बारे में बताया गया है।

Also Read This Article:2025 में कॉम्पिटेटिव एक्जाम कैसे क्रैक करें?

13.चरित्र निर्माण (हास्य-व्यंग्य) (Character Creation) (Humour-Satire):

  • टीचर (छात्र से):आजकल क्या कर रहे हो?
  • छात्र:सर,प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहा हूं।
  • टीचर:अच्छा यह बताओ कि जाॅब प्राप्त करना,आधुनिक शिक्षा प्राप्त करना जरूरी है या कैरेक्टर का निर्माण।
    छात्र:दोनों ही जरूरी हैं।
  • टीचरःजाॅब प्राप्त करने के लिए तो इतने वर्ष खपा दिए। कैरेक्टर निर्माण के लिए क्या कर रहे हो?
    छात्र:कैरेक्टर के निर्माण करने की क्या जरूरत है? वह तो स्वतः ही निर्माण हो जाता है।

14.प्रतियोगिता परीक्षा को क्रैक करने की 13 रणनीतियाँ (Frequently Asked Questions Related to 13 Strategy to Crack Competitive Exam),काॅम्पीटेटिव एग्जाम कैसे क्रैक करें? (How to Crack Competitive Exam?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या स्नातक में अध्यनरत छात्र प्रतियोगिता परीक्षा दे सकता है? (Can a student studying in graduation take a competitive exam?):

उत्तर:हाँ,स्नातक में अध्ययनरत छात्र परीक्षा दे सकता है परंतु चयन होने पर नियुक्ति से पूर्व स्नातक उत्तीर्ण होने का प्रमाण (अंक तालिका,डिग्री) देना आवश्यक है।

प्रश्न:2.लोक सेवाएं कितने प्रकार की होती हैं? (What are the types of public services?):

उत्तर:दो प्रकार की।अखिल भारतीय सेवाएं तथा राज्य लोक सेवाएं।

प्रश्न:3.परीक्षा प्रश्न-पत्र किस प्रकार का होता है? (What is the type of exam question paper?):

उत्तर:सामान्यतः प्रारंभिक परीक्षा वस्तुनिष्ठ प्रकार तथा मुख्य परीक्षा निबंधात्मक प्रकार की होती है।प्रारंभिक परीक्षा क्वालीफाइंग एक्जाम (Qualifying Exam) है जबकि वरीयता सूची के लिए मुख्य परीक्षा तथा साक्षात्कार के अंक जोड़े जाते हैं।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा प्रतियोगिता परीक्षा को क्रैक करने की 13 रणनीतियाँ (13 Strategy to Crack Competitive Exam),काॅम्पीटेटिव एग्जाम कैसे क्रैक करें? (How to Crack Competitive Exam?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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