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6 Formulas to Make Children Excellent

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1.बच्चों को उत्कृष्ट बनाने के 6 सूत्र (6 Formulas to Make Children Excellent),बच्चों की परवरिश कैसे करें? (How to Raise Children?):

  • बच्चों को उत्कृष्ट बनाने के 6 सूत्र (6 Formulas to Make Children Excellent) के आधार पर बच्चों को सही शिक्षा-दीक्षा देने के गुर जान सकेंगे।किशोर,युवा और बचपन जीवन का सबसे नाजुक दौर होता है अतः इस समय में बच्चों को संभालना बहुत जरूरी है।
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2.युवावस्था में भटकाव की समस्या (The problem of disorientation in youth):

  • किशोर वय और युवाकाल जीवन का एक नाजुक एवं संवेदनशील मोड़ है।यह जीवन को विकसित भी कर सकता है;क्योंकि इस उम्र में किया गया साहस अपने चरम उफान पर होता है,परंतु विचार किसी एक बिंदु पर ठहरता नहीं है,एकनिष्ठ होकर चलता नहीं है।भावनाओं का आवेग भावुकता के रूप में व्यथित भी बहुत करता है।यह उम्र है कुछ कर गुजरने की,अपनी क्षमताओं को विकसित करने की और जो ऐसा कुछ तय कर लेता है,वह भविष्य के सुनहरे पथ पर अपना कदम बढ़ा लेता है;बस,उसे अपने आवेग को काबू में रखकर धैर्य एवं विवेकपूर्ण कार्य के साथ बढ़ते रहना है।ऐसे में लक्ष्य की ओर पहुंचना और उसे पाना कठिन नहीं होता।
  • किशोर वय की कुछ विशेषताएं होती हैं और कुछ समस्याएं भी होती हैं।बुद्धिमत्ता है कि अपनी क्षमताओं एवं विशेषताओं को बढ़ाया जाए तथा उचित मार्गदर्शक के मार्गदर्शन में अपनी निजी एवं चुभती समस्याओं का हल खोजा जाए।जिसे ऐसा दिव्य अवसर मिल जाता है,वह अपनी प्रतिभा को विकसित कर लेता है।प्रतिभा भगवान का दिया हुआ दिव्य एवं अनमोल वरदान है और उस वरदान का हकदार हुआ जा सकता है,परंतु इसके ठीक विपरीत समस्याओं का उचित निदान न मिल पाने के कारण कई युवा प्रतिभाएँ अपनी मंजिल तक पहुंचने से पूर्व दम तोड़ देती हैं,अपने बनाए मकड़जाल में उलझ जाती हैं।
  • इस उलझन को उलझाने में भावुकता सर्वोपरि है।भावुक किशोर आत्मीयता एवं प्यार पाने की तलाश में भटकता बहुत है और इसी तलाश में वह संबंध बनाता है।इस उम्र में शारीरिक परिवर्तन का दौर होता है,अतः विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण भी अधिक होता है।भावुक वय को उस आकर्षण से भयावह खतरा रहता है।तथाकथित प्यार-प्रेम की चाह में जितनी ऊर्जा इस फिसलती राह पर चुकती है,शायद ही और किसी में चुके।अत्यंत मेधावी एवं प्रतिभावान छात्र भी इस राह पर अपनी क्षमता एवं प्रतिभा को खोते देखे गए हैं।यहां पर प्रेम-प्यार की,संबंधों की निंदा अथवा उनको नकारा नहीं जा रहा है,बल्कि अपरिपक्व मन एवं भावुक हृदय के खतरों की ओर इंगित किया जा रहा है।
  • किसी को बौद्धिक,भावनात्मक सहायता प्रदान करना उचित है,पर सहायता के दौरान अपनी मर्यादित सीमाओं को लाँघना ठीक नहीं है;जो अक्सर होते देखा गया है।इस वय की दूसरी समस्या है-जोश अधिक,होश कम होना।किशोर वय में प्राणों की प्रबलता एवं बहुलता होती है।इसे अगर उचित दिशा मिल जाए तो यह रेगिस्तान को हरियाली बना सकता है और भगीरथ जैसे हिमालय को तोड़कर भगीरथी को प्रवाहित कर सकता है।आज क्रिया के उफान को नियंत्रित एवं मर्यादित करने के लिए सूक्ष्म एवं विवेकपूर्ण विचारों की आवश्यकता है।क्रिया के साथ औचित्यपूर्ण विचारों की जरूरत है,ताकि कदम भटके नहीं।भटकाव इस उम्र की सबसे बड़ी समस्या है।ये भटकाव भावुकता के कारण विवेक के अभाव में होते हैं।

3.युवावस्था नाजुक पड़ाव है (Puberty is a delicate stage):

  • किशोर उम्र जीवन का एक नाजुक पड़ाव है।यह वयसंधि काल के समान है,जो एक और तो बचपन को पीछे छोड़ती है और आगे जीवन की सच्चाई की ओर झाँकती है।इस उम्र में न तो बचपन पूरी तरह छूटा रहता है और न परिपक्वता आ चुकी होती है।इसमें दोनों का एक अजीब-सा मेल एवं सुयोग होता है।इसी दौर में शारीरिक एवं हार्मोनल विकास का अंधड़ उठता है। परिवर्तन बड़े तीव्र गति से होते हैं।परिवर्तन के इस वेग को थामना सबसे बड़ी चुनौती होती है।अक्सर इस चुनौती से किशोर वय चुक जाते हैं और इसके परिणामस्वरूप समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं।जिंदगी हर दिन एक नई चुनौती पेश करती है और इससे बड़ी ही कुशलता के साथ निपटना चाहिए।चूँकि किशोर वय में मानसिक परिपक्वता इतनी नहीं होती कि उससे चुनौती को समझा-परखा जाए,निर्णय लेने में चूक होने की संभावना बनी रहती है।
  • यह अल्हड़ उम्र अपने जोश के सामने स्वयं की नासमझी को ही बड़ी समझदारी मानती है।वह अपने जीवन में किसी का हस्तक्षेप कम पसंद करती है।हाँ! यह भी सच है कि अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए,पर सही तथ्य यह है कि प्रचण्ड वेगवती इस उम्र में उचित मार्गदर्शन के बिना जिंदगी की भूलभुलैया में खो जाने का डर बना रहता है।पहले संयुक्त परिवार-व्यवस्था थी। ऐसे में व्यथित मन को समझाने के लिए परिवार के कोई भी समझदार सदस्य आगे आ जाते थे,पर एकल परिवार में अब यह भी गुंजाइश रह नहीं गई है।अतः भटक जाने का खतरा बना रहता है।
  • इस उम्र में विचार एवं भाव को थामे रखना भी एक बड़ी चुनौती है।क्रिया के आवेश में भावुकता आड़े आती है। इससे जूझना ऐसा है,जैसे किसी उफनती नदी की धारा को रोकना।कठिन है यह डगर।जिंदगी सरल नहीं है।यह पग-पग कठिनाइयों से भरी पड़ी है।हर दिन नई कठिनाइयों से जूझना और आगे बढ़ना ही तो जिंदगी का नाम है।इतनी विषमताओं के बावजूद हर दिन कुछ नया करना साहसी शूरवीरों का काम है।इसके लिए विवेकपूर्ण चिंतन की आवश्यकता पड़ती है,जिससे कि चीजों को हर पहलू से समुचित ढंग से देखा-परखा जा सके।
  • विचारों को उचित दिशा देने के लिए तो दूर,उनको भटकाने के लिए आज हमारे चारों ओर जितनी साधन-सुविधाएं हैं,शायद कभी न थीं।युवा मन में जहर फैलाने वाले चैनल,पत्र-पत्रिकाएं,इंटरनेट,मूवी,पब,पार्टी आदि की भरमार है।मन को भटकाने के लिए तमाम साधन भरे पड़े हैं।मन को सधाने के लिए,चिंतन को ऊंचा उठने के लिए मुश्किल से कुछ मिलता है या मिलता है तो हम उसे दकियानूसी का लेबल लगाकर टाल देते हैं।पुराणों के श्रेष्ठ एवं प्रेरणादायक कथानक बीते युग की बातें हो चुकी है।हम अपना आदर्श ध्रुव,प्रहलाद,अभिमन्यु,नचिकेता,उत्तरा,गार्गी,अपाला आदि को मानने के बजाय मॉडल एवं पेशेवर खिलाड़ियों को मानने लगे हैं।जब आदर्श ऐसे होंगे तो हमारे जीवन का हश्र क्या होगा?
  • अल्हड़ किशोर व युवा मन बड़ा ही अनुकरण प्रिय होता है।उसके सामने यदि श्रेष्ठ विचार एवं आदर्श प्रस्तुत नहीं किए जाएंगे तो वह भटकेगा ही।अतः इसे भटकाने के लिए ये जितने जिम्मेदार हैं,उनसे कहीं अधिक हम और हमारा समाज भी जिम्मेदार है।ऐसी तमाम समस्याएँ हैं,जिनके भँवर में कितने किशोर अपने जीवन को डाल चुके हैं।इन तमाम समस्याओं का उचित समाधान ही उन्हें समुचित विकास के पथ पर अग्रसर कर सकता है।इनकी कलियों में प्राण-ऊर्जा भरकर उन्हें सुंदर फूलों जैसा खिलने में मददगार साबित हो सकता है।

4.किशोर और युवाओं की विशेषता (Characteristics of Teens and Youth):

  • किशोर वय की सर्वोपरि विशेषता है जीवन-ऊर्जा से ओत-प्रोत होना।इस ऊर्जा को सुनियोजित,संयमित एवं विकसित करना सबसे बड़ी आवश्यकता है।इस ऊर्जा का क्षरण रोकने के लिए कुसंगति से दूर रहना चाहिए।अपने किसी संगी-साथियों का प्रभाव मन में गहरा पड़ता है।गलत-अच्छी आदतें इन्हीं के प्रभाव से पनपती हैं।एक गलत आदत आगे चलकर व्यक्तित्व को विनष्ट कर सकती है और एक अच्छी आदत व्यक्तित्व को गढ़ एवं संवार सकती है।अतः कुसंग से बचना चाहिए,श्रेष्ठ संगति का साथ करना चाहिए।कोई अच्छा न मिले तो सबसे अच्छा मित्र है स्वाध्याय।स्वाध्याय अर्थात् श्रेष्ठ साहित्य,महान् गणितज्ञों एवं वैज्ञानिकों की जीवनियाँ,उनके संघर्ष की कथाएं,महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग,पुराणों के मर्मस्पर्शी कथानकों का अध्ययन,जिससे हम स्वयं को जान-समझ एवं परख सकें।उससे विचारों के उद्दाम प्रवाह को थामने एवं नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।
  • संबंध के बिना जीवन विरल,शुष्क एवं बेजान-सा हो जाता है,इसलिए संबंधों की सरसता बरकरार रखनी चाहिए,परंतु साथ में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि संबंध स्वस्थ एवं पवित्र हों,मर्यादाओं का उल्लंघन ना हो।जीवन में कई ऐसे मोड़ आते हैं,जिनमें हमारा निर्णय बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है।निर्णय जोश में नहीं,सदा शांत मन से एवं समझदारीपूर्वक लेना चाहिए।अगर हम स्वयं को इसके लिए अक्षम-असहाय पाते हों तो किसी योग्य मार्गदर्शक की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।
  • इस उम्र में अपने करियर पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए।जो भी करना है और जिस राह पर भी आगे बढ़ना है,चाहे वह अध्यात्म का क्षेत्र हो या कंप्यूटर का या फिर व्यापार व्यवसाय का,उसके लिए सुनियोजित तरीके से एवं लगन-निष्ठापूर्वक लग जाना चाहिए।चुने हुए करियर को सदा आगे रखकर शेष चीजों को उसके बाद करना चाहिए।अपनी सारी क्षमता एवं ऊर्जा अपने निर्दिष्ट लक्ष्य में झोंक देनी चाहिए,क्योंकि जितनी सामर्थ्य एवं साहस इस उम्र में होता है,उतना शायद आयुष्य की किसी भी स्थिति में नहीं होता।अतः सतत नया करना चाहिए एवं नई चीजों का प्रशिक्षण आदि लेने का प्रयास करना चाहिए।
  • करियर के बाद सबसे अहम सवाल जिंदगी का है।कभी-कभी सब कुछ साधन-सुविधा होने के बावजूद जिंदगी में ह्रास देखते हैं।कठिन समय में हमारे अपने लोग जो हम पर प्राण निछावर करते थे,अनजान अजनबी-सा व्यवहार करते हैं।इनकी बेरुखी और उपेक्षा से कच्चा मन एवं कोमल भाव चोटिल होते हैं।ऐसे में हमें उस परमात्मा से थोड़ी देर के लिए हृदय से प्रार्थना करनी चाहिए।प्रार्थना का तरीका अपने ढंग से तय कर सकते हैं,परंतु यह भावभरी होनी चाहिए।इसके साथ सरस्वती स्तोत्र मंत्र बड़े भावपूर्वक बोलना चाहिए।नियत समय में एवं नियत स्थान पर अवश्य रोजाना इसका पाठ करना चाहिए।
  • सतत साधना का प्रभाव कभी निष्फल नहीं होता है। इसका दूरगामी प्रभाव पड़ता है।यह साधना हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होती है और यह साथ कभी नहीं छोड़ती;भले ही अपने साथ क्यों न छोड़ दें।घनघोर  अंधकार में यह प्रदीप्त लौ के समान हमें राह दिखाती है।कठिन समय में हम सही निर्णय इसी के आधार पर कर सकते हैं।जीवन की भीषण चुनौतियों में यही एक संबल हमारी शक्ति बन जाता है।अतः किशोर वय की सभी समस्याओं के समाधान में साधना एक सशक्त माध्यम है।इससे चिंतन एवं भावनाओं की बागडोर हमारे हाथ में आ जाती है और हम अपने जीवन के मालिक स्वयं बन जाते हैं।अगर इस उम्र में यह सध सके तो आने वाला भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा।

5.आज के युवाओं की स्थिति और निष्कर्ष (The Status and Conclusions of Today’s Youth):

  • आज के अधिकांश किशोर एवं युवा पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव,इंटरनेट पर भड़काने,भटकाने वाली सामग्री के संपर्क,माता-पिता व शिक्षकों के द्वारा सही मार्गदर्शन न कर पाने के कारण नशाखोरी,अय्याश प्रवृत्ति और अपराध जगत की ओर अग्रसर हो रहे हैं।एक बार भटकने के बाद सही दिशा पकड़ना मुश्किल हो जाता है।क्योंकि नशाखोरी और सेक्स का चस्का लग जाने के बाद यह ऐसा दलदल है जिसमें जितना अधिक निकलने का प्रयास करता है उतना ही धँसता चला जाता है।
  • आप अपने आस-पास नजर दौड़ा कर देख लीजिए,आपको अधिकांश किशोर एवं युवा पथभ्रष्ट और गलत आदतों,गलत संगत में फंसे हुए मिलेंगे।इसके लिए किसको दोष दिया जाए आज की दिशाविहीन शिक्षा पद्धति को,वातावरण को,माता-पिता व शिक्षकों को,पाश्चात्य संस्कृति को,कुसंगति को,सहशिक्षा को या और किसी को।दोष किसका भी हो परंतु युवाओं के भटकाव को देखकर मन व्यथित होता है और यह सोचकर परेशान भी होता है कि भारत का भविष्य कैसा होगा? भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है,भारत महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है,भारत में टेक्नोलॉजी का विकास द्रुतगति से हो रहा है आदि आदि।परंतु यह तस्वीर का केवल उजला पक्ष है,इसके काले पक्ष को देखने के लिए भटकती किशोर एवं युवा पीढ़ी को देखना होगा।जब तक किशोर या युवा पीढ़ी को सही दिशा नहीं मिलती है,सही दिशा में आगे बढ़ाने के प्रयास नहीं किए जाते और तौर-तरीके नहीं अपनाए जाते तब तक भारत सही मायने में विकसित,उन्नत नहीं कहा जा सकता है।
  • युवावर्ग आधुनिक तकनीक के संपर्क में आने के कारण अनेक गलत बातों के संपर्क में भी आता है।इंटरनेट पर अच्छी व गलत,सही दिशा देने वाली और भटकाने वाली बातें मौजूद हैं।कई किशोर एवं युवा पोर्न वेबसाइट खंगालते हैं और तथाकथित प्रेम व प्यार की बातें देखकर व पढ़कर सेक्सी प्रवृत्ति के हो जाते हैं।एक बार सेक्स का चस्का लग जाता है तो फिर उसकी गिरफ्त से नहीं छूट पाते हैं।नियम,संयम,अनुशासन,साधना आदि की बातें उन्हें बेतुकी लगती है।गलत बातों और बुरी बातें विभिन्न वेबसाइट्स व वीडियो को देखने के लिए उन पर कोई पाबंदी नहीं है।एक बार मोबाइल फोन हाथ में आ गया है और आ ही जाता है तो फिर उसको देखने,उन पर नियंत्रण करने वाला कोई नहीं होता है।युवा व किशोर बालक ऑनलाइन शिक्षण सामग्री का बहाना बनाकर मोबाइल मांग लेते हैं और फिर रपटीली राह पर चल पड़ते हैं।
  • इस उम्र में उन्हें साधना करके अपने आप को तपाना चाहिए उसमें वाहियात हरकते करने लगते हैं।साधना उनके जीवन का अंग होना चाहिए था।साधना का अर्थ जंगल में जाकर धूणी लगाने,जटाजूट बढ़ाने,वल्कल या गेरुए वस्त्र धारण करना नहीं है।साधना का सही अर्थ है,जीवन को परिपूर्ण रूप से साध लेना,अपने नियंत्रण में रखना।अपने जीवन को कर्मयोगी की तरह बना लेना।हर श्वास में,हर पल अपने पर दृष्टि रखना कि हमसे कुछ ऐसा तो नहीं हो रहा,जो नहीं होना चाहिए था? मानवीय गरिमा के अनुरूप हमारा आचरण है कि नहीं? क्या हम अपने आपका शोधन कर पा रहे हैं? हमारी कितनी कमियाँ हमारी रोज की साधना से दूर हुई,कितनी नई विशिष्टताएँ हमारे जीवन क्रम में जुड़ीं? क्या हम पिछले वर्षों की तुलना में और अधिक सुसंस्कृत,संयमशील,कर्त्तव्यपरायण देश के नागरिक बन गए हैं? यदि हम ऐसा अनुभव करते हैं तो हमारी साधना सही मार्ग पर चल रही है।यदि हम
  • अनिश्चिताओं,शंकाओं,असुरक्षा,रोगों,दुर्व्यसनों के आवरण से घिरे बैठे हैं एवं कई जगह,कई गुरुओं के,कई आश्रमों,संस्थानों के चक्कर लगाकर आज भी मन को अशांत किए बैठे हैं तो फिर हम एक जाल में उलझे बैठे हैं और इससे हमें निकलना ही होगा।
    उपर्युक्त आर्टिकल में बच्चों को उत्कृष्ट बनाने के 6 सूत्र (6 Formulas to Make Children Excellent),बच्चों की परवरिश कैसे करें? (How to Raise Children?) के बारे में बताया गया है।

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6.बच्चे के उत्कृष्ट होने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (How Child Excels) (Humour-Satire):

  • रजनीश:यार मेरे तो गणित में कुछ समझ में ही नहीं आता है।
  • निखिल:ऐसा कहा जाता है कि जो गंजे होते हैं वो अधिक बुद्धिमान और उत्कृष्ट होते हैं।तुम भी ऐसा करो कि गंजे हो जाओ।गणित में एक्सीलेंट हो जाओगे।

7.बच्चों को उत्कृष्ट बनाने के 6 सूत्र (Frequently Asked Questions Related to 6 Formulas to Make Children Excellent),बच्चों की परवरिश कैसे करें? (How to Raise Children?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.संसार की सर्वोत्तम कृति कौनसी है? (What is the best work in the world?):

उत्तर:बच्चे संसार की सर्वोत्तम कृति है।अतः माता-पिता व शिक्षकों को बच्चों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि वे उसे उत्कृष्ट बनायें।

प्रश्न:2.माता-पिता का प्रमुख दायित्व क्या है? (What is the major responsibility of parents?):

उत्तर:माता-पिता के लिए उनकी संतान अनमोल है।अतः बच्चों की समुचित परवरिश,उचित लालन-पालन,नैतिक विकास,सही मार्गदर्शन और व्यक्तित्व निर्माण के लिए उन्हें सर्वस्य त्याग करने में नहीं हिचकना चाहिए।

प्रश्नः3.राष्ट्र की उन्नति कैसे संभव है? (How is the progress of the nation possible?):

उत्तर:किशोर,युवा एवं बच्चों की उन्नति में पूरे राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति छिपी है।अतः उनकी क्षमताओं,योग्यताओं का शीघ्र पता लगाकर उनको वैसा प्रशिक्षण देकर ऐसा दिशा में मोड़ा जाए,जिससे न केवल उन्हें आत्म संतुष्टि ना हो बल्कि राष्ट्र की समृद्धि में भी उनका योगदान मिल सके।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा बच्चों को उत्कृष्ट बनाने के 6 सूत्र (6 Formulas to Make Children Excellent),बच्चों की परवरिश कैसे करें? (How to Raise Children?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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