Technology Toxics for M-Generation
1.एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी टाॅक्सिक (Technology Toxics for M-Generation),एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी और संचार टाॅक्सिक कैसे है? (How is Technology and Communication Toxics for M-Generation?):
- एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी टाॅक्सिक (Technology Toxics for M-Generation),इंटरनेट टॉक्सिक हो गई है।यहाँ टॉक्सिक से तात्पर्य है कि विषैला प्रभाव या दुष्प्रभाव। प्रौद्योगिकी के बिना आज के युवा रह ही नहीं सकते हैं,इंटरनेट पर 8-10 घंटे सर्फिंग के बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता है।किसी भी चीज का संतुलित उपयोग करने पर वह हमारे विकास व उन्नति में सहायक है जबकि सीमा से अधिक व अनावश्यक प्रयोग करने पर वह जीवन को विषाक्त कर देती है।
- आपको यह जानकारी रोचक व ज्ञानवर्धक लगे तो अपने मित्रों के साथ इस गणित के आर्टिकल को शेयर करें।यदि आप इस वेबसाइट पर पहली बार आए हैं तो वेबसाइट को फॉलो करें और ईमेल सब्सक्रिप्शन को भी फॉलो करें।जिससे नए आर्टिकल का नोटिफिकेशन आपको मिल सके।यदि आर्टिकल पसन्द आए तो अपने मित्रों के साथ शेयर और लाईक करें जिससे वे भी लाभ उठाए।आपकी कोई समस्या हो या कोई सुझाव देना चाहते हैं तो कमेंट करके बताएं।इस आर्टिकल को पूरा पढ़ें।
Also Read This Article:How to Avoid Side Effects of Gadgets?
2.प्रौद्योगिकी के जाल में फँसते युवा (Young people falling into the trap of technology):
- आज के युवाओं को ‘एम-जेनरेशन’ कहा जाता है।इन्हें नई पीढ़ी का सही प्रतिनिधि कहा जा रहा है,जो तारों के संजाल पर सवार मीडिया के विविध रूपों को जिंदगी का अविभाज्य एवं अहम भाग मानते हैं।संचार माध्यमों के अनुरागी और प्रौद्योगिकी के दीवाने युवा संचार से जुड़ी चीजों पर अधिक से अधिक घंटे व्यतीत करते हैं।ये औसतन रोज 8 घंटे अपने कमरे में अपनी पीढ़ी के नए-नए उपकरणों में व्यस्त रहते हैं।उनका टी०वी० और लैपटॉप पर इंटरनेट आदि तब तक बंद नहीं होते,जब तक कि रात 2:00 बजे के करीब उनकी पलकें न झपकने लग जाएं।इस पीढ़ी ने अपने इन कारनामों से पालकों,कथा विशेषज्ञों को नई चिंता एवं उलझनों में डाल दिया है।प्रौद्योगिकी के प्रति उनकी यह दीवानगी आखिर सकारात्मक है या नकारात्मक?
- आज के युवाओं के लिए नई प्रौद्योगिकी के उपकरण जैसे कंप्यूटर,लैपटॉप,मोबाइल फोन,आई०पॉड,कराओके सिस्टम आदि आवश्यकताओं के साथ-साथ फैशन की अभिव्यक्ति का माध्यम भी बन गए हैं।इन्हें क्रय करने की क्षमता और फैशन में से कहीं ज्यादा अहम बात यह है कि यह प्रौद्योगिकी इस ‘एम-जनरेशन’ के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।ये युवा स्वयं को इसके प्रतिनिधि मानते हैं और इस सदी के प्रथम दशक में तीव्रता से आगे बढ़ना चाहते हैं।सम्पन्न युवाओं की इस पीढ़ी को विशेषज्ञ प्रौद्योगिकी से संचालित पहली लहर मानते हैं।वे आतुर उपभोक्ता और प्रौद्योगिकी आदि से प्रभावित हैं और यह आजादी उन्हें मोबाइल फोन एवं नेट से मिलती है।
- 12 से 29 साल के किशोर एवं युवाओं का वर्ग ऐसी पहली पीढ़ी है,जिसे लगता है कि प्रौद्योगिकी के नए उपकरण उनके जीवन का अहम हिस्सा है,जिनके बगैर आज के आधुनिक समय की तीव्रता के साथ कदम नहीं मिला सकते।इसलिए इस पीढ़ी को ‘टेक्नोलॉजी बेबी’ कहा है।इनका जन्म 1995 से 2013 के बीच हुआ है और उनकी संख्या 5 करोड़ के लगभग है।इन्हें प्रौद्योगिकी अनुरागी,नए उपकरणों और इंटरनेट का प्रेमी करार दिया गया है।बहुआयामी भूमिका पर सर्वेक्षण को अंजाम देने वाले फाउंडेशन के अनुसार: बच्चे एक ही समय में मीडिया के विभिन्न रूपों का उपयोग कर रहे हैं।इसे मल्टीटास्किंग कहा जाता है,जो एक नया चलन है,परंतु हम नहीं जानते हैं यह अच्छा-बुरा है या फिर दोनों है।बहुत से युवाओं के दिन की शुरुआत म्यूजिक सिस्टम चालू करते और ईमेल देखने के लिए कंप्यूटर खोलने से होती है।ये छात्र-छात्राएं इंटरनेट पर सर्फिंग,गाने डाउनलोड करने और कंप्यूटर गेम में प्रतिदिन 5 घंटे खर्च करते हैं।शेष समय आई०पॉड,टी०वी० और मोबाइल फोंस में बँट जाता है।इस बीच कुछ घंटे उन्हें कॉलेज में गुजारने पड़ते हैं।ये इन उपकरणों पर खासा निर्भर हैं।यदि ये उनके पास नहीं होते हैं तो उन्हें चिड़चिड़ाहट,सूनापन एवं नीरस-सा लगता है,ये इनकी लत में शुमार हो गया है।
3.कंप्यूटर आदि पर बढ़ती निर्भरता (Increasing dependence on computers etc.):
- कार्टून नेटवर्क इंडिया के 14 शहरों में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 40 फीसदी कंप्यूटर के जानकार या इसका इस्तेमाल करने वाले थे।सर्वेक्षण में शामिल लोगों में 5 साल से 25 साल के बच्चे व युवा थे।बेंगलुरु के 75% बच्चे कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं;जबकि 66 फीसदी रोजाना साइबर कैफे में इंटरनेट खंगालते हैं। अधिकांश सूचनाएँ लेने,होमवर्क पूरा करने और कैरियर मार्गदर्शक के रूप में इंटरनेट की अपील करते हैं।70 फ़ीसदी माता-पिता ने बताया कि कंप्यूटर खरीदते समय उनके बच्चे ने जोर दिया कि कौन-सा ब्रांड खरीदा जाए। यही समर्थन मोबाइल खरीदते समय 67 फीसदी के साथ हुआ।64 फीसदी बैंगलोरवासी प्रतिदिन इंटरनेट पर इस्तेमाल करते हैं;जबकि इस बारे में राष्ट्रीय औसत मात्र 40 फीसदी है।
- इंडियन एकेडमी फॉर पेडिएट्रिक्स के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत का औसत बच्चा,एक साल में स्कूल के बजाय टी०वी० के सामने औसत 30 घंटे प्रति सप्ताह और स्कूल में औसतन प्रति सप्ताह 25 घंटे व्यतीत करता है।इस संदर्भ में सर्वेक्षण से अहमदाबाद के एक युवा को पूछने पर पता चला कि वह रोजाना 8 घंटे कंप्यूटर आदि के सामने खर्च करता है।उसके अनुसार वह 8 घंटे अपने उपकरणों:कंप्यूटर,आई०पॉड,मोबाइल फोन,कराओके सिस्टम और टी०वी० के विभिन्न चैनलों के साथ रहता है।वह रोज कंप्यूटर पर करीब इष्टमित्रों के साथ 5 घंटे कंडक्टर वट्राइल खेलता है;यह संभव है,क्योंकि उनके कंप्यूटर लोकल एरिया नेटवर्क (एल०ए०एन०) से जुड़े हैं।इसके अलावा वह दो घंटे इंटरनेट पर सर्फिंग,चैटिंग या गाने या फिल्में डाउनलोड करने में खर्च कर देता है।
- कंप्यूटर आदि नवीनतम तकनीकों की बढ़ती निर्भरता के प्रभाव पर मनोचिकित्सक चिंतित हैं।मनोचिकित्सकों के अनुसार बच्चे,किशोर एवं युवा यदि कंप्यूटर और टी०वी० का उपयोग एक सीमा तक करें तो उनके स्वास्थ्य के लिए बुरा नहीं है,परंतु लंबे समय तक इस पर निर्भरता,उन्हें जिंदगी के स्वाभाविक आनंद से दूर ले जा सकती है।सामाजिक व्यक्ति के रूप में उनका विकास अवरुद्ध हो सकता है।क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक की मान्यता है कि लंबे समय तक गेम और कंप्यूटर पर घण्टों खर्च करने से बच्चों की दक्षता पर प्रभाव पड़ता है।किशोरवय वह संवेदनशील अवस्था है,जब बच्चे दूसरे लोगों से मेल-जोल बढ़ाना,अंतर्वेयक्तिक संबंधों को विकसित करना सीखते हैं और इस उम्र में उनमें खुद की पहचान को लेकर समझ विकसित होती है।उपकरणों से लगातार चिपके रहने से मानवीय संवेदनशील प्रवृत्तियां कम होती हैं।इससे बच्चों में असंतुलन पैदा होगा,लोगों से मिलने-जुलने कि उनकी क्षमता कम होगी और अपने आस-पास के लोगों के प्रति वे असंवेदनशील हो जाएंगे और जैसे-जैसे वे बड़े होंगे,उनमें पहचान का संकट गहराने लगेगा।समय बीतने के साथ ही,उनके पारिवारिक जीवन में भारी समस्याएं एवं परेशानियां उभरने लगेंगी।युवा मन इस समस्या से निजात पाने के लिए ही खुद को कमरे में बंदकर नेट के माध्यम से अश्लील सामग्री देखने लगता है।
- साइबर कैफे का चलन भी युवाओं में बड़ी तेजी से पनपा है।साइबर की दुनिया के फायदे से इन्कार नहीं किया जा रहा है।इंटरनेट ने जो ज्ञान एवं सूचना के नए आयाम खोले हैं,उससे देश और दुनिया में कोई अपरिचित नहीं है।सूचना-क्रांति के इस अनूठे उपकरण ने शोध,अनुसंधान और ज्ञान के आदान-प्रदान में काफी कुछ जोड़ा है,पर तकनीकी उपयोगिता से बढ़ते एकाकीपन एवं भटकन से युवक-युवतियां इसका दुरुपयोग भी कम नहीं कर रहे हैं।साइबर कैफे उनके जीवन में जहर घोलने की बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।विकसित राज्यों एवं बड़े शहरों में इनकी चर्चा और चलन को तो सभी जानते हैं,पर नए बने राज्यों एवं छोटे शहरों में भी यह बीमारी कम नहीं है।
4.आधुनिक उपकरणों का दुष्प्रभाव (Side effects of modern equipment):
- घंटों मोबाइल एवं नेट के एस०एम०एस० कार्नर पर व्यतीत करने वाले युवाओं के एस०एम०एस० की भाषा एवं लहजा उनकी भटकी हुई भावनाओं का बयान करने के लिए पर्याप्त है।युवाओं द्वारा एस०एम०एस० के जरिए भेजे जाने वाले चुटकुलों में 50% अश्लील होते हैं।लड़कों की बराबरी करने के फेर में लड़कियां भी इसमें अब काफी बोल्ड होकर दाखिल हुई हैं।एस०एम०एस० के संदेशों का सृजन करने वालों ने अपनी ही एक विशिष्ट भाषा एवं शब्दावली ईजाद की है। इसका स्वरूप बहुतायत में कुछ ऐसा है,जिसे अपने गरिमामय शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।इस संबंध में जूनियर रिसर्च संस्था ने काफी खोज-बीन की है।इनके विश्लेषण ने इस संबंध में पर्याप्त तथ्य इकट्ठे किए हैं।इनका कहना था कि मोबाइल अश्लीलता का कारोबार पिछले वर्ष तक एक बिलियन डॉलर यानी कि लगभग 50000 करोड़ हो जाएगा।एस०एम०एस० की नई तकनीकों में संदेश ही नहीं,चित्र भेजने,वीडियो भेजने की भी व्यवस्था है।ये चित्र और वीडियो कैसे होते हैं,इसकी चित्र कथा बीच-बीच में अखबार में प्रकाशित होती रही है।इसके विस्तार से बचें,यही अच्छा है।
- आधुनिक उपकरणों के बढ़ते प्रभाव के कई नकारात्मक पक्ष भी हैं।क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एवं काउंसलर के अनुसार बच्चे,किशोर एवं युवा प्रायः अपने उपकरणों का दिखावा करते हैं और उन्हें एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल बन जाता है।ऐसा इसलिए है,क्योंकि घर में पढ़ाई के बजाय वे अपना सारा खाली समय कंप्यूटर गेम्स और टी०वी० पर व्यतीत करते हैं।उपकरणों के बिना जीवन अधूरा है,वाली सोच दीर्घकाल में बच्चों के विकास एवं युवा मन पर असर डालती है।ये अपने उपकरणों में अधिक मग्न एवं मस्त रहते हैं।अन्य शैक्षिक,सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यों और गतिविधियों के लिए उनके पास समय कम होता है।अतः तकनीकी के क्षेत्र में प्रवीण एवं पारंगत युवा व्यावहारिक क्षेत्र में अत्यंत फिसड्डी साबित होते हैं।
- इस परिप्रेक्ष्य में हम ऐसी पीढ़ी का उदय देख रहे हैं,जिसने पारंपरिक गतिविधियों को बिल्कुल नई चीजों से बेदखल कर दिया है।अपने मीडिया चैनलों के जरिए,वे दुनिया से कहीं अधिक मुखातिब हैं।इससे वे आधुनिक चीजों से परिचित होते हैं,परंतु सांस्कृतिक चीजों से अनभिज्ञ रहने से उनका विकास एकांगी एवं एकपक्षीय रह जाता है।सामाजिक और अंतर्वेयक्तिक रिश्तों की बात आती है तो ‘एम-जनरेशन’ के बच्चे प्रायः बिछुड़ जाते हैं।
- एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि कूल माने जाने वाले उपकरण और बहुआयामी मीडिया के इस्तेमाल से शुरुआत में तो किशोर मानसिक और शारीरिक रूप से सामान्य से बेहतर प्रदर्शन करते हैं,परंतु कुछ समय बाद यही चीजें शरीर और मस्तिष्क के लिए बोझ बन जाती हैं।इनके जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से एकाग्रता एवं संवेदनशीलता पर असर पड़ता है और इससे भी बड़ी बात यह है कि इन उपकरणों के प्रति बढ़ती दीवानगी का तात्पर्य है कि युवा खुद को मानसिक विकास के दूसरे साधनों जैसे किताबें,सांस्कृतिक शिक्षा,कला या सामान्य मानवीय संपर्कों से वंचित कर लेते हैं।
- आज की एम-जेनरेशन और बुजुर्गों के बीच बढ़ता फासला तकनीकी और मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल करना भी है।हर चीज,हर बात तकनीकी से नहीं सीखी जा सकती है।लेकिन युवा यही समझता है कि तकनीकी में सारा ज्ञान सिमट कर कैद हो गया है,इसलिए बड़े-बुजुर्गों और माता-पिता के साथ वे समय बिताना पसंद नहीं करते हैं।परंतु मानवीय संवेदना,प्रेम,सद्व्यवहार,सहयोग आदि जैसे मानवीय गुण परिवार,समाज के लोगों के साथ कनेक्टिविटी से ही पनपते और विकसित होते हैं।
5.तकनीकी का इस्तेमाल का निष्कर्ष (Conclusion of the use of technology):
- भारत की ‘एम-जनरेशन’ के सामने विशाल अवसर है तो गंभीर चुनौती भी है।बहुआयामी माध्यमों में दक्षता से,तेजी से बढ़ते प्रौद्योगिकी तंत्र पर फतह भी पाई जा सकती है और इसका दास बनकर नष्ट भी हुआ जा सकता है।यह भी स्पष्ट है कि बहुआयामी मीडिया के जरिए आज के बच्चे दुनिया के बारे में कहीं ज्यादा जान पा रहे हैं और यही वजह है कि वे नववैश्विक रुझानों से वाकिफ हैं और अनेक कौशल से लैस भी,परंतु इसके दूरगामी विभिन्न नकारात्मक परिणाम भी सामने खड़े हैं। अतः इस समस्या को दूर कर उसके सकारात्मक पक्ष पर जोर देना चाहिए।प्रौद्योगिकी का उपयोग महज मनोरंजन के बजाय शिक्षा और जागरूकता बढ़ाने के लिए करना चाहिए।इससे आधुनिकता और प्राचीन सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्यों के बीच में सामंजस्य बढ़ेगा।बच्चों एवं युवाओं में समग्र विकास संभव हो सकेगा।
- उदाहरण के लिए गणित विषय आपको जटिल महसूस होता है तो आप शिक्षा संस्थानों में टीचर्स से गणित पढ़ते हैं।और घर आकर गणित विषय के सवालों,प्रमेयों और समस्याओं को हल करते हैं।प्रॉब्लम सैट हल करते हैं तो कुछ समस्याएं आपसे हल नहीं हो पाती है या आप समझ नहीं पाते हैं।तो इंटरनेट में बहुत सी उम्दा वेबसाइट्स हैं या यूट्यूब पर वीडियो हैं जिन्हें देखकर आप उन्हें समझ सकते हैं।टीचर्स हमेशा हमारे साथ नहीं रहते हैं,घर पर नहीं रहते हैं ऐसी स्थिति में तकनीक के इस्तेमाल से आप अपने ज्ञान में वृद्धि कर सकते हैं।आज ज्ञान प्राप्ति के अनेक साधन हैं परंतु किसी भी एक साधन से संपूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है।तात्पर्य यह है कि ऑफलाइन एवं ऑनलाइन क्लासेज एक दूसरे की पूरक हैं,एक दूसरे की विकल्प नहीं हैं।ऑफलाइन व ऑनलाइन क्लासेज के अपने-अपने फायदे और नुकसान है किसी भी चीज पर अत्यधिक निर्भरता से नुकसान होता है।इसलिए किसी भी साधन का संतुलित उपयोग करना चाहिए।
- इस प्रकार आप गणित में जो कठिनाई महसूस करते हैं,वह धीरे-धीरे सरल होती जाएंगी।परंतु यदि आप हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहेंगे और सबके सामने यह रोना रोते रहेंगे की क्या करूं गणित समझ में नहीं आती है,इसलिए सोशल मीडिया,इंटरनेट पर मनोरंजन करके अपना तनाव हल्का कर रहा हूं।कोई भी साधन गणित की समस्याओं को घोलकर आपको नहीं पिलाने वाला है।समस्त समस्याओं का किसी साधन से हल मिल भी जाए तो आपके व्यक्तित्व का विकास कैसे होगा? गणित के कुछ सवालों को आप भी हल करेंगे और बहुत प्रयास करने पर भी कोई समस्या हल नहीं हो रही है तब अन्य साधनों (तकनीकी आदि) का सहारा लेंगे तभी आपको गणित को हल करने की कला आएगी,तभी आप गणित में पारंगत और निपुण हो सकेंगे।तकनीकी का दास बनने या लत लगने से उसके साइड इफैक्ट्स भी हमें भोगने होंगे।
- ऑफलाइन या ऑनलाइन क्लास में गणित की थ्योरी समझने के बाद आपको कुछ सवालों को हल करने का प्रयास करना चाहिए।एक बार हल नहीं होते हैं,समझ में नहीं आता है तो बार-बार अभ्यास करें।निराश व हताश न हों बल्कि प्रयत्न करते रहें।आप में गणित की जितनी कमजोरी होगी उसको दूर करने के लिए उतना ही अधिक प्रयास करना होगा।अपनी कमजोरी को पहचानें और उसे दूर करते रहें।निरंतर,नियमित अभ्यास करें।विचार,चिंतन व मनन करें।आवश्यक होने पर तकनीक का इस्तेमाल करें।इसी प्रकार अन्य विषयों को समझने के लिए तकनीक का संतुलित उपयोग करें।
- माता-पिता,बड़े बुजुर्गों तथा अपने से बड़ों के साथ भी कुछ समय बिताना चाहिए।उनके अनुभवों का भी फायदा उठाना चाहिए।हर चीज तकनीक,इंटरनेट,मीडिया से ही नहीं सीखी जाती है।कम से कम मानवता का पाठ तो आप मीडिया से नहीं सीख सकते हैं।मानव बनने के लिए तो आपको लोगों से कनेक्टिविटी रखनी होगी।बड़ों से हमें पढ़ने-लिखने व अध्ययन करने के गुर भी सीखने को मिल सकते हैं।अतः इन बातों का ध्यान रखेंगे तो प्रौद्योगिकी हमारे लिए विष का काम नहीं करेगी बल्कि वरदान साबित होगी।
- उपर्युक्त आर्टिकल में एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी टाॅक्सिक (Technology Toxics for M-Generation),एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी और संचार टाॅक्सिक कैसे है? (How is Technology and Communication Toxics for M-Generation?) के बारे में बताया गया है।
Also Read This Article:5 Techniques How to Reduce Screen Time
6.छात्र रोड पर कैसे आया? (हास्य-व्यंग्य) (How Did Student Get on Road?) (Humour-Satire):
- महिला (भिखारी छात्र से):तुम रोड पर कैसे आ गए,मेरा मतलब है तुम भिखारी कैसे बन गए?
- भिखारी छात्र:मैं सोशल मीडिया,टेक्नोलॉजी का इतना दीवाना था कि पढ़ाई की तरफ ध्यान ही नहीं दिया।घरवालों ने खूब चेताया भी लेकिन मेरी लत नहीं छूटी और एक दिन घरवालों ने धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया।कुछ स्किल जानता नहीं था,अतः भीख मांगनी पड़ी।
7.एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी टाॅक्सिक (Frequently Asked Questions Related to Technology Toxics for M-Generation),एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी और संचार टाॅक्सिक कैसे है? (How is Technology and Communication Toxics for M-Generation?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.क्या युवाओं को तकनीक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए? (Shouldn’t young people be using technology?):
उत्तर:अपने अध्ययन में आवश्यक होने पर संतुलित उपयोग करना चाहिए।स्क्रीन टाइम निर्धारित करें तथा इसे अपनी आदत नहीं बनानी चाहिए।
प्रश्न:2.तकनीक का इस्तेमाल न करने से क्या हम पिछड़ नहीं जाएंगे? (Won’t we be held back by not using technology?):
उत्तर:आवश्यक होने पर तकनीक व प्रौद्योगिकी का सदुपयोग करें।केवल मौज-मजे या मनोरंजन के लिए इसका उपयोग न करें।
प्रश्न:3.तकनीक के बिना ज्ञान कैसे प्राप्त करें? (How do you get knowledge without technology?):
उत्तर:प्रौद्योगिकी या तकनीकी ज्ञान पुस्तकों से,टीचर्स से डिस्कस करके,मित्रों से डिस्कस करके भी प्राप्त कर सकते हैं और लिमिटेड गैजेट्स का उपयोग कर ही सकते हैं,करना चाहिए भी।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी टाॅक्सिक (Technology Toxics for M-Generation),एम-जनरेशन के लिए प्रौद्योगिकी और संचार टाॅक्सिक कैसे है? (How is Technology and Communication Toxics for M-Generation?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
No. | Social Media | Url |
---|---|---|
1. | click here | |
2. | you tube | click here |
3. | click here | |
4. | click here | |
5. | Facebook Page | click here |
6. | click here | |
7. | click here |
Related Posts
About Author
Satyam
About my self I am owner of Mathematics Satyam website.I am satya narain kumawat from manoharpur district-jaipur (Rajasthan) India pin code-303104.My qualification -B.SC. B.ed. I have read about m.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 15 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science.