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Demerit and solutions of current Indian curriculum

Demerit and solutions of current Indian curriculum

1.वर्तमान भारतीय पाठ्यक्रम के दोष एवं समाधान का परिचय (Introduction to Demerit and solutions of current Indian curriculum)-

वर्तमान  समय में पाठ्यक्रम से तात्पर्य केवल उन पाठ्य विषयों से नहीं है जिनकी शिक्षा विद्यालय में दी जाती है अब इसका उपयोग कुछ विस्तृत रूप में किया जाता है। विद्यालय में बालक को दिए जाने वाले समस्त अनुभवों को अब पाठ्यक्रम का अंग माना जाता है ।यह कोई आवश्यक नहीं है कि ये अनुभव बालक को कक्षा में ही दिए जाएं। कक्षा में ,खेल के मैदान में ,समाज सेवा कार्य में, वन भ्रमण में ,वाद विवाद में ,शिक्षा यात्राओं के रूप में या कहीं और जो बालक अनुभव प्राप्त करता है वे सब उसके पाठ्यक्रम के अंग ही होते हैं ।
विस्तृत अर्थ में पाठ्यक्रम का महत्व अधिक है बालक की शिक्षा का मुख्य साधन पाठ्यक्रम ही है ।बिना पाठ्यक्रम की सहायता के अध्यापक अध्यापन कार्य नहीं कर सकता और न शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का विकास में कोई सहयोग दे सकता है ।शैक्षणिक प्रक्रिया में हम पाठ्यक्रम को निम्न दृष्टि से नहीं देख सकते हैं। यह आवश्यक है कि इसका चुनाव अच्छे शैक्षिक सिद्धांतों पर हो। बालक के लिए उसके प्रत्येक विकास स्तर पर क्या पाठ्यक्रम होना चाहिए, इस संबंध में अध्यापक कों अच्छा ज्ञान एवं अनुभव होना चाहिए। पाठ्यक्रम द्वारा बालक तथा समाज दोनों की प्रगति का ध्यान होना चाहिए ।

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2.भारतीय पाठ्यक्रम के दोष(Demerit of Indian Curriculum)- 

Demerit and solutions of current Indian curriculum
Demerit and solutions of current Indian curriculum
आजकल हमारे विद्यालयों में जो पाठ्यक्रम प्रचलित है ,वह बहुत दूषित है ।उनका निर्माण करने में अध्यापक का कोई हाथ नहीं है ।वह ऊपर से थोपा हुआ है ,इसमें विषयों की प्रधानता मिली हुई है। विद्यार्थियों की रुचि ,योग्यताओं तथा आवश्यकताओं का इसमें कोई ध्यान नहीं रखा जाता ।यह बालक के चारों ओर के वातावरण को कोई महत्व नहीं देता है।

वर्तमान भारतीय पाठ्यक्रम ज्ञान प्रधान है वह स्मृति पर अधिक बल देता है। उसमें क्रिया का कोई महत्व नहीं है। काम करके सीखो- इस सिद्धांत को कोई स्थान नहीं है। यह बालकों को व्यावहारिकता से अवगत कराने में पूर्ण रूप से असफल है। बालक विषय-सम्बन्धी ज्ञान ग्रहण कर ले- यही इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य होता है ।
वर्तमान पाठ्यक्रम बालकों में अच्छी आदतों के निर्माण कराने में,उनकी रुचियों के विकास में , उनमें नेतृत्व की भावना को प्रोत्साहित करने में तथा अनेक ऐसे गुण जैसे- परिश्रमशीलता,सहयोग,आत्मविश्वास एवं शिष्टता इत्यादि जिनका एक व्यक्ति के जीवन में बहुत मूल्य है ,के विकास में कोई सहयोग नहीं देता ।
एक और दोष जो पाठ्यक्रम में है ,वह है -उसकी विविधता की कमी ।विद्यालय चाहे ग्राम में स्थित हो, चाहे नगर में, पाठ्यक्रम में कोई अंतर नहीं होगा। वही पाठ्यक्रम हर प्रकार के वातावरण तथा स्थिति में प्रत्येक विद्यालय में अध्यापक को पढ़ाना होता है ।इसका फल यह होता है कि बालक अपने जीवन में आने वाली समस्याओं से दूर चले जाते हैं ।उन्हें अपने निकट के वातावरण का कोई ज्ञान नहीं होता ।उन्हें इसलिए बाध्य किया जाता है कि वे दूर वातावरण संबंधी ज्ञान को अर्जित करें ।
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 विभिन्न विषयों में सह-सम्बन्ध रखकर ही सम्यक् रूप से ज्ञान प्रदान किया जा सकता है ।हमारे पाठ्यक्रम में इसका भी अभाव है। एक गणित का अध्यापक गणित के पीरियड में केवल वही पढ़ाएगा जो गणित के कहलाया जा सके ।वह कभी भी यह चेष्टा नहीं करेगा कि गणित का देश की भौगोलिक स्थिति में या आर्थिक दशा से या मनोविज्ञान से सह-संबंध स्थापित करके शिक्षा दे ।ऐसा वह इसी कारण नहीं कर पाता कि उसे एक निर्धारित समय में निर्धारित पाठ्यक्रम को पढ़ाना है ।यदि वह सह-संबंध स्थापित करने में लग जाए तो गणित में जो पाठ्यक्रम निर्धारित किया है, उसे वह दिए हुए समय में नहीं समाप्त कर सकता ।
प्रचलित पाठ्यक्रमों का सबसे बड़ा दोष यह है कि इन पर परीक्षाओं का एकमात्र आधिपत्य है ।पाठ्यक्रम की सफलता परीक्षा पास करने की क्षमता के रूप में आंकी जाती है क्या पढ़ाया जाए ,इस प्रश्न का उत्तर परीक्षा ही प्रदान करती है।वे विषय पाठ्यक्रम में रखे जाते हैं जिनकी परीक्षा सरलता से हो सके।वे प्रकरण ध्यान देकर पढ़ाए जाते हैं जो परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो। बालक को रटने को प्रोत्साहित किया जाता है।उसकी स्मृति पर चिंतन,तर्क तथा कल्पना शक्ति के विकास की तुलनात्मकता से अधिक बल दिया जाता है।
हमारी शिक्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम निर्धारण को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता है। पाठ्यक्रम का निर्धारण विभिन्न विद्यालयों के लिए या तो राज्य सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा या परीक्षा लेने वाले बोर्ड या विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित होता है ।उन कक्षाओं के लिए जिनकी परीक्षा बोर्ड या विश्वविद्यालय द्वारा नहीं ली जाती ,राज्य सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा ली जाती है, पाठ्यक्रम इन्हीं संस्थाओं द्वारा निर्धारित होता है। अतएव अधिकतर हमारे विद्यालयों में पाठ्यक्रम निर्माण करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह बना बनाया उनको मिल जाता है। किंतु इस प्रकार पाठ्यक्रम निर्धारण में अनेक दोष हैं ।वास्तव में हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली का एक मुख्य दोष ही यह है कि हमारे विद्यालयों में पाठ्यक्रम घिसा पिटा ,स्थाई एवं ऊपर से लादा हुआ है ।यह परीक्षा का गुलाम है ।प्रत्येक विद्यालय चाहे वह किसी भी वातावरण में स्थित हो, कैसी ही विद्यार्थियों की सामाजिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि हो, कोई भी विद्यार्थियों में व्यक्तिगत भिन्नता हो -एक ही ढंग का पाठ्यक्रम पढ़ना पड़ता है। वर्तमान समय में पाठ्यक्रम की इस धारणा की बहुत आलोचना की जाती है ।पाश्चात्य देशों में इस प्रकार से पाठ्यक्रम निर्धारण करने की विधियों को ठुकरा दिया गया है। वहां पाठ्यक्रम विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार उनके तत्कालीन वातावरण को ध्यान में रखकर निर्माण किया जाता है। पाठ्यक्रम निर्माण में विद्यालय के अध्यापकों को मुख्य स्थान दिया जाता है। यह विद्यार्थियों पर ऊपर से थोपा नहीं जाता है। अतएव हमारे देश में भी इस बात की आवश्यकता है कि पाठ्यक्रम में विकास उचित ढंग से इस प्रकार किया जाए कि शिक्षा के वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति उसके द्वारा हो सके और उसके निर्धारण में विद्यार्थी ,वातावरण तथा अध्यापकों को मुख्य स्थान मिले ।इसके लिए हमें कुछ मुख्य बातों का ध्यान रखना होगा ।
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3.समाधान(Solution) –

(1.)पाठ्यक्रम निर्माण प्रत्येक स्तर पर बालक की आवश्यकताओं , रुचियों तथा अनुभवों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
(2.)पाठ्यक्रम लचीला होना चाहिए । प्रत्येक बालक चाहे उसकी कैसी भी योग्यताएं तथा संभावनाएं हो- एक ही प्रकार के पाठ्यक्रम के अध्ययन को बाध्य नहीं करना चाहिए ।इसके अतिरिक्त विद्यालय जिस प्रकार के समाज तथा वातावरण में स्थित हो ,तदनुसार पाठ्यक्रम में हेरफेर होना चाहिए ।
(3.)पाठ्यक्रम जीवन के उद्देश्यों से प्रेरित होना चाहिए- इसको जीवन तथा शिक्षा के उद्देश्यों को ग्रहण करना चाहिए।सुखी मूल्यांकन तथा उच्च जीवन व्यतीत करने के लिए प्रयत्न करना,हमारे जीवन तथा शिक्षा दोनों का उद्देश्य है ।जब वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है तो नई आवश्यकताओं को प्रेरणा देनी चाहिए और जब वे संतुष्ट हो जाएं तो अन्य नवीन आवश्यकताओं को जन्म देना चाहिए। जीवन में प्रगति इसी प्रकार संभव है ।शिक्षा की प्रगति भी इसी सिद्धांत पर निर्भर है ।अतएव बोन्सर महोदय के अनुसार “बालकों में बहुमुखी विषयों के विकास के लिए, पाठ्यक्रम के हर प्रकार की मूल्यवान क्रियाओं में बालकों को भाग लेने को प्रोत्साहित करना चाहिए। इस प्रकार बालक विज्ञान, कला, साहित्य और दूसरे प्रकार की रुचियां- जो पूर्व पर आधारित है या भविष्य के लिए उपयोगी हो रही हैैं- के मूल्यों के अनुभव में वृद्धि कर सके।”
(4.) पाठ्यक्रम निर्धारण में समन्वय के सिद्धांत पर बल देना चाहिए ।विषयों का शिक्षण विभिन्न बंद कोठियों में न होकर, एक दूसरे के साथ समन्वय स्थापित करके होना चाहिए।
(5.) पाठ्यक्रम क्रिया पर आधारित होना चाहिए काम करके सीखो ‘सिद्धांत को इसमें महत्ता मिलनी चाहिए।’ केवल स्मृति पर ही बल देना अच्छा नहीं है । व्यावहारिकता तथा प्रयोग को पाठ्य विषयों के अध्ययन में महत्ता मिलनी चाहिए।
(6.) पाठयक्रम विविध स्तरों की समाप्ति पर अपने आप में पूर्ण होना चाहिए। प्राथमिक या माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रम का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि वह बालकों को आगे की शिक्षा के लिए तैयार करने हेतु है वरन् उसका उद्देश्य बालक को उसी स्तर के लिए तैयार करना चाहिए।
 शिक्षण विधि एवं शिक्षण पद्धति के निर्धारण में आवश्यक है कि शैक्षिक प्रक्रिया के विभिन्न अंगों को उचित रूप दिया जाए । यहां हमने शैक्षिक प्रक्रिया के अंग पाठ्यक्रम पर प्रकाश डालकर यह प्रयास किया है कि इस अंग की उचित रूप में व्याख्या की जा सके ताकि एक शिक्षक को शैक्षिक प्रक्रिया के प्रति नवीन दृष्टिकोण का ज्ञान हो जाए ।यह ज्ञान ही उसको उन शिक्षण विधियों को चुनने में सहायता प्रदान करेगा जो बालकों के लिए सबसे अच्छी है।

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