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Monday, 16 December 2019

what is professionalisation of education in hindi||what is occupational education

December 16, 2019
what is professionalisation of education in hindi||what is occupational education


via https://youtu.be/74MBQSf7tag

India's space missions cannot be imagined without math

December 16, 2019

India's space missions cannot be imagined without mathematics

1.गणित के बिना भारत के अंतरिक्ष अभियानों की नहीं की जा सकती कल्पना(India's space missions cannot be imagined without mathematics)-

India's space missions cannot be imagined without math
India's space missions cannot be imagined without math
इस आर्टिकल में बताया गया है कि भारत के अन्तरिक्ष अभियानों में गणित की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। शोध सम्मेलन में भाग लेने वाले विद्वानों ने स्वीकार किया कि जीवन की प्रत्येक गतिविधि का गणित अभिन्न भाग है। जल, थल, नभ और अन्तरिक्ष में गणित व्याप्त है। विद्वानों यह भी स्वीकार किया कि भारत के अन्तरिक्ष अभियानों की गणित के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इस सम्मेलन से यह बात तो स्पष्ट हो ही गई है कि वैज्ञानिक शोधों तथा तकनीकी ज्ञान में आगे बढ़ने के लिए गणित की कितनी अधिक भूमिका है और महत्त्व है।
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कई बार शोधों, अनुसंधानों, विद्वानों व वैज्ञानिकों द्वारा स्पष्ट हो चुका है कि गणित का हमारे जीवन के लिए कितना योगदान है। कई माता-पिता, अभिभावक और विद्यार्थी इस बात की अनदेखी करते हैं और सोचते हैं कि गणित के ज्ञान के बिना बहुत से लोग अपना जीवनव्यापन कर रहे हैं और मजे से रह भी रहे हैं। प्रत्युत्तर में निवेदन है कि जीवन को काटने और सुचारु रूप से चलाने में अन्तर होता है। यदि संसार में आगे बढ़नेवालों, अंग्रिमपंक्ति के लोगों से कदमताल मिलाकर चलना है तो गणित के ज्ञान की आवश्यकता है, तकनीकी ज्ञान और विज्ञान के ज्ञान की भी आवश्यकता है। आज के आधुनिक युग में पुरानी परम्पराएं, सिद्धान्त, मान्यताओं ध्वस्त हो गई हैं और उनकी जगह नवीन मान्यताओं, सिद्धान्तों तथा नियमों ने ले ली है। यदि हम उसी पुरानी मान्यताओं व परम्पराओं से बँधें रहेंगे तथा अपने आप में बदलाव नहीं करेंगे तो हम पिछड़ जाएंगें। यदि आप अपना विकास करना चाहते हैं तो नवीन ज्ञान ग्रहण करना होगा। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और सही मायने में वास्तविक शिक्षा वही है जो प्रगतिशील और समय के अनुसार परिवर्तनशील हो। करोड़ों लोग जैसे जन्म लेते हैं और इस संसार के विकास में अपना कोई योगदान नहीं देते हैं तथा इस संसार में जैसे आए थे वैसे ही आकर चले जाते हैं। इसलिए मरने के बाद न तो कोई उनको याद करता है और न ही याद करने लायक कोई ऐसा कार्य करते हैं। इसलिए इस बात का महत्त्व समझते हुए बालक-बालिकाओं को गणित शिक्षा अर्जित करने में हमें योगदान देना चाहिए। नकारात्मकता से न तो हमारा भला होगा और न ही विद्यार्थियों का। सकारात्मकता से बालक-बालिकाओं का भविष्य तो उज्ज्वल होगा ही। बल्कि यदि बालक-बालिकाएं कोई ऐसा विशिष्ट कार्य करते हैं तो माता-पिता, शिक्षकों, समाज व देश का गौरव बढ़ता है। संसार के अन्य लोग उनके बहुमूल्य योगदान से लाभ उठाते हैं और ऐसी विभूतियों को हमेशा के लिए स्मरण रखते हैं और उनके प्रति कृतज्ञ रहते हैं। बहुत से लोग उनसे प्रेरणा लेते हैं। मानव अपने कर्म से ही अमर रहता है, कर्मों के द्वारा हम मरने के बाद भी जीवित रहेंगे। अल्बर्ट आइंस्टीन, प्लेटो, जेम्स वाट जैसे बहुत से वैज्ञानिक और गणितज्ञ हुए हैं जिनका ऋण मनुष्य जाति कभी भुला नहीं सकती है और न ही उनको विस्मृत किया जा सकता है। इसीलिए बालक-बालिकाओं को गणित में प्रखर,तेजस्वी बनाने के लिए हर संभव उचित कदम उठाएं जाने चाहिए।

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2.गणित के बिना भारत के अंतरिक्ष अभियानों की नहीं की जा सकती कल्पना(India's space missions cannot be imagined without mathematics)-

शिमला  Updated Sat, 30 Nov 2019
हमीरपुर। नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्मारक राजकीय महाविद्यालय हमीरपुर में गणित विभाग के सौजन्य से अंतरराष्ट्रीय शोध सम्मेलन का शुभारंभ शुक्रवार को किया गया। उद्घाटन सत्र में यूएई से आए वक्ता प्रो. जीपी राव ने अंतरिक्ष और अन्य अनुप्रयोगों के लिए नियंत्रण की गणतीय अवधारणाओं पर अपना व्याख्यान दिया। जीवन की प्रत्येक गतिविधि का गणित अभिन्न भाग है। जल, थल, नभ और अंतरिक्ष सभी में गणित व्याप्त है। गणित न केवल विज्ञान बल्कि अन्य सभी विषयों में समाहित है। इससे पूर्व प्राचार्य डा. अंजू बत्ता सहगल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन गणित की व्यापक संभावनाओं को व्यक्त करने में कारगर भूमिका निभाएगा। जीवन के सुचारु संचालन में गणित की महत्वपूर्ण भूमिका है।
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गणित के बिना भारत के अंतरिक्ष अभियानों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। डॉ. सहगल ने महाविद्यालय की ओर से बीज वक्ता प्रो. जीपी राव और अन्य विद्वानों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। कांफ्रेंस चेयर डॉ. जीसी राणा ने कहा कि हमीरपुर महाविद्यालय के अस्तित्व में आने के 54 वर्षों में पहली दफा अंतरराष्ट्रीय शोध सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। यह सम्मेलन गणित की विभिन्न संभावनाओं को तलाशने का एक कारगर माध्यम बनेगा। शोध सम्मेलन के समन्वयक डा. संजय कान्गो ने बताया कि यह कार्यक्रम मुंबई के नेशनल बोर्ड फार हायर मैथमेटिक्स और डीआरडीओ दिल्ली की ओर से वित्त पोषित है। इस सम्मेलन में 28 विश्वविद्यालयों, 8 इंजीनियरिंग संस्थानों, 4 मेडिकल कॉलेजों, भोपाल के इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एजूकेशन व रिसर्च और 40 महाविद्यालयों के 180 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।
विशेष आमंत्रित वक्ताओं डीआरडीओ के वैज्ञानिक डॉ. एसके पाल, जेएनयू दिल्ली से गजेंद्र प्रताप सिंह, कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय से प्रो. रजनीश कुमार, प्रो. अनिल वशिष्ठ और कॅरियर प्वाइंट विश्वविद्यालय से प्रो. केएल वर्मा ने भी व्याख्यान दिए। इस
ये भी रहे उपस्थित
टांडा मेडिकल कॉलेज से डॉ. तरुण शर्मा, हिप्र विश्वविद्यालय से प्रो. आरपी शर्मा, प्रो. वीना शर्मा, कटड़ा के माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय से राकेश कुमार, भोरंज कॉलेज के प्राचार्य डा. हरदेव सिंह जंवाल, सरकाघाट के प्राचार्य प्रो. आरसी शर्मा, धर्मशाला के प्राचार्य डॉ. ज्योति कुमार, ज्वालाजी के प्राचार्य डा. अजायब सिंह बन्याल, को-चेयर प्रो. कल्पना चड्ढा, पूर्व प्राचार्य प्रो. पीसी पटियाल, प्रो. जोगिंद्र सिंह चौहान, ओएसए के सलाहकार कर्नल एडी शर्मा, पीटीए सलाहकार होशियार सिंह, पीटीए प्रधान राज गोपाल शर्मा, उपाध्यक्ष मनोज कुमार, प्रो. वाईडी शर्मा, प्रो. आरके वत्स, डॉ. पवन शर्मा, डॉ. संजय, डॉ. बलराज, सम्मेलन के सलाहकार उप प्राचार्य प्रो. रीटा शर्मा, संयोजक प्रो. जगजीत पटियाल सहित महाविद्यालय के स्टाफ सदस्य मौजूद रहे।


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Sunday, 15 December 2019

How is teaching mathematics an art?

December 15, 2019

How is teaching mathematics an art?

1.गणित शिक्षण एक कला है का परिचय(Introduction to How is teaching mathematics an art)-

How is teaching mathematics an art
How is teaching mathematics an art
भारतवर्ष 20वीं शताब्दी में गरीबी, गुलामी, राजनीतिक एवं मानसिक, अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता एवं रूढ़िवादिता से जूझता रहा है। आज भी ये राक्षसी प्रवृत्तियाँ मुँह खोले खड़ी हैं। किन्तु इसमें सन्देह नहीं है कि 21वीं शताब्दी भारत के लिए एक ऐसे युग का सन्देश लाएगी जिसमें इन सब राक्षसी प्रवृत्तियों का संहार होगा और सम्पन्नता, सद्भाव,प्रगति, स्वतंत्रता विशेष रूप से मानसिक, वैज्ञानिकता, समानता, न्याय एवं बन्धुत्व का साम्राज्य स्थापित होगा। यह केवल झूठी अभिलाषा नहीं है, न ही केवल आदर्श स्वप्न है। यह तो वास्तविकता का पूर्व अनुमान है और इस पूर्व अनुमान को ठोस रूप देना हमारा सबका कर्त्तव्य है।हम कैसे इस कर्त्तव्य को सम्पन्न कर सकेंगे?इस प्रश्न का उत्तर है हमारी शिक्षा एवं गणित शिक्षण में। यह कारण ही है कि हमारे विचारक आज भविष्य की चुनौती को शिक्षा के सन्दर्भ में स्वीकार करने को लालायित हैं।
इस देश के निवासी जानते हैं कि 21वीं शताब्दी उनकी है और उसके लिए उन्हें अपनी आनेवाली पीढ़ी को तैयार करना है। इसके लिए शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा और उसमें मुख्य स्थान गणित शिक्षण का होगा।
गणित शिक्षण क्या है? यह एक कला है किन्तु यह एक विज्ञान भी है। यह कला इस रूप में है कि प्रत्येक गणित शिक्षक एक सृजनात्मक व्यक्ति होता है जो अपनी गणित शिक्षण विधि का स्वयं सृजन करता है और विज्ञान इसलिए कि आज इस सम्बन्ध में अनेक अनुसंधान हो रहे हैं जो हमें गणित शिक्षण सम्बन्धी विभिन्न पक्षों के सम्बन्ध में वस्तुनिष्ठ ज्ञान दे रहे हैं।
अनुसंधानों में वृद्धि, उनमें ओर अधिक निर्मलता, शुद्धता एवं सूक्ष्मता, गणित शिक्षण को विज्ञान का रूप देने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निबा रहे हैं।

2.गणित शिक्षण एक जटिल कार्य है(Teaching mathematics is a complex task)-

एक समय था जब विचार किया जाता था कि गणित शिक्षक बनना सबसे सरल कार्य है। माता-पिता बालक को जन्म देने के पश्चात् ही शिक्षण देने लगते हैं। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति जिसके सन्तान होती है, गणित शिक्षक होता है और उसे गणित शिक्षण देना स्वयं ही आ जाता है। आज इस धारणा में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो गए हैं। अब यह विचार किया जाने लगा है कि गणित शिक्षण देने के लिए विशेष तैयारी की आवश्यकता है। माता-पिता अपने बालक के विकास में कोई महत्त्वपूर्ण सहायता उस समय तक नहीं प्रदान कर सकते हैं जब तक कि उनका अपना गणित शिक्षण ठीक ढंग से नहीं हुआ हो। उन्हें यह पता न हो कि अपने बालकों को क्या सीखाना है एवं कैसे सिखाना है।
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वर्तमान में ज्ञान का विस्तार अत्यन्त तेजी से हुआ है। यह ज्ञान इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि प्रत्येक दशक में दुगुना, तिगुना होता जा रहा है। इस प्रकार आज ज्ञान की मात्रा इतनी अधिक है जितनी कि शायद हमारे पूर्वजों ने सोची भी नहीं होगी। इस विस्तृत ज्ञान को नई पीढ़ी को प्रदान करने के लिए प्रत्येक राष्ट्र विद्यालय खोलता है। इन विद्यालयों में न केवल यह चेष्टा की जाती है कि मानव द्वारा अर्जित ज्ञान से नई पीढ़ी को परिचित कराया जाए वरन् यह भी कि नई पीढ़ी को और ज्ञान अर्जन करने के लिए तैयार भी किया जाए और ज्ञान का सदुपयोग करना भी सिखाया जाए। यह सब विद्यालय के कार्य अध्यापकों द्वारा सम्पन्न होते हैं। अध्यापक अपने गणित शिक्षण द्वारा विद्यार्थियों को ज्ञान अर्जन, ज्ञान उत्पादन तथा ज्ञान का उपयोग सिखाते हैं। क्योंकि ये तीनों बातें सिखाना अत्यन्त कठिन है। हम गणित शिक्षण को एक जटिल कार्य ही कहते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि गणित शिक्षक का प्रोफेशन कार्य अन्य सब प्रोफेशन कार्यों से अधिक कठिन और अधिक मेहनत वाला है।
एक गणित शिक्षक जो किसी विद्यालय में गणित शिक्षण प्रदान करता है, उसका कार्य अधिक जटिल इस कारण भी है कि उसे निर्धारित पाठ्यक्रम एक ही समय में अनेक विद्यार्थियों को पढ़ाना होता है। ज्ञान इत्यादि प्रदान करने के लिए उनके पास, सीमित समय होता है, अनेक विद्यार्थी सीखना नहीं चाहते और गणित शिक्षक के कार्य का मूल्यांकन प्रशासनिक अधिकारी तथा अभिभावक करते रहते हैं। गणित शिक्षक अपना कार्य उत्तम ढंग से पूरा कर सके इसके लिए गणित शिक्षण में पारंगत होना आवश्यक है।

3.गणित शिक्षण एक कला है(Teaching mathematics is an art)-

गणित शिक्षण एक कला है। अन्य कलाओं की भाँति इस कला में पारंगत होने के लिए भी विशेष प्रकार के प्रयत्न करने की आवश्यकता है। एक गणित शिक्षक को जो इस कला को सीखना चाहता है, सावधानी तथा धीरज से काम लेना होगा। वह कक्षा में जाकर चाहे जैसे ढंग से बालकों को पढ़ाना आरम्भ नहीं कर सकता है। बालकों को पढ़ाने से पहले उन्हें उत्तम शिक्षा किस प्रकार प्रदान की जा सकती है, यह जानना नितान्त आवश्यक है। यह तो ठीक है कि गणित शिक्षक बहुत कुछ अभ्यास द्वारा सीखता है परन्तु गणित शिक्षण में वह उसी समय सफल हो सकता है, जब वह अभ्यास से पहले गणित शिक्षण-सिद्धान्तों को समझ ले। गणित शिक्षण-सिद्धान्तों का प्रयोग जब वह अभ्यास में कर सकता है उसी समय यह शिक्षा प्रदान करने के योग्य माना जा सकता है। कुछ समय पहले तक गणित अध्यापन से यह तात्पर्य यह माना जाता था कि थोड़ा-सा ज्ञान बालक को लिखने, पढ़ने एवं गणित में दे दिया जाए। यह ज्ञान भी अध्यापक बालकों की स्मृति पर बल देकर प्रदान करते थे। जो शिक्षण-विधि वे अपनाते थे, वह रटने की विधि थी। वे बालकों पर कड़ा अनुशासन रखकर डंडे के बल पर शिक्षा देना ही उत्तम समझते थे। उनका विश्वास था कि डंडे का उपयोग यदि न किया जाएगा तो बालक निश्चय ही बिगड़ जाएगा। एडम्स महोदय गणित शिक्षण के सम्बन्ध में एक वाक्य "अध्यापक ने जाॅन को गणित पढ़ाई।" का वर्णन करते हैं। इस वाक्यानुसार पुराने अध्यापक गणित पर अधिक बल देते थे जबकि नवीन शिक्षण गणित शिक्षण में जाॅन पर अधिक बल दिया जाता है। पुराने गणित अध्यापक हर बालक को एक ही लकड़ी से हाँकते थे, उन्हें केवल इस बात की चिन्ता थी कि बालक किसी तरह गणित के निश्चित पाठ्यक्रम को रट ले, इस बात पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती थी कि भिन्न-भिन्न बालकों की योग्यताओं में भी विभिन्नता हो सकती है, उनकी रुचियों और सामर्थ्यों में भी अन्तर हो सकता है।
रूसो, पेस्टालाॅजी, फ्राॅबेल, हर्बर्ट स्पेन्सर, डीवी आदि के विचारों ने इस पुरातन शिक्षण-सिद्धान्तों एवं विधियों में क्रांति ला दी। शिक्षा विषय-केन्द्रित से हटकर बाल-केन्द्रित होने लगी। एडम्स के उपर्युक्त वाक्य में जाॅन का स्थान अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाने लगा। विभिन्न बालकों की योग्यता के अनुसार शिक्षा प्रदान करना ही उत्तम समझा जाने लगा।
उक्त शिक्षा शास्त्रियों ने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा एक आनन्दपूर्ण प्रक्रिया है। बालक नई वस्तुओं को सीखने में आनन्दानुभव करता है। शिक्षा प्राप्त करने में आनन्द की इस वृद्धि का होना परम आवश्यक है। शिक्षा की प्रक्रिया में बालक एक सक्रिय कार्यकर्ता है। वह बहुत सी बातें स्वयं सीख सकता है। गणित अध्यापक तो एक सहायक और प्रदर्शक के रूप में होता है, वह नियम बनानेवाली मशीन नहीं होता है। विद्यालय और गणित अध्यापक का कार्य ऐसे अनुकूल वातावरण को उपस्थित करना है जहाँ बालक के व्यक्तित्व का विकास स्वतंत्र और पूर्ण रूप से हो सके।
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हमारे विचार से गणित अध्यापक जो कुछ भी कक्षा-शिक्षण में व्यक्तिगत शिक्षण में बालक के सर्वतोमुखी विकास के लिए करता है वह सब शिक्षण कला के ही अन्तर्गत आता है।गणित शिक्षण प्रदान करने में गणित अध्यापक गणित शिक्षण के अनेक सिद्धान्तों को ध्यान में रखना पड़ता है, अनेक समस्याओं का हल ढूँढ़ना पड़ता है तथा अनेक प्रकार के बालकों से सम्पर्क स्थापित करना पड़ता है। कितनी सुन्दरता से वह यह कार्य कर सकता है, यह उसके गणित शिक्षण-कला सम्बन्धी ज्ञान पर निर्भर करता है। यहाँ कला शब्द के प्रयोग में एक ओर अर्थ शामिल है। वही कलाकार उत्तम समझा जाता है जो कला सम्बन्धी प्राचीन एवं नवीन विचारधाराओं तथा शैलियों से पूर्णतया अवगत हो परन्तु अपनी कलाकृतियों को अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर प्रस्तुत करे। इसी प्रकार वह शिक्षक उत्तम समझा जाता है जो गणित शिक्षण-कला सम्बन्धी पुरातन और नवीन-सभी सिद्धान्तों एवं विधियों में पारंगत हो परन्तु कला के व्यवहारिक रूप में अपना व्यक्तिगत योगदान दे। वह नए सिद्धान्तों और नवीन प्रणालियों का आदर तो करता हो परन्तु उसका दास न हो। वह समय, स्थान और अपने अनुभवों के आधार पर गणित शिक्षण प्रदान करने में हेर-फेर करने की सामर्थ्य रखता हो। वह अपने व्यक्तित्व की शक्ति के आधार पर उस शिक्षण-विधि को अपनाने में सफल हो जो बालक के व्यक्तिगत विकास तथा सामाजिक समायोजन में लाभदायक सिद्ध होती है। वह विद्यार्थियों को इस प्रकार से शिक्षा दे सके कि वे भविष्य में आनेवाली चुनौतियों का सामना करने को तैयार रहें।
वर्तमान विचारधारा के अनुसार गणित शिक्षक एक प्रेरक है जो विद्यार्थी के सीखने में प्रोत्साहित करता है। यह न तो बुद्धि को प्रशिक्षित करनेवाला है, न मन को अनुशासित करनेवाला। प्रत्येक व्यक्ति अनुभव द्वारा सीखता है। शिक्षक अनुभवों को प्रदान करने और उनके व्यावहारिक प्रवृत्तियों में परिवर्तन लाने में अपना सहयोग देता है।

4.शैक्षिक तकनीकी(Educational technology)-

How is teaching mathematics an art
How is teaching mathematics an art
वर्तमान काल में ज्ञान का बहुत प्रयोग हुआ है। गणित शिक्षण में भी इस ज्ञान में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। अब शैक्षिक तकनीकी एक नवीन ज्ञान के रूप में उभर कर आयी है। शिक्षा प्रदान करने में इसने नए आयाम जोड़ दिए हैं। शैक्षिक तकनीकी से हमारा तात्पर्य शिक्षण प्रदान करने में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना और गणित शिक्षण में विज्ञान द्वारा आविष्कारित उपकरणों का प्रयोग है। गणित शिक्षण में जिन उपकरणों का हम प्रयोग कर रहे हैं उनमें कुछ हैं - टेलीविजन, वीडियो, प्रोजेक्टर इत्यादि। यह सब वैज्ञानिक तकनीकी की ही देन है। 
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Saturday, 14 December 2019

Tension during the exam,then remove the mind stress

December 14, 2019

Tension during the exam, then remove the mind stress 

1.एग्‍जाम के दौरान हो बहुत ज्‍यादा टेंशन, तो ऐसे दूर करें दिमाग का एस्‍ट्रेस(If there is a lot of tension during the exam, then remove the mind Stress) 

Tension during the exam,then remove the mind stress
Tension during the exam,then remove the mind stress 
परीक्षा के दौरान बहुत से विद्यार्थी तनावग्रस्त हो जाते हैं। बोर्ड परीक्षा तथा ग्रेजुएशन व पोस्ट ग्रेजुएशन की परीक्षाएं का सबसे मुश्किल भरा समय होता है। विद्यार्थियों के साथ-साथ उनके माता-पिता भी चिंतित हो जाते हैं जबकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि परीक्षा से गुजरना हर किसी विद्यार्थी के लिए आवश्यक होता है। इन परीक्षाओं में हम कुछ ऐसे टिप्स बता रहे हैं जिनके पालन करने पर आप तनाव से बच सकते हैं। परीक्षा में सबसे अधिक तनाव गणित और विज्ञान जैसे विषयों को लेकर होता है। सबसे मुख्य बात तो यह है कि तनावग्रस्त होने से न तो परीक्षा देने से बच सकते हैं, न परीक्षा की समस्याओं या कठिन विषयों का हल निकल सकता है बल्कि तनाव से जो कुछ याद होता है उसे भी भूल जाते हैं या जो कुछ भी हल निकाल सकते थे वो भी नहीं निकाल पाते हैं।

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2.पूर्ण सत्र में विषयों की तैयारी करें(2. Prepare topics in the full session) - 

अक्सर अधिकतर विद्यार्थी परीक्षा के समय ही पुस्तकें उठाकर देखते हैं या पढ़ते हैं। परीक्षा के समय दिनरात उनके पास पुस्तकें रहती हैं। इधर-उधर टहलते हुए, खाते-पीते, सोते समय तथा किसी से बातचीत करते समय उनके पास पुस्तके रहती है। ऐसा उन विद्यार्थियों के साथ ही होता है जो पूरे वर्षभर गम्भीरता से गणित, विज्ञान इत्यादि विषयों को नहीं पढ़ते हैं। हम बार-बार गणित, विज्ञान विषयों का ही उल्लेख इसलिए करते हैं क्योंकि ज्यादातर इन विषयों को ही कठिन समझा या माना जाता है। हालांकि हमारा मानना है कि यदि आप सरल विषय को भी नहीं पढ़ेगें तो वो सरल विषय भी आपके लिए कठिन हो जाएगा। गणित, विज्ञान जैसे विषयों को नहीं पढ़ेगें तो ये विषय आपके लिए ओर ज्यादा कठिन हो जाएंगें।
इस आर्टिकल को इस समय लिखने का भी मकसद यही है कि अभी भी लगभग तीन महीने परीक्षा के बचे हैं। परीक्षा से इतने समय पहले आपको सावधान व सतर्क करना हमारा कर्त्तव्य है जिसे हम बखूबी निभा रहे हैं। यदि अब भी कोई विद्यार्थी लापरवाही कर रहा हो और यह सोच रहा हो कि परीक्षा के समय तैयारी कर लेंगे तो न तो वे ऐसा कर पाएंगे तथा निश्चित रूप से वे तनावग्रस्त हो जाएंगे यहाँ हम अतिप्रतिभाशाली विद्यार्थियों की बात नहीं कर रहे हैं। इसलिए पूरे सत्र में प्रारम्भ से ही तैयारी चालू कर देनी चाहिए यदि अभी तक भी तैयारी प्रारम्भ नहीं की हो तो तुरन्त चालू कर देनी चाहिए। अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में परीक्षा के दिनों में या परीक्षा के कुछ दिन पूर्व आर्टिकल लिखने की परम्परा है परन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है उस समय हम हमारी आदतों में ज्यादा कुछ बदलाव नहीं कर सकते हैं। एक्जामिनेशन के समय में हमें किस तरह से तैयारी करनी चाहिए तथा एक्जामिनेशन सेसे पूर्व किस प्रकार से तैयारी करनी चाहिए उसके लिए हम आर्टिकल लिख चुके हैं। आपको उन आर्टिकल को भी पढ़ना चाहिए।
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3.अपनी हाॅबी को भी टाइम दें(Give your hobby time too)-

विद्यार्थियों की कुछ न कुछ हाॅबी होती है जैसे फिटनेस, खेल, मिमिक्री, पेटिंग,लेख लिखने, कविता,नाटक, नृत्य, संगीत, गाने, भजन इत्यादि में किसी न किसी कार्य में हाॅबी होती है। इसलिए पढ़ाई के बीच-बीच में अपनी हाॅबी को भी टाईम दें। इससे हमारा दिमाग रिफ्रेश हो जाता है।लगातार अध्ययन करते रहने से मानसिक थकान हो जाती है। विद्यार्थियों में , मानसिक थकान से चिड़चिड़ापन व तनावग्रस्त हो जाते हैं। हालांकि एक्जाम के समय पढ़ना बहुत जरुरी है परन्तु उससे भी ज्यादा जरूरी है अपने दिमाग को रिफ्रेश करना और दिमाग को रिफ्रेश करने के लिए बीच-बीच में अपनी हाॅबी पर भी ध्यान दें, समय दें।

4.अपने मित्रों से मिलें(Meet your friends)-

मित्रों से हम मिलते हैं तो अपनी परेशानी व समस्याओं को साझा करते हैं। यदि समस्याओं का हल मित्रों से मिल जाता है तो well and good परन्तु यदि समस्या का हल नहीं भी मिलता है तो भी हमारा दिमाग हल्का हो जाता है और उतने समय के लिए हम अपने टेंशन को भूल जाते हैं इसलिए पढ़ाई के बीच में जब भी ब्रेक दें तो अपने मित्रों से अवश्य मिलें। मिलते समय पढ़ाई के साथ-साथ अन्य बातों पर भी बातचीत करें। मित्रों से केवल पढ़ाई ही पढ़ाई की बात न करें।

5.योग व व्यायाम करें(Do yoga and exercise)-

योग व व्यायाम हमारे टेंशन को दूर करने में सबसे कारगर माध्यम है। रोजाना सुबह जल्दी उठकर दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के पश्चात ध्यान, योग और व्यायाम अवश्य करें। ध्यान व योग से हमारा दिमाग शांत रहता है और व्यायाम से शरीर में चुस्ती व फुर्ती रहती है। पूरा दिन एक्टिव होकर पढ़ाई कर सकते हैं, आलस्य नहीं आता है। इसलिए नियमित रूप से ध्यान व योग अवश्य किया करें। ध्यान व योग करने का सीधा-सादा तरीका यह है कि आँखें बंद करके सुखासन में बैठ जाएं और मन में किसी प्रकाशरूप ज्योति, दीपक, सूर्य पर ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश करें। मन को कोई ओर विचार आए तो उनको कम्पनी न दें। ध्यान विकाररहित होने की प्रक्रिया है, दिमाग को शांत करने की औषधि है। हमारे दिमाग में नाना प्रकार के विचार आते रहते हैं जिनका हमारे से कोई सम्बन्ध नहीं है। ध्यान करने से आप फालतू के विचारों को आने से रोक सकते हैं। इस प्रकार ध्यान व योग तनाव को समाप्त करने का अचूक और सबसे बढ़िया तरीका है।
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6.पूर्ण विश्राम करें(Take a rest)-

Tension during the exam,then remove the mind stress
Tension during the exam,then remove the mind stress 
अक्सर विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में रात-रात भर जागकर अध्ययन करते हैं। यदि पूरे वर्षभर आपने गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया है तो आपको ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि पूरे वर्ष गम्भीरतापूर्वक तथा नियमित व निरन्तर अध्ययन नहीं भी किया है तो भी यदि आप शरीर को पूर्ण विश्राम नहीं देंगे तो तनावग्रस्त हो जाएंगें। आप जो भी पढ़ेगें, वह पढ़ा हुआ भी याद नहीं रहेगा तो फिर रात-रात भर जागने का क्या फायदा? दूसरा नुकसान यह है कि यदि नींद व विश्राम पूर्ण रूप से नहीं लेगें तो आपका स्वास्थ्य खराब हो जाएगा। इसलिए परीक्षा के समय व परीक्षा के दिनों में पूर्ण विश्राम लें।

7.मनोरंजन भी करें(Do entertainment)-

परीक्षा का यह अर्थ नहीं है कि हमेशा पढ़ाई ही करते रहें, हमेशा किताब हमारे हाथ में ही रहे। अपने दिमाग को शांत रखना तथा तनावरहित होने के लिए मनोरंजन करना भी जरुरी है। मनोरंजन के लिए आप भजन, गीत या संगीत के वीडियो सुन सकते हैं।

8.सहयोग लेने में संकोच न करें(Don't hesitate to cooperate)-

कई बार परीक्षा के दौरान हमारे टाॅपिक से सम्बन्धित कोई समस्या होती है तो उसको किसी को न तो बताते हैं और न ही किसी से सहयोग लेना चाहते हैं याद रखें यह दुनिया सहयोग, परोपकार तथा एक दूसरे की मदद करने पर ही टिकी हुई है। यह हो सकता है कि कोई कम सहयोग लेता है तथा कोई अधिक सहयोग लेता है। इसलिए सहयोग लेने में संकोच न करें।सहयोग नहीं लेंगे तो समस्या के कारण आप तनावग्रस्त हो जाएंगें। 

9.अपनी अंतरंग बाते माता-पिता से न छुपाएं(Do not hide your intimate things from parents)-

दुनिया में यदि सबसे अधिक हित चाहने वाले हैं तो वो माता-पिता ही होते हैं। इसलिए कोई आपसे गलती हो गई हो या कोई समस्या हो तो अपने माता-पिता को अवश्य बताएं अन्यथा धीरे-धीरे आपमें घुटन व कुण्ठा पैदा हो जाएगी और वो तनाव का कारण बन जाएगी। 

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Friday, 13 December 2019

Why do you need a tutor or coaching in mathematics?

December 13, 2019

Why do you need a tutor or coaching in mathematics?)-

1.गणित में ट्यूटर या कोचिंग की आवश्यकता का परिचय(Introduction to the need of tutor or coaching in mathematics)-


Why do you need a tutor or coaching in mathematics
Why do you need a tutor or coaching in mathematics
इस आर्टिकल में बताया गया है कि विद्यार्थियों को स्कूल में नियमित रूप से जाने के बावजूद ट्यूटर या कोचिंग की आवश्यकता क्यों है? वर्तमान युग आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रौद्योगिकी का युग है। प्राचीन काल के बजाय वर्तमान युग में हर चीज इतनी तेजी से बदल रही है परम्पराएँ, मान्यताएं, रीति रिवाज, फैशन यानी इतना परिवर्तन हो रहा है (हर क्षेत्र में) कि आज कोई भी अनुसंधान या तकनीक आ गई है तो कहा नहीं जा सकता है कि वह तकनीक कितने दिन टिकी रह सकेगी। आधुनिक युग से कदमताल मिलाते हुए नहीं चलेंगे तो हम पिछड़ जाएंगे और हमसे पीछे जो हैं वे हमसे आगे निकल जाएंगे। हालांकि ऐसा कहकर हम दूसरों से स्पर्धा करने का समर्थन नहीं कर रहे हैं परन्तु स्वयं से भी स्पर्धा की जाए तो हमेशा इस बात का मूल्यांकन करते रहना चाहिए कि पिछले समय से हम कितना आगे बढ़ें हैं अर्थात् हमारा कितना उत्थान और विकास हुआ है। दूसरी बात यह है कि प्रतियोगिता परीक्षाओं में दूसरों से अव्वल या आगे निकलेंगे तो ही किसी पद पर नियुक्त हुआ जा सकता है, इसके लिए दूसरों से स्वस्थ प्रतियोगिता तो की ही जा सकती है। दूसरों से प्रतियोगिता के समय यह बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हमारे मन में दूसरों के प्रति कोई ईर्ष्या, जलन तथा राग, द्वेष तो पैदा नहीं हो रहा है।
अब हम मूल मुद्दे की तरफ आते हैं कि ट्यूटर या कोचिंग की जरुरत है या नहीं यदि है तो क्यों है? और नहीं तो क्यों नहीं? सामान्यतः निम्नलिखित कारणों की वजह से ट्यूटर या कोचिंग की आवश्यकता होती है -

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2.स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव(Lack of quality education in schools)-

औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने का प्रथम स्थान स्कूल, कॉलेज को ही दिया जाना चाहिए यदि वाकई में स्कूलों और कालेजों में पढ़ाई कराई जाती है तो। लेकिन हमारे अनुभव में आया है कि स्कूलों में तो फिर भी अध्ययन-अध्यापन का कार्य होता है जो स्तरीय स्कूल हैं। बहुत से स्कूल ऐसे हैं जो धनार्जन के केन्द्र बने हुए हैं उनको बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने से कोई लेना-देना नहीं है। काॅलेजों में तो 80 प्रतिशत काॅलेज नाम मात्र के चल रहे हैं,केवल उनको फीस वसूल करने से मतलब है, विद्यार्थियों की शिक्षा तो भगवान भरोसे है। कुछ नामी या उत्कृष्ट काॅलेजों को छोड़ दिया जाए तो काॅलेजों की स्थिति बदतर है। जब सारे कुएँ में ही भाँग मिली हुई है तो कोई कैसे बच सकता है। इन स्कूल, काॅलेजों की स्थिति के कारण ही तो ट्यूटर और कोचिंग संस्थानों की आवश्यकता महसूस हुई है।
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3.पाठ्यक्रम को पूर्ण करने हेतु(To complete the course)

स्कूलों में पाठ्यक्रम पूर्ण न कराया गया हो या विद्यार्थी स्कूल में कराए गए कोर्स के साथ न चल पा रहा तो पाठ्यक्रम पूर्ण करने के लिए ट्यूटर या कोचिंग की आवश्यकता होती है। अन्य विषयों के कोर्स को तो जैसे तैसे विद्यार्थी अपने स्तर पर पूर्ण कर लेते हैं परन्तु सबसे अधिक परेशानी गणित और विज्ञान के कोर्स को पूरा करने में आती है। इन विषयों का पाठ्यक्रम छूट जाने पर अपने स्तर पर पूर्ण नहीं किया जा सकता है।

4.अप्रत्याशित घटना घटित होने के कारण(Due to force majeure)-

कई बार विद्यार्थी बीमार हो जाते हैं या कोई पारिवारिक संकट आ जाता है जैसे किसी की मृत्यु हो गई हो या विद्यार्थी का एक्सीडेंट हो जाए या अन्य किसी कारण से साल दो साल के लिए पढ़ाई में ब्रेक लग जाए इत्यादि अनपेक्षित स्थितियों में ट्यूटर या कोचिंग की आवश्यकता हो जाती है। क्योंकि बीच में ब्रेक आने से अध्ययन का क्रम टूट जाता है और हमारा याद किया हुआ विस्मृत हो जाता है इसलिए पुराने ज्ञान को रिमाइंड करने की आवश्यकता होती है तथा पाठ्यक्रम को समय पर पूर्ण करना होता है।

5.स्कूलों में अनुभवी शिक्षकों का अभाव(Lack of experienced teachers in schools)-

बहुत से स्कूलों में गणित व विज्ञान के अनुभवी अध्यापक नहीं होते हैं इसलिए विद्यार्थियों की गणित व विज्ञान सम्बन्धी समस्याएँ हल नहीं हो पाती है। यदि विद्यार्थी और अभिभावक स्कूल प्रशासन से शिकायत करते हैं तो वे कोई भी गोल-मटोल जवाब दे देते हैं, ऐसी स्थिति में विद्यार्थी और अभिभावकों को  ट्यूटर या कोचिंग की व्यवस्था करनी ही पड़ती है।

6.अभिभावकों का शिक्षित न होना(Parents not educated)-

विद्यार्थी को सबसे अधिक समस्या विज्ञान और गणित, अंग्रेजी विषयों में होती है। स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने के कारण विद्यार्थियों की व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता है। अभिभावक या तो गणित व विज्ञान जैसे विषयों में शिक्षित नहीं होते हैं और यदि होते भी हैं तो अध्ययन का लम्बा अन्तराल व्यतीत होने से वे गणित व विज्ञान जैसे विषयों की जटिल समस्याओं को हल करने में सहायता नहीं कर सकते हैं। दूसरी तरफ उनकी अपने व्यवसाय में इतनी व्यस्तता होती है कि वे विद्यार्थियों की समस्याओं का समाधान नहीं कर पाते हैं।

7.अच्छे अंक प्राप्त करने हेतु(To get good marks)-

हर विद्यार्थी तथा अभिभावक की यह दिली तमन्ना होती है कि वो अधिक से अधिक अंक अर्जित करे। इसलिए अपने अध्ययन में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। अच्छे अंक अर्जित करने के लिए अधिक परिश्रम व मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। स्कूल व ट्यूटर तथा कोचिंग की कल्चर अलग होती है। ट्यूटर आपकी प्रत्येक व्यक्तिगत समस्या का समाधान कर सकता है जबकि स्कूल में ऐसा नहीं हो सकता है। इसलिए अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने के लिए ट्यूटर व कोचिंग संस्थान की आवश्यकता होती है।
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8.नया सीखने के लिए(To learn new)-

ट्यूटर, स्कूल और कोचिंग संस्थान में पढ़ाने का अलग-थलग तरीका होता है। किसी बालक को ट्यूटर से तो किसी बालक को कोचिंग संस्थान में ठीक से समझ आता है। साथ स्कूल में पढ़ने के बाद कुछ अलग हटकर तथा नया सीखने की इच्छा होती है क्योंकि ट्यूटर, स्कूल और कोचिंग संस्थान में अलग-अलग तरीके से पढ़ाया जाता है।

9.पाठ्यक्रम की पुनरावृत्ति हेतु(For course repeat)-

स्कूलों में सामान्यतः पूर्ण सत्र में पाठ्यक्रम को एक बार ही करवाया जाता है। यदि पाठ्यक्रम की पुनरावृत्ति करनी हो और पाठ्यक्रम की पुनरावृत्ति करनी ही चाहिए, उसके लिए भी ट्यूटर व कोचिंग की आवश्यकता होती है। बहुत से प्रश्न व सवाल विद्यार्थी पुनरावृत्ति करते समय स्वयं हल कर लेता है परन्तु जो जटिल समस्याएं होती है उन्हें विद्यार्थी समझ नहीं पाता है उसके लिए मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

10.प्रतियोगिता परीक्षा के लिए आवश्यकता(Requirement for competitive examination)-

प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न घुमा फिराकर आते हैं। सामान्य प्रश्नों को भी घुमा फिराकर देते हैं जिससे अभ्यर्थियों में कन्फ्यूजन की स्थिति पैदा हो जाती है। पाठ्यक्रम पहले से पढ़ा हुआ नहीं होता है। पूरी तरह नवीन होता है। इसलिए पाठ्यक्रम के प्रश्नों को हल करने, कुछ नवीन मैथड सीखने, परीक्षा का पैटर्न पता लगाने और सवालों को हल करने की स्पीड बढ़ाने के गुर सीखने के लिए ट्यूटर या कोचिंग संस्थान की आवश्यकता होती है।

11.हुनर सीखने के लिए(To learn skills)-

Why do you need a tutor or coaching in mathematics
Why do you need a tutor or coaching in mathematics
ग्रीष्मकालीन या शीतकालीन व दीपावली की छुट्टियाँ आने पर विद्यार्थी उस समय को फालतू नष्ट कर देते हैं इसलिए अभिभावक भी चिन्तित हो जाते हैं। इस अवकाश काल का उपयोग किसी हुनर को सीखने में लगाया जा सकता है। इससे कुछ फायदे हैं। सबसे पहला फायदा तो यह है कि समय का सदुपयोग हो जाता है। फालतू में समय नष्ट करने से कोई न कोई खुराफात सूझती है। इसलिए इस प्रकार का कार्य करने से रचनात्मकता को प्रोत्साहन मिलता है। दूसरा फायदा यह है कि आधुनिक शिक्षा सैद्धान्तिक है इसको प्राप्त करने के बाद विद्यार्थियों को रोजगार व भविष्य की चिन्ता सताने लगती है। यदि आप कोई हुनर सीखें हुए हो तो आपको ज्यादा चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं होगी। आप डिग्री हासिल करने के बाद अपना छोटा-मोटा कार्य कर सकते हो। बहुत से कोचिंग संस्थान कोई न कोई हुनर सीखाते हैं जैसे योगासन, संगीत, नृत्य, पेटिंग,कम्प्यूटर संबंधी स्किल।

12.समीक्षा(Review)-

ऊपर बताएं गए कारणों से एक बार में यह मत समझ बैठना कि हम ट्यूटर तथा कोचिंग के पक्के समर्थक हैं। हमारा व्यक्तिगत अनुभव है कि यदि विद्यार्थियों और माता-पिता में दृढ़ संकल्पशक्ति हो तो आप बिना ट्यूटर व कोचिंग की सहायता लेकर भी सफल हो सकते हैं। यदि आपमें दृढ़ संकल्पशक्ति नहीं है और अन्य विद्यार्थियों की देखा देखी ट्यूटर या कोचिंग कर रहे हैं तो ऐसी शिक्षा कोई भी काम आनेवाली नहीं है। केवल आप अपना समय और धन ही खर्च करेंगे। हाँ यह अवश्य है कि यदि आप सजग, सतर्क और चौकस हैं तो ट्यूटर व कोचिंग का फायदा उठा सकते हैं। हमारा व्यक्तिगत अनुभव तो यह है कि हमने न तो कोई ट्यूटर की व्यवस्था की थी और न ही कभी कोचिंग में शिक्षा ग्रहण की। परन्तु फिर भी  R. A. S  तक का एक्जाम अपने बलबूते पर तैयारी करके दी थी। बीएससी(गणित) भी अपने खुद के दम पर ही की थी। यह अवश्य है कि वो समय अलग था और आज समय अलग है। हालांकि हमारे समय में भी ट्यूटर और कोचिंग संस्थान थे। पर हमने कभी इनकी सेवाएँ नहीं ली। आज समय बदल चुका है। फिर भी इतना तो कह सकते हैं कि मनुष्य में असीम क्षमताएं हैं। वह अपने संकल्पशक्ति, कठोर परिश्रम, तप, साधना और समर्पण के बल पर अपनी मंजिल हासिल कर सकता है। जो विद्यार्थी ऐशोआराम में अपना जीवन व्यतीत करते हैं उनमें ये गुण विकसित नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में वे चाहे ट्यूटर रख लें, कोचिंग क्लासेज ज्वाइन कर लें तो भी उनकी सफलता संदिग्ध है। हम निश्चित के स्थान पर संदिग्ध का प्रयोग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कई बार पूर्वजन्म के अच्छे संस्कार प्रबल हो जाते हैं तो उनके बल पर सफलता मिल जाती है परन्तु ऐसी सफलता टिकाऊ नहीं होती है अर्थात् लम्बे समय तक टिकी नहीं रह सकती है क्योंकि किसी जाॅब पर कार्य करने के लिए कई कठिनाइयों व समस्याओं का सामना करना पड़ता है यदि हम उनका समाधान नहीं करते हैं तो हमारी प्रतिभा और योग्यता की पोल खुल जाती है। इसलिए विद्यार्थी काल को ऐशोआराम में न बिताकर कठोर तप व साधना से हमें व्यावहारिक ज्ञान तो मिलता ही है साथ ही हमारा चारित्रिक विकास भी होता है। यदि इन बातों को ध्यान में रखा जाए तो आपका उत्थान और विकास टिकाऊ होगा। आपका खुद का तो भला होगा ही साथ ही ज्यादा कुछ करेंगे तो दूसरों का भी भला कर सकेंगे।

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