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Wednesday, 18 September 2019

Basic Education And Teaching Mathematics

Basic Education And Teaching Mathematics

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Basic Education And Teaching Mathematics 

1.बेसिक शिक्षा तथा गणित शिक्षण का परिचय (Introduction of Basic Education And Teaching Mathematics) -

इस आर्टिकल में बताया गया है कि बेसिक शिक्षा तीन माध्यमों द्वारा दी जाती है - प्रकृति (Nature), समाज (Society), और उद्योग (Craft) ।बालक का जीवन प्रारम्भिक काल में प्रकृति की गोद में व्यतीत होता है और परिवार में अपना जीवन व्यतीत करता है पश्चात समाज के सम्पर्क में आता है। इसलिए बेसिक शिक्षा में प्रकृति, परिवार और समाज में सन्तुलन स्थापित किया जाता है। गणित प्रकृति, परिवार और समाज में सम्बन्ध स्थापित करता है जो उद्योग में सहायक है। बालक को प्राकृतिक घटनाओं जैसे - सूर्य, चन्द्रमा, तारों के निकलने का समय, उनकी स्थिति तथा दिशा, ऋतुओं तथा वर्षा आदि के ज्ञान की आवश्यकता होती है। यह सब गणित द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार गणित प्राकृतिक घटनाओं को समझने में बहुत सहायक है। घर व समाज सम्बन्धी समस्याओं जैसे - खाने-पीने, कपड़े और मकान बनाने, लेन-देन में उठने वाले खर्चो के हिसाब-किताब, शादी, श्राद्ध और अन्य सामाजिक उत्सवों में हुए आय-व्यय के ब्योरों का सामना करना पड़ता है, वे सब समस्याएँ भी गणित के द्वारा ही सुलझायी जा सकती हैं। इस प्रकार सामाजिक समस्याओं में भी गणित की आवश्यकता पड़ती है। उद्योग में तो गणित का कदम-कदम पर उपयोग है। खेतों का क्षेत्रफल, बीजों की नापतोल और उनसे उत्पादित पदार्थों की तोल, भण्डार-बिक्री, खरीद-बिक्री, कागज, लकड़ी, लोहा, जस्ता, टीन आदि की बाजार दर, रंग, रस-द्रव्य (chemical) आदि का अनुपात के अनुसार उपयोग, लाभ-हानि का हिसाब फलाना आदि बातों का हल बिना गणित के सम्भव नहीं है। अतः गणित का उपयोग चारों प्रकार के माध्यमों-प्रकृति, परिवार, समाज और उद्योग में भलीभांति होता है।
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इसके अतिरिक्त बेसिक शिक्षा में इस बात पर भी ध्यान दिया जाता है कि बालक जो भी ज्ञान प्राप्त करे, वह विभिन्न क्रियाओं (Activities) के आधार पर प्राप्त करे। इसमें शिक्षा इस प्रकार दी जाती है कि ज्ञान (Knowledge) और कार्य (Activity) में परस्पर समन्वय (correlation) बना रहे ।गणित विभिन्न क्रियाओं और उनसे उत्पन्न ज्ञानों के जोड़ने में बड़ा उपयोगी है। जिस प्रकार भवन-निर्माण में गारा एक ईंट को दूसरी ईंट से जोड़ने में सहायक होता है, उसी प्रकार गणित भी विभिन्न क्रियाओं और ज्ञान के जोड़ने में सहायक होता है। इसलिए बेसिक शिक्षा में गणित की उपयोगिता को समझकर पाठ्यक्रम में इसका समावेश (Include) किया जाए ।
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2.बेसिक शिक्षा में गणित पढ़ाने का उद्देश्य (Objectives to Teach Mathematics in Basic Education) -

बेसिक शिक्षा में गणित पढा़ने का उद्देश्य विद्यार्थियों को इस योग्य बनाना है कि वे अपने उद्योग को तथा घरेलू व सामाजिक जीवन के सम्बन्ध में आने वाले हिसाब-किताब की नापतोल की समस्याओं को शीघ्रता से हल कर सकें। अतः बेसिक शिक्षा में गणित के व्यावहारिक तथा सांस्कृतिक मूल्य पर अधिक जोर दिया जाता है। गणित के अनुशासनात्मक (Disciplinary) मूल्य पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता है।
अत: अध्यापक को बेसिक शिक्षा में गणित पढ़ाते समय निम्नलिखित उद्देश्यों को ध्यान में रखना चाहिए -
(1.)बालक को दैनिक जीवन में काम आने वाले अंकों का भली-भाँति ज्ञान कराना चाहिए।
(2.)उद्योग और दैनिक जीवन में उठने वाली अनेक संख्या व ज्यामिति सम्बन्धी समस्याओं को शीघ्रता एवं शुद्धता से हल करने की क्षमता प्राप्त करानी चाहिए।
(3.)बालकों को किसी विषय पर स्वयं सोचने की, एकाग्रचित्त (Concentrate) होने की, उस पर सफल प्रयत्न (Effort) करने तथा उसको शब्दों, संकेतों या चित्रों द्वारा सूक्ष्म में व्यक्त करने के अवसर प्रदान करने चाहिए।

3.बेसिक शिक्षा में गणित का पाठ्यक्रम (Mathematics Curriculum in Basic Education) -

बालक को किसी विशेष परिस्थिति में गणित के जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है वही बात उस समय बालक को पढ़ाई जानी चाहिए। ऐसा करने से बालक रुचिपूर्वक गणित के ज्ञान को ग्रहण करता है। इस प्रकार वर्तमान आवश्यकता और बालक की रुचि, बेसिक शिक्षा में गणित का पाठ्यक्रम बनाने के मूल सिद्धान्त है।
यह पाठ्यक्रम बड़ा लचीला (Flexible) होता है ।इसमें कोर्स की सूक्ष्म रूपरेखा (Outline) दी हुई होती है। अध्यापक पढ़ाते समय उस कोर्स में से आवश्यक तथा बालकों की रुचि के अनुसार किसी भी विषय को चुनने में पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं। पाठ्यक्रम में सैद्धान्तिक (Theoretical) और कृत्रिम (Artificial) गणित के लिए कोई स्थान नहीं होता है। इसमें विशेष बल इस बात पर दिया जाता है कि गणित का दैनिक जीवन से सम्बन्ध हो। स्व. डॉ. जाकिर हुसै ने बेसिक शिक्षा की मूल योजना में बताया था कि बेसिक शिक्षा सैद्धान्तिक अंकों तक ही सीमित न रखी जाय बल्कि उसका बहुत समीप सम्बन्ध उन व्यावहारिक समस्याओं से होना चाहिए जो बुनियादी कला-कौशल को सीखते समय उत्पन्न होती है। इसलिए बेसिक शिक्षा में गणित के पाठ्यक्रम में नीरस (Dry) भिन्ने (Fractions), काम और समय (work and Time) सम्बन्धी रूखे प्रश्न तथा निरर्थक (Meaningless) बीजगणित के गुणनखण्ड (Factors) आदि को तनिक भी स्थान प्राप्त नहीं है। इसमें उसी गणित को सम्मान प्राप्त है, जो हस्तकला ( Handicraft) में सामाजिक तथा मनोरंजन सम्बन्धी क्रियाओं और व्यावहारिक जीवन में आवश्यक होता है। रचनात्मक रेखागणित (Practical Geometry)  पर अधिक जोर दिया जाता है जिससे यह हस्तकला तथा घरेलू कामों में डिजायन और चित्र बनाने में सहायक हो सके। बीजगणित भी वही पढ़ाई जाती है जो अंकगणित के प्रश्नों को सरल करने में सहायक हो। बीजगणित के उन समीकरणों को पढ़ाया जाता है जो हस्तकला सम्बन्धी समस्याओं को हल करने में सहायक होते हैं।
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बेसिक शिक्षा में गणित के पाठ्यक्रम बनाने में प्रायः गणित को इसके व्यावहारिक कोर्स से पृथक कर दिया जाता है। पाठ्यक्रम में इसका सीधे तौर पर कोर्स लिख दिया जाता है, जैसे जोड़, बाकी, गुणा, भाग, दशमलव, ऐकिक नियम आदि ।इसका प्रभाव यह पड़ता है कि प्रायः अध्यापक बालकों को पढ़ाते समय उस कोर्स को दैनिक जीवन सम्बन्धी समस्याओं से बड़ी कठिनाई से जोड़ पाते हैं। अतः गणित कोर्स को दैनिक जीवन सम्बन्धी समस्याओं से जोड़ देना चाहिए।
गणित में दैनिक जीवन सम्बन्धी अनेक समस्याएं हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित है -

(1.)उद्योग सम्बन्धी -

त्रिभुज, चतुर्भुज, वर्ग व आयत आदि आकृतियों की क्यारियाँ बनाई जा सकती है। जब वे खेतों के लिए बीज व खाद और बिनौले तोलें, उस समय उनको तोल सम्बन्धी इकाइयाँ जैसे - किलोग्राम, ग्राम इत्यादि के बारे में बताया जा सकता है। खेतों व बागों में क्यारियाँ व मार्ग बनाते समय उनकी भूमि की पैमाइश करना, क्षेत्रफल आदि का निकालना सिखाया जा सकता है। खेत व बाग में उत्पन्न उपज, बुने हुए कपड़े को बिकवाकर उनकी लाभ-हानि (Profit and Loss) तथा व्यवहार गणित (practical Mathematics) का ज्ञान कराया जा सकता है। इसी सम्बन्ध में उनकी रसीद बही, रोकड़-बही और बैलेंस शीट (Balance Sheet) का ज्ञान भी सहज में हो जाएगा। खेती-बाड़ी में क्यारियाँ बनवाते समय उनको फील्ड-बुक (Field Book) भी सीखायी जा सकती है। वस्त्र बुनते समय उनकों गति (speed), घर्षण (Friction), आदि का भी ज्ञान कराया जा सकता है। बुने हुए वस्त्र पर डिजाइन करवाते समय ज्यामिति की विभिन्न आकृतियों का ज्ञान कराया जा सकता है। रँगवाते समय रंगों के हिसाब का ज्ञान हो जाता है। मिट्टी का माॅडल बनाने में ठोस ज्यामिति की आकृति-गोले (Sphere), घन (Cube) आदि का ज्ञान सरलता से दिया जा सकता है। जब वे मिट्टी के ढेलों से काम करेंगे तो उनकी गिनती का ज्ञान भी सहज में हो जायेगा। लकड़ी व मिट्टी के खिलौने बनाते समय नाप-तोल, विभिन्न पैमाइशें आदि सिखाई जा सकती है। उनको रँगने में रंगों को विभिन्न अनुपात में लाना बताया जा सकता है। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के उद्योगों पर विभिन्न प्रकार की गणित की शिक्षा दी जा सकती है।

(2.)घर और परिवार सम्बन्धी -

खाने-पीने, कपड़े व मकान बनवाने, पढ़ने-लिखने, लेन-देन के सम्बन्ध में उठने वाले हिसाब सम्बन्धी प्रसंगों में अनेक प्रकार से गणित की शिक्षा दी जा सकती है। बालकों के अभिभावकों (Guardians) की आय-कर (Income Tax) के सम्बन्ध में प्रतिशत सम्बन्धी प्रश्न कराये जा सकते हैं। डाकखानों व बैंकों में रूपयों को जमा करने, निकालने और उन पर ब्याज लगाने के प्रसंग में ब्याज सम्बन्धी प्रश्न कराए जा सकते हैं।

(3.)समाज सम्बन्धी -

स्कूल में सहकारी भण्डार (Co-operative Store) चलाकर बालकों को ब्याज, लाभ-हानि, साझेदारी (Partnership) तथा अंकगणित के अन्य प्रमुख नियम सरलता से बताये जा सकते हैं। स्कूल में हुए उत्सव का हिसाब भी बालकों से कराया जाये। इससे वे लेन-देन, खरीद और खर्च आदि बातों को सरलता से सीख सकते हैं। समाज में शादी, ब्याह, श्राद्ध और अनेक व्यावहारिक एवं सामाजिक कार्यों में लेन-देन, खरीद-बिक्री के प्रसंग में आयी हुई अनेक प्रकार की गणित बालकों को सिखायी जा सकती है।

4.उपकरण -

पाठ्यक्रम को बनाने के बाद गणित के लिए आवश्यक उपकरण और सामग्री का होना भी नितान्त आवश्यक है। इन उपकरणों और सामग्री से गणित का शिक्षण सरल एवं रोचक हो जाता है। इसके अतिरिक्त गणित शिक्षण में कुछ ऐसी सूक्ष्म बातें आ जाती हैं, जिनका समझना यदि सब विद्यार्थियों के लिए नहीं तो कुछ के लिए तो अवश्य ही असम्भव हो जाता है। ऐसी दशा में यदि उपकरण तथा चित्रादि दिखाकर सूक्ष्म बातें स्पष्ट कर दी जाएँ तो उसे बालक शीघ्र समझ लेते है। ब्लैकबोर्ड, पाॅइण्ट, खल्ली, झाड़न के अतिरिक्त ज्योमेट्रीकल सेट, चेन(chain) और मापने के यंत्र जैसे गिनने के सामान, ठोस ज्यामिति के विभिन्न रंगों की नालियाँ, भिन्न-भिन्न ऊँचाई और गहराई वाले सामान, विभिन्न आकृतियों के माॅडल जैसे गोला (sphere), घन (cube), आयताकार ठोस (Rectangular Solid), त्रिपार्श्व (Prism) और शंकु (Cone) आदि भिन्न-भिन्न प्रकार के सिक्के, विभिन्न घनत्व (density) वाले पदार्थ, तोल के विभिन्न प्रकार के बाँट, ग्राफ, चार्ट तथा विभिन्न प्रकार के चित्र व रेखाचित्र आदि आकर्षक ढंग से विद्यालय में सजे हुए होने चाहिए। यह भी बालकों को गणित-शिक्षण का एक साधन है। जहाँ तक हो सके, चित्र हाथ के बने होने चाहिए। इन उपकरणों की सफाई और व्यवस्था का प्रतिबन्ध भी अध्यापक और बालकों द्वारा होना चाहिए।

5.विधि(Method) -

बेसिक शिक्षा में गणित की शिक्षण-पद्धति सीधे तौर पर नियम बताकर प्रश्न निकलवाने की नहीं है बल्कि सीखते समय जो समस्या खड़ी हो उसको हल करते हुए गणित सीखना चाहिए ;जैसे - किसी बालक ने एक दिन में 40 मीटर सूत काता और दूसरे दिन 35 मीटर। अब इस बात की आवश्यकता होगी कि उसने दोनों दिन में कितने मीटर सूत काता। इस समय अध्यापक को जोड़ का नियम सिखाने का अच्छा अवसर है। इस प्रकार क्राफ्ट के सम्बन्ध में अनेक समस्याएँ आयेंगी और उनका उपयोग करते हुए गणित का ज्ञान सहज में ही दिया जा सकेगा। अध्यापक को गणित की शिक्षा देते हुए भी विचार रखना चाहिए कि बेसिक कक्षाओं में बालक बहुत छोटे होते हैं, अतः उनको आगमन प्रणाली (Inductive Method) में पढ़ाना चाहिए क्योंकि निगमन प्रणाली (Deductive Method) के लिए काफी तर्क और समझ की आवश्यकता होती है।
ऐसा करने से जीवन सम्बन्धी वास्तविक प्रसंगों के सहारे गणित का शिक्षण हो सकेगा। कभी-कभी बेतुके और असत्य उदाहरण पुस्तकों में दिखाई देते हैं जैसे - एक आदमी की उम्र 14 साल है और उसके 3 बच्चे हैं। अब यह सोचने की बात है कि क्या 14 साल के लड़के के 3 बच्चे हो सकते हैं
? इसी प्रकार ऐसे प्रश्न भी किए जाते हैं जिनका उत्तर 20.5 आदमी आता है। क्या यह सम्भव है कि 20.5 आदमी हो सकते हैं? कभी-कभी ऐसे प्रश्न भी पूछे जाते हैं कि एक घोड़े का दाम 2 रूपये है तो8 घोड़े का दाम बताओं। क्या एक घोड़ा 2 रुपये का हो सकता है? अतः ऐसे प्रश्नों को बालकों से नहीं करना चाहिए जो कृत्रिम और असत्य हों। इसका बालकों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वे गणित को जीवन से असम्बन्धित समझकर एक अजीब और भयानक विषय समझ बैठते हैं। अध्यापक को चाहिए कि वह बालक से उन्हीं प्रश्नों को कराये जो संख्यात्मक, वर्णनात्मक, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, खेल-खिलोने आदि से सम्बंधित और मनोरंजक हों। इसके साथ-साथ गणित से सम्बन्ध रखने वाली सामग्री का जैसे - गिनने के साधन, सिक्के, ज्याॅमैट्रीकल सैट, ठोस ज्यामिति की आकृतियों आदि का भी गणित पढ़ाते समय उपयोग करना चाहिए। ऐसा करने से बालकों में सहज प्रवृत्ति उत्पन्न होगी। उन्हें गणित में रस मिलेगा। वे गणित में रुचि लेने लगेंगे। उनमें शोध - Research) की प्रवृत्ति जाग्रत होगी और अपनी समस्याओं का हल अपने आप निकालने में समर्थ होंगे।
कभी-कभी अध्यापक एक गलती कर बैठते हैं, वे बालकों को गणित सीखाते समय उनको कुछ गलती करने पर धमकाते हैं और उनको बैंचों पर खड़ा कर देते हैं व उनको पीटते हैं। इसके अतिरिक्त गणित में सूक्ष्म और अबोधगम्य सिद्धान्तों को वे बालकों की उम्र और समझ का बिना विचार किए उन पर लादते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बालक गणित के प्रति उदासीन हो जाते हैं और उससे कोसो दूर भागते हैं। रट-रटाकर वे चाहे परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं परन्तु गणित का वास्तविक उपयोग अपने जीवन में नहीं ले पाते हैं। अतः अध्यापकों को चाहिए कि वे इन गलतियों से सावधान रहें। उनको चाहिए कि वे इस प्रकार के प्रेम का वातावरण बनायें कि बालक नि:संकोच अध्यापक से अपनी शंका का समाधान कर सकें और किसी बात को अध्यापक से पूछने में झिझके नहीं। गणित अध्यापक को यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि जब तक बालकों की रुचि विषय में रहे तभी तक गणित पढ़ानी चाहिए क्योंकि अनुकूल परिस्थिति और ठीक समय पर किया हुआ कार्य ही पूर्ण रूप से सफल होता है। जिस समय बालक गणित के किसी विषय को पढ़ते-पढ़ते ऊब जायें और उनको जब उसके पढ़ने में रुचि न रहे तो इसका परिणाम उसी प्रकार होगा जैसा कि बर्तन के भर जाने पर ओर पानी भरने से होता है। अतः बालकों की जब तक विषय में रुचि बनी रहे तभी तक उनको पढ़ाना चाहिए।
लड़कों में गणित के प्रश्नों को हल करने में शीघ्रता एवं शुद्धता (speed and accuracy) हो तथा गणित सम्बन्धी लेखन में कहीं भी किसी तरह की भूल न होने पाये। इसके लिए गणित-कार्य में अभ्यास (Drill) की आवश्यकता है। परन्तु अभ्यास इस प्रकार कराना चाहिए कि बालक उसके करने से ऊबे नहीं। अध्यापक को यह अभ्यास-कार्य खेल-पद्धति (Play-way-Method) द्वारा कराना चाहिए। अभ्यास-कार्य में प्रश्न इस ढंग से बालकों के सम्मुख चुनने चाहिए कि बालक उनमें रुचि लेते रहें। अध्यापक को किसी प्रश्न की लघु विधि(short cut) पर जोर नहीं देना चाहिए बल्कि उस क्रम से कराना चाहिए जिस क्रम से बालक सोचते हैं। कमजोर बालकों का भी गणित अध्यापक को ध्यान रखना चाहिए। तेज (Intelligent) और कमजोर (Weak) बालकों को यथासम्भव उनकी योग्यतानुसार पढ़ाना चाहिए। कमजोर बालकों को तेज बालकों के साथ लाने के लिए कभी-कभी अध्यापक बहुत जल्दी कर बैठते हैं। ऐसा करने से कमजोर बालक की नींव कमजोर रह जाती है जो आगे उन्नति में बाधक होती है। अशुद्ध उत्तर आने पर बालकों पर गुस्सा नहीं करना चाहिए बल्कि उनसे सही उत्तर निकलवाने की चेष्टा करनी चाहिए।

6.पाठ्यपुस्तक (Text-Book) -

कुछ लोगों की ऐसी धारणा है कि बेसिक शिक्षा में पाठ्यपुस्तक की कोई आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। बेसिक शिक्षा के लिए पुस्तकों का होना अनिवार्य है परन्तु ये पुस्तकें बेसिक शिक्षा के सिद्धान्त पर लिखी होनी चाहिए। गणित की पाठ्यपुस्तक में जो प्रश्न दिये जायें, वे जीवन से सम्बंधित होने चाहिए। प्रश्न वास्तविक हों, उनमें कृत्रिमता की झलक न रहे। प्रश्नों को रखने का ढंग भी क्रमपूर्वक (systematic) हो ताकि सरल प्रश्न पहले आये और फिर अन्त में सबसे कठिन। मौखिक (Oral) तथा मानसिक प्रश्नों का भी समावेश होना चाहिए। गणित की अच्छी पुस्तकों में पुष्टि के लिए कहीं कहीं चित्र और आकृतियों का होना अनिवार्य है। 

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