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Friday, 7 June 2019

Problem solving Method in mathematics

समस्या समाधान विधि (Problem solving Method in Mathematics) -

1.भूमिका (Introduction)-

समस्या समाधान विधि से बालकों में तर्क एवं निर्णय लेकर किसी समस्या को सुलझाने की क्षमता का विकास करना है।
एक समस्यात्मक स्थिति एक रचनाहीन जीवन स्थल के क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है। इस विधि में तथ्यों के आधार पर उद्देश्य की ओर अग्रसर होते हैं।
लेविन ने जीवन स्थल को परिभाषित किया है-"व्यक्ति एवं उसका वातावरण, जैसा वह देखता है, अनुभव करता है तथा समझता है।"
प्रत्येक व्यक्ति का अपने चारों ओर के वातावरण के सम्बन्ध में एक निर्धारित दृष्टिकोण होता है - यही उसके जीवन स्थल के क्षेत्र का संकेत देता है। जब जीवन स्थल का क्षेत्र रचनाबद्ध होता है तो वह जान पहचान वाला एवं समझ में आनेवाला होता है।यदि वह रचना रहित हो तो उलझन पैदा करने वाला होता है। ऐसे क्षेत्र को रचनाबद्ध करना आवश्यक होता है। हमारा व्यवहार बहुत अंशों में जीवन स्थल की ज्ञानात्मक संरचना पर निर्भर करता है। ऐसी दशा में उसे यह पता ही नहीं होता है कि समस्या समाधान में कौन से पद सहायक हो सकते हैं। समस्या समाधान तब सम्भव होता है जब जीवन स्थल रचना ग्रहण कर लेता है। जब हमारे समक्ष कोई कठिन बाधा उत्पन्न होती है या एक रचना रहित क्षेत्र हमारे सम्मुख आता है तो समस्या का प्रादुर्भाव होता है।जब हमें ज्ञानात्मक रचना का बोध हो जाता है तब उसे समस्या समाधान कहा जाता है।
समस्या समाधान विधि के जनक हर्बर्ट, डीवी, टोलमेन, आंइनस्टीन आदि जैसे महान् गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक हैं।
समस्या समाधान प्रक्रिया का प्रथम चरण 'समस्या हल करने की आवश्यकता है।' इसके पश्चात् व्यक्ति समस्या को परिभाषित कर समस्या को समझने का प्रयास करता है। तत्पश्चात समस्या समाधान हेतु सामग्री एकत्रित करता है तथा उसकी उपयुक्तता की जाँच कर समस्या हल करता है।
यदि हल उपयुक्त नहीं हो तो पुन:समस्या को परिभाषित कर समस्या समाधान के विभिन्न चरणों को दोहराता है।
गणित अध्यापन की यह एक सर्वमान्य स्वीकृत एवं प्रचलित विधि है। गणित अध्यापन में अध्यापक कक्षा में विद्यार्थियों के समक्ष समस्याओं को प्रस्तुत करता है तथा विद्यार्थी सीखे हुए नियमों, सिद्धान्तों, संकल्पनाओं तथा प्रत्ययों की सहायता से समस्याओं के हल ज्ञात करते हैं। यदि अध्यापक विद्यार्थियों के जीवन से जुड़ी समस्याओं को कक्षा में हल करने के लिए प्रस्तुत करता है तो विद्यार्थियों में हल ज्ञात करने हेतु उत्साह एवं तत्परता का प्रादुर्भाव होता है तथा सीखने की गति में वृद्धि होती है। प्रत्येक समस्या में नवीनता होनी चाहिए। इससे विद्यार्थियों को हल ज्ञात करने हेतु प्रेरणा मिलती है।
Problem solving Method in mathematics

Problem solving Method in mathematics


एक कुशल अध्यापक स्वयं वास्तविक तथ्यों का संकलन कर विद्यार्थियों की क्षमताओं को ध्यान में रखकर समस्याओं का निर्माण करता है। विद्यार्थी समस्या में दी हुई परिस्थिति का अध्ययन कर तथ्यों का विश्लेषण करते हैं तथा सूत्रों, नियमों, सिद्धान्तों, प्रमेयों आदि की सहायता से समस्या का हल ज्ञात करते हैं। प्रत्येक समस्या का सफल हल विद्यार्थियों को नए अनुभव प्रदान करता है तथा समाधान-क्षमता का विकास करता है।
यदि समस्या जीवंत हो तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं एवं रुचियों से सम्बंधित हो तो विद्यार्थियों में स्वत: समस्या हल करने हेतु आकुलता होगी तथा अन्वेषण कर एक अनुमान का निर्धारण कर हल ज्ञात करेंगे तथा हल का मूल्य निरूपण कर उपयुक्तता की जाँच करेंगे। समस्या समाधान विधि में निम्न शिक्षा-शास्त्रियों ने इस प्रकार बल दिया -
आवश्यकता :जाॅन डीवी
रुचि             :थार्नडाइक
आकुलता      :बगलेस्की
गणित की पाठ्यपुस्तकों में परम्परागत, घिसी-पिटी तथा काल्पनिक समस्याओं का संकलन होता है। ये समस्याएं विद्यार्थियों में उन्हें हल करने हेतु कोई उत्साह पैदा नहीं करती हैं।

2.समस्या प्रस्तुत करने के नियम(Rule of submission of problem)-

(1.)समस्या में निहित सामाजिक परिस्थिति ऐसी हो जो विद्यार्थियों की रुचि एवं समझ के अनुसार हो
(2.)समस्या बालक के जीवन से सम्बंधित होनी चाहिए। समस्या के तथ्यों से बालक परिचित होने चाहिए।
(3.)समस्या की भाषा सरल, बोधगम्य तथा अर्थपूर्ण हो। अनावश्यक रूप से लम्बी तथा अर्थहीन शब्दाडम्बर से परिपूर्ण समस्याएं गणित विषय को कठिन तथा भयावह बनाती हैं।
(4.)समस्या में क्या ज्ञात करना है? यह बात स्पष्ट रूप से विद्यार्थियों को दृष्टिगत होनी चाहिए। बहुधा ऐसी समस्याएं भी पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध हैं जिन्हें बार-बार पढ़ने के पश्चात् भी यह ज्ञात नहीं होता कि समस्या में क्या? कितना? कैसे? क्यों? ज्ञात करना है।
(5.)समस्याएं विद्यार्थियों द्वारा सीखे हुए सूत्रों, प्रमेयों, संकल्पनाओं, सिद्धान्तों आदि पर आधारित हों।
(6.)समस्याओं को सरल, स्पष्ट, सारपूर्ण तथा लघु आकार की बनाने हेतु स्पष्ट चित्र, अर्थपूर्ण सारणी, संकेत देने चाहिए।
(7.)समस्या को समझने के पश्चात् उन्हें हल करने की विधि का पूर्वज्ञान होना आवश्यक है।
(8.)यदि अध्यापक विद्यार्थियों के वातावरण, स्थानीय परिस्थितियों एवं रुचियों को आधार बनाकर स्वयं ही समस्याओं को निर्माण कर कक्षा में प्रस्तुत करें तो गणित विषय रुचिपूर्ण हो सकेगा।
(9.)यदि समस्या लम्बी हो तो उसके दो या तीन भाग कर देने चाहिए जिससे बालकों को कोई अप्रत्याशित उलझन न हो।
(10.)समस्याओं के अपेक्षित उत्तर तर्कसंगत होने चाहिए जिससे विद्यार्थी स्वयं उनका मूल्य निरूपण कर सकें। यदि उत्तर में 200 वर्ष का आदमी, 1 क्विंटल का बालक, 45 घंटे का एक दिन, कुछ बालकों की संख्या 91/2, कार की गति 1000 कि. मी. प्रतिघंटा हों तो उत्तरों की अप्रासंगिकता उन्हें पुन: जाँच के लिए बाध्य करे।
(11.)कक्षा में समस्या श्यामपट्ट पर लिखकर प्रस्तुत की जाए तथा रंगीन चाॅक द्वारा संकेत देना लाभकर है। यदि आकृति, चित्र, नक्शा, सारणी, ग्राफ आदि समस्या के साथ सम्मिलित हों तो समस्या समझने में सहायता मिलेगी।
(12.)कक्षा में कम्प्यूटर, फिल्मों, विश्व समाचारों में प्रकाशित तथ्यों, पत्रिकाओं में प्रकाशित चित्रों आदि के माध्यम से यदि समस्याएं प्रस्तुत की जाएं तो अध्यापन को वास्तविक बनाने में सहायता मिलेगी।
(13.)कक्षा में बालकों से उनकी समस्याएं ज्ञात कर उन्हें संख्यात्मक प्रारूप देना भी एक उत्तम विधि मानी गई है।
(14.)जीवन की वास्तविक घटनाओं, तथ्यों, विवरणों, प्रसंगों को गणित अध्यापन में विषयवस्तु बनाकर अध्यापन करना आधुनिक अधिगम का भाग है।
(15.)समस्या आकलन तथा समाधान में धैर्य आवश्यक है।
(16.)विद्यार्थियों को स्वयं को समस्या पहचानकर हल ढूँढ़ने की प्रेरणा देना गणित अध्यापक का कर्त्तव्य है।

3.उदाहरण (Examples)-

(1.)प्रत्येक विद्यार्थी ज्ञात करे कि विद्यालय से उनके घर के लिए सबसे कम दूरी का कौन-सा मार्ग है? (ज्यामिति आकृति द्वारा)
(2.)यदि परिवार में आमदनी में 10%कटौती की जाए तो घर खर्च में क्या परिवर्तन आवश्यक होंगे? (बालक अपने घरों की जानकारी लेंगे)
(3.)गाँव के तालाब में मछलियों की संख्या कैसे ज्ञात करेंगे?
(4.)गाँव में बनी ऊँची मीनार की ऊँचाई कैसे ज्ञात की जाए?
(5.)यदि स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या 50% बढ़ जाए तो वर्तमान कक्षा-व्यवस्था में क्या-क्या परिवर्तन करने होंगे?
(6.)किसी नदी को बिना पार किए उसकी चौड़ाई कैसे ज्ञात करेंगे?
(7.)तुम्हारे शहर की सड़कों को एक-तरफा यातायात करने हेतु क्या सम्भावनाएं अपेक्षित हैं?

4.चिंतन एवं समस्या समाधान(Contemplation and problem solving)-

चिंतन एवं समस्या समाधान में विशेष अन्तर नहीं है। John Dewey के अनुसार चिंतन ही समस्या का हल है। मानव की विशेषता उसकी तर्क-शक्ति है। तर्क-शक्ति को कक्षा में प्रोत्साहन मिलना चाहिए। यदि विद्यार्थी चिंतन शक्ति तथा तर्क-शक्ति आधार बनाकर समस्या समाधान का प्रयास करते हैं तो उनके विकास का क्रम गतिशील होगा। कार्य सम्बन्धी चेतना तथा समस्याओं से जूझने की क्षमता का विकास गणित अध्ययन का महत्त्वपूर्ण भाग है। कक्षा में अध्यापक जादुई वर्ग तथा जादुई वृत्त प्रस्तुत कर रिक्त स्थानों में संख्यापूर्ति करायें। यह सब चिंतन प्रक्रिया के प्रबलन के उत्तम उदाहरण हैं। प्रेरणादायक समस्या स्वयं में प्रेरक है। वैज्ञानिक ढंग से हल की ओर अग्रसर होना समस्या समाधान विधि का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। मूल दक्षताओं का अनुप्रयोग, उच्च चिंतन, अनुमान को विश्वासी प्रदत्त सामग्री पर आधारित करना, प्रदत्त सामग्री एकत्रित करने की क्षमता, धैर्य के साथ समस्या का विश्लेषण करना आदि समस्या समाधान विधि के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
समस्या हल में यांत्रिक व्यवहार उपयोगी सिद्ध होता है। गतिमान एवं निश्चित प्रतिक्रियाएं यांत्रिक व्यवहार के महत्त्वपूर्ण भाग हैं। परीक्षणों ने समस्या समाधान विधि की महानता सिद्ध की है। कौतूहल एवं आकुलता समस्या समाधान को गति प्रदान करते हैं। समस्या जितनी जीवंत एवं प्रासंगिक होगी उतनी ही वे विद्यार्थियों को हल ज्ञात करने की प्रेरणा देगी। विवेचना, अनुमान, संक्षेपीकरण, विश्लेषण तथा संश्लेषण आदि प्रक्रियाएं समाधान में निश्चितता प्रदान करते हैं।
यह विधि तर्क पर आधारित है तथा जनतांत्रिक है। सीखना, चेतनता, जागरूकता, अवधानता, प्रेरणा, परीक्षणों की क्षमता, तर्कपूर्णता, आकुलता, वैज्ञानिकता, कौतुहलता आदि इस विधि के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। हमारा सम्पूर्ण जीवन समस्याओं के हल प्राप्त करने की सजग यात्रा है। गणित अध्यापन इस विधि का सर्वोत्तम प्रशिक्षण प्रदान करता है। उच्च स्तर का चिंतन इस विधि का अंतरंग अवयव है।

5.समस्या हल करने के पद(Problem solving Term)-

(1.)समस्या में दिए गए तथ्यों तथा उनके सम्बन्धों को समझना (
Understanding the facts and their relation in the problem)
-

समस्या को प्रस्तुत करने के बाद, अध्यापक के लिए यह आवश्यक है कि कक्षा को इतना समय दे जिससे कि प्रत्येक विद्यार्थी समस्या का भली-भाँति अध्ययन कर सके। इससे प्रत्येक विद्यार्थी को यह जानकारी प्राप्त हो सकेगी कि समस्या में क्या दिया हुआ है तथा क्या ज्ञात करना है।


(2.)समस्या का विश्लेषण(Problem analysis) - 

कक्षा में समस्या को प्रस्तुत करने के पश्चात् समस्या का प्रश्नोत्तर विधि द्वारा विश्लेषण करना चाहिए तथा विद्यार्थियों की सहायता से यह स्पष्ट करना चाहिए कि समस्या में दिए गए तथ्यों में परस्पर क्या सम्बन्ध है? इस पद में विद्यार्थी यह समझ सकेंगे कि कौन-से तथ्य अनावश्यक हैं तथा कौन-से आवश्यक है। इस प्रकार विद्यार्थी में समस्या का विश्लेषण करने की आदत पड़ जाएगी जो समस्या को सफलतापूर्वक हल करने के लिए अनिवार्य है। जिन विद्यार्थियों में समस्या का विश्लेषण करने की आदत पड़ जाएगी जो समस्या को सफलतापूर्वक हल करने के लिए अनिवार्य है। जिन विद्यार्थियों में समस्या का विश्लेषण करने की क्षमता का विकास नहीं होता है, वे समस्या को अधिकांशतः आत्मविश्वास के साथ हल नहीं कर सकते हैं।

(3.)सम्भावित हल खोजना (Finding a potential solution)-

 विश्लेषण के पश्चात् विद्यार्थी यह भली प्रकार समझ सकेगा कि जो हल ज्ञात करना है उसे प्राप्त करने के लिए गणित के कौन-से नियम, सूत्र, सिद्धान्त आदि का प्रयोग आवश्यक है। यहाँ पर विद्यार्थी यह निर्णय कर सकेगा कि ज्ञातव्य हल को प्राप्त करने के लिए किस विशेष विधि को काम में लाना अपेक्षित है तथा यदि कोई वैकल्पिक विधि हो तो उस पर भी विचार करेगा।

(4.)हल को प्राप्त करने के लिए सही गणना करना(
Calculating the correct to get the solution)
 -

यह देखा गया है कि विद्यार्थी हल करने की विधि को जानते हुए भी समस्या का सही उत्तर प्राप्त नहीं कर पाते। वे गणना करने में बहुत साधारण त्रुटियाँ करते हैं। विद्यार्थियों में सही तथा शीघ्र गणना करने की क्षमता का होना आवश्यक है। अध्यापक अलग से गणना करने का अभ्यास करा सकता है जिससे गणना करने में विद्यार्थियों को कोई कठिनाई न हो। यह देखा गया है कि अधिकांश विद्यार्थी दशमलव के गुणा तथा भाग करते समय त्रुटियाँ करते हैं।

(5.)समस्या का हल ज्ञात करना एवं पुन:जाँच करना(
Find out the problem and check it again)
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समस्या का हल ज्ञात करने के पश्चात् प्रत्येक विद्यार्थी को उत्तर की पुन:जाँच करना चाहिए जिससे हल में गणना या विधि सम्बन्धी त्रुटियों को ठीक किया जा सके। विद्यार्थियों में उत्तर की पुन: जाँच करने की आदत होना आवश्यक है क्योंकि त्रुटियों को ढूँढ निकालना इसके बिना सम्भव नहीं है। जो उत्तर प्राप्त हो उसकी तर्कसंगतता के बारे में भी विद्यार्थी को विचार करना चाहिए।

6.समस्या समाधान विधि के गुण(Properties of Problem Solving Method)-

(1.)समस्या के द्वारा हम विद्यार्थियों को जीवन से सम्बंधित परिस्थितियों के सही जानकारी दे सकते हैं। इस प्रकार गणित विषय के सामाजिक महत्त्व को हम कक्षा में प्रस्तुत कर सकते हैं।
(2.)विद्यार्थी में समस्या का विश्लेषण करने की क्षमता का विकास होता है तथा आवश्यक तथ्यों में विभेद कर सकता है। कभी-कभी समस्या में अपूर्ण तथ्य दिए होते हैं तथा इसका हल ज्ञात करना सम्भव नहीं। इसकी जानकारी समस्या के सही विश्लेषण पर निर्भर करती है।
(3.)बालकों में आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता का विकास होता है।
(4.)समस्या-निवारण विधि के प्रयोग से बालकों में समस्या से जूझने की आदत पड़ जाती है जो जीवन में सफलता की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
(5.)इस विधि में बालकों में सही चिंतन तथा तर्क का समुचित प्रयोग करने की आदत पड़ जाती है।

(6.)उच्च गणित के अध्ययन में सहायक है।

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