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Friday, 10 May 2019

Problem-based learning and project-based learning in math

Problem-based learning and project-based learning

1.भारत में परम्परागतअधिगम (Learning)-


(1.)सीखना (अधिगम) Learning :- 

भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अनुसार बालक माता के गर्भ से ही सीखना प्रारंभ कर देता है और आजीवन यह सीखने की प्रक्रिया जारी रहती है. सीखने की कोई निश्चित उम्र नहीं होती है, न कोई समय तथा स्थान होता है. कोई भी मनुष्य कहीं भी, कभी भी और किसी से भी सीख सकता है. माता-पिता, भाई-बहन, मित्र-अमित्र, परिचित और अपरिचित आपस में सीख सकते हैं. अभिमन्यु ने अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में ही चक्रव्यूह का भेदन सीख लिया था. 
Abhimanyu Uttara

Abhimanyu Uttara


यहां तक कि हम मनुष्यों से ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों से भी सीख सकते हैं या कि सीखते हैं. शेर से आत्मनिर्भरता अर्थात् वह अपने बल पर ही शिकार करता है दूसरे के शिकार किये हुए का भक्षण नहीं करता है और शिकार करने के लिए पूरी शक्ति लगा देता है, बगुले से हम ध्यान सीख सकते हैं वह सरोवर के किनारे एकाग्रता से मछली की प्रतीक्षा करता है और शिकार कर लेता है इसी प्रकार हम बगुले से इन्द्रियों को वश में करके एकाग्रचित्त होकर अपने कार्य को सिद्ध कर सकते हैं ,चींटी से परिश्रम, मुर्गे से चार बाते यथासमय जागना, युद्ध के लिए तैयार रहना, बन्धुओं को उनका हिस्सा देना और आक्रमण करके भोजन करना सीख सकते हैं. छिपकर मैथुन करना, धृष्टता (ढीठपन), समय समय पर संग्रह करना, निरन्तर सावधान रहना और किसी पर विश्वास न करना इन पांच बातों को कोए से सीखना चाहिए. बहुत खाने की शक्ति रखना, न मिलने पर थोड़े में ही सन्तोष कर लेना, गाढ़ निद्रा में सोना, तनिक सी आहट से ही जाग जाना, स्वामी भक्ति और शूरवीरता ये छ: गुण कुत्ते से सीखना चाहिए. अत्यन्त थक जाने पर भी बोझ ढोते जाना, सर्दी-गर्मी की परवाह न करना और सदा सन्तोष से जीवन बिताना इन तीन गुणों को गधे से सीखना चाहिए. 

(2,)मनुष्य यहां तक कि पशु-पक्षियों तथा प्रकृति से सीखना(Human beings, even animals and birds, learn from nature)-

व्यक्ति सीखना चाहे तो कदम कदम कदम पर किसी भी व्यक्ति से चाहे वह छोटा या बड़ा यहां तक कि पशु-पक्षियों तथा प्रकृति से बहुत कुछ सीख सकता है. सीखने के लिए सद्गुरु विवेक के रूप में हमारे अन्दर मौजूद है. ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति में अन्त:करण विद्यमान है. परन्तु शर्त यही है कि अन्त:करण यदि काम, क्रोध आदि विकारों से मुक्त हो अथवा जिसने तप, साधना द्वारा अपने अन्त:करण को विकारों से मुक्त कर लिया हो. ऐसा व्यक्ति प्रकृति को देखकर भी धर्म, अध्यात्म का तत्त्व ज्ञान सीख सकता है. वस्तुतः यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उस परमात्मा की लीला ही है.
दत्तात्रेय जी को ज्ञान प्राप्ति के लिए तप साधना करने के पश्चात् भी अन्तर्बोध नहीं हुआ. वे कई साधु सन्तों, गुरुओं के पास गये पर कहीं भी सन्तोष नहीं हुआ क्योंकि क्योंकि उनको आत्मज्ञान नहीं हुआ. अन्त में वे ब्रह्मा जी के पास गये तथा अपनी जिज्ञासा ब्रह्मा जी को बताई. ब्रह्मा जी ने दत्तात्रेय को कहा कि प्रकृति में प्रत्येक जीव तथा प्रकृति को देखकर अन्तर्ज्ञान हो सकता है, आवश्यकता है अपने अन्त:करण को पवित्र एवं शुध्द करने की. इसके पश्चात प्रकृति की छोटी-छोटी घटनाओं का निरीक्षण करने के पश्चात अध्यात्म ज्ञान की सिद्धि कर ली. पश्चात् सामान्य व्यक्ति से लेकर राजा तक प्रत्येक व्यक्ति को अध्यात्म का संदेश पहुंचाया.
एक बार राजा यदु ने दत्तात्रेय जी से पूछा महात्मन्! संसार के अधिकांश लोग काम, क्रोध, लोभ इत्यादि के वशीभूत होकर दु:खी है तो आपने जीवन्मुक्त की अवस्था कैसे प्राप्त की? तब दत्तात्रेय जी ने कहा कि चेतना की अनुभूति के लिए किसी अकेले गुरु से काम नहीं चलता उसके लिए व्यक्ति को अन्दर जो गुरु आत्मा के रूप में विराजमान है उसकी शरण में जाना होता है. इस सद्गुरु के माध्यम से मुझे 24 गुरुओं से शिक्षा प्राप्त हुई.. उनमें पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा, हाथी, मधुमक्खी, हिरण, मछली, पिंगलावेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाग बनाने वाला, सर्प और भृंगी कीट है. महाराजा यदु ने कहा कि ये सब तो जड़ और निर्बुद्धि हैं, इनसे शिक्षा कैसे प्राप्त हुई. दत्तात्रेय जी ने बताया कि जड़ और निर्बुद्धि होते हुए भी प्रकृति उस परमात्मा की लीला ही तो है, आवश्यकता है अपने अन्त:करण को निर्मल करने की.
उन्होंने कहा कि पृथ्वी से मैंने धैर्य और क्षमा की शिक्षा ली.लोग पृथ्वी पर कितना उत्पात करते हैं और चोट पहुंचाते हैं पर वह न तो किसी से बदला लेती है और सहन करती है,, इसी प्रकार धीर पुरुष को को चाहिए कि दूसरों की मजबूरी को समझकर न तो क्रोध करें और न धैर्य खोए.
वायु से शिक्षा ली कि वह कहीं आसक्त नहीं होती और किसी का भी गुणदोष नहीं अपनाती. वैसे ही साधक को भी किसी का दोष ग्रहण न करे और न किसी से आसक्ति व द्वेष करें.
आकाश से मैंने यह जाना कि जितने भी चल-अचल पदार्थ है उनका आश्रय स्थान एक ही है आकाश. उसी प्रकार जितने भी चर-अचर जीव है उनमें आत्मा सर्वत्र व्याप्त है.
जल का स्वभाव स्वच्छ, मधुर और पवित्र है जिससे यह प्रेरणा प्राप्त की कि साधक को स्वभाव स्वच्छ, शुद्ध और पवित्र रखना चाहिए.
अग्नि तेजस्वी और ज्योतिर्मय है उसके तेज को कोई दबा नहीं सकता तथा उसके पास संग्रह के लिए कोई पात्र नहीं है, वह सब कुछ भस्म कर देती है. वह भले बुरे सभी पदार्थों को भस्म कर देने पर भी किसी दोष से लिप्त नहीं होती है. इसी प्रकार साधक को भी तेजस्वी व इंद्रियों को नियंत्रण में रखना चाहिए उनमें आसक्ति न रखें.
चन्द्रमा की गति काल के प्रभाव से घटती बढ़ती रहती है परन्तु वस्तुतः वह न तो घटता है, न बढ़ता है. वैसे ही जन्म से लेकर मृत्यु तक शरीर की अवस्थाएं बदलती है आत्मा का उससे कोई सम्बन्ध नहीं है.
सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल सोखकर और समय पर बरसाता है. वैसे ही योगी पुरुष समय पर विषयों को ग्रहण और त्याग करते हैं किंतु सूर्य की भाँति आसक्त नहीं होते हैं.. अजगर से मैंने सीखा कि साधक को हर परिस्थिति में संतुष्ट रहना चाहिए. समुद्र, वर्षा ऋतु में नदियों की बाढ़ के कारण न तो बढ़ता है और न ही ग्रीष्म ऋतु में जब नदियां सूखने लगती है तो घटता ही है. उसी प्रकार साधक को सांसारिक पदार्थों के प्राप्त होने पर न तो खुश होना चाहिए और न ही उनके नष्ट हो जाने पर खिन्न होना चाहिए.
पतंगा दीपक के रूप पर मोहित होकर उस पर कूदता है और जल कर भस्म हो जाता है. वैसे ही जो व्यक्ति इंद्रियों को वश में नहीं रखता वह नाशवान पदार्थों में फँसा रहता है. वह अपनी विवेक बुद्धि खोकर पतंगें के समान ही नष्ट हो जाता है.
भौंरा पुष्पों से उनका सार ही ग्रहण करता है उसी प्रकार बुद्धिमान पुरुष सभी शास्त्रों से उनका सार मात्र ही ग्रहण करें.
हाथी काठ की हथिनी को देखकर ही शिकारियों द्वारा खोदे गए गड्ढे में गिरता है और मृत्यु को प्राप्त होता है. इसी प्रकार काष्ठ मूर्ति में भी साधक की आसक्ति उसके पतन का कारण बन जाती है.
लोभी मधुमक्खी प्रयत्नपूर्वक रस का संचय करती है जिसे अन्य लोग ही उपयोग में लेते है. उसी प्रकार लोभी व्यक्ति का संचित धन का दूसरे लोग ही उपभोग करते हैं.
हिरण सुरीली यंत्रों के कारण श्रवणेन्द्रिय के विषयों में आसक्त होकर अपने प्राण गँवाता है उसी प्रकार साधक को श्रवणेन्द्रिय की आसक्ति पतन की ओर ले जाती है.
मछली काँटें में फँसे हुए माँस के टुकड़े में अपने प्राण गँवा देती है वैसे ही स्वाद का लोभी मनुष्य भी अपनी जीभ के वश में होकर मारा जाता है.
प्राचीनकाल में विदेह नगरी में पिंगला नाम की वेश्या थी. वह हमेशा धन प्राप्ति की कामना रखती थीं और सोचा करती थी कि कोई धनिक पुरुष आकर उसे अपना धन दे जायेगा. एक दिन वह आधी रात इसी तरह प्रतीक्षा करती रही और उसका मुँह सूख गया. उसे निराश होना पड़ा जिसके कारण उसे वैराग्य हो गया. इससे मैंने सीखा कि दूसरों से आशा करना दु:ख का कारण है. दूसरों से आशा न करके खुद के प्रयत्नों पर निर्भर रहना सबसे बड़ा सुख है. उस रात जब पिंगला ने दूसरों से आशा करना छोड़ दिया तो वह सुख की नींद सो सकी.
एक बार किसी कुमारी कन्या के घर, वर और उसके घर वाले पहुँचे. संयोग कन्या के घर वाले कहीं गये हुए थे. इसलिए कन्या ने स्वयं ही उनका सम्मान किया और उनको भोजन कराने के लिए धान कूटने लगी. धान कूटते समय उसकी कलाई की चूड़ियाँ बज रही थी जिससे उसे लज्जा महसूस हुई. उसने एक-एक करके सारी चूड़ियाँ उतार दी केवल एक ही रखी. मैंने यह शिक्षा ग्रहण की कि साधक के चित्त में बहुत सी वृत्तियां हों तो उसका मन चलायमान रहता है वह ठीक से कोई कार्य नहीं कर पाता है. इसलिए साधक को चित्त में एक ही ध्येय रखना चाहिए.
एक बार एक व्यक्ति बाण बनाने के अपने काम में इतना एकाग्र था कि उसके पास से ही राजा की सवारी निकल गई पर उसे पता ही नहीं चला. साधक भी संसार के कोलाहल तथा उथल पुथल से विचलित न होकर अपने लक्ष्य में एकाग्रचित्त रहे.
कोई पक्षी अपनी चोंच में माँस का टुकड़ा लिए बैठा था. दूसरे पक्षियों ने छीनने के लिए उसे चोंचों से मारना प्रारंभ कर दिया. जब उस पक्षी ने माँस का टुकड़ा फेंक दिया तो कष्ट से मुक्त हो गया. इससे मैंने यह शिक्षा ली कि समस्या के कारण को छोड़ देना चाहिए क्योंकि वह दूसरों के मन में ईर्ष्या को जन्म देता है.
साँप से मैंने यह शिक्षा ली कि मठ या मण्डली बनाने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए.
मकड़ी बिना किसी सहायक के अपने ही मुँह के तारों द्वारा जाला बना लेती है, उसी में घूमती फिरती है और फिर उसे ही निगल जाती है. परमात्मा भी बिना किसी सहायक के अपनी माया से इस ब्रह्मांड की रचना करते हैं और उसमें जीवरूप से भ्रमण करते हैं और अपने आपको ही लीन करके अंत में अकेले शेष रह जाते हैं. भृंगी किसी कीट को पकड़कर अपने रहने के स्थान में बन्द कर देता है और कीड़ा भय से उसी का चिन्तन करते करते उसके रूप का हो जाता है उसी प्रकार साधक को भी केवल परमात्मा का ही चिन्तन करके परमात्मा रूप हो जाना चाहिए.
विवेक और वैराग्य की शिक्षा देने के कारण यह शरीर भी एक गुरु है यद्यपि यह शरीर नष्ट होनेवाला है लेकिन इससे मोक्ष(मुक्ति) को उपलब्ध हुआ जा सकता है. यदि व्यक्ति जिज्ञासु हो और तीव्र लगन हो तो ज्ञान की प्राप्ति प्रकृति व इसमें रहनेवाले जीव-जंतुओं से हो सकती है.




2.आधुनिक अधिगम (Learning)(अ )-


2(1.)समस्या समाधान विधि( Problem solving Method) :-

समस्या समाधान विधि के जनक हर्बर्ट, डीवी, टोलमेन, आंइनस्टीन जैसे महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक हैं ।
समस्या समाधान तब सम्भव होता है जब जीवन में हमारे सामने कोई बाधा उत्पन्न होती है या एक रचना रहित क्षेत्र हमारे सम्मुख आता है तो समस्या का जन्म होता है ।जब हमें उस समस्या को हल करने का बोध हो तो जाता है तो उसे समस्या समाधान कहा जाता है ।
समस्या समाधान के प्रथम चरण में समस्या को समझने की आवश्यकता होती है कि आखिर समस्या क्या है और उसका कारण क्या है? इसके पश्चात समस्या को परिभाषित किया जाता है ।इसके पश्चात समस्या को हल करने की सामग्री एकत्रित की जाती है और उसका समाधान किया जाता है ।
गणित विषय की यह एक सर्वमान्य स्वीकृत एवं प्रचलित विधि है ।गणित अध्यापन में अध्यापक कक्षा में विद्यार्थियों के समक्ष समस्याओं को प्रस्तुत करता है तथा विद्यार्थी सीखे हुए नियमों, सिद्धान्तों, संकल्पनाओं तथा प्रत्ययों की सहायता से समस्याओं के हल ज्ञात करते हैं.
यदि अध्यापक विद्यार्थियों के जीवन से सम्बंधित समस्याओं को कक्षा में हल करने के लिए प्रस्तुत करता है तो विद्यार्थियों में हल ज्ञात करने हेतु उत्साह एवं तत्परता उत्पन्न होती है तथा सीखने की गति में वृद्धि होती है। प्रत्येक समस्या में नवीनता होनी चाहिए इससे विद्यार्थियों को हल ज्ञात करने हेतु प्रेरणा मिलती है।
एक कुशल अध्यापक स्वयं वास्तविक तथ्यों को इकट्ठा कर विद्यार्थियों की क्षमता को ध्यान में रखकर समस्याओं का निर्माण करता है। विद्यार्थी समस्या में दी हुई परिस्थिति का अध्ययन कर तथ्यों का विश्लेषण करते हैं तथा सूत्रों, नियमों, सिद्धान्तों, प्रमेयों आदि की सहायता से समस्या का समाधान करते हैं।
यदि समस्या जीवंत हो तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं एवं रुचियों से संबंधित हो तो विद्यार्थियों में स्वत: समस्या का समाधान करने की जिज्ञासा होगी।
वस्तुतः गणित की पाठ्यपुस्तकों में परम्परागत, घिसीपिटी तथा काल्पनिक समस्याओं का समावेश होता है। ये समस्याएं विद्यार्थियों में समाधान करने हेतु कोई उत्साह पैदा नहीं करती हैं।

2(2.)समस्या प्रस्तुत करने के नियम -

(1.)समस्या में सम्मिलित सामाजिक परिस्थिति ऐसी हो जो विद्यार्थियों की रुचि एवं समझ के अनुसार हो।
(2.)समस्या विद्यार्थी के जीवन से सम्बंधित होनी चाहिए। समस्या के तथ्यों से विद्यार्थी को परिचित होना चाहिए।
(3.)समस्या की भाषा सरल, स्पष्ट, ग्रहण करने योग्य तथा अर्थपूर्ण हो। अनावश्यक रूप से लम्बी तथा अर्थहीन शब्दाडम्बर से परिपूर्ण समस्याएं गणित विषय को कठिन व अरुचिकर बना देती है।
(4.)समस्या में क्या ज्ञात करना है? यह बात स्पष्ट रुप से विद्यार्थियों को दृष्टिगत होनी चाहिए
बहुधा ऐसी समस्याएं भी पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध हैं कि समस्या को पढ़ने के बाद भी यह ज्ञात नहीं किया जा सकता है कि समस्या में क्या है? कितना? कैसे? क्यों? ज्ञात करना है।
(5.)समस्याएं विद्यार्थियों द्वारा सीखे हुए सूत्रों, प्रमेयों, संकल्पनाओं आदि पर आधारित हो।
(6.)समस्याओं को सरल, स्पष्ट, सारपूर्ण तथा लघु आकार की बनाने हेतु स्पष्ट चित्र, अर्थपूर्ण सारणी, संकेत देने चाहिए।
(7.)समस्या को समझने के पश्चात् उन्हें हल करने की विधि का पूर्व ज्ञान होना चाहिए।
(8.)यदि अध्यापक विद्यार्थियों के वातावरण, स्थानीय परिस्थितियों एवं रुचियों को आधार बनाकर स्वयं ही समस्याओं को निर्माण कर कक्षा में प्रस्तुत करें तो गणित विषय रुचिपूर्ण हो सकेगा
(9.)यदि समस्या लम्बी हो तो उसके दो या तीन भाग कर देने चाहिए जिससे विद्यार्थियों में कोई अप्रत्याशित उलझन न हो।
(10.)समस्याओं के अपेक्षित उत्तर तर्कसंगत होने चाहिए जिससे विद्यार्थी स्वयं उनका समाधान कर सके।
(11.)कक्षा में समस्या बोर्ड पर लिखकर प्रस्तुत की जाये तथा रंगीन चाॅक द्वारा आवश्यक संकेत देना लाभप्रद है। यदि आकृति, चित्र, नक्शा, सारणी, ग्राफ आदि समस्या के साथ सम्मिलित हों तो समस्या को समझने में सहायता मिलेगी।
(12.)कक्षा में कम्प्यूटर, फिल्मों, विश्व समाचारों में प्रकाशित तथ्यों, पत्रिकाओं में प्रकाशित चित्रों आदि के माध्यम से यदि समस्याएं प्रस्तुत की जायें तो अध्यापन को वास्तविक बनाने में सहायता मिलेगी।
(13.)कक्षा में विद्यार्थियों से उनकी समस्याएं ज्ञात कर उन्हें संख्यात्मक प्रारूप देना भी एक उत्तम विधि है।
(14.)जीवन की वास्तविक घटनाओं, तथ्यों, विवरणों, प्रसंगों को गणित अध्यापन में विषयवस्तु बनाकर अध्यापन करना आधुनिक अधिगम का भाग है।
(15.)समस्या समाधान तथा आकलन में धैर्य रखना अत्यंत आवश्यक है।
(16.)विद्यार्थियों को स्वयं को समस्या पहचानकर हल ढूंढने की प्रेरणा देना गणित अध्यापक का कर्तव्य है।
2(3.)चिंतन एवं समस्या समाधान -
चिंतन एवं समस्या समाधान में विशेष अंतर नहीं है। चिंतन ही समस्या का हल है। मनुष्य की विशेषता उसकी तर्क शक्ति है। तर्क शक्ति को कक्षा में प्रोत्साहन मिलना चाहिए। यदि विद्यार्थी चिंतन शक्ति और तर्क शक्ति को आधार बनाकर समस्या समाधान का प्रयास करते हैं तो उनके विकास का क्रम गतिशील होगा। कार्य सम्बन्धी चेतना तथा समस्याओं से जूझने की क्षमता का विकास गणित अध्ययन का महत्त्वपूर्ण भाग है।

2(4.)समस्या हल करने के पद -

(1.)समस्या में दिए गए तथ्यों तथा उनके सम्बन्धों को समझना -
समस्या को प्रस्तुत करने के बाद अध्यापक के लिए यह आवश्यक है कि कक्षा को इतना समय दे जिससे कि प्रत्येक विद्यार्थी समस्या का भलीभांति अध्ययन कर सके। इससे प्रत्येक विद्यार्थी को यह जानकारी प्राप्त हो सकेगी कि समस्या में क्या दिया हुआ है तथा क्या ज्ञात करना है।
(2.)समस्या का विश्लेषण -
कक्षा में समस्या को प्रस्तुत करने के बाद समस्या का प्रश्नोत्तर विधि द्वारा विश्लेषण करना चाहिए तथा विद्यार्थियों की सहायता से यह स्पष्ट करना चाहिए कि समस्या में दिए गए तथ्यों में परस्पर क्या सम्बन्ध है तथा सम्पूर्ण परिस्थिति में उनका क्या महत्त्व है? इस पद में विद्यार्थी यह समझ सकेंगे कि कौनसे तथ्य अनावश्यक है तथा कौनसे आवश्यक है। इस प्रकार विद्यार्थी में समस्या का विश्लेषण करने की आदत पड़ जाएगी जो समस्या को सफलतापूर्वक हल करने के लिए अनिवार्य है। जिन विद्यार्थियों में समस्या का विश्लेषण करने की क्षमता का विकास नहीं होता है, वे समस्या को अधिकांशतः आत्मविश्वास के साथ हल नहीं कर सकते हैं।
(3.)सम्भावित हल खोजना - विश्लेषण के पश्चात विद्यार्थी यह भली प्रकार समझ सकेगा कि जो हल ज्ञात करना है उसे प्राप्त करने के लिए गणित के कौनसे नियम, सूत्र, सिद्धान्त आदि का प्रयोग आवश्यक है। यहां विद्यार्थी यह निर्णय कर सकेगा कि समस्या का समाधान प्राप्त करने के लिए किस विशेष विधि को काम में लेना चाहिए तथा यदि कोई वैकल्पिक विधि हो तो उस पर वह विचार करेगा।
(4.)हल को प्राप्त करने के लिए सही गणना करना - कई बार विद्यार्थी हल करने की विधि को जानते हुए भी समस्या का सही उत्तर प्राप्त नहीं कर पाते हैं। वे गणना करने में बहुत साधारण सी त्रुटियां करते हैं। विद्यार्थियों में सही तथा शीघ्र करने की क्षमता का होना आवश्यक है। अध्यापक अलग से गणना करने का अभ्यास करा सकता है जिसमें गणना करने में विद्यार्थियों को कोई कठिनाई न हो। यह देखा गया है कि अधिकांश विद्यार्थी के गुणा तथा भाग करते समय त्रुटियां करते हैं।
(5.)समस्या का हल ज्ञात करना एवं पुन: जाँच करना :-
समस्या का हल ज्ञात करने के पश्चात प्रत्येक विद्यार्थी को उत्तर की पुन: जाँच करना चाहिए जिससे हल में गणना या विधि सम्बन्धी त्रुटियों को ठीक किया जा सके। विद्यार्थियों में उत्तर की पुन:जाँच करने की आदत होना आवश्यक है क्योंकि त्रुटियों को ढूँढ निकालना इसके बिना सम्भव नहीं है।।
2(5.)समस्या समाधान विधि के गुण -
(1.)समस्या के द्वारा हम विद्यार्थियों को जीवन से सम्बंधित परिस्थितियों की सही जानकारी दे सकते हैं। इस तरह गणित विषय के सामाजिक महत्त्व को हम कक्षा में प्रस्तुत कर सकते हैं
(2.)विद्यार्थी में समस्या का विश्ले विश्लेषण करने की क्षमता का विकास होता है तथा आवश्यक एवं अनावश्यक तथ्यों में विभेद कर सकता है। कभी-कभी समस्या में अपूर्ण तथ्य दिए होते हैं तथा इसका हल ज्ञात करना सम्भव नहीं। इसकी जानकारी समस्या के सही विश्लेषण पर निर्भर करती है।
(3.)बालकों में आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता का विकास होता है।
(4.)समस्या निवारण विधि के प्रयोग से विद्यार्थियों में समस्या से जूझने की आदत पड़ जाती है जो जीवन में सफलता की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
(5.)इस विधि से विद्यार्थियों में सही चिंतन तथा तर्क का समुचित प्रयोग करने की आदत पड़ जाती है।
(6.)उच्च गणित के अध्ययन में आवश्यक है।
2. आधुनिक अधिगम (Learning)(ब )-

2(1.)प्रायोजना आधारित विधि(Project Based Method) :-

इस विधि के जन्मदाता प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री जाॅन डीवी के योग्य शिष्य विलियम किलपैट्रिक हैं। इन्होंने शिक्षा के सभी अंगों को मिलाकर शिक्षण को रुचिकर व जीवनोपयोगी बनाने का प्रयत्न किया है।
प्रायोजना का अर्थ है कि विद्यार्थियों के वास्तविक जीवन से सम्बंधित किसी समस्या का हल खोजकर निकालने के लिए प्रसन्नतापूर्वक किया जाने वाला वह कार्य जिसे स्वाभाविक रूप से सामाजिक वातावरण में ही पूर्ण किया जाता है।

2(2.)प्रायोजना विधि के सिद्धांत -

(1.)रोचकता (Interest) :-
विद्यार्थियों द्वारा स्वयं ही प्रोजेक्ट या कार्य का चुनाव करने के कारण उसे रुचिपूर्वक करते हैं।
(2.)उपयोगिता (Utility) :-
विद्यार्थी उस कार्य को अधिक पसंद करते हैं जिसे वे अपने लिए उपयोगी हो अर्थात् जो उनके जीवन में काम आता हो। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि विद्यार्थी इस प्रकार के कार्य को विद्यार्थी अधिक रुचि से करते हैं जो उनके लिए उपयोगी हो।
(3.)  समन्वय :-
इस विधि में समस्त विषयों को ध्यान में रखकर शिक्षण कराया जाता है और प्रोजेक्ट के माध्यम से समन्वय स्थापित किया जाता है।
(4.)मितव्ययता :-
विद्यार्थी प्रोजेक्ट को दिए गए खर्च में ही पूरा करने का प्रयास करते हैं जिससे उनमें मितव्ययता का भाव उत्पन्न होता है।
 (5.)वास्तविकता (Reality) :-
 प्रोजेक्ट के लिए जो भी कार्य कराया जाता है वह वास्तविक परिस्थितियों के अनुकूल होता है।
 (6.)सामाजिकता (Socialisation) :-
  प्रोजेक्ट विधि में विद्यार्थियों द्वारा लिया गया कार्य आपस में मिलजुल कर पूरा किया जाता है जिससे उनमें सामाजिकता का विकास होता है।
 (7.)स्वतंत्रता (Freedom) :-
 इस विधि में विद्यार्थी को प्रोजेक्ट को चुनने की पूरी स्वतंत्रता होती है। इस विधि प्रारम्भ से लेकर अन्त प्रोजेक्ट को पूरा करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।
 (8.)प्रयोजन (purposiveness) :-
 जो प्रोजेक्ट विद्यार्थियों को दिया जाता है उसका निश्चित उद्देश्य होना चाहिए जिससे विद्यार्थियों में उस प्रोजेक्ट को पूरा करने की लगन बनी रहे।

 2(3.)प्रायोजना विधि के पद -

 (1.)परिस्थिति प्रदान करना (providing a situation):-
 अध्यापक विद्यार्थियों की योग्यता एवं क्षमताओं के आधार पर वैसी ही स्थिति प्रदान करे जिसमें प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए दोनों की रुचि बनी रहे तथा परिस्थिति ऐसी हो जिसमें कुछ समस्याएं हों।
 (2.)चयन और उद्देश्य ( selection and objective) :-
 इस पद के अन्तर्गत अध्यापक विद्यार्थियों द्वारा जिन जिन परिस्थितियों का चयन किया गया है वे उनसे सम्बन्धित समस्याओं पर विचार विमर्श करेंगे और प्रोजेक्ट के रुप में ऐसी समस्या का चयन करेंगे जिसमें विद्यार्थियों की रुचि हो। विद्यार्थियों पर गलत परियोजना को लादना नहीं चाहिए।
 (3.)योजना बनाना (planning) :- प्रोजेक्ट के चयन के पश्चात विद्यार्थियों को उसके अनुसार विस्तृत योजना बनानी चाहिए तथा कोई समस्या हो तो वार्ता द्वारा समाधान करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
 (4.)लागू करना या कार्यान्वित करना (Executing the project) :-
 प्रोजेक्ट की योजना बन जाने के बाद सभी विद्यार्थियों को अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार अपना कार्य प्रारंभ करते हैं। शिक्षक को उनके कार्य में सहायता व सहयोग देना चाहिए।
(5.)कार्य का मूल्यांकन (Evaluating the Project) :-प्रोजेक्ट समाप्त होने के बाद विद्यार्थी को उसका मूल्यांकन करना चाहिए कि उसका उद्देश्य कहाँ तक पूर्ण हुआ और क्या कमी रही गई है जिससे उसे आगे के प्रोजेक्ट में दूर किया जा सके ।
(6.)कार्य का लेखा जोखा रखना (Recording) :- परियोजना सम्बन्धित समस्त कार्य का रिकार्ड विद्यार्थियों को रखना चाहिए अर्थात् उसे प्रोजेक्ट की योजना, उसे लागू करने सम्बन्धी नियम, उद्देश्य और मूल्यांकन से सम्बंधित समस्त रिकार्ड रखना चाहिए इसमें खर्च की गई धनराशि पुस्तकें, चाॅर्ट, माॅडल आदि सम्मिलित हैं ।इनको रखने से उसे भविष्य में जब कोई प्रोजेक्ट तैयार करेगा तो लाभ मिलेगा उसे ध्यान रहेगा कि अब उसे क्या क्या करना होगा?
(7.)सुझाव (suggestion) :-
ये सुझाव प्रोजेक्ट पूर्ण होने के पश्चात अन्त में दिए जाते हैं ।जो कमियाँ विद्यार्थियों ने महसूस की हैं उन कमियों को बताया जाता है ।इन सुझावों का लाभ यह है कि भविष्य में उसे ध्यान रहेगा कि ये कमियाँ आगे के प्रोजेक्ट में नहीं करनी हैं ।

2(3.)अच्छी प्रायोजना के गुण ( Merits of a Good Project) -

(1.)विद्यार्थियों और अध्यापक दोनों को सक्रिय रखती हैं, दोनों में से भी विद्यार्थियों को ज्यादा सक्रिय रखती है ।
(2.)प्रोजेक्ट को तैयार करने में उद्देश्य और लाभदायकता का ध्यान रखा जाता है ।
(3.)प्रोजेक्ट से विद्यार्थियों को सीखने को मिलता है ।
(4.)प्रोजेक्ट से स्पष्टता का ज्ञान होता है।
(5.)प्रोजेक्ट समस्या प्रधान होता है जिससे हल करने के लिए विद्यार्थियों को चिन्तन करना होता है ।
(6.)प्रोजेक्ट में होनेवाली गलतियों से विद्यार्थियों को भविष्य में तैयार करनेवाले प्रोजेक्ट में लाभ होता है अर्थात् विद्यार्थी उन कमियों को दूर करने का प्रयास करता है ।
(7.)प्रोजेक्ट विद्यार्थियों को मानसिक व शारीरिक रूप से सक्रिय रखती हैं ।
(8.)प्रोजेक्ट से सामाजिकता और सहयोग करने की प्रवृत्ति का विकास होता है ।
(9.)प्रोजेक्ट से विद्यार्थियों में सृजनात्मकता का विकास होता है ।
(10.)प्रोजेक्ट के अभ्यास से विद्यार्थियों को वास्तविक परिस्थितियों में प्रोजेक्ट को तैयार करने के सीखने का ज्ञान होता है ।
(11.)प्रोजेक्ट से पिछड़े विद्यार्थियों को भी आगे बढ़ने का लाभ होता है ।
(12.)प्रोजेक्ट से रटना का कार्य नहीं होता है ।विद्यार्थी पूर्ण रूप से सक्रिय रहकर लगन और उत्साह से कार्य करते हैं ।इससे प्राप्त ज्ञान, व्यवहार या कौशल स्थायी होता है ।

2(4.)प्रोजेक्ट विधि के दोष(Demerits) -

(1.) प्रोजेक्ट विधि के लिए प्रयोगशाला की आवश्यकता होती है अतः यह विधि खर्चीली है।
(2.)प्रोजेक्ट को पूर्ण करने बहुत सा समय लगता है ।
(3.)गणित विषय में विद्यार्थियों को प्रोजेक्ट तैयार करने में बहुत मुश्किल होती है जिससे विद्यार्थियों को हर कदम पर अध्यापक की सहायता की आवश्यकता होती है जिससे विद्यार्थियों के मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाता है ।
(4.)उच्च कक्षाओं में प्रोजेक्ट विधि से पाठ्यक्रम को पूर्ण नहीं किया जा सकता है ।
(5.)गणित विषय का प्रोजेक्ट तैयार कराने के लिए अध्यापक का अधिकतर समय योजना बनाने, तैयारी करने तथा मूल्यांकन करने में ही व्यतीत हो जाता है ।
(6.)गणित जैसे विषय में अभ्यास कार्य की अत्यंत आवश्यकता होती है परन्तु इसमें अभ्यास कार्य कराने का अभाव रहता है ।
(7.)प्रोजेक्ट विधि निम्न कक्षाओं के लिए तो लाभदायक है परन्तु उच्च कक्षाओं के लिए लाभदायक नहीं है ।
(8.)प्रोजेक्ट विधि के अनुसार पुस्तकें नहीं लिखी जाती है ।
(9.)प्रोजेक्ट विधि से विद्यार्थियों को विस्तृत अध्ययन नहीं कराया जा सकता है ।
(10.)इस विधि में समय बहुत लगता है अतः एक वर्ष में पाठ्यक्रम पूर्ण नहीं कराया जा सकता है ।
2(5.)प्रोजेक्ट विधि में अध्यापक की भूमिका (Role of Teacher in Project Method) -
(1.)अध्यापक को सभी विद्यार्थियों का ज्ञान होना चाहिए और विद्यार्थियों के स्तर के अनुसार ही प्रोजेक्ट दिया जाना चाहिए ।
(2.)अध्यापक को विद्यार्थियों के चरित्र और व्यक्तित्त्व के विकास का भी ध्यान रखना चाहिए ।
(3.)किसी भी प्रोजेक्ट में अध्यापक एक मित्र, सहयोगी और मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है न कि एक कठोर आदेश देने वाले शिक्षक की ।
(4.)अध्यापक को पर्याप्त अनुभव होना चाहिए तथा उसमें पहल करने का गुण भी होना चाहिए ।
(5.)अध्यापक को विद्यार्थियों की स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना चाहिए ।


(6.)अध्यापक को प्रोजेक्ट के प्रारम्भ से लेकर अन्त तक सजग व सतर्क रहना चाहिए ।



(3.)समस्या आधारित अधिगम और परियोजना आधारित अधिगम की तुलना  (Compare between Problem-based learning and project-based learning)


दोनों समस्या आधारित अधिगम और परियोजना आधारित अधिगम PBL के रूप में संदर्भित कर रहे हैं, तो कुछ यह दो अलग करने के लिए भ्रमित करने लगता है.

दोनों समस्या आधारित अधिगम और परियोजना आधारित अधिगम PBL के रूप में संदर्भित कर रहे हैं, और कुछ यह दो अध्यापन अलग करने के लिए भ्रमित करने लगता है.
Problem-based learning and project-based learning in math

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तो, क्या अंतर है?समस्या आधारित अधिगम 1960 के दशक में उत्पन्न हुआ है और एक शिक्षण अध्यापन कि छात्र केंद्रित है. छात्रों की समस्याओं के समाधान के माध्यम से एक विषय के बारे में जानने के लिए और आम तौर पर समूहों में काम करने के लिए समस्या का समाधान जहां, अक्सर, वहां कोई एक सही जवाब है । संक्षेप में, ' यह शिक्षार्थियों को अनुसंधान संचालित करने, सिद्धांत और अभ्यास को एकीकृत करने, और ज्ञान और कौशल को एक परिभाषित समस्या के लिए एक व्यवहार्य समाधान विकसित करने के लिए सशक्त करता है, ' (Savery, २००६) ।

परियोजना आधारित अधिगम जॉन Dewey और विलियम Kilpatrick के काम में अपने मूल वापस आ गया है और १९१८ को वापस तिथियां जब शब्द पहले इस्तेमाल किया गया था (Edutopia, २०१४) । परियोजना आधारित अधिगम एक अनुदेशात्मक दृष्टिकोण है जहां छात्र एक जटिल प्रश्न, समस्या या चुनौती की जांच करके सीखते हैं । यह सक्रिय सीखने को बढ़ावा देता है, छात्रों संलग्न, और उच्च क्रम सोच (savery, २००६) के लिए अनुमति देता है । छात्रों को वास्तविक दुनिया की समस्याओं का पता लगाने और एक परियोजना के पूरा होने के माध्यम से जवाब मिल । छात्रों को भी वे परियोजना पर काम किया जाएगा पर कुछ नियंत्रण है, कैसे परियोजना खत्म हो जाएगा, साथ ही अंत उत्पाद ।

मतभेदों को

समस्या आधारित सीखने और परियोजना आधारित सीखने के बीच अंतर यह है कि जो छात्र समस्या को पूरा आधारित सीखने अक्सर परिणामों का हिस्सा है और संयुक्त रूप से शिक्षक के साथ सीखने के लक्ष्यों और परिणामों की स्थापना की । दूसरी ओर, परियोजना आधारित अधिगम एक दृष्टिकोण है जहां लक्ष्य निर्धारित हैं । यह भी काफी तरीका है कि शिक्षण होता है में संरचित है ।

परियोजना आधारित अधिगम अक्सर multidisciplinary और अब है, जबकि समस्या के आधार पर सीखने और एक ही विषय और कम होने की संभावना है । सामान्यतया , प्रोजेक्ट-आधारित लर्निंग सामान्य  चरणों का पालन करते समय समस्या-आधारित शिक्षण विशिष्ट चरण प्रदान करता है । महत्वपूर्ण बात, परियोजना आधारित सीखने अक्सर प्रामाणिक कार्य है कि वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल शामिल है, जबकि समस्या आधारित अधिगम परिदृश्यों और मामलों है कि शायद कम वास्तविक जीवन से संबंधित है (Larmer, २०१४) का उपयोग करता है ।

अंत में, यह शायद छात्रों कि योग्य है और नहीं कार्य का वास्तविक नाम के साथ सक्रिय सीखने के संचालन का महत्व है । दोनों समस्या आधारित और परियोजना आधारित अधिगम आज की कक्षा में अपनी जगह है और 21 वीं सदी के सीखने को बढ़ावा कर सकते हैं ।

संदर्भ

आप अपने कक्षा में परियोजना आधारित सीखने या समस्या आधारित सीखने का इस्तेमाल किया है?

क्या गतिविधियों आप छात्रों को शामिल करने के लिए इस्तेमाल किया?

क्या कोई ऐसा साक्ष्य था जिससे यह पता चल सके कि छात्र अधिक व्यस्त थे?

परियोजना आधारित अधिगम का कार्यांवयन

महत्वपूर्ण सोच का विकास

प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित है, न सिर्फ उत्पाद




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