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Monday, 8 April 2019

Objectives of Teaching Mathematics ||गणित शिक्षण के उद्देश्य

Objectives of Teaching Mathematics(गणित शिक्षण के उद्देश्य):-

Objectives of Teaching Mathematics ||गणित शिक्षण के उद्देश्य

Objectives of Teaching Mathematics ||गणित शिक्षण के उद्देश्य

(1.)भूमिका (Introduction):- 

शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाया जाता है तथा विद्यार्थियों का मानसिक, नैतिक, शारीरिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास किया जाता है. उक्त विकास में शिक्षा संस्थानों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है क्योंकि विद्यार्थी का अधिकांश समय शिक्षा संस्थानों में ही व्यतीत होता है. हालांकि विद्यार्थियों के विकास में परिवार, समाज, विभिन्न संस्थानों, सोशल मीडिया तथा संगठनों का योगदान भी होता है जिनके सम्पर्क में विद्यार्थी आता है.
शिक्षा संस्थानों में विभिन्न विषयों के अध्यापन का अपना अपना महत्त्व तथा उपयोगिता है. प्रत्येक विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने का एक मकसद होता है. प्रत्येक विषय का अध्ययन करके उस मकसद को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है. इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाता है. इन विषयों को पढ़ाने के लिए दोनों पक्षों पर ध्यान दिया जाता है. सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक पक्ष. यदि हम सैद्धान्तिक पक्ष पर ही अधिक बल देते हैं तो विद्यार्थी को जीवन में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. इसलिए विद्यार्थी के दोनों पक्षों पक्षों सैद्धान्तिक व व्यावहारिक पक्ष के विकास पर बल देना चाहिए.

(2.)गणित शिक्षा की अनिवार्यता(Compulsarry of Mathematics Education) :- 

अधिकांश विद्यार्थी मैट्रिक पास करके जीवन के व्यावहारिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, उनको जीविकोपार्जन हेतु दूकानों, कुटीर उद्योग, किर्यालयों, फैक्ट्रियों, बैंकों तथा विभिन्न व्यवसायों में काम करना पड़ता हैं. आज का युग तकनीकी युग है तथा हस्त कार्य के बजाए मशीनों, कम्प्यूटरों तथा तकनीकी के इस्तेमाल का प्रयोग दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. हर व्यवसाय में संख्याओं, लाभ-हानि, गुणा-भाग, प्रतिशत, ब्याज तथा संख्याओं की गणना करने की आवश्यकता होती है. यदि विद्यार्थी गणित में पिछड़ा हुआ रह जाता है तो ऐसे विद्यार्थी को जीवन में नीचा देखना पड़ता है. इस प्रकार के विद्यार्थी को किसी व्यवसाय काम देने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता है. किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में गणित, मानसिक क्षमता की परीक्षा ली जाती है. बहुत से माता-पिता, अभिभावक यह सोचते हैं कि विद्यार्थी को इंजीनियर, डाक्टर, आई. ए. एस., आर. ए. एस. अथवा इसी प्रकार के किसी व्यवसाय में तो भेजना नहीं है तो फिर गणित के ज्ञान की क्या आवश्यकता है?
उच्च प्राथमिक कक्षाओं से पहले विद्यार्थियों का मानसिक विकास ठीक तरह से नहीं हो पाता है. उनको इस बात का ज्ञान नहीं हो पाता है कि कौनसा विषय लें जो उनके लिए लाभदायक हो सकता है. प्राय: विद्यार्थी अपने सहयोगियों, सहपाठियों और मित्रों की सलाह से विषय चुन लेते हैं और आगे जाकर उनकों उसमें कठिनाईयां महसूस होती है तो उसे छोड़ देते हैं. गणित विषय को अनिवार्य करने पर ऐसी कठिनाई महसूस नहीं होती है. यो भी हर व्यवसाय में गणित के ज्ञान की आवश्यकता होती है. मजदूर से लेकर जोक मुश्किल से अपनी आजीविका चलाता है वित्तमंत्री तक जिसे करोड़ों रुपयों के बजट का अवलोकन करना पड़ता है और हिसाब रखना पड़ता है, बड़े बड़े उद्योगपतियों मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी जो अरबों रूपयों का व्यवसाय करते हैं कहने का तात्पर्य यह है कि हर मनुष्य को गणित के ज्ञान की आवश्यकता होती है. इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि गणित की आधुनिक युग में मनुष्य को कदम कदम पर आवश्यकता होती है और उसके लिए उपयोगी हो सकती है. अन्य सब विषयों की उपयोगिता गणित के बिना अधूरी है. इसलिए गणित का स्कूल के पाठ्यक्रम में सर्वाधिक महत्त्व है.

Objectives of Teaching Mathematics

(3.)गणित का व्यावहारिक जीवन में उपयोग(Utilitarian or Practical object of Mathematics):-

दैनिक जीवन में गणित का हरक्षेत्र में, हर छोटे-छोटे कार्यों में जैसे बाजार में कोई वस्तु के क्रय विक्रय करने, बस किराया चुकाने, मजदूरी चुकाने, दूध का हिसाब करने, रसोईघर के सामान को खरीदने, ब्याज की गणना, पुस्तकें खरीदते समय, बट्टा का हिसाब लगाने, वस्तुओं के खरीदने बेचने में लाभ-हानि की गणना करने में हर कहीं गणना करने की आवश्यकता होती है. किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले मनुष्य जैसे डाक्टर, वकील, इंजीनियर, व्यापारी, मजदूर, किसान, कंडक्टर, क्लर्क, व्याख्याता, शिक्षक, पटवारी, लेखपाल (एकाउन्टेन्ट) इत्यादि को कहीं न कहीं गणित के ज्ञान की आवश्यकता होती है. इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आधुनिक युग में गणित ही मुख्य आधार है. विज्ञान की जितनी भी खोजें हुई हैं जैसे भाप का इंजन, कंप्यूटर, टेलीफोन, हवाई जहाज इत्यादि जितनी भी खोजें हुई है और उन अत्याधुनिक सुविधाओं का हम उपभोग कर रहें हैं उनमें गणित का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है.

व्यावहारिक जीवन में गणित की इतनी अधिक उपयोगिता समझते हुए य। यह आवश्यक है कि विद्यार्थियों में गणित के प्रति रुचि जाग्रत करें और उसका सदुपयोग समझाएं. गणित को सरल विधि तथा प्रभावशाली ढंग से पढ़ाएं जिससे विद्यार्थियों का जीवन उन्नत और प्रगतिशील बनें. हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि विद्यार्थी गणित शिक्षा संस्थानों में ही सीखता है वह हर कहीं घर-परिवार, समाज, विभिन्न संगठनों के अनुभव और आवश्यकता के आधार पर गणित का ज्ञान प्राप्त करता रहता है. अतः प्रत्येक शिक्षक का दायित्व है कि गणित को रुचिकर व उपयोगी बनाने में अपना सहयोग दें.

(2.)सांस्कृतिक उद्देश्य (cultural Object of Mathematics):- 

समाज की संस्कृति और विरासत को आगे बढ़ाने में भी गणित का योगदान है. गणित के सहयोग से मनुष्य में तर्कशक्ति का विकास होता है. आज का युग तकनीकी और विज्ञान का युग है, बिना गणित के ज्ञान के मनुष्य विज्ञान और तकनीकी ज्ञान को समझ भी नहीं सकता है तथा उसे समाज के लिए उपयोगी नहीं बना सकता है. समाज में जो पुरानी रूढ़िवादी प्रथाएं हैं जैसे ऊँच-नीच, गरीबी, अज्ञानता, निरक्षरता, बाल विवाह, अन्धविश्वास इत्यादि को हटाने में गणित का महत्त्वपूर्ण योगदान है क्योंकि गणित के द्वारा तर्कशक्ति का विकास होता है. इसलिए हर परम्परा को तर्क के आधार पर देखता और समझता है तथा और तर्क के आधार पर अगर कोई परम्परा सही है तो ही उसे स्वीकार करता है और अपनाता है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास में भी गणित का महत्त्वपूर्ण योगदान है क्योंकि समस्याओं के समाधान में चिन्तन और तर्क शक्ति की आवश्यकता होती है. चिन्तन और तर्कशक्ति का सबसे अधिक विकास गणित और तर्कशास्त्र से सम्भव है और तर्कशास्त्र में भी गणित के नियमों और सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार वर्तमान समाज को आधुनिक, प्रगतिशील और व्यापक विचारधारा युक्त बनाने में गणित का अतुलनीय योगदान है.

गणित पढ़ाने के लिए तर्कशक्ति के विकास का ध्यान रखना सूचनाओं को याद रखने की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है. अतः शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों पर इस बात का फोकस रखना चाहिए कि उन्हें तथ्यों को याद कराने की बजाए उनमें तर्कशक्ति का विकास हो. केवल गणित का सैद्धांतिक ज्ञान व व्यावसायिक ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि गणित का ज्ञान इस प्रकार कराया जाना चाहिए कि वह समाज और देश की प्रगति में किस प्रकार तथा कैसे अधिक से अधिक उपयोगी हो सकता है. अर्थात् शिक्षा संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उसके व्यवहार से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि वह एक सभ्य तथा व्यावहारिक नागरिक है तथा समाज के लिए उपयोगी हो सकता है. वैज्ञानिक युग के लिए उसे गणित का अच्छा ज्ञाता होना चाहिए परन्तु समाज व देश के लिए भी उसे विज्ञान से अधिक उपयोगी और व्यावहारिक साबित करनेवाला होना चाहिए. आज कि शिक्षा का यह मुख्य उद्देश्य होना चाहिए.

(3.)अनुशासनिक उद्देश्य (Disciplinary Object) :- 

(1.)गणित शिक्षण से विद्यार्थियों में अनेक मानसिक और अनुशासनात्मक गुणों का विकास होता है. इसके अध्ययन से छात्र-छात्राओं में तर्क शक्ति, चिन्तन, वाद-विवाद, पक्ष-विपक्ष में अपनी बात रखना, सत्य का अन्वेषण करना, निर्णय लेना, क्रमबद्ध अध्ययन, कठिन परिश्रम करने की क्षमता, समय का पालन करना, गम्भीरता, धैर्य आदि गुणों का विकास होता है.

(2.)गणित के अध्ययन से छात्र-छात्राओं में ध्यान, धारणा, एकाग्रता की शक्ति का विकास होता है क्योंकि विद्यार्थी गणित के प्रश्नों को हल करने के प्रति समर्पित होता जाता है तो उसमें अनजाने में ही एकाग्रता, ध्यान जैसे गुणों का विकास हो जाता है जिसे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि बहुत तपस्या करके अर्जित करते हैं, गणित की समस्याओं का हल करना और बार-बार अभ्यास करना, कठिन से कठिन प्रश्नों को हल करना भी एक तपस्या ही है और तप से ही ध्यान और एकाग्रता जैसे गुण अर्जित होते हैं.
(3.)गणित से विवेक तथा कल्पना शक्ति भी जाग्रत होती है. गणित को हल करने में कल्पना शक्ति का सहारा लेना पड़ता है इसमें कई तरह की कल्पना की जाती है परन्तु की विशेष समस्या को हल करने के लिए कौनसी कल्पना उपयुक्त हो सकती है इसके लिए विवेक की आवश्यकता होती है. इससे विद्यार्थी में गणित के द्वारा विवेक और कल्पना शक्ति का विकास होता है.
(4.)गणित के सतत अभ्यास और अध्ययन से विद्यार्थियों में आत्म-विश्वास अर्थात् अपने आपको पहचानने, अपनी छिपी हुई प्रतिभा और शक्तियों को पहचानकर उन्हें प्रकट करने में सहयोग मिलता है. ज्यों ज्यों विद्यार्थी का आत्मविश्वास अर्थात् अपनी आत्मशक्ति, अपनी छिपी हुई योग्यता प्रकट होती जाती है त्यों त्यों उसे बाहरी सहायता जैसे पुस्तकीय ज्ञान तथा शिक्षकों पर निर्भरता कम होती जाती है तथा स्वयं के चिन्तन एवं मनन पर विश्वास बढ़ता जाता है, अपनी सोई हुई आत्म-शक्ति जाग्रत होती जाती है.
(3.)गणित के अध्ययन से कठिन परिश्रम और क्रमबद्धता का विकास होता है क्योंकि केवल परीक्षा के दिनों में रटकर पास करना मुश्किल है. अतः विद्यार्थी सत्र के आरम्भ से ही गणित में कठिन परिश्रम तथा नियमित अध्ययन करता है और इन्हीं गुणों के कारण गणित पर अच्छी पकड़ हो सकती है अर्थात् गणित का गहरा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है.
(6.)गणित से विद्यार्थी चरित्रवान और अध्यवसायी बनता है. दरअसल झूठ, पाखंड, आलस्य, बेईमानी जैसे दुर्गुण विद्यार्थी में तभी प्रवेश करते हैं जब कि उसके पास फालतू समय होता है और फालतू समय को वह बुरे मनुष्यों के साथ व्यतीत करता है, गणित के विद्यार्थियों के पास हमेशा समय की कमी रहती है. जो भी समय रहता है उसे अध्ययन करने, सत्य का अन्वेषण और गणित पर अच्छा अधिकार रखने में व्यतीत करता है. इस प्रकार उसमें स्वत: ही चारित्रिक, अध्ययनशील, सत्यनिष्ठ जैसे मानवीय गुणों का विकास होता है.
(7.)गणित के विद्यार्थी में सादगी, सरलता का प्रवेश हो जाता है. दरअसल अच्छे कार्य को कठिन परिश्रम से करने पर उसमें सरलता व सादगी जैसे गुणों का विकास होता है. कठिन परिश्रम और कठिन समस्याएं मनुष्य को विनम्र व सरल बना देती हैं क्योंकि ज्यों-ज्यों हम कठिन समस्याओं का करते हैं तो हमारे अन्दर अहंकार मिटता जाता है और हम समझते हैं कि अभी तो मैंने बहुत कम ज्ञान प्राप्त किया है, सीखा है. गणित का ज्ञान तो अथाह समुद्र हैं औ उसमें गोते लगाते हैं तो उससे सरलता, सादगी और विनम्रता जैसे गुणों का विकास होता जाता है और हमारा अहंकार कम होता जाता है.
(4.)मानसिक और बौद्धिक शक्ति का विकास :-गणित की समस्याओं को हल करने के लिए विद्यार्थी को मस्तिष्क का प्रयोग करना पड़ता है. ज्यों ज्यों विद्यार्थी समस्याओं को हल करता है उसमें जिज्ञासा और लगन बढ़ती जाती है. नई - नई समस्याओं और कठिन से कठिन समस्याओं का समाधान करने से विद्यार्थी की मानसिक और बौद्धिक शक्ति का विकास होता हैं. परन्तु इसके लिए उसमें लगन व उत्साह का होना आवश्यक होता है. जब वह किसी समस्या को हल करने में असफल हो जाता है तथा बार-बार उसे हल करने का प्रयास करता है और इस सूत्र को याद रखता है "Try and Try again you will success at last" अर्थात् चरेवेति चरेवेति यानि आगे बढ़ते रहो तो इससे विद्यार्थी में मानसिक और बौद्धिक शक्ति का विकास होता.

निष्कर्ष :- मानव जीवन में कोई कार्य क्यों किया जाता हैं? भारतीय दर्शन में उसे मोक्ष या आनंद कहा गया है. गणित का अध्ययन भी अपनी चरम सीमा पर प्राप्त होने लगता है तो उसे आनन्द की प्राप्ति होती है मोक्ष की प्राप्ति होती है. महर्षि पतञ्जलि ने अष्टांग-योग में बताया है कि "यम, नियम, आसन, प्राणायाम,ध्यान, धारणा, समाधि से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग बताया है. समाधि ही आनंद अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति की अन्तिम स्थिति है. हमारा साधन कोई सा भी हो सकता है. गणित से भी आप ध्यान, धारणा, समाधि अर्थात् आनंद की स्थिति का अनुभव कर सकते हैं. यह समाधि की स्थिति का ज्ञान हम हमारे सैद्धान्तिक ज्ञान के आधार पर ही बता रहें हैं क्योंकि व्यक्तिगत रूप से हमें समाधि का अभी अनुभव नहीं हुआ हैं. परन्तु हमारे ऋषियों-मुनियों ने यही मार्ग अपने अनुभव और तप के आधार पर बताया है और उसे मान लेने तथा मोक्ष की अवस्था, बोध की अवस्था का अनुभव करने, अपने अस्तित्व का बोध करने में ही हमारा कल्याण है और दूसरों का भी कल्याण है.

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